Originally Published India Today Published on Mar 13, 2026 Commentaries 4 Days ago

चीन की रणनीति सीधी है: राजनीति अपनी जगह, कारोबार अपनी जगह. वह ताइवान और तेल-बाजार पर ध्यान रखते हुए ईरान जैसी जंगों में सीधे कूदने के बजाय पर्दे के पीछे कूटनीति, आर्थिक और खुफिया मदद के जरिए अपने हित को सुरक्षित करता है. समझें कि चीन कैसे अमेरिका-विरोधी देशों का समर्थन करता है लेकिन सीधे भिड़कर खुद या अपने कारोबार को जोखिम में नहीं डालता.

ईरान जंग में क्यों चुप है चीन?

वेनेजुएला के मसले पर भी चीन खामोश रहा, और अब अमेरिका-इस्राइल-ईरान जंग के दौरान ज्यादा कुछ बोल नहीं रहा. सवाल है कि चीन ऐसा क्यों कर रहा है? यह सिर्फ सावधानी है या इसके पीछे कोई डीप स्ट्रेटेजी है? चीन की इस रणनीतिक सोच को समझने के लिए उसके बुनियादी हित देखने चाहिए. चीन में एक मजबूत सोच है कि चीन के असली और सबसे अहम हित सिर्फ दो इलाकों से जुड़े हैं. पहला ताइवान, और दूसरा साउथ चाइना सी. इसके बाद दुनिया में चीन की दिलचस्पी मुख्य रूप से व्यापार और कारोबार तक ही रहती है.

कारोबार में चीन अपने साझेदारों और दोस्तों में अमेरिका-विरोधी रुख का स्वागत करता है. लेकिन यह अकेला पैमाना नहीं है. मसलन, चीनी हुकूमत के मुताबिक रूस, सऊदी अरब और इराक लगातार चीन को कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले सबसे बड़े तीन मुल्कों में शामिल हैं.

चीन की इस रणनीतिक सोच को समझने के लिए उसके बुनियादी हित देखने चाहिए. चीन में एक मजबूत सोच है कि चीन के असली और सबसे अहम हित सिर्फ दो इलाकों से जुड़े हैं. पहला ताइवान, और दूसरा साउथ चाइना सी. इसके बाद दुनिया में चीन की दिलचस्पी मुख्य रूप से व्यापार और कारोबार तक ही रहती है.

लेकिन सऊदी अरब कट्टर अमेरिकी समर्थक है, तो इराक को अमेरिका की कठपुतली कहते हैं. इसके बावजूद चीन उनके साथ कारोबार करने से पीछे नहीं हटता. इराक के साथ चीन का दो तरफा व्यापार और डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट ईरान के मुकाबले बहुत ज्यादा है.

तेल, ताइवान और बाजार

चाहे मामला वेनेजुएला का हो या ईरान का, चीन की पहली दिलचस्पी तेल में है और दूसरी बाजारों में. अपने अमेरिका-विरोधी दोस्तों के लिए चीन का पैगाम साफ है- वे अमेरिका का विरोध करते रहें. लेकिन सीधे अमेरिका से भिड़कर न अपने लिए मुसीबत खड़ी करें, न सिर्फ चीन के ही आसरे रहें.

ऐसे ही जब ताइवान का मसला हल करने की बात आएगी, मुमकिन है कि चीन को न तो अपने किसी दोस्त की मदद की जरूरत होगी और न ही वह उससे ऐसी उम्मीद करेगा. चीन को सिर्फ इतना चाहिए कि उसके दोस्त साथ में कारोबार करते रहें. Guancha.com अपने एक लेख में ईरान के मसले पर चीन की प्रतिक्रिया ये लिखकर समझाने की कोशिश करता है, 'अपने मसले खुद हल करो, चीन से बिना शर्त मदद की उम्मीद मत रखो, और हरगिज अपनी मुसीबतों में चीन को मत घसीटो.'

हाल में 2026 के चीन-रूस सान्या डायलॉग में में कहा कि अगर अमेरिका ईरान की हुकूमत गिरा देता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए बहुत बुरा उदाहरण होगा. उन्होंने कहा कि इससे शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन और ब्रिक्स की साख दरकेगी.

लेख में यह भी कहा गया कि जब तक चीन कौमी एकता हासिल नहीं कर लेता और अपने सबसे अहम बुनियादी हितों की हिफाजत नहीं कर लेता, तब तक वो हावी रहने वाली किसी सुपर पावर का रोल नहीं ले सकता. इसलिए चीन को चाहिए कि वह ताइवान और पूर्वी एशिया को अपनी पहली तरजीह बनाए.

छूट न जाएं दोस्त पुराने

चीन के रणनीतिक हल्कों में एक और दलील है कि हाल के दिनों में अमेरिका का वेनेजुएला पर फौजी हमला, कोलंबिया को धमकियां, क्यूबा की नाकेबंदी, और अब ईरान पर हमला उसकी ग्लोबल कॉम्पिटिशन स्ट्रैटिजी है. इन सबकी जड़ में आखिरकार चीन के साथ मुकाबले की सोच है.

अमेरिका और पश्चिमी मुल्क लंबे समय से चीन, रूस, उत्तर कोरिया, क्यूबा, वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों को एक ही ग्रुप में रखते आए हैं. फिलहाल अमेरिका चीन से बच-बचाकर इस ग्रुप के दूसरे देशों को एक-एक करके निशाना बना रहा है. चीन को इस पैटर्न गंभीर रूप से ध्यान देने की जरूरत है. इसलिए उसे खास तौर पर रूस जैसे बाकी देशों के साथ और करीबी तालमेल बनाने की जरूरत है.

चीन पब्लिक डिप्लोमेसी एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वू हाइलोंग ने हाल में 2026 के चीन-रूस सान्या डायलॉग में में कहा कि अगर अमेरिका ईरान की हुकूमत गिरा देता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए बहुत बुरा उदाहरण होगा. उन्होंने कहा कि इससे शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) की साख दरकेगी. इसके साथ ही मध्य पूर्व में चीन और रूस का असर भी समेट दिया जाएगा. इससे दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को कायदे से नुकसान होगा.

लेख में यह भी कहा गया कि जब तक चीन कौमी एकता हासिल नहीं कर लेता और अपने सबसे अहम बुनियादी हितों की हिफाजत नहीं कर लेता, तब तक वो हावी रहने वाली किसी सुपर पावर का रोल नहीं ले सकता.

उनका कहना था कि ईरान का अमेरिका-विरोधी रुख अभी भी चीन और रूस के लिए फायदेमंद है. इससे अमेरिका की ताकत सीमित रखने में मदद मिलती है. उन्होंने यह भी अंदाजा लगाया कि आने वाले दिनों में ईरान की हुकूमत सेफ ही रहेगी. इसलिए चीन और रूस किसी न किसी तरीके से ईरानी हुकूमत को बचाने की कोशिश करें.

चीन कैसे आए बीच में

रिपोर्टों के मुताबिक शायद रूसी खुफिया जानकारी की मदद से ईरान की मिसाइलें और ड्रोन मध्य पूर्व के कई देशों में मौजूद अमेरिकी रडार और एंटी-मिसाइल सिस्टम को तबाह कर चुके हैं. चीन के रणनीतिक विशेषज्ञों का एक हिस्सा  मानता है कि चीन कैसे भी दखल दे, बस कोई बड़ा दखल न हो. वजह यह कि चीन नहीं चाहता कि  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आने वाली चीन यात्रा में कोई रुकावट आए.

कूटनीतिक तौर पर चीन ने अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या की निंदा की. उसने ईरान पर किए हमलों का विरोध किया, ताकि ईरान को कूटनीतिक और नैतिक समर्थन मिले. 8 मार्च को चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा, 'ताकत का मतलब यह नहीं कि वही सही है', और यह भी कहा कि 'दुनिया फिर से जंगल के कानून की तरफ नहीं लौट सकती.'

रिपोर्टों के मुताबिक चीन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ लगातार संपर्क में है. वह मध्य पूर्व में सुलह-सफाई के लिए अपना खास दूत भी भेजने वाला है. चीन चाहता है कि ईरान के साथ उसके कारोबारी रिश्ते बने रहें, ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था ढह जाए.

आने वाले दिनों में चीन कोशिश करेगा कि वह अमेरिका और इस्राइल पर अमन की बातचीत के लिए दबाव बढ़ाए. चीन उनसे यह भी कहेगा कि फौजी हमलों का दायरा और न बढ़ाया जाए, ईरान के नए नेताओं की हत्या की कोशिश न की जाए, और धीरे-धीरे इस जंग की तीव्रता कम की जाए.

आगे की रणनीति

चीन ईरान और मध्य पूर्व के दूसरे देशों में रिश्ते बेहतर बनाने की भी में है, ताकि वे ईरान के खिलाफ एकजुट न हों. रिपोर्टों के मुताबिक चीन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ लगातार संपर्क में है. वह मध्य पूर्व में सुलह-सफाई के लिए अपना खास दूत भी भेजने वाला है.

चीन चाहता है कि ईरान के साथ उसके कारोबारी रिश्ते बने रहें, ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था ढह जाए. इसके साथ-साथ चीन रूस, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को भी प्रोत्साहित कर रहा है कि वे अपने-अपने तरीके से ईरान को फौजी और आर्थिक मदद दें.

कुल मिलाकर चीन ईरान को जरूरी खुफिया जानकारी और दोहरे इस्तेमाल वाली फौजी और नागरिक सप्लाई कैसे भी मुहैया करा सकता है, ताकि ईरान अमेरिका के खिलाफ एक 'लंबी जंग' लड़ सके.


यह लेख पहले इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.

Author

Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh

Antara Ghosal Singh is a Fellow at the Strategic Studies Programme at Observer Research Foundation, New Delhi. Her area of research includes China-India relations, China-India-US ...

Read More +