आने वाले समय में किसकी सैन्य और आर्थिक हैसियत ज्यादा होगी, समाज पर किसका प्रभाव अधिक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन AI को बनाता और प्रशिक्षित करता है. विभिन्न क्षेत्रों में AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह होड़ और तेज हो गई है.
भारत इस समय AI Impact Summit की मेजबानी कर रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ एक तकनीक नहीं, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बन चुका है. इसकी स्थिति वैसी ही है, जैसी शीत युद्ध के दौरान परमाणु तकनीक की थी. देश केवल एल्गोरिद्म में पैसे नहीं लगा रहे, वे ताकत में निवेश कर रहे हैं. किसकी सैन्य और आर्थिक हैसियत ज्यादा होगी, समाज पर किसका प्रभाव अधिक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन AI को बनाता और प्रशिक्षित करता है. विभिन्न क्षेत्रों में AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ यह होड़ और तेज हो गई है.
नई करंसी: तेल या जमीन के उलट AI की ताकत किसी दिखाई देने वाली चीज पर नहीं टिकी. इसकी असली शक्ति है डेटा, कंप्यूटिंग पावर, टैलेंट और नए एल्गोरिद्म बनाने की क्षमता. आज यही नई करंसी हैं, जिनसे किसी पर प्रभाव जमाया जा सकता है. आज डिजिटल संप्रभुता का मतलब है AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर नियंत्रण होना, मसलन - क्लाउड, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन, नियम. इस नए दौर में किसी देश की मजबूती उसकी तकनीकी क्षमता से अधिक आंकी जा रही है.
डिजिटल वॉर: AI को लेकर सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा अमेरिका और चीन के बीच है. अनुमान है कि AI ग्लोबल इकॉनमी में कई ट्रिलियन डॉलर जोड़ सकता है, लेकिन इसका फायदा उन्हीं को मिलेगा जिनके पास मजबूत डिजिटल ढांचा होगा. सुरक्षा चिंताओं ने इस मुकाबले को और तीखा बना दिया है. खुफिया जानकारी जुटाने, साइबर हमलों और ऑटोमेटिक वेपन सिस्टम को AI मजबूत बना रहा है. मशीन लर्निंग का सैन्य इस्तेमाल हकीकत बन चुका है. हालात 'डिजिटल कोल्ड वॉर' जैसे बन गए हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ एक तकनीक नहीं, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मैदान बन चुका है. इसकी स्थिति वैसी ही है, जैसी शीत युद्ध के दौरान परमाणु तकनीक की थी. देश केवल एल्गोरिद्म में पैसे नहीं लगा रहे, वे ताकत में निवेश कर रहे हैं. किसकी सैन्य और आर्थिक हैसियत ज्यादा होगी, समाज पर किसका प्रभाव अधिक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन AI को बनाता और प्रशिक्षित करता है.
बदलते नियम: इस प्रतिस्पर्धा की एक और कड़ी है - रेयर अर्थ मेटल्स. AI को चलाने वाले हार्डवेयर बनाने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स चाहिए. इस वजह से यह मुकाबला अब खनिजों की सप्लाई और ऊर्जा की राजनीति से भी जुड़ गया है, खासकर अमेरिका और चीन के बीच. साथ ही, डेटा भी अब देशों के हिसाब से बंटता जा रहा है. हर देश अपने डिजिटल नियम बना रहा है. इस प्रतिस्पर्धा से विचारधारा को अलग नहीं कर सकते. लोकतांत्रिक देश पारदर्शिता और निजता पर जोर देते हैं, जबकि तानाशाह इसके जरिये समाज पर नियंत्रण चाह रहे.
प्रतिस्पर्धा का असर: दुनिया दो हिस्सों में बंटती नजर आ रही है. अमेरिका व चीन आगे हैं, यूरोप आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है और ग्लोबल साउथ के कई देशों पर पीछे छूटने का खतरा है. AI से नौकरियों पर असर पड़ सकता है, जिससे असमानता बढ़ सकती है. आगे चलकर दो तरह के AI सिस्टम बन सकते हैं - एक खुला और नियमों पर आधारित, दूसरा केंद्रीकृत और निगरानी वाला.
सुरक्षा खतरा: साइबर युद्ध, ऑटोनॉमस वेपन और एल्गोरिदम से फैलाया जाने वाला दुष्प्रचार संस्थाओं पर भरोसे को कमजोर कर रहा है. जेनरेटिव AI की मदद से सूचना को हथियार की तरह इस्तेमाल करना आसान हो गया है, जिससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा. अधिनायकवादी देशों में सरकारें तकनीक के जरिये निगरानी और नियंत्रण बढ़ा रही हैं. लोकतांत्रिक देशों में इनोवेशन और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की चुनौती खड़ी हो सकती है.
भारत की विदेश नीति की परंपरा रणनीतिक स्वायत्तता की रही है, जिसे वह आसानी से नहीं छोड़ेगा. वहीं, देश के भीतर संतुलन जरूरी है. इनोवेशन का फायदा सभी को मिलना चाहिए. वैश्विक स्तर पर भारत AI के नियमों में एक संतुलित रास्ता सुझा सकता है.
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर: हम ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जिसे 'जियो-टेक्नोपॉलिटिक्स' कहा जा सकता है. जो देश समय के साथ खुद को ढालेंगे, वही नई विश्व व्यवस्था की दिशा तय करेंगे. जो पीछे रह जाएंगे, वे रणनीतिक रूप से कमजोर और आर्थिक रूप से हाशिए पर जा सकते हैं.
भारत की रणनीति: भारत के लिए AI सिर्फ तकनीक नहीं, रणनीति का सवाल है. ऐसे दौर में जब ताकत डेटा और कंप्यूटिंग से तय होगी, भारत तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकता. हालांकि अमेरिका और चीन जितना बड़ा निवेश करना भारत के लिए संभव नहीं है. ऐसे में उसे नकल के बजाय अपनी जरूरतों के हिसाब से रणनीति बनानी होगी. भारत की ताकत अलग है - डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़ा डेटा नेटवर्क और ह्यूमन कैपिटल. असल चुनौती है कि बिना किसी गुट में बंधे इस ताकत को लाभ में कैसे बदला जाए.
संतुलन जरूरी: नई तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन तक पहुंच के लिए अमेरिका व समान सोच वाले देशों के साथ साझेदारी जरूरी होगी. लेकिन, भारत की विदेश नीति की परंपरा रणनीतिक स्वायत्तता की रही है, जिसे वह आसानी से नहीं छोड़ेगा. वहीं, देश के भीतर संतुलन जरूरी है. इनोवेशन का फायदा सभी को मिलना चाहिए. वैश्विक स्तर पर भारत AI के नियमों में एक संतुलित रास्ता सुझा सकता है. भारत भविष्य के नियम तय करने वाला देश बनेगा या सिर्फ दूसरों के बनाए नियम मानेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह महत्वाकांक्षा और समझदारी के बीच सही संतुलन बना पाता है या नहीं.
यह लेख नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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