अमेरिका और इजरायल ने किसी आसन्न ईरानी हमले का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया. उल्टे 28 फरवरी को अपने आकस्मिक हमले के दौरान वार्ता का छलपूर्ण आभास बनाए रखा. उनके पास युद्ध छेड़ने की कानूनी वैधता नहीं थी.
अमेरिका और इजरायल ने किसी आसन्न ईरानी हमले का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया. उल्टे 28 फरवरी को अपने आकस्मिक हमले के दौरान वार्ता का छलपूर्ण आभास बनाए रखा. उनके पास युद्ध छेड़ने की कानूनी वैधता नहीं थी. अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध कानूनी रूप से भी समस्याग्रस्त है. यह अमेरिकी कानून के तहत तो अवैध है ही, क्योंकि इसे यूएस कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त नहीं है, लेकिन यह यूएन चार्टर के तहत भी गैर-कानूनी है, जिसके अनुच्छेद 2(4) में किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग पर रोक लगाई गई है.
अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध कानूनी रूप से भी समस्याग्रस्त है. यह अमेरिकी कानून के तहत तो अवैध है ही, क्योंकि इसे यूएस कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त नहीं है, लेकिन यह यूएन चार्टर के तहत भी गैर-कानूनी है, जिसके अनुच्छेद 2(4) में किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग पर रोक लगाई गई है.
युद्धों के भी अपने नियम-कायदे होते हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आगे के संघर्षों को रोकने के उद्देश्य से यूएन की स्थापना की गई थी और यह युद्ध से संबंधित अंतरराष्ट्रीय कानूनों को संहिताबद्ध करता है. इसके अलावा कुछ संस्थाएं- जिनमें से कुछ यूएन से भी पहले की हैं- यह तय करती हैं कि युद्ध किस प्रकार लड़ा जाना चाहिए (जैसे नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए, न ही अस्पतालों और चिकित्सा कर्मियों को), चाहे युद्ध किसी ने भी और क्यों शुरू किया हो.
संयुक्त राष्ट्र की वैधता
किसी देश के पास कानूनी रूप से युद्ध करने के दो ही रास्ते होते हैं. यूएन के अनुच्छेद 52 के तहत, वास्तविक हमले या आसन्न हमले की स्थिति में आत्मरक्षा के लिए युद्ध किया जा सकता है. लेकिन खतरा वास्तविक और बड़ा होना चाहिए और उस पर प्रतिक्रिया भी उसी के अनुपात में होनी चाहिए. इस प्रतिक्रिया को बाद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की स्वीकृति भी प्राप्त होनी चाहिए. ईरान के मामले में, अमेरिका और इजरायल किसी आसन्न खतरे का प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाए. उल्टे इन दोनों ने 28 फरवरी को अपने आकस्मिक हमले के दौरान वार्ता का एक छलपूर्ण आभास बनाए रखा.
युद्ध का दूसरा कानूनी मार्ग यूएनएससी की अनुमति के माध्यम से है, जो यूएन चार्टर के चैप्टर 7 के अंतर्गत आता है. 1991 का खाड़ी युद्ध, 1950 का कोरियाई युद्ध, 1991-1995 के बीच यूगोस्लाविया में हुए विभिन्न युद्ध, 1992 में सोमालिया में हस्तक्षेप और 2011 में लीबिया में कार्रवाई- इन सभी को संयुक्त राष्ट्र की वैधता प्राप्त थी. यूएन की स्वीकृति के लिए सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्य- अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन का समर्थन आवश्यक होता है. अमेरिका और इजरायल ने इन दोनों ही सीमाओं की अनदेखी की. देशों के भी अपने-अपने कानूनी ढांचे और प्रक्रियाएं होती हैं. अमेरिका में किसी भी युद्ध के लिए यूएस कांग्रेस की अनुमति आवश्यक होती है. अमेरिकी संविधान का अनुच्छेद 1, धारा 8 कांग्रेस को युद्ध घोषित करने का एकमात्र अधिकार देता है. 1973 का वॉर पावर्स रिज़ोल्यूशन राष्ट्रपति को सशस्त्र बलों को युद्ध में शामिल करने से पहले कांग्रेस से परामर्श करने और 60-90 दिनों के भीतर उन्हें वापस बुलाने के लिए बाध्य करता है, जब तक कि कांग्रेस उनकी तैनाती को अधिकृत न कर दे. इसी कारण ट्रंप प्रशासन इस युद्ध को ‘सैन्य अभियान’ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.
अतीत में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय और हेग स्थित उसके पूर्ववर्ती ट्रिब्यूनलों द्वारा युद्ध अपराधों के लिए नेताओं पर मुकदमा चलाकर उन्हें दंडित किया गया है. इसमें कुछ सर्वियाई और अफ्रीकी नेता शामिल रहे हैं. लेकिन अमेरिका, चीन, भारत, इजरायल, रूस ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र को स्वीकारने से इनकार किया है.
युद्ध के संचालन के तरीके भी कई प्रश्न उत्पन्न होते हैं. युद्ध कैसे लड़े जाएं, यह हेग और जिनेवा कन्वेंशन में निर्धारित है. लेकिन युद्ध में ही, अमेरिका ने कई नियमों का उल्लंघन किया है. एक या अधिक व्यक्तियों की जानबूझकर हत्या न केवल 1949 के जिनेवा कन्वेंशन, बल्कि 1996 के उसके अपने वॉर क्राइम्स एक्ट का भी उल्लंघन है. 28 फरवरी को मिनावा में 175 स्कूली बच्चों की मौत की भी जांच की जानी चाहिए.
एक अन्य मुद्दा है ऐसी संपत्ति का विनाश, जिसे सैन्य आवश्यकता से उचित नहीं ठहराया जा सकता— तेल रिफाइनरियां, डिसैलिनेशन प्लांट्स और 10,000 से अधिक नागरिक इमारतों को निशाना बनाना इसी श्रेणी में आता है, क्योंकि इसे सामूहिक दंड माना जाता है. यह भी निर्धारित है. 1899 और 1907 के हेग कन्वेंशन यह निर्धारित करते हैं कि किन हथियारों का उपयोग किया जा सकता है और युद्ध किस प्रकार संचालित किए जाएं.
क्या ये दोनों देश इन अवैध कार्रवाइयों के लिए कभी जवाबदेह ठहराए जाएंगे? अतीत में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय और हेग स्थित उसके पूर्ववर्ती ट्रिब्यूनलों द्वारा युद्ध अपराधों के लिए नेताओं पर मुकदमा चलाकर उन्हें दंडित किया गया है. इसमें कुछ सर्वियाई और अफ्रीकी नेता शामिल रहे हैं. लेकिन अमेरिका, चीन, भारत, इजरायल, रूस ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र को स्वीकारने से इनकार किया है. इससे दुर्भाग्यपूर्ण रूप से जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति बन जाती है.
यह लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.
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Manoj Joshi is a Distinguished Fellow at the ORF. He has been a journalist specialising on national and international politics and is a commentator and ...
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