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टैरिफ़ की जंग में हर चाल मायने रखती है. मेक्सिको के नए शुल्क भारत के लिए भी चुनौती हैं. अमेरिका–चीन टकराव का असर अब ग्लोबल व्यापार पर दिख रहा है.
यह टैरिफ़ का दौर है जिसमें देशों को अपनी आर्थिक नीतियाँ बदलनी पड़ रही हैं. अमेरिकी दबाव और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा के बीच मेक्सिको इसका ताज़ा उदाहरण है जिसने अपनी टैरिफ़ नीति में सख़्त बदलाव किए हैं. मेक्सिको की सीनेट ने जनवरी 2026 से कुछ आयातों पर 50 प्रतिशत तक नए शुल्क मंज़ूर किए हैं जबकि अधिकांश वस्तुओं पर शुल्क 35 प्रतिशत तक बढ़ेगा. ये शुल्क चीन, भारत और कई एशियाई देशों पर लागू होंगे जिनका मेक्सिको के साथ कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं है.
मेक्सिको की सीनेट ने जनवरी 2026 से कुछ आयातों पर 50 प्रतिशत तक नए शुल्क मंज़ूर किए हैं जबकि अधिकांश वस्तुओं पर शुल्क 35 प्रतिशत तक बढ़ेगा.
अमेरिका–मेक्सिको उभरते व्यापार टकराव में मेक्सिको की भूमिका इसलिए अहम है क्योंकि वह अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. ट्रंप प्रशासन के संरक्षणवादी रुख के तहत यह चिंता बढ़ी है कि मेक्सिको चीनी सामानों के लिए ‘डंपिंग ग्राउंड’ और एशियाई निर्यातकों का ट्रांसशिपमेंट केंद्र बन रहा है. अमेरिकी नीति-निर्माताओं का मानना है कि USMCA जैसे मुक्त व्यापार ढाँचों का उपयोग कर चीनी कंपनियाँ अमेरिका तक पहुँच बना रही हैं और सीधे लगाए गए टैरिफ़ से बच रही हैं.
यह स्थिति विशेष रूप से स्टील, एल्युमिनियम, ऑटोमोबाइल पुर्ज़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों जैसे क्षेत्रों में देखने को मिली है जहाँ मेक्सिको में मूल्यवर्धन अक्सर बहुत सीमित होता है लेकिन फिर भी ‘रूल्स ऑफ़ ओरिजिन’ की शर्तें पूरी करने के लिए पर्याप्त माना जाता है. इसी पृष्ठभूमि में, USMCA की समीक्षा से पहले मेक्सिको यह भी दिखाना चाहता है कि वह निष्पक्ष खेल का पक्षधर है और अमेरिकी व्यापार नियमों को कमजोर नहीं कर रहा.
ट्रंप प्रशासन के संरक्षणवादी रुख के तहत यह चिंता बढ़ी है कि मेक्सिको चीनी सामानों के लिए ‘डंपिंग ग्राउंड’ और एशियाई निर्यातकों का ट्रांसशिपमेंट केंद्र बन रहा है.
एशियाई देशों पर उच्च आयात शुल्क लगाने का मेक्सिको का हालिया फ़ैसला आर्थिक और भू-राजनीतिक-दोनों तरह के पुनर्संतुलन को दर्शाता है. एक ओर, यह घरेलू विनिर्माण को बचाने और बढ़ते व्यापार घाटे को नियंत्रित करने की कोशिश है; दूसरी ओर, यह वॉशिंगटन को यह भरोसा दिलाने का प्रयास भी है कि मेक्सिको टैरिफ़ से बचने के रास्ते नहीं खोल रहा और न ही अमेरिकी व्यापार प्रवर्तन को कमजोर कर रहा है. व्यापक स्तर पर देखें तो ये कदम अमेरिकी व्यापार रणनीति और मेक्सिको की औद्योगिक नीति के बीच बढ़ते तालमेल को रेखांकित करते हैं. हालांकि, अमेरिका के साथ मेक्सिको के अपने जटिल रिश्तों ने यह भी दिखा दिया है कि ‘नियरशोरिंग’ चीन-केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं का पूरी तरह बिना रुकावट वाला विकल्प नहीं है.
मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लॉडिया शाइनबाउम ने ट्रंप प्रशासन से सीधे टकराव से बचने में उल्लेखनीय कुशलता दिखाई है. इसके बावजूद, मेक्सिको की नीतियों से यह साफ़ झलकता है कि उसे समझ आ गया है कि अमेरिकी बाज़ार तक निरंतर पहुँच अब अधिक कड़ी निगरानी, सख़्त अनुपालन अपेक्षाओं और अमेरिकी आर्थिक सुरक्षा प्राथमिकताओं के साथ तालमेल की एक मौन मांग के साथ आती है. मेक्सिको में इन मुद्दों पर आंतरिक बहस चली और शुरुआत में कहीं अधिक व्यापक वस्तुओं पर टैरिफ़ लगाने पर विचार किया गया था. इन नए शुल्कों को लेकर देश के व्यापारिक समूहों ने आलोचना भी की है लेकिन सरकार ने स्थानीय उद्योगों की रक्षा, व्यापार असंतुलन को दूर करने और रोज़गार बढ़ाने के तर्क देकर अपना बचाव किया है.
एशियाई देशों पर उच्च आयात शुल्क लगाने का मेक्सिको का हालिया फ़ैसला आर्थिक और भू-राजनीतिक—दोनों तरह के पुनर्संतुलन को दर्शाता है.
भारत–मेक्सिको के बढ़ते आर्थिक रिश्तों के संदर्भ में ये टैरिफ़ भारत के लिए चिंता का संकेत हैं. महामारी के बाद मेक्सिको की अर्थव्यवस्था संभल चुकी है और भारत उसका उभरता व्यापारिक साझेदार है. 2024 में भारत ने मेक्सिको को 8.9 अरब डॉलर का निर्यात और 2.8 अरब डॉलर का आयात किया जिससे भारत को बड़ा व्यापार अधिशेष मिला. ऑटोमोबाइल, पेट्रोलियम, इंजीनियरिंग, रसायन, दवाइयाँ और कृषि प्रमुख क्षेत्र हैं. ऐसे में नए टैरिफ़ द्विपक्षीय व्यापार और कारोबारी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं; अनुमानतः भारत के लगभग 2 अरब डॉलर के निर्यात पर असर पड़ सकता है.
आगे वैश्विक व्यापार अधिक राजनीतिक और अनुपालन-आधारित होगा जहाँ बाज़ार पहुँच रणनीतिक तालमेल पर निर्भर करेगी.
मेक्सिको की टैरिफ़ नीति में बदलाव भारत के लिए अहम सबक़ देता है. अमेरिका–चीन के बीच बढ़ता आर्थिक तनाव कई देशों को वॉशिंगटन से टकराव से बचने के लिए अपनी व्यापार नीतियाँ बदलने पर मजबूर कर रहा है जिसका असर अक्सर उनके अन्य साझेदारों पर पड़ता है. भारत के लिए यह लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार विविधीकरण की चुनौती को उजागर करता है जो अमेरिकी टैरिफ़ अस्थिरता से बचने के लिए ज़रूरी है. आगे वैश्विक व्यापार अधिक राजनीतिक और अनुपालन-आधारित होगा जहाँ बाज़ार पहुँच रणनीतिक तालमेल पर निर्भर करेगी. ऐसे में भारत को अधिक लचीली और सक्रिय व्यापार कूटनीति अपनानी होगी.
यह टिप्पणी मूल रूप से एनडीटीवी (NDTV) में प्रकाशित हुई थी.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...
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