इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता अविश्वास और परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर गतिरोध के कारण विफल रही. अमेरिका परमाणु प्रगति रोकने पर जोर दे रहा था, जबकि ईरान प्रतिबंधों से राहत और व्यापक क्षेत्रीय समझौते चाहता था.
इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान की वार्ता पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं, लेकिन इसके परिणाम सकारात्मक नहीं रहे. इस वार्ता का विफल होना राजनयिक कुप्रबंधन कम, बल्कि उस बुनियादी जड़ता को ही अधिक रेखांकित करता है, जो आज भी दोनों देशों के संबंधों को परिभाषित करती है. दोनों पक्षों के वरिष्ठ नेतृत्व की मौजूदगी और उच्चस्तरीय संपर्क के बीच यह वार्ता अतिवादी मांगों, गहरे अविश्वास और असंगत रणनीतिक दृष्टिकोण के बोझ तले दबी रही.
इस्लामाबाद वार्ता का परिणाम प्रक्रिया की विफलता नहीं, बल्कि गतिरोध से भरी उन परिस्थितियों का ही एक पूर्वानुमानित परिणाम रही, जिन परिस्थितियों को बदलने के लिए दोनों ही पक्षों में न तो कोई सक्षम दिख रहा था और न ही इसके लिए तैयार. इस गतिरोध का एक अहम पहलू है परमाणु हथियारों को लेकर ईरान का मोह. स्वाभाविक है कि ईरान यह मोह नहीं छोड़ना चाहता. वहीं अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि ईरान को न केवल परमाणु मोर्चे पर हुई प्रगति को पीछे छोड़ना होगा, बल्कि उस तकनीकी क्षमता से भी वंचित होना पड़ेगा जो भविष्य में उसे परमाणु शक्ति से संपन्न करने में सहायक बने. परमाणु की यह पहेली ईरान के लिए उसकी संप्रभुता का सवाल बन गई है.
इस्लामाबाद वार्ता का परिणाम प्रक्रिया की विफलता नहीं, बल्कि गतिरोध से भरी उन परिस्थितियों का ही एक पूर्वानुमानित परिणाम रही, जिन परिस्थितियों को बदलने के लिए दोनों ही पक्षों में न तो कोई सक्षम दिख रहा था और न ही इसके लिए तैयार.
वार्ता के दायरे और महत्वाकांक्षाओं को लेकर उपजे मतभेदों ने भी इसे और जटिल बना दिया. अमेरिका जहां परमाणु प्रतिबंध और होर्मुज जलमार्ग में स्वतंत्र एवं मुक्त आवाजाही जैसे सीमित उद्देश्यों के साथ वार्ता की मेज पर आया, वहीं ईरान का एजेंडा कहीं अधिक व्यापक था. ईरान केवल तनाव घटाने की मांग के साथ ही सामने नहीं आया, बल्कि उसने पश्चिम के साथ अपने संबंधों के नए सिरे से संयोजन की मांग रखी. इस पुनर्संयोजन में प्रतिबंधों से राहत, जब्त की हुई परिसंपत्तियों तक निर्बाध पहुंच, हालिया सैन्य हमलों से हुए नुकसान की भरपाई का मुआवजा और एक व्यापक क्षेत्रीय युद्धविराम शामिल था, जिसमें हिजबुल्ला जैसे सहयोगियों के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाइयों पर रोक भी शामिल थी. वार्ता के इस ढांचे में मौजूद विसंगतियों ने पहले से ही सुनिश्चित कर दिया कि बात नहीं बनने वाली. जहां वाशिंगटन इसे एक तात्कालिक संकट के रूप में देखते हुए फौरी राहत पर जोर दे रहा था तो तेहरान को यह अपने समीकरणों को नए सिरे से तय करने का अवसर महसूस हुआ. यानी अमेरिका बस आग को बुझाना चाहता था और ईरान की मंशा अपने क्षतिग्रस्त भवन के नए सिरे से निर्माण की थी.
दोनों पक्षों के बीच होर्मुज जलमार्ग एक अहम बिंदु बन गया है. अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए इस जलमार्ग के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करना एक रणनीतिक आवश्यकता है. इसीलिए वाशिंगटन का आग्रह रहा कि परस्पर विश्वास बहाली के लिए इसे तुरंत खोला जाए. जबकि तेहरान का जोर व्यापक समझौते को अमल में लाने पर था. देखा जाए तो ईरान ने अपनी अपेक्षाकृत कमजोर सैन्य ताकत और आर्थिक कमजोरियों के मुकाबले होर्मुज की भौगोलिक स्थिति को अपनी रणनीतिक ढाल के रूप में इस्तेमाल कर इस संघर्ष में संतुलन का प्रयास किया है. उसका संदेश स्पष्ट है कि ईरान के हितों को कुछ टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्रता में देखना होगा. इस संदर्भ में होर्मुज जलमार्ग एक सामुद्रिक परिवहन एवं ढुलाई से अधिक एक बड़ी भू-राजनीतिक सौदेबादी का औजार बन गया है.
यह कूटनीतिक विफलता ईरान में कट्टरपंथी ताकतों को और मजबूत कर सकती है जो यह दलील दोहराएंगे कि पश्चिम के साथ जुड़ाव से कोई वास्तविक लाभ संभव नहीं. यह स्थिति ईरान में टकराव बढ़ाने का काम करेगी, जिसमें उसकी परमाणु क्षमताओं को लेकर प्रयास बढ़ेंगे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र के साथ सहयोग घटेगा.
बातचीत की विफलता के बाद आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू हो गया है. परस्पर दोषारोपण का यह दौर किसी पुराने नासूर का प्रतीक है. जहां अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान के प्रस्तावों को अपर्याप्त और गंभीरता के अभाव से ग्रस्त बताया तो ईरानी प्रतिनिधियों ने वाशिंगटन पर भली मंशा के बिना हद से ज्यादा और अवैध मांगें थोपने का आरोप लगया है. ये आरोप किसी वाक् युद्ध से अधिक उस रुझान को ही दर्शाते हैं जिसके कारण अतीत की वार्ताएं भी पटरी से उतरती आई हैं. इसमें 2025 और 2026 में ओमान की मध्यस्थता में विफल वार्ताओं का दौर भी शामिल है. इन कूटनीतिक प्रयासों पर संदेह की बदलियां ही छाई रहीं और हर पक्ष दूसरे पर बुरी मंशा का आरोप मढ़ता रहा कि यह सब ध्यान भटकाने या रियायतें मांगने के लिए हो रहा है. इससे भरोसे की परत ऐसी पिघलती गई कि नेक इरादों के साथ की जाने वाली कोई सार्थक पहल भी विफल होने के लिए अभिशप्त सी हो गई है.
इस्लामाबाद वार्ता की विफलता के गंभीर तात्कालिक एवं दूरगामी परिणामों की आशंका बढ़ गई है. अभी जो लड़ाई थमी हुई दिख रही है, वह आने वाले दिनों में और भयावह रूप ले सकती है. इसके आर्थिक परिणाम भी बहुत घातक हो सकते हैं. वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अहम किरदार होर्मुज जलमार्ग में गतिरोध से वैश्विक आर्थिकी की सेहत बिगड़ सकती है. इससे जहाजों से ढुलाई महंगी होने के साथ ही तेल की कीमतें भी बढ़ेंगी और महंगाई का दबाव भी असर दिखाएगा. पहले से ही नाजुक दौर से गुजर रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह और बड़ा झटका होगा.
इसमें यह आशंका है कि हिजबुल्ला सरीखे नए सहयोगी संगठन संघर्ष में उतरकर अस्थिरता एवं अशांति का भौगोलिक दायरा बढ़ा सकते हैं. कुल मिलाकर, इस्लामाबाद वार्ता की विफलता वही पुरानी परिपाटी को ही दोहराती है कि जहां कूटनीति टकराव को बढ़ाने वाले पहलुओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती.
यह कूटनीतिक विफलता ईरान में कट्टरपंथी ताकतों को और मजबूत कर सकती है जो यह दलील दोहराएंगे कि पश्चिम के साथ जुड़ाव से कोई वास्तविक लाभ संभव नहीं. यह स्थिति ईरान में टकराव बढ़ाने का काम करेगी, जिसमें उसकी परमाणु क्षमताओं को लेकर प्रयास बढ़ेंगे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र के साथ सहयोग घटेगा.
वार्ता की विफलता ईरान के राजनीतिक एवं रणनीतिक भविष्य को भी नया आकार दे सकती है. प्रतिबंधों से राहत न मिलना ईरान की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ाएगा, जिससे घरेलू स्थिरता बनाए रखने की मौजूदा शासन की क्षमताओं पर भारी दबाव पड़ेगा. यह कूटनीतिक विफलता ईरान में कट्टरपंथी ताकतों को और मजबूत कर सकती है जो यह दलील दोहराएंगे कि पश्चिम के साथ जुड़ाव से कोई वास्तविक लाभ संभव नहीं. यह स्थिति ईरान में टकराव बढ़ाने का काम करेगी, जिसमें उसकी परमाणु क्षमताओं को लेकर प्रयास बढ़ेंगे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र के साथ सहयोग घटेगा. क्षेत्रीय स्तर पर भी इसके गहरे निहितार्थ होंगे. इसमें यह आशंका है कि हिजबुल्ला सरीखे नए सहयोगी संगठन संघर्ष में उतरकर अस्थिरता एवं अशांति का भौगोलिक दायरा बढ़ा सकते हैं. कुल मिलाकर, इस्लामाबाद वार्ता की विफलता वही पुरानी परिपाटी को ही दोहराती है कि जहां कूटनीति टकराव को बढ़ाने वाले पहलुओं के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती.
(लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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