Author : Harsh V. Pant

Published on Apr 28, 2026 Commentaries 1 Days ago

पश्चिम एशिया के संकट में जहां कई देश फंस गए, वहीं भारत ने खुद को संभालते हुए पड़ोसियों को भी ईंधन देकर मदद की. पढ़ें कैसें, अब भारत सिर्फ अपना नहीं, पूरे दक्षिण एशिया का एनर्जी संकट मैनेजर बनकर उभर रहा है.

दक्षिण एशिया का नया ऊर्जा केंद्र: भारत

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अमेरिका-ईरान युद्ध से उपजे गहरे संकट ने विश्व राजनीति की इस सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष कहीं दूर तक प्रभाव डालता है. फरवरी के अंत में इस युद्ध की शुरुआत हुई, जिसमें होर्मुज जलमार्ग का बाधित होना एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र चूंकि ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए यह संकट उनके लिए गंभीर और अस्थिरता पैदा करने वाला साबित हुआ.

इसको संभालने में नई दिल्ली की प्रतिक्रिया उल्लेखनीय रही है. संकट प्रबंधन में संकीर्ण नज़रिया अपनाने के बजाय, भारत ने अपनी ढांचागत शक्तियों का लाभ उठाया और खुद को क्षेत्र में ऊर्जा स्थिरता बनाए रखने वाला देश बना लिया है. यह अचानक नहीं हुआ, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने, शोधन क्षमता बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा को व्यापक भू-राजनीतिक ढांचों में शामिल करने के उद्देश्य से अपनाई गई नीतियों का यह नतीजा रहा है.

फरवरी के अंत में इस युद्ध की शुरुआत हुई, जिसमें होर्मुज जलमार्ग का बाधित होना एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्र चूंकि ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए यह संकट उनके लिए गंभीर और अस्थिरता पैदा करने वाला साबित हुआ.

अमेरिका-ईरान युद्ध ने दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की कमज़ोरियों को उजागर किया है जो खाड़ी देशों से आने वाले हाइड्रोकार्बन पर अत्यधिक निर्भर हैं. बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों को कच्चे तेल, एलपीजी और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों की भारी कमी का सामना करना पड़ा है, जिस कारण वहां ईंधनों की सीमित आपूर्ति, क़ीमतों में उछाल, औद्योगिक उत्पादन में कमी और इसके कम इस्तेमाल जैसे उपाय उपयोग में लाए गए. वास्तव में, यह मुश्किल कई मामलों में इस क्षेत्र की आर्थिक मज़बूती की एक परीक्षा भी थी, जिसमें अधिकांश देश विफल साबित हुए हैं.

संकट की घड़ी में भारत बना सहारा 

मगर भारत की स्थिति बेहतर रही. विश्व का चौथा सबसे बड़ा तेल शोधक और पेट्रोलियम उत्पादों का महत्वपूर्ण निर्यातक होने के नाते, वैश्विक ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी ख़ास अहमियत है. हालांकि, भारत भी खाड़ी देशों से कच्चा तेल आयात करता है, लेकिन पड़ोसी देशों की तुलना में इसमें कहीं अधिक विविधता है. हमारा कुल आयात का सिर्फ़ 54 प्रतिशत तेल खाड़ी से आता है और बाकी ज़रूरतें घरेलू उत्पादन से पूरी की जाती हैं. इस तरह भारत ने ऐसी रणनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर ली है, जो मौजूदा संकट में अमूल्य साबित हुआ है.

भारत की शोधन क्षमता काफ़ी महत्वपूर्ण है. भारतीय रिफाइनरियां अपनी स्थापित क्षमताओं पर शत-प्रतिशत काम कर रही हैं. वे कच्चे तेल को कुशलतापूर्वक संसाधित और निर्यात करने के लिए अतिरिक्त परिष्कृत उत्पाद पैदा करने में सफल रहीं. नतीजतन, भारत न केवल अपनी घरेलू ज़रूरतों को पूरा करता रहा, बल्कि पड़ोसियों को भी मदद कर रहा है. ‘पड़ोसी पहले’ की उसकी नीति वर्तमान संकट में हक़ीक़त बन चुकी है, जिसका राजनीतिक संदेश साफ़ है- भारत क्षेत्रीय संकट के समय ‘मदद करने वाले देशों’ में न सिर्फ़ अगुवा बनने को इच्छुक है, बल्कि इसमें वह सक्षम भी है.

बांग्लादेश इसका सबसे सटीक उदाहरण है. वह अपनी 80 प्रतिशत ऊर्जा ज़रूरतें पश्चिम एशिया से आयात करके पूरी करता है, इसलिए होर्मुज़ संकट से उसे गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उसकी औद्योगिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं, जिसके बाद भारत ने दोस्ती के रूप में असम के नुमालीगढ़ रिफाइनरी से उसे डीजल भेजना शुरू किया. मार्च के अंत तक, क़रीब 15,000 टन डीजल की आपूर्ति की जा चुकी थी और अप्रैल में इसे बढ़ाने की योजना है. इससे राजनीतिक जुड़ाव को भी मजबूती मिली है. बांग्लादेश के विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान की 7 से 9 अप्रैल, 2026 की यात्रा भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई. ढाका में बीएनपी की नई सरकार आने के बाद मंत्रिस्तरीय यह पहला दौरा था, जिसका प्रतीकात्मक और वास्तविक, दोनों महत्व था. रहमान द्वारा भारतीय मदद की प्रशंसा करना और डीजल-उर्वरक की आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध करना ढाका के रणनीतिक नज़रिये में आए बदलाव का संकेत है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी इन अनुरोधों पर ‘तुरंत और सकारात्मक रूप से विचार’ करने का आश्वासन दिया, जो बता रहा था कि भारत इस साझेदारी को और मज़बूत बनाना चाहता है. चूंकि चर्चाएं तात्कालिक संकट से आगे बढ़कर व्यापार, संपर्क और जल-बंटवारे जैसे मुद्दों पर होने लगी हैं, इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि ऊर्जा सहयोग अधिक स्थायी द्विपक्षीय संबंधों का आधार बन सकता है.   

पश्चिम एशिया का संकट दक्षिण एशिया में ऊर्जा संबंधी असुरक्षा को उजागर करता है. पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश, जिनकी ऊर्जा के मामले में खाड़ी देशों पर निर्भरता 65 प्रतिशत से लेकर 80 प्रतिशत तक है, होर्मुज संकट से कहीं अधिक प्रभावित हुए हैं. भारत का दायरा अपेक्षाकृत बड़ा है और उसकी शोधन क्षमता भी अच्छी है, इसलिए इसका भू-राजनीति पर असर पड़ता भी दिख रहा है.

श्रीलंका का उदाहरण इससे अलग है. वह पहले से ही आर्थिक मुश्किलों से जूझ रहा है, इसलिए उसके सामने ऊर्जा संकट का बड़ा ख़तरा था. भारत ने तुरंत मदद की और मार्च के अंत तक डीजल-पेट्रोल सहित लगभग 38,000 मीट्रिक टन पेट्रोलियम उत्पाद वहां भेजे. इससे श्रीलंका की क़रीब 45 प्रतिशत ज़रूरतें पूरी हो गईं. लंका IOC के माध्यम से भेजी गई इस मदद ने वहां तेज़ी से बिगड़ रही स्थिति को नियंत्रित किया.

नेपाल और भूटान में भारत की भूमिका इतनी ज़्यादा नहीं रही, लेकिन उसका भी अपना महत्व था. दोनों देश पेट्रोलियम उत्पादों के लिए क़रीब-क़रीब भारत पर निर्भर हैं और इसकी आपूर्ति भारतीय तेल निगम सहित अन्य स्थापित माध्यमों से की जाती है. होर्मुज़ में उथल-पुथल के बावजूद, भारत ने निर्बाध आपूर्ति की. हालांकि, नेपाल ने एहतियात के तौर पर कार्य-सप्ताह कम करने और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए, जबकि भूटान को शायद ही किसी मुश्किल का सामना करना पड़ा.

मालदीव ने भारत से कम समय और लंबे वक़्त, दोनों के लिए ऊर्जा आपूर्ति का अनुरोध किया है. हालांकि, अभी इस पर विचार किया जा रहा है, लेकिन नई दिल्ली ने इस पर गौर करने का आश्वासन दिया है, जिससे क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा-स्रोत के रूप में भारत की छवि और मज़बूत होती है. यह छवि केवल क्षमता से नहीं बनी है, बल्कि बढ़ते भरोसे का भी नतीजा है. संकट के समय में यह विश्वास ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता है, और भारत ने इसे बनाए रखने पर पूरा प्रयास किया है.

दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका  

साफ़ है, पश्चिम एशिया का संकट दक्षिण एशिया में ऊर्जा संबंधी असुरक्षा को उजागर करता है. पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश, जिनकी ऊर्जा के मामले में खाड़ी देशों पर निर्भरता 65 प्रतिशत से लेकर 80 प्रतिशत तक है, होर्मुज संकट से कहीं अधिक प्रभावित हुए हैं. भारत का दायरा अपेक्षाकृत बड़ा है और उसकी शोधन क्षमता भी अच्छी है, इसलिए इसका भू-राजनीति पर असर पड़ता भी दिख रहा है.

हालांकि, नई दिल्ली को निश्चिंत नहीं रहना चाहिए. इस संकट ने ऊर्जा क्षेत्र में और विविधता लाने की ज़रूरत पर बल दिया है. संकट और उसके समाधान के इस जटिल तालमेल से यही पता चलता है कि भारत क्षेत्रीय नेतृत्व की अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति अधिक सहज होता जा रहा है. उसके कदम व्यावहारिक रहे हैं, जिनमें घरेलू स्थिरता और क्षेत्रीय ज़रूरतों, दोनों को प्राथमिकता दी गई है. इन सबसे भारत दक्षिण एशिया में स्थिरता लाने वाली ताक़त के रूप में मज़बूत हुआ है. क्या ऐसा आगे भी बना रहेगा? यह तो कई कारकों पर निर्भर करेगा, लेकिन अभी के लिए संदेश साफ़ हैं- तेज़ी से अस्थिर होती दुनिया में, भारत न केवल संकटों को संभाल रहा है, बल्कि उसके परिणामों को आकार देने में भी पूरी तरह तत्पर है.


यह लेख मूल रूप से OPEN में प्रकाशित हुआ है.
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