अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला में अपनाए गए रुख को देखते हुए ईरान में असंतोष का नेतृत्व करने वाले समूहों को यह उम्मीद है कि उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है. डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ऐसे संकेत भी दिए गए हैं कि यदि प्रदर्शनकारियों को मृत्यु-दंड दिया गया तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा.
ईरान एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में है. आंतरिक असंतोष, लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंध और अमेरिका की कड़ी चेतावनियों ने वहां की स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है. इस पूरे घटनाक्रम पर रूस और चीन की भी पैनी नजर है, जो ईरान में यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं.मिडिल ईस्ट पहले से ही सत्ता संघर्षों से जूझ रहा है. ऐसे में ईरान में किसी भी तरह की बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसका असर पूरे क्षेत्र और वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ेगा. यही वजह है कि ईरान का मौजूदा संकट पूरे दुनिया के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा बन गया है. ईरान की अस्थिरता न केवल क्षेत्रीय संकट है, बल्कि एक नए कोल्ड वॉर की आहट भी हो सकती है.
ईरान लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों और आंतरिक दबावों से जूझ रहा है. इन प्रतिबंधों ने आम जनता में गहरा असंतोष पैदा किया है, जो अब चरम पर पहुंच चुका है. इस आंतरिक असंतोष के अलावा अमेरिका का दबाव भी मौजूद है, जिससे स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है. मिडिल ईस्ट वैसे भी पहले से ही अस्थिरता और सत्ता संघर्षों से गुजर रहा है. इस क्षेत्र में शिया-सुन्नी विवाद और इजराइल-ईरान के बीच की वैचारिक व सामरिक दुश्मनी से तनाव पसरा हुआ है. यदि यह तनाव और बढ़ता है तो पूरा मिडिल ईस्ट ही अस्थिरता की चपेट में आ सकता है.
ईरान में किसी भी तरह की बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसका असर पूरे क्षेत्र और वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ेगा.
इस समय दुनिया में शक्ति के तीन केंद्र हैं - अमेरिका, रूस और चीन. और तीनों ही ईरान को लेकर सक्रिय हैं. एक तरफ अमेरिका है, जो लंबे समय से ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाशता रहा है. यदि अमेरिका के समर्थन से वहां सत्ता परिवर्तन होता है, तो रूस और चीन की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आना तय है. रूस तो साफ कह चुका है कि वह ईरान में किसी भी तरह के अमेरिकी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा. चीन का भी ईरान में गहरा रणनीतिक और आर्थिक दखल है. वेनेजुएला का उदाहरण सामने है, जहां चीन ने बड़े पैमाने पर निवेश किया था, लेकिन मादुरो के हटते ही उसका निवेश जोखिम में आ गया. इसी अनुभव के चलते चीन ईरान को लेकर अत्यंत सतर्क है.
अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला में अपनाए गए रुख को देखते हुए ईरान में असंतोष का नेतृत्व करने वाले समूहों को यह उम्मीद है कि उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है. डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ऐसे संकेत भी दिए गए हैं कि यदि प्रदर्शनकारियों को मृत्यु-दंड दिया गया तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा. हालांकि अब ईरान ने कहा है कि वह प्रदर्शनों से संबंधित किसी भी शख़्स को मृत्यु-दंड देने की तैयारी में नहीं है. ऐसे में दोनों पक्षों की ओर से डी-एस्केलेशन यानी टकराव को टालने की संभावना कुछ हद तक बढ़ती दिख रही है. हालांकि ट्रंप हमेशा से अनप्रेडिक्टेबल रहे हैं. इसलिए कल क्या होगा, यह आज नहीं कहा जा सकता.
रूस और चीन, दोनों ही ईरान में यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं, क्योंकि मौजूदा सत्ता-संरचना उन्हें रणनीतिक रूप से सूट करती है. अगर अमेरिका सैन्य कार्रवाई करता है तो हालात और बिगड़ने की आशंका बढ़ जाएगी. ऐसे में दुनिया कोल्ड वॉर जैसे हालात की ओर बढ़ सकती है, जहां एक तरफ अमेरिका होगा और दूसरी ओर रूस तथा चीन. इसके बाद रूस और चीन के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसलिए ईरान की अस्थिरता केवल एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती बन सकती है.
रूस तो साफ कह चुका है कि वह ईरान में किसी भी तरह के अमेरिकी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा. चीन का भी ईरान में गहरा रणनीतिक और आर्थिक दखल है. वेनेजुएला का उदाहरण सामने है, जहां चीन ने बड़े पैमाने पर निवेश किया था, लेकिन मादुरो के हटते ही उसका निवेश जोखिम में आ गया.
सत्ता परिवर्तन अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन उसके बाद स्थिति को नियंत्रित करना कहीं अधिक कठिन. इराक, लीबिया और सीरिया जैसे उदाहरण बताते हैं कि जब पावर वैक्यूम पैदा होता है, तो अलग-अलग गुट, मिलिशिया और सशस्त्र समूह सत्ता पर कब्ज़ा जमाने की कोशिश करने लगते हैं. ईरान में वर्तमान में हो रहे प्रदर्शनों का कोई संगठित नेतृत्व नहीं है. ट्रंप पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका ईरान में अपनी जमीनी सेना नहीं भेजेगा. इसी वजह से ईरान में संभावित सत्ता परिवर्तन शांति के बजाय लंबे समय तक चलने वाले संकट का कारण बन सकता है.
मिडिल ईस्ट में अस्थिरता भारत के हित में नहीं है. भारत ने हमेशा अरब देशों, ईरान और इज़राइल के बीच संतुलन बनाकर अपनी विदेश नीति को आगे बढ़ाया है. हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि समय के साथ ईरान के साथ भारत के रिश्तों में चुनौतियां बढ़ी हैं. ईरान के साथ भारत का व्यापार घटा है और उससे तेल आयात भी कम हुआ है. भले ही हाल के वर्षों में भारत के रणनीतिक और आर्थिक दांव इज़राइल और अरब देशों पर अधिक लगे हों, लेकिन भारत मोटे तौर पर यही चाहेगा कि इस क्षेत्र में अस्थिरता न बढ़े. किसी भी तरह की उथल-पुथल से भारत के समक्ष आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक हितों के सामने गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.
चाबहार परियोजना को लेकर भारत ने अमेरिका के समक्ष बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह उसके लिए रणनीतिक रूप से अहम है. अमेरिका ने इस बात को समझा भी है और इसी कारण ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों में चाबहार को भारत को मामले में लगातार रियायत मिलती रही है. चाबहार के पहले चरण का काम पूरा हो चुका है, लेकिन दूसरे चरण का भविष्य पूरी तरह से क्षेत्रीय स्थिरता पर निर्भर करता है. यदि ईरान पर सैन्य हमला होता है या वहां आंतरिक अस्थिरता बढ़ती है, तो ईरान की प्राथमिकताएं बदल जाएंगी और चाबहार जैसी दीर्घकालिक परियोजनाएं अधर में लटक सकती हैं.
चाबहार प्रोजेक्ट भारत के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है, जिस पर करोड़ों डॉलर खर्च हो चुके हैं. इसके माध्यम से भारत, पाकिस्तान की भूमि का उपयोग किए बिना सीधे अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच सकता है. यह बंदरगाह ‘इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने का एक छोटा और सस्ता रास्ता प्रदान करता है. इसके अलावा यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जिसे चीन विकसित कर रहा है) से मात्र 70–100 किमी की दूरी पर स्थित है, जिससे भारत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति भी बनाए रख सकता है.
यह लेख दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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