Author : Atul Kumar

Originally Published The Week Published on Feb 25, 2026 Commentaries 1 Days ago

चीन क्यों मानता है कि अमेरिका का बढ़ता सैन्य दबाव ईरान संकट को युद्ध की ओर धकेल रहा है. और कैसे असफल वार्ता की स्थिति में सीमित अमेरिकी हमला मध्य पूर्व व वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.

अमेरिका–ईरान टकराव: बीजिंग का नजरिया क्या है?

चीन का मानना है कि अमेरिका का सैन्य दबाव, जो घरेलू राजनीति से जुड़ा है, कूटनीति के बावजूद तनाव बढ़ा रहा है. 2025 के अंत में ईरान में महंगाई, बेरोज़गारी और अधूरे सुधारों से नाराज़ लोगों ने बड़े प्रदर्शन किए, जो धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गए. शुरुआत में चीन ने इन प्रदर्शनों पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं दी और तटस्थ बना रहा. लेकिन जब रज़ा पहलवी, इज़राइल और अमेरिका ने खुलकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया, तो चीन को शक हुआ कि इसमें बाहरी ताकतों का हाथ हो सकता है. 8–9 जनवरी को हुई हिंसा में हजारों लोगों की मौत हुई, जिसके लिए चीन ने विदेशी दखल को जिम्मेदार माना. चीन का मानना है कि ईरान सरकार ने हालात पर जल्दी काबू पा लिया. इससे अमेरिका और उसके सहयोगी हैरान रह गए और दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया, जो आगे चलकर सैन्य टकराव जैसी स्थिति में बदल गया.

अमेरिका-ईरान विवाद  

चीनी विमर्श में कहा जाता है कि ईरानी जनता को पश्चिमी साजिश ने दो बार धोखा दिया-पहली बार तब, जब उन्होंने शासन के खिलाफ विरोध किया और बाहरी हस्तक्षेप की उम्मीद की, जो कभी नहीं हुआ; और दूसरी बार तब, जब ट्रंप ने ईरान से बातचीत का निर्णय लिया, जिससे प्रदर्शनकारी अकेले पड़ गए. ऐसे में प्रश्न यह है कि चीन मध्य पूर्व की मौजूदा घटनाओं को किस तरह देखता है और निकट भविष्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षाएं हैं. अमेरिका की मांग है कि ईरान यूरेनियम संवर्धन बंद करे, मिसाइलों की मारक क्षमता सीमित करे और प्रॉक्सी समूहों का समर्थन समाप्त करे. बीजिंग का मानना है कि यदि इज़राइल इसमें शामिल न हो, तो इन मुद्दों पर बातचीत संभव है.

जब रज़ा पहलवी, इज़राइल और अमेरिका ने खुलकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया, तो चीन को शक हुआ कि इसमें बाहरी ताकतों का हाथ हो सकता है. 8–9 जनवरी को हुई हिंसा में हजारों लोगों की मौत हुई, जिसके लिए चीन ने विदेशी दखल को जिम्मेदार माना. चीन का मानना है कि ईरान सरकार ने हालात पर जल्दी काबू पा लिया.

अमेरिका और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर मूलभूत प्रतिस्पर्धा है. बीजिंग के अनुसार, वाशिंगटन अलगाव, प्रतिबंध, आंतरिक अस्थिरता पैदा करने और सैन्य घेराबंदी के माध्यम से तेहरान पर दबाव बढ़ाना चाहता है; और यदि ये उपाय विफल होते हैं, तो युद्ध की संभावना बन सकती है. पिछले वर्ष 12-दिवसीय संघर्ष से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षण में पाया गया कि ईरान के पास 60 प्रतिशत तक संवर्धित 440.9 किलोग्राम यूरेनियम था, जिससे इज़राइल और अमेरिका में चिंता बढ़ी और हालिया तनाव को बल मिला.

नेतन्याहू चाहते हैं कि ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम विदेश भेजे, परमाणु ढांचा और समर्थित समूह खत्म करे और मिसाइलों की सीमा 300 किमी तक सीमित करें. ईरान परमाणु हथियार छोड़ सकता है, लेकिन मिसाइलों पर समझौता नहीं करेगा. वह यूरेनियम हटाने की जगह उसे कम शुद्ध करने और बदले में प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है.
चीन का मानना है कि मांगों का यह असंतुलन दोनों पक्षों को युद्ध की ओर धकेल रहा है. ट्रंप पहले ही यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड और यूएसएस अब्राहम लिंकन के नेतृत्व में दो विमानवाहक पोत समूह तैनात कर चुके हैं, कतर में रणनीतिक बमवर्षक रखे गए हैं और क्षेत्र के 19 ठिकानों पर लगभग 40,000–50,000 सैनिक तैनात हैं. वाशिंगटन ने GBU-57 बंकर बस्टर बमों के भंडार को पुनः भरने के लिए बोइंग को अनुबंध भी दिया है. ट्रंप ने इज़राइल के संभावित हमलों के लिए हवाई ईंधन और ओवरफ्लाइट की मदद मांगी है, लेकिन कई मध्य पूर्वी देश हिचक रहे हैं. जवाब में ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन से अमेरिकी ठिकानों व इज़राइल को निशाना बनाने की चेतावनी दी है. उसके समर्थित समूह भी संघर्ष बढ़ा सकते हैं.

ट्रंप ईरान की तेल कमाई पर चोट करना चाहते हैं, क्योंकि उसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है. उन्होंने कहा है कि जो देश ईरान से व्यापार करेगा, उस पर 25% शुल्क लगाया जा सकता है. लेकिन चीन इसे केवल धमकी मानता है और सोचता है कि अमेरिका चीन के साथ नया व्यापार युद्ध नहीं चाहेगा. चीन का यह भी मानना है कि ट्रंप बार-बार सैन्य कार्रवाई की बात कर रहे हैं, जबकि कोई साफ और तुरंत खतरा दिखाई नहीं देता. उनके इस सख्त रुख के पीछे घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव हो सकता है. हालांकि इससे उनके समर्थक खुश हो सकते हैं, लेकिन इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी, तेल आपूर्ति प्रभावित होगी और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है. जनवरी 2026 में ट्रंप को सलाह दी गई कि बड़ा हमला ईरान में सत्ता नहीं बदल पाएगा और युद्ध बढ़ा सकता है. 6 फरवरी को मस्कट में अप्रत्यक्ष वार्ता हुई, पर सहमति नहीं बनी. अगली बैठक 17 फरवरी को जेनेवा में होगी.

चीन का मानना है कि यदि वार्ता विफल रहती है, तो अमेरिका पूर्ण पैमाने के हमले की ओर बढ़ सकता है. अक्टूबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 की ‘स्नैपबैक’ धारा समाप्त होने के बाद वाशिंगटन के पास स्वचालित प्रतिबंध लगाने का विकल्प नहीं रहा, इसलिए वह मुख्य रूप से सैन्य दबाव को ही सौदेबाजी का साधन बना रहा है.

चीन का मत

फरवरी 2026 के मध्य तक बीजिंग का आकलन है कि युद्ध निश्चित नहीं है, लेकिन सैन्य दबाव और कूटनीति साथ-साथ चल रहे हैं. पेंटागन का रुख निरोध (डिटरेंस) से बदलकर स्पष्ट युद्ध-तैयारी में बदल गया है, जिससे अमेरिकी हमले का जोखिम बना हुआ है. फिर भी अमेरिका दीर्घकालिक जमीनी युद्ध के बजाय एक सप्ताह तक चलने वाले सीमित सैन्य अभियान की तैयारी में दिखता है, जिसका उद्देश्य ईरान की प्रमुख सैन्य और परमाणु क्षमताओं को नष्ट करना होगा.

12 फरवरी को ट्रंप ने समझौते के लिए एक महीने की समयसीमा तय की. चीन का मानना है कि यदि वार्ता विफल रहती है, तो अमेरिका पूर्ण पैमाने के हमले की ओर बढ़ सकता है. अक्टूबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 की ‘स्नैपबैक’ धारा समाप्त होने के बाद वाशिंगटन के पास स्वचालित प्रतिबंध लगाने का विकल्प नहीं रहा, इसलिए वह मुख्य रूप से सैन्य दबाव को ही सौदेबाजी का साधन बना रहा है. दो विमानवाहक पोत तैनात रखना महंगा है, इसलिए वार्ता लंबी नहीं चल सकती. मार्च तक प्रगति न हुई तो बातचीत कमजोर पड़ेगी. पीछे हटने पर ट्रंप कमजोर दिखेंगे, जिससे तनाव और बढ़ेगा.


यह लेख मूल रूप से द वीक में प्रकाशित हुआ था.  

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.