भारत और EU ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था चाहते हैं, जहां उन्हें महाशक्तियों के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने का मौका मिले. इसी वजह से दोनों स्वाभाविक साझेदार बनकर उभरे हैं.
इस महीने की शुरुआत में जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की भारत यात्रा ने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी. यह मौका दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी के 25 साल और राजनयिक संबंधों के 75 साल पूरे होने का भी था. इस दौरे की बड़ी बात यह रही कि आपसी रिश्ता अब सिर्फ व्यापार और निवेश तक सीमित न होकर, मजबूत रणनीतिक साझेदारी में बदल रहा है. इस दौरान 19 अहम समझौतों पर सहमति बनी. इससे यूरोप की आधुनिक टेक्नोलॉजी और भारत की उत्पादन क्षमता के बीच गैप कम होगा.
रक्षा सहयोग: डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन को लेकर साझा घोषणा को इस दौरे की सबसे महत्वपूर्ण बात कह सकते हैं. इससे भारत और जर्मनी का रिश्ता महज विक्रेता और ग्राहक से आगे बढ़ेगा. दोनों देश मिलकर हथियारों का विकास और निर्माण करेंगे. उम्मीद है कि इससे निर्यात आसान होगा और जर्मनी की अहम रक्षा तकनीक भारत पहुंचेगी. चांसलर मर्ज के साथ बड़ी पनडुब्बी कंपनियों के प्रतिनिधि भी थे. इससे संकेत मिलता है कि 6 आधुनिक पनडुब्बियों की अरबों डॉलर की परियोजना आगे बढ़ेगी.
अहम समझौते: दुनिया में बढ़ते संरक्षणवाद के बीच दोनों नेताओं ने सप्लाई चेन को विविध बनाने की जरूरत पर बात की. एक नया CEO फोरम बनाया गया, ताकि सरकारी निवेश पर फैसला लेने वाली समितियां बिजनेस लॉबी को सीधे भागीदार हो सके. सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स और टेलीकम्युनिकेशन में समझौते किए गए. जर्मन चांसलर ने उम्मीद जताई कि इस महीने के आखिर तक भारत–EU के बीच FTA भी फाइनल हो सकता है.
मदद का वादा: जर्मनी ने ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट पार्टनरशिप के लिए 1.24 अरब यूरो की अतिरिक्त मदद का वादा किया है. इन पैसों का इस्तेमाल ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक वाहनों और जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकने वाले अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में किया जाएगा. भारत की AM Green और जर्मनी की Uniper के बीच ग्रीन अमोनिया पर समझौता महत्वपूर्ण रहा.
दोनों देश मिलकर हथियारों का विकास और निर्माण करेंगे. उम्मीद है कि इससे निर्यात आसान होगा और जर्मनी की अहम रक्षा तकनीक भारत पहुंचेगी. चांसलर मर्ज के साथ बड़ी पनडुब्बी कंपनियों के प्रतिनिधि भी थे. इससे संकेत मिलता है कि 6 आधुनिक पनडुब्बियों की अरबों डॉलर की परियोजना आगे बढ़ेगी.
आपसी संपर्क: इस दौरे में दो महत्वपूर्ण घोषणाएं हुईं. एक, वीज़ा-फ्री ट्रांजिट. अब भारतीय पासपोर्ट धारक जर्मनी के एयरपोर्ट से बिना वीज़ा के ट्रांजिट कर सकेंगे. दूसरी घोषणा शिक्षा के क्षेत्र में आई. जर्मनी के विश्वविद्यालय भारत में भी कैंपस खोलेंगे. जर्मनी में भारतीय हेल्थकेयर और आईटी प्रोफेशनल्स को मौके मिलेंगे.
मैक्रों की यात्रा: अगले महीने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ‘इंडिया–AI इम्पैक्ट समिट’ में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आने वाले हैं. पहली बार ‘ग्लोबल साउथ’ में वैश्विक AI सम्मेलन होने जा रहा है. मैक्रों ने भारत की इस पहल का समर्थन किया है कि तकनीक का फायदा विकासशील देशों के साथ भी साझा किया जाना चाहिए.
EU नेताओं का दौरा: पीएम मोदी के निमंत्रण पर यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेन 25 से 27 जनवरी तक भारत का राजकीय दौरा करेंगे. दोनों नेता 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी और 27 जनवरी को 16वें भारत–EU शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करेंगे.
EU की नजर में भारत तेजी से बढ़ता बाजार है. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन और क्लाइमेट एक्शन पर सहयोग बढ़ा है. हालांकि EU की कार्बन बॉर्डर जैसी नीतियों के कारण कुछ टकराव भी हैं.
वैश्विक बदलाव: भारत–EU संबंधों पर भू-राजनीतिक बदलावों का असर पड़ा है. ट्रंप की नीतियां, विश्व व्यवस्था में अस्थिरता, चीन की हठी और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत ने भारत–EU को पास लाया है, खासकर हिंद प्रशांत क्षेत्र में.
चीन पर नजर: दोनों के बीच अब भी आर्थिक संबंध सबसे अहम हैं. फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, निवेश की सुरक्षा और मजबूत सप्लाई चेन में दोनों पक्षों की दिलचस्पी यह दिखाती है कि भारत और यूरोप व्यापार में विविधता लाना चाहते हैं, ताकि चीन पर निर्भरता न रहे. EU की नजर में भारत तेजी से बढ़ता बाजार है. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन और क्लाइमेट एक्शन पर सहयोग बढ़ा है. हालांकि EU की कार्बन बॉर्डर जैसी नीतियों के कारण कुछ टकराव भी हैं.
नई व्यवस्था: भारत और EU ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था चाहते हैं, जहां उन्हें महाशक्तियों के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने का मौका मिले. इसी वजह से दोनों स्वाभाविक साझेदार बनकर उभरे हैं. आने वाले समय में यह रिश्ता और मजबूत होने की उम्मीद है.
यह लेख नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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