ग़ाज़ा शांति के नाम पर बने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होना भारत के लिए मौका भी है और जोखिम भी. जहाँ एक ओर अमेरिका से रिश्ते संभालने का दबाव है, वहीं संगठन की संरचना और मंशा पर बड़े सवाल खड़े हैं. जानिए क्यों भारत के लिए इस मोड़ पर जल्दबाज़ी नहीं, रणनीतिक धैर्य ही सबसे बड़ी ताक़त है.
मध्य पूर्व में शांति बहाली में हमेशा से ही बाहरी शक्तियों की भूमिका पर निर्भर रही है, विशेष रूप से अमेरिका की. एक बार फिर, बोर्ड ऑफ पीस (बीओपी) द्वारा लागू की गई ग़ाज़ा शांति योजना में अमेरिका की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है लेकिन इस बार मुख्य भूमिका में ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिनका मूड कब बदल जाए, कोई नहीं जानता. बीओपी की कार्यकारी संरचना ऐसी है कि वो ट्रंप को इसके अध्यक्ष के रूप में स्थापित करती है जिन्हें व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं. अभी यह देखना बाकी है कि ऐसी व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी. आलोचकों का तर्क है कि 2027 की सख्त समय सीमा के साथ, बीओपी द्वारा प्रभावी और टिकाऊ सत्ता परिवर्तन लाना संभव नहीं है जबकि कुछ अन्य लोगों की दलील है कि ग़ाज़ा जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से तनावपूर्ण संघर्ष में शांति लागू करने के लिए एक व्यापक और बाहरी रूप से थोपा गया ढांचा ज़रूरी है. इनका कहना है कि इज़रायल और हमास जैसे धुर-विरोध को शांति समझौते की मेज पर बाहरी देश ही ला सकते हैं.
अभी यह देखना बाकी है कि ऐसी व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी. आलोचकों का तर्क है कि 2027 की सख्त समय सीमा के साथ, बीओपी द्वारा प्रभावी और टिकाऊ सत्ता परिवर्तन लाना संभव नहीं है जबकि कुछ अन्य लोगों की दलील है कि ग़ाज़ा जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से तनावपूर्ण संघर्ष में शांति लागू करने के लिए एक व्यापक और बाहरी रूप से थोपा गया ढांचा ज़रूरी है.
भारत भी उन कई देशों में शामिल है जिन्हें ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया. हालांकि, 22 देश पहले ही सदस्य के रूप में हस्ताक्षर कर चुके हैं लेकिन भारत का इसमें शामिल होने से पहले रणनीतिक रूप से विचार करने का फैसला विवेकपूर्ण हो सकता है. बीओपी के चार्टर में इसे एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में बताया गया है लेकिन ऐसा लगता है कि यह अंतर्राष्ट्रीय संगठन की परिभाषा पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता है.
समझौते में शामिल होने के लिए 1 अरब डॉलर का योगदान अनिवार्य करने वाला भुगतान-आधारित सदस्यता प्रावधान शायद इस संगठन की सबसे समस्या है. फिर भी, भारत के लिए समझौते में शामिल होने का फैसला करना फायदेमंद साबित हो सकता है. सबसे बड़ा प्रोत्साहन तो यह है कि भारत-अमेरिका संबंध इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. एक तनावपूर्ण व्यापार समझौते पर अभी बातचीत चल रही है. भारत की अध्यक्षता में क्वाड नेताओं का शिखर सम्मेलन स्थगित कर दिया गया है, और भारत को वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा टैरिफ बोझ का सामना करना पड़ रहा है.
भारत के लिए बीओपी में शामिल होने की स्थिति आदर्श नहीं हो सकती है, क्योंकि इस संगठन में पहले से ही पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश शामिल हैं, जबकि चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण देश इसकी सदस्यता से बाहर हैं.
संरचनात्मक रूप से, यह तर्क दिया जा सकता है कि बीओपी में शामिल होना भारत के लिए वैश्विक शासन में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने का भी एक मौका हो सकता है, विशेष रूप से ये देखते हुए कि भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है. एक अन्य कारक जो भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकता है, वो है मध्य पूर्व में इसकी गहरी हिस्सेदारी. भारत का एक विशाल प्रवासी समुदाय मध्य पूर्व के देशों में रहता है. इन देशों के साथ भारत के मज़बूत द्विपक्षीय संबंध हैं. इतना ही नहीं, मध्य पूर्व को इंडो-पैसिफिक से जोड़ने में ग्लोबल साउथ के भविष्य के लिए व्यापक संभावनाएं निहित हैं.
भारत के शांति समझौते में शामिल होने के विरोध में दिए जाने वाले तर्क भी मज़बूत हैं. पहली दलील तो यही है कि इस संगठन के प्रारूप को लेकर ही स्पष्टता नहीं है. हालांकि, शांति समझौते के पीछे के प्रयास नवंबर 2025 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 से प्रेरित हैं. इस प्रस्ताव के तहत ग़ाज़ा शांति योजना के दूसरे चरण के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए बीओपी के गठन की बात थी. सैद्धांतिक रूप से, ग़ाज़ा में शांति स्थापित करने की ट्रंप की योजना तात्कालिकता और वैधता दोनों पर आधारित है. बीओपी के भविष्य की प्रासंगिकता, इसके चार्टर में ग़ाज़ा का कोई स्पष्ट उल्लेख ना होना, और अमेरिकी राष्ट्रपति को दी गई व्यापक शक्तियां इस संगठन के लिए बड़ा सवाल बने हुए हैं. संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि यह संस्था भविष्य में दुनिया के अन्य क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों तक भी अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ा सकती है. इसके अलावा, 2027 में प्रस्तावित समाप्ति की समय सीमा को लेकर अस्पष्टता भी भारत के निर्णयों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है. कुल मिलाकर देखें तो मौजूदा परिदृश्य में दो सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं. पहला, अगर ग़ाज़ा को स्थिर करने और पुनर्निर्माण के लिए दो साल अपर्याप्त प्रतीत होते हैं, तो 2027 के बाद इस संगठन का कार्यकाल आगे बढ़ाने और भविष्य के नेतृत्व को लेकर प्रश्न उठेंगे, विशेष रूप से ये देखते हुए कि ट्रंप का कार्यकाल 2028 में खत्म हो जाएगा. दूसरा, भारत के लिए बीओपी में शामिल होने की स्थिति आदर्श नहीं हो सकती है, क्योंकि इस संगठन में पहले से ही पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश शामिल हैं, जबकि चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण देश इसकी सदस्यता से बाहर हैं.
भारत को इस मामले में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस मोड़ पर लिए जाने वाले फैसलों के दूरगामी नतीजे होंगे. मध्य पूर्व में भारत की भविष्य की रणनीतिक स्वायत्तता उसके द्वारा आज लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगी.
यह लेख मूल रूप में NDTV में प्रकाशित हो चुका है.
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Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...
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