Author : Samir Saran

Published on Jan 03, 2026 Commentaries 5 Days ago

कभी सीखने वाला भारत आज विश्व के लिए उदाहरण बन रहा है. 2025 उस आत्मविश्वास का साल रहा जब विकास ने स्वदेशी सोच के साथ गति पकड़ी.

1991 से 2025 तक: भारत की आर्थिक रणनीति

1980 के दशक में भारत एक युवा राष्ट्र के रूप में दुनिया के पुराने और स्थापित देशों से सीखने और प्रेरणा लेने की कोशिश कर रहा था. वहीं, 2020 के दशक में वही भारत दुनिया के सामने अपने अनुभव और दृष्टिकोण के माध्यम से एक नया आर्थिक और राजनीतिक मॉडल पेश कर रहा है. यह बदलाव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह नीति, सोच और क्रियान्वयन के हर स्तर पर गहराई से महसूस किया जा सकता है.

भारत की विकास यात्रा

साल 2025 भारत के आर्थिक इतिहास में संभवतः 1991 के समान एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज होगा. दोनों ही वर्षों में देश की महत्वाकांक्षा, आत्मविश्वास और सुधारों की गति में असाधारण तेजी देखने को मिली. हालांकि दोनों कालखंडों के प्रेरक कारण अलग रहे. जहां 1991 के आर्थिक सुधार भुगतान संतुलन के गंभीर संकट से उपजे थे, वहीं 2025 के सुधार किसी मजबूरी का परिणाम नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में उभरते अवसर की समझ से प्रेरित हैं. यह बदलाव दर्शाता है कि भारत का शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आज की खंडित और अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था में विकास की प्रकृति को गहराई से समझता है.

भारत अब सीखने वाला नहीं बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने वाला देश बन रहा है, जिसने स्वदेशी सोच के साथ विकास की एक नई राजनीतिक–आर्थिक भाषा गढ़नी शुरू की है।

केंद्रीय बजट 2025 में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर ₹1,00,000 प्रतिमाह करना इसी सोच का एक स्पष्ट उदाहरण है. यह कदम केवल कर राहत नहीं था बल्कि यह संकेत था कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर मध्यम वर्ग का निर्माण तभी संभव है, जब उसे सरकार के अनावश्यक बोझ और हस्तक्षेप से बचाया जाए. यह दृष्टिकोण भारत के उभरते राज्य चरित्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव को रेखांकित करता है.

जब भारत ने विकास की कमान खुद संभाली

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी 2025 भारत के लिए नई वास्तविकताओं को लेकर आया. अमेरिकी राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में आए बदलावों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अब आदर्शवाद से अधिक लेन–देन पर आधारित हो गए हैं. इस परिदृश्य में यह भ्रम टूट गया कि वैश्विक साझेदारियाँ अपने आप भारत की विकास यात्रा को आगे बढ़ा देंगी. वास्तविकता यह है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकास साझा नहीं किया जाता बल्कि उसके लिए प्रतिस्पर्धा होती है. प्रधानमंत्री मोदी ने इसी संदर्भ में यह स्पष्ट किया कि भारत का विकास डू-इट-योरसेल्फ मॉडल पर आधारित होना चाहिए-यानी अपने संसाधनों, संस्थानों और क्षमताओं के बल पर.

इस दृष्टिकोण का अर्थ यह नहीं है कि वैश्विक संबंध महत्वहीन हैं बल्कि भारत पश्चिम को न तो शत्रु मानता है और न ही उद्धारक. वह उसे एक साझेदार के रूप में देखता है जिसके साथ संतुलन, संयम और आत्मविश्वास के साथ संबंध रखे जाने चाहिए. विकास की असली ऊर्जा देश के भीतर से ही आती है- उसे घरेलू नीतियों, सुधारों और संस्थागत मजबूती से लगातार पोषित करना पड़ता है.

चार श्रम संहिताओं, GST सरलीकरण और अनुपालन बोझ में कटौती के ज़रिए भारत ने व्यवसायों को संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय उन्हें विकास के साझेदार के रूप में स्वीकार किया है।

2025 के सुधारों में सबसे दूरगामी कदम चार श्रम संहिताओं को लागू करना रहा. यह 1990 के दशक के बाद श्रम और उत्पादन से जुड़े नियमों में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव है. इन सुधारों के तहत नियमों की संख्या में भारी कटौती की गई, रिपोर्टिंग प्रक्रियाएं सरल की गईं और अनुपालन बोझ को काफी कम किया गया. अनुमान है कि इससे 6 करोड़ से अधिक उद्यमों को लाभ होगा. यह संदेश स्पष्ट है कि भारत अब व्यवसायों को संदेह की दृष्टि से नहीं बल्कि विकास के साझेदार के रूप में देख रहा है.

वस्तु एवं सेवा कर (GST) प्रणाली में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए. टैक्स स्लैब की संख्या घटाई गई और अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाया गया. इससे न केवल राजस्व संग्रह में स्थिरता आई बल्कि छोटे और मध्यम कारोबारियों पर पड़ने वाला मानसिक और प्रशासनिक बोझ भी कम हुआ. यह दर्शाता है कि सुधार केवल एक बार किया गया कदम नहीं होते; उन्हें समय-समय पर ज़मीनी अनुभव के आधार पर सुधारना पड़ता है.

आयकर सुधार, यूनिफाइड सिक्योरिटीज़ मार्केट कोड और जन विश्वास 2.0 यह संकेत देते हैं कि उभरता भारतीय राज्य अब डर और दंड नहीं, बल्कि स्पष्टता, भरोसे और प्रोत्साहन पर आधारित होगा।

 

इसी क्रम में यूनिफाइड सिक्योरिटीज़ मार्केट कोड, जन विश्वास 2.0 विधेयक और नया आयकर कानून सामने आए. इन पहलों ने यह संकेत दिया कि भारत का उभरता हुआ राज्य डर और दंड के बजाय स्पष्टता और भरोसे पर आधारित होगा. कर कटौती को भी एक मौन प्रोत्साहन के रूप में देखा जा सकता है जिससे मांग बढ़ती है और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलती है.


भारत ने झिझक नहीं, निर्णय चुना!

दिसंबर 2025 में लिए गए कुछ निर्णय भारत के बढ़ते रणनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाते हैं. बीमा और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निजी भागीदारी को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक हिचक बनी रही थी. अब बिना किसी बड़े विवाद के इन क्षेत्रों को खोल दिया गया, कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाया गया और स्वच्छ ऊर्जा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया गया.

भारत अब वैश्विक साझेदारियों से पहले घरेलू संस्थानों, नीतियों और क्षमताओं को मज़बूत करने पर केंद्रित है—यही स्वदेशी विकास मॉडल की वास्तविक नींव है। 

इन सभी सुधारों को अलग-अलग देखा जाए तो वे महत्वपूर्ण है लेकिन सामूहिक रूप से वे क्रांतिकारी बदलाव का संकेत देते हैं. प्रधानमंत्री मोदी वही रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर लागू कर रहे हैं जो उन्होंने पहले गुजरात में, फिर डिजिटल इंडिया और जीएसटी के माध्यम से अपनाई थी. बड़े निर्णय, स्पष्ट दिशा और प्रशासनिक जड़ता को तोड़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति.

2025 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आईं लेकिन भारत की प्रतिक्रिया भीतर से आई- घरेलू सुधार, घरेलू ऊर्जा और आत्मनिर्भर दृष्टि के माध्यम से. वैश्विक साझेदारियों को नए सिरे से गढ़ने से पहले भारत ने अपने भीतर के सामाजिक-आर्थिक अनुबंध को पुनर्परिभाषित करना शुरू किया है. यह भारत के भविष्य को लिखने का समय है और इस बार कलम भारतीयों के हाथ में है.


यह टिप्पणी मूल रूप से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुई थी।

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