Author : Nilanjan Ghosh

Originally Published द हिंदू बिजनेस लाइन Published on Jan 05, 2026 Commentaries 1 Days ago

IMEC को भारत–यूरोप व्यापार का गेमचेंजर माना गया था लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि यह गलियारा अभी उम्मीद और अमल के बीच अटका हुआ है.

IMEC रुका क्यों है- राजनीति, बंदरगाह या पैसा?

2023 में भारत–मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की घोषणा की गई थी. माना गया कि भारत का यह कदम चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का जवाब है लेकिन भारत के लिए यह पहल प्रतिस्पर्धा से कहीं ज्यादा कनेक्टिविटी और अपनी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है. भारत और यूरोपीय संघ के बीच के ट्रेड रूट्स में अगर विविधता आती है तो पारंपरिक रेड सी-स्वेज नहर मार्ग पर आने वाली भूराजनीतिक और परिवहन संबंधी दिक्कतें कुछ कम हो सकती हैं.

यूरोपीय संघ भारत के शीर्ष तीन व्यापारिक साझेदारों में है. भारत से होने वाली चीजों के व्यापार में इसका 12 फीसदी से अधिक हिस्सा है. इसके बावजूद भारत और यूरोप के बीच होने वाले व्यापार का अधिकतर हिस्सा आज भी रेड सी-स्वेज नहर वाले रास्ते पर ही निर्भर है.

उभरती समस्या

मार्च 2021 की बात है. स्वेज नहर में एक बड़ा कंटेनर जहाज फंस गया. इससे सैकड़ों जहाज अटक गए और दुनिया के लगभग 12 फीसदी व्यापार पर असर पड़ा. हाल के वर्षों में, कमर्शल जहाजों पर हूती हमलों के चलते 2023-24 में रेड सी संकट पैदा हुआ फिर बड़ी शिपिंग कंपनियों को अपने जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ा. इसके चलते लगभग 3,500 समुद्री मील की दूरी और बढ़ी, यात्रा में हफ्ते भर का वक्त और लगा, तेल ज्यादा लगा, बीमा का भी खर्च बढ़ा. और तो और, डिलीवरी कब होगी, यह भी नहीं तय हो पा रहा था. कई भारतीय निर्यातकों को अपना माल रोकना पड़ा. ऐसे में भारत का नया रास्ता पुराने रास्तों से इतर जोखिम कम करने का एक तरीका बन सकता है.

 

मार्च 2021 की बात है. स्वेज नहर में एक बड़ा कंटेनर जहाज फंस गया. इससे सैकड़ों जहाज अटक गए और दुनिया के लगभग 12 फीसदी व्यापार पर असर पड़ा.

आर्थिक सुरक्षा कवच

असल में IMEC का महत्व स्वेज नहर या रूस के रास्ते उत्तर-दक्षिण गलियारे को पूरी तरह बदलने में नहीं है. यह भारत और यूरोप के बीच व्यापार के लिए अलग-अलग रास्ते बनाने में है. इसमें समुद्री परिवहन, हाई स्पीड रेल और आपस में जुड़े बंदरगाह नेटवर्क को मिलाकर भारत को खाड़ी देशों और फिर आगे यूरोप से जोड़ा जाना है.

अनुमान है कि इससे माल पहुंचने में लगने वाला समय लगभग 40 फीसदी तक कम हो सकता है, लागत में भी करीब 30 फीसदी की कमी आ सकती है. इससे भारतीय निर्यातकों को तेजी से भुगतान मिलेगा और उनकी वर्किंग कैपिटल पर बोझ कम होगा.

अनुमान है कि इससे माल पहुंचने में लगने वाला समय लगभग 40 फीसदी तक कम हो सकता है, लागत में भी करीब 30 फीसदी की कमी आ सकती है. इससे भारतीय निर्यातकों को तेजी से भुगतान मिलेगा और उनकी वर्किंग कैपिटल पर बोझ कम होगा. इसके चलते भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों पर अधिक आवाजाही होगी. खाड़ी और भूमध्यसागरीय देशों के लॉजिस्टिक्स सिस्टम से बेहतर जुड़ाव होगा. साथ ही यह गति शक्ति और सागरमाला जैसी सरकारी योजनाओं के अनुरूप लॉजिस्टिक्स लागत घटाने में मददगार होगा.

इस तरह भारत का लक्ष्य कम मुनाफे वाले काम से आगे बढ़कर ज्यादा मूल्य वाले निर्माण और सेवाओं की ओर जाना है. इसके लिए एक त्रिकोणीय व्यवस्था बनती है- भारत एक निर्माण और सेवा केंद्र के रूप में, खाड़ी देश लॉजिस्टिक्स और पूंजी के केंद्र के रूप में और यूरोप तकनीक, मानकों और मांग के स्रोत के रूप में.

राह की रुकावटें

IMEC का मतलब है कि भारत में बनने वाला सामान और कामगारों से जुड़ी चीजें, मध्य पूर्व के रास्ते आसानी से यूरोप के बाजारों तक पहुंच सकें.

फिर भी रास्ते में कई रुकावटें सामने आती हैं जो राजनीतिक तनाव, परिवहन से जुड़ी दिक्कतों और पैसों की कमी के कारण पैदा होती हैं. गाजा पट्टी में चल रहे संघर्ष ने, मौजूदा युद्धविराम के बावजूद, काफी समय तक इस योजना में अड़चनें डाली हैं.

परिवहन से जुड़ी रुकावटें बुनियादी ढांचे की कमी और बंदरगाहों की सीमित क्षमता के कारण भी पैदा होती हैं. IMEC के तहत मुंबई या मुंद्रा जैसे भारतीय बंदरगाहों से माल यूएई के जेबेल अली तक भेजने और फिर यूएई व सऊदी अरब के रास्ते रेल से इस्राइल के हाइफा बंदरगाह तक पहुंचाने की योजना है लेकिन इस पूरे रास्ते में कई जरूरी रेलवे कनेक्शन अभी पूरे नहीं हुए हैं.

एक बार फिर समस्या यह है कि जहां जेबेल अली बंदरगाह साल में करीब 90 मिलियन टन माल संभाल सकता है, वहीं हाइफा बंदरगाह की क्षमता सिर्फ लगभग 30 मिलियन टन की है. इससे रास्ते में बड़ी अड़चन पैदा होती है. जब तक हाइफा बंदरगाह की क्षमता में अच्छी-खासी बढ़ोतरी नहीं होती, तब तक IMEC रेड सी–स्वेज नहर मार्ग का बड़ा विकल्प नहीं बन सकता, जहां मिस्र के बंदरगाह मिलकर हर साल करीब 180 मिलियन टन माल संभालते हैं.

 

जब तक हाइफा बंदरगाह की क्षमता में अच्छी-खासी बढ़ोतरी नहीं होती, तब तक IMEC रेड सी–स्वेज नहर मार्ग का बड़ा विकल्प नहीं बन सकता, जहां मिस्र के बंदरगाह मिलकर हर साल करीब 180 मिलियन टन माल संभालते हैं.

असल परीक्षा

IMEC की असली परीक्षा इसके लिए पैसे जुटाने में है. बड़े अंतरराष्ट्रीय गलियारे अक्सर तब अटक जाते हैं, जब फंडिंग की योजना राजनीतिक जोखिम, अलग-अलग देशों के नियमों और लंबे समय में पूरा होने वाली परियोजनाओं को ध्यान में नहीं रखती. IMEC ऐसे इलाकों से होकर गुजरता है जहां सरकारों की आर्थिक ताकत और कर्ज चुकाने की क्षमता एक जैसी नहीं है इसलिए केवल सरकारी पैसा या साधारण सरकारी-निजी साझेदारी काफी नहीं होगी. IMEC के लिए ऐसी फंडिंग चाहिए जिसमें सरकारी निवेश, अंतरराष्ट्रीय गारंटी, संप्रभु कोषों का पैसा और निजी निवेश-सब मिलकर हों ताकि लागत कम हो और लंबे समय के निवेशक आकर्षित किए जा सकें.


(यह लेख पहले हिंदू बिजनेस लाइन में प्रकाशित हुआ है)

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