हाल ही में हुई क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल मीटिंग ने संसाधनों की बढ़ती अहमियत को उजागर किया. जानिए, इस दौड़ में दुनिया और भारत के लिए क्या मायने हैं.
पिछले हफ्ते वॉशिंगटन डी.सी. में क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल मीटिंग हुई. इस मीटिंग ने साफ दिखाया कि आज की दुनिया की सियासत में संसाधनों की सुरक्षा कितनी अहम हो गई है. बैठक की मेजबानी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की, जिसमें उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने मुख्य भाषण दिया. इस जुटान में 54 देशों और यूरोपीय कमीशन के नुमाइंदे पहुंचे.
भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे बड़े हिस्सेदार भी इसमें मौजूद थे. इससे यह समझ बढ़ती दिखी कि लिथियम, कोबाल्ट, रेयर-अर्थ एलिमेंट्स और ग्रेफाइट जैसे जरूरी खनिज अब सिर्फ आर्थिक मसले नहीं हैं. ये अब सीधी रणनीतिक जरूरत बन चुके हैं. इस मीटिंग का मकसद था ग्लोबल सप्लाई चेन की अंदरूनी कमजोरियों का जवाब देना. खास चिंता यह रही कि क्रिटिकल मिनरल्स की माइनिंग, प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग में चीन का भारी दबदबा है.
ट्रंप प्रशासन इस चुनौती को तेल बाजार में OPEC के असर जैसा मानता है. फर्क यह है कि इसका असर कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है. हाई-टेक, क्लीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर तक इसकी मार पहुंचती है. इससे साफ है कि संसाधनों की सियासत अब ताकत की होड़ से गहराई से जुड़ गई है.
रेयर-अर्थ प्रॉडक्शन के 60% से ज्यादा हिस्से पर बीजिंग का कंट्रोल है. हाल में उसने गैलियम और जर्मेनियम जैसे मिनरल्स के एक्सपोर्ट पर रोक को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की ख्वाहिश भी दिखाई है. इससे वॉशिंगटन और उसके सहयोगी देशों की बेचैनी और बढ़ गई है. ट्रंप प्रशासन इस चुनौती को तेल बाजार में OPEC के असर जैसा मानता है. फर्क यह है कि इसका असर कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है. हाई-टेक, क्लीन एनर्जी और डिफेंस सेक्टर तक इसकी मार पहुंचती है. इससे साफ है कि संसाधनों की सियासत अब ताकत की होड़ से गहराई से जुड़ गई है.
चीन के सस्ते माल से मुकाबला
यह मीटिंग यह भी दिखाती है कि इकोनॉमिक पॉलिसी को अब मौजूदा हालात के हिसाब से ज्यादा बदला जा रहा है. बाजार को अकेला छोड़ देने से ऐसे नतीजे आए हैं जो बड़े पैमाने पर सरकारी मदद और स्टेट एक्शन को फायदा देते हैं. इन तीनों में चीन आगे है. जैसा वेंस ने कहा भी कि सस्ते चीनी मिनरल्स से दुनिया के बाजार भर गए हैं. इससे दूसरे देशों में घरेलू प्रॉडक्शन कमजोर पड़ गया है. नतीजा यह हुआ कि ऐसी निर्भरता बन गई है जो सियासी और रणनीतिक तौर पर ठीक नहीं मानी जाती.
अमेरिका-चीन तनाव बढ़ रहा है. दुनिया भर में रेयर अर्थ एलिमेंट्स की मांग भी तेजी से बढ़ रही है, खासकर लिथियम की. ऐसे माहौल में इस मीटिंग में कोशिश रही कि बाकी के देश मिलकर काम करें. आपस में सप्लाई के नए रास्ते बनाएं. भरोसेमंद देशों के साथ नेटवर्क तैयार करें. सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत बनाएं. मीटिंग के फैसले इसी बदलाव की तरफ इशारा करते हैं. प्रॉजेक्ट वॉल्ट के तहत 10 अरब डॉलर का अमेरिकी स्ट्रैटिजिक क्रिटिकल मिनिरल्स रिजर्व बनाने का ऐलान हुआ. इससे साफ है कि अमेरिका अब मिनरल्स को सिर्फ सामान नहीं मानता. वह उन्हें रणनीतिक संपत्ति की तरह देख रहा है.
जैसा वेंस ने कहा भी कि सस्ते चीनी मिनरल्स से दुनिया के बाजार भर गए हैं. इससे दूसरे देशों में घरेलू प्रॉडक्शन कमजोर पड़ गया है. नतीजा यह हुआ कि ऐसी निर्भरता बन गई है जो सियासी और रणनीतिक तौर पर ठीक नहीं मानी जाती.
साथी देशों के बीच खास ट्रेड व्यवस्था बनाने की बात भी हुई. इसमें टैरिफ और कीमत को स्थिर बनाए रखने जैसे तरीके शामिल हैं. यह दिखाता है कि दुनिया एक ज्यादा नियंत्रित इकोनॉमिक सिस्टम की तरफ बढ़ रही है. यहां सुरक्षा वाली सोच और चुनिंदा देशों के साथ मिलकर काम करने का मॉडल दिखता है. यूरोपीय यूनियन, जापान और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ नए समझौते भी सामने आए. इससे खनिज सुरक्षा के लिए सहयोगी देशों का एक नेटवर्क बनाने की रफ्तार और तेज दिखी.
भारत के लिए इसके मायने खास हैं. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की नुमाइंदगी की. उन्होंने दिखाया कि सप्लाई चेन के एक ही जगह केंद्रित होने से जो खतरे पैदा होते हैं, उन्हें कम करने की कोशिशों में भारत अहम पार्टनर बनना चाहता है. फोरम ऑन रिसोर्स, जियोस्ट्रेटेजिक एंगेजमेंट (फोर्ज) जैसी पहलों को भारत का समर्थन मिला है. यह भारत के अपने नेशनल क्रिटिकल मिनिरल्स मिशन से मेल खाता है. इस मिशन का मकसद है आयात पर निर्भरता घटाना, खासकर चीन पर. साथ ही घरेलू खोज बढ़ाना, प्रोसेसिंग मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी बढ़ाना.
अभी हालत यह है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी ज्यादातर मिनरल्स भारत चीन से लेता है. इसलिए सप्लाई के अलग स्रोत बनाना एक मजबूत रणनीतिक कदम लगता है. इस क्षेत्र में अमेरिका और भारत की बढ़ती नजदीकी, दोनों देशों के बड़े रणनीतिक तालमेल से भी जुड़ती है. जयशंकर की अमेरिकी अफसरों से मुलाकातें हुई हैं. हाल में ट्रेड और टैरिफ में भी बदलाव हुए हैं. यह सब दिखाता है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, जॉइंट वेंचर और माइनिंग-रिफाइनिंग में निवेश बढ़ाने की सियासी ख्वाहिश मजबूत हो रही है.
अगर भारत खुलकर अमेरिकी नुमाइंदगी वाले मिनरल्स ग्रुप्स के साथ खड़ा होता है, तो जियो-पॉलिटिकल खतरे बढ़ सकते हैं. वजह साफ है. चीन भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. लेकिन साथ ही वह लगातार सुरक्षा चुनौती भी बना हुआ है. रणनीतिक आजादी और रणनीतिक साझेदारी- इन दोनों के बीच संतुलन बनाना भारत की कूटनीतिक समझ की असली परीक्षा होगा.
भारत के पास अपने भंडार भी हैं जिनका अभी पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ. जम्मू-कश्मीर में लिथियम है. केरल में रेयर-अर्थ हैं. ये नए मौके दे सकते हैं. लेकिन इसके लिए पूंजी निवेश चाहिए. नियम साफ होने चाहिए. पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी है. एक मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर भारत सहयोगी देशों के ब्लॉक में शामिल हो सकता है. इससे कमजोरियां कम होंगी. खनिज सुरक्षा के मुद्दे पर Quad- यानी अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है.
लेकिन भारत के सामने मुश्किलें भी हैं. प्रोसेसिंग क्षमता अभी सीमित है. प्रॉजेक्ट पूरे होने में लंबा वक्त लगता है. पर्यावरण से जुड़े मसले भी रफ्तार धीमी कर सकते हैं. सबसे अहम बात यह है कि अगर भारत खुलकर अमेरिकी नुमाइंदगी वाले मिनरल्स ग्रुप्स के साथ खड़ा होता है, तो जियो-पॉलिटिकल खतरे बढ़ सकते हैं. वजह साफ है. चीन भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. लेकिन साथ ही वह लगातार सुरक्षा चुनौती भी बना हुआ है. रणनीतिक आजादी और रणनीतिक साझेदारी- इन दोनों के बीच संतुलन बनाना भारत की कूटनीतिक समझ की असली परीक्षा होगा.
आखिर में, 2026 की क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल मीटिंग यह दिखाती है कि दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर बदल रही है. भारत के लिए यह एक मौका है, खुद पर भरोसा बढ़ाने का. लेकिन यह एक चुनौती भी है- ऐसी दुनिया में रास्ता निकालने की, जो धीरे-धीरे अलग खेमों में बंटती जा रही है. यह नया ढांचा सच में मजबूती देगा या सिर्फ निर्भरता का नया रूप बनाएगा- यह इस पर तय होगा कि इसे कैसे लागू किया जाता है. सबको कितना साथ लिया जाता है. और क्या देश अपनी सुरक्षा की जरूरतों और टिकाऊ विकास के लक्ष्यों के बीच सही तालमेल बना पाते हैं.
यह लेख पहले मिंट में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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