Published on Nov 27, 2025 Commentaries 0 Hours ago

अलेक्जेंड्रिया और मुंबई- दो अलग महाद्वीपों के दो तटीय शहर लेकिन चुनौती एक ही है: समुद्र बढ़ रहा है और मौसम पहले जैसा नहीं रहा. इतिहास बताता है कि कोई भी शहर प्रकृति के सामने ज़िद नहीं चला सकता. लिहाजा दोनों शहरों का भविष्य हमारी समझदारी, तैयारी और बदलते जलवायु के साथ कदम मिलाकर चलने की क्षमता पर टिका है.

समुद्र से टकराई मुंबई, अलेक्जेंड्रिया ने कैसे संभाला?

काहिरा के बाद मिस्र का दूसरा सबसे बड़ा शहर अलेक्जेंड्रिया माना जाता है. 331 ईसा पूर्व में अलेक्जेंडर द ग्रेट ने इस शहर की स्थापना की थी और उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम अलेक्जेंड्रिया पड़ा. सहस्राब्दियों से, प्राकृतिक आपदाओं ने इस शहर का आकार बदला है,  इसे फिर से नया आकार दिया है.

अलेक्जेंड्रिया की तुलना में भारत के वित्तीय केंद्र, मुंबई का इतिहास अपेक्षाकृत आधुनिक है लेकिन भूगोल उतना ही जटिल है. अरब सागर के किनारे स्थित मुंबई में पहले ही समुद्र-स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा चुकी है.

  • इतिहास दिखाता है—प्रकृति के सामने कोई शहर ज़िद नहीं चला सकता.
  • भविष्य अनुकूलन, सहयोग और लचीली शहरी प्रणालियों पर निर्भर है.
  • ज़रूरत है कि भारत–मिस्र साझेदारी में जलवायु सहयोग भी शामिल हो.

दोनों शहरों का इतिहास हमें एक बात स्पष्ट रूप से बताता है. लंबे समय में कोई शहर या क्षेत्र प्रकृति के विरुद्ध नहीं जा सकता. इन शहरों का भविष्य जलवायु के हिसाब से हमारी अनुकूलनशीलता, सहयोग और लचीली शहरी प्रणालियों के निर्माण की क्षमता पर निर्भर करता है.


“लंबे समय में कोई भी शहर प्रकृति के विरुद्ध नहीं टिक सकता.”


तटीय कटाव, भारी निर्माण और निजीकरण के कारण पिछले 25 साल में अलेक्जेंड्रिया ने अपने 40 प्रतिशत से ज़्यादा समुद्र तटों को खो दिया है. हालांकि, यूनेस्को ने अलेक्जेंड्रिया को अफ्रीका का पहला ऐसा शहर घोषित किया है, जो 'सुनामी जैसी मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार' है लेकिन कई स्थानीय लोगों का मानना है कि ये शहर भविष्य की आपदाओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है. इसके अलावा, शहरी विकास, विशेष रूप से कॉर्निश तट के किनारे हो रहे विकास के कामों ने तटीय कमज़ोरियों का बढ़ा दिया है. इससे समुद्र तटों का कटाव बढ़ रहा है और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ रहा है. भारत में भी स्थिति उतनी ही गंभीर है. बेंगलुरु स्थित थिंक टैंक, सीएसटीईपी, के एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि 2040 तक मुंबई की 10 प्रतिशत से ज़्यादा ज़मीन के डूबने का ख़तरा है.

भारत और मिस्र के बीच पहले से ही सांस्कृतिक आदान-प्रदान, आर्थिक, सुरक्षा और रक्षा सहयोग, समुद्री सहयोग सहित तमाम अन्य क्षेत्रों में मज़बूत द्विपक्षीय संबंध हैं. अब दोनों देश जलवायु परिवर्तन के बढ़ते ख़तरों का सामना कर रहे हैं, विशेष रूप से समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है. ये संकट इन देशों के तटीय शहरों को प्रभावित कर रहा है. ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि भारत और मिस्र अपनी इस द्विपक्षीय साझेदारी का विस्तार करके जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र को भी इसमें शामिल करें.

“भारत–मिस्र को तटीय लचीलापन और जलवायु-अनुकूलन ढांचा बनाना चाहिए.”


भारत और मिस्र के बीच एक तटीय लचीलापन और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन ढांचा स्थापित किया जाना चाहिए. इसकी स्थापना से जलवायु संबंधी मुद्दों पर उनके सहयोग को बढ़ाया जा सकेगा. इतना ही नहीं, इससे दोनों देश रणनीतिक साझेदारी और पर्यावरण सहयोग पर वर्तमान ज्ञापन को और भी ज़्यादा मज़बूत कर सकेंगे. अलेक्जेंड्रिया और मुंबई के बीच एक शहर-दर-शहर ढांचा बनाना कारगर साबित हो सकता है. इससे स्थानीय सरकारों, नियोजन और अनुसंधान संस्थानों के बीच तकनीकी आदान-प्रदान को संभव बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है.

जिन क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण सहयोग हो सकता है, उसमें ज्ञान और तकनीकी विशेषज्ञता का साझाकरण शामिल है. अलेक्जेंड्रिया को 'सुनामी-तैयार' बनाने में मिस्र की उपलब्धि भारतीय शहरों के लिए एक आदर्श बन सकती है. दूसरी ओर, शहरी नियोजन, बाढ़ पूर्वानुमान और उपग्रह-आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीकों के उपयोग में भारत आगे है. ऐसे में अगर भारत अपना ये तकनीकी ज्ञान साझा करे तो, मिस्र के अधिक स्मार्ट और ज़्यादा लचीले शहर बनाने की कोशिशों में मददगार साबित हो सकते हैं.


“जिन क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण सहयोग हो सकता है, उसमें ज्ञान और तकनीकी विशेषज्ञता का साझाकरण शामिल है.”


अलेक्जेंड्रिया और मुंबई मिलकर ऐसे ढांचे का विकास कर सकते हैं, जिसमें मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिकीय बफर्स की सुरक्षा के लिए नए और अपडेटेड क्षेत्रीय कानून शामिल हों. समुद्र तट के किनारे बेतरतीब और अवैध निर्माण को रोकने के लिए सख्त मानदंड लागू किए जाएं. ऐसे नियम और कानून, जो कृत्रिम चट्टानों, आर्द्रभूमि और बाढ़ से प्रभावित ज़मीन को फिर से काम में ला सकने वाली हरित अवसंरचना परियोजनाओं को बढ़ावा दें. तूफानी लहरों और तटीय कटाव को कम करने में मदद करें.

दोनों देशों को इसे लेकर कोई भी कार्य योजना बनाने में आपदा जोखिम वित्तपोषण को एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल करना चाहिए. 

भारत और मिस्र अपनी वित्तीय तैयारी में सुधार कर सकते हैं. रिज़िल्यन्स बॉन्ड या पैरामीट्रिक बीमा तंत्र जैसे नए वित्तीय उपकरण बनाकर निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल कर सकते हैं.

“अलेक्जेंड्रिया और मुंबई मिलकर ऐसे ढांचे का विकास कर सकते हैं, जिसमें मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिकीय बफर्स की सुरक्षा के लिए नए और अपडेटेड क्षेत्रीय कानून शामिल हों.”

इस सहयोग के केंद्र में सामुदायिक भागीदारी भी होनी चाहिए, क्योंकि दोनों देशों की स्थानीय आबादी पर्यावरणीय परिवर्तनों की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

इसके अलावा, भारतीय और मिस्र के शैक्षणिक और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाना चाहिए. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), अलेक्जेंड्रिया विश्वविद्यालय, काहिरा विश्वविद्यालय और ऐन शम्स विश्वविद्यालय जैसे शैक्षिक केंद्रों को जोड़ना को इससे जोड़ना होगा. शैक्षणित आदान-प्रदान से दीर्घकालिक लचीलेपन के लिए ज़रूरी तकनीकी और अनुसंधान आधार मज़बूत होगा.

अलेक्जेंड्रिया और मुंबई को एक साथ जोड़ने के विचार को सिर्फ प्रतीकात्मकता तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए. धरातल पर किया जाने वाला कोई भी सहयोग जलवायु परिवर्तन के दौर में अस्तित्व की साझा लड़ाई की नींव बन सकता है.


ये लेख मूल रूप से द टेलीग्राफ में छपा है.

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Authors

Samir Bhattacharya

Samir Bhattacharya

Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing global ...

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Hebatallah Adam

Hebatallah Adam

Hebatallah Adam is a Professor of International Economics at the Jindal School of International Affairs (JSIA), O. P. Jindal Global University, and associate dean of ...

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