Author : Harsh V. Pant

Published on Mar 27, 2026 Commentaries 3 Days ago

क्या बातचीत की ऐसी पेशकश पश्चिम एशिया से जुड़े सभी समीकरणों को नए सिरे से तय करने का काम करेगी या यह फिर यह एक अस्थायी विराम होगा? इसकी नियति केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि इरादों से तय होगी, जिसमें भरोसे की बड़ी अहमियत होने वाली है.

बढ़ती अस्थिरता: क्या दुनिया नए संकट की ओर?

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध चौथे सप्ताह में प्रवेश कर गया है और अभी इस पर विराम लगने के कोई आसार भी नहीं दिखते. देखा जाए तो यह युद्ध पश्चिम एशिया में किसी सामान्य सैन्य टकराव के बजाय, दबाव और कूटनीति की चिरपरिचित जुगलबंदी को दर्शाता है. अमेरिका लंबे समय से ईरान के प्रति ये तौर-तरीके आजमाता आया है. यह युद्ध उन्हीं का विस्तार दिखता है. बड़ी-बड़ी घोषणाओं को लेकर खास पहचान बना चुके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैसे तो समग्र समाधान के संकेत दिए हैं, लेकिन यह भी सच है कि युद्ध को लेकर रेखाएं धुंधली होती जा रही हैं.

इस धुंधलके में युद्ध की मंशा और परिणाम, दोनों अस्पष्ट हैं. अमेरिका ने ईरान के समक्ष कुछ बिंदुओं को लेकर पहले से ही दबाव बनाया हुआ था. जैसे यूरेनियम संवर्धन पर रोक के साथ ही समूचे परमाणु कार्यक्रम पर विराम और अपने पोषित छद्म संगठनों के ढांचे को ध्वस्त करना. ये ऐसी शर्तें थीं, जिन पर ईरान कभी सहमत नहीं होता. इसके बाद युद्ध का विकल्प ही शेष था, जिसकी पहल इजरायल ने की और अमेरिका ने समर्थन किया.

देखा जाए तो यह युद्ध पश्चिम एशिया में किसी सामान्य सैन्य टकराव के बजाय, दबाव और कूटनीति की चिरपरिचित जुगलबंदी को दर्शाता है. अमेरिका लंबे समय से ईरान के प्रति ये तौर-तरीके आजमाता आया है. यह युद्ध उन्हीं का विस्तार दिखता है.

यह एक पारंपरिक उकसावे वाले क्रम को ही रेखांकित करता है, जिसमें पहले कूटनीति को अल्टीमेटम के रूप में पेश किया जाता है और फिर उसी को सैन्य कार्रवाई का आधार बनाया जाता है. दूसरी ओर, ईरान ने अपनी परमाणु महत्वाकांक्षा को तो खारिज किया है, पर क्षेत्र में अपनी भूमिका को विस्तार देने की उसकी महत्वाकांक्षाएं और निरंतर बढ़ती क्षमताएं कुछ संदेह पैदा करने वाली भी रहीं.

पश्चिम एशिया में युद्ध की अनिश्चितता

युद्ध को लेकर बढ़ती अनिश्चितता में ट्रंप के तेवर भी बदलते दिख रहे हैं. ट्रंप ने 23 मार्च को ऐलान किया कि ईरान के साथ ‘बहुत अच्छी और उत्पादक बातचीत’ हुई. इससे पहले उन्होंने ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले के लिए एक अल्टीमेटम दिया था और फिर उक्त बातचीत का हवाला देकर उसे पांच दिनों के लिए टालने की बात भी कही. हालांकि ईरान ने ट्रंप की वार्ता के इस दांव को नकारने में देर नहीं की. ईरान अमेरिका के 15 सूत्रीय एजेंडे को खारिज भी कर चुका है और अपनी पांच स्पष्ट मांगें भी सामने रख चुका है. इस सिलसिले का चाहे जो नतीजा निकले, पर अमेरिका ने बार-बार यही दोहराया है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे. यह दोहराव कूटनीति को एक निश्चित उद्देश्य के साथ जोड़ देता है. इस सबके बीच इन वार्ताओं के इर्द गिर्द बन रहा माहौल भी एक उल्लेखनीय पहलू है. जैसे पाकिस्तान के एक मध्यस्थ के रूप में सामने आने की अटकलें और ईरानी संसद के स्पीकर से लेकर ट्रंप के विशेष प्रतिनिधियों के बीच इस्लामाबाद में संभावित बैठक.

पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है, पर यह तो तय है कि कूटनीतिक विकल्पों की संभावनाएं तलाशी जरूर जा रही हैं. इसमें सभी खेमों की बयानबाजी दबाव बनाने और उसकी काट के रूप में ही देखी जा सकती है. मौजूदा परिदृश्य ट्रंप की चिरपरिचित शैली से मेल खाता है, जिसमें वे अधिकतम दबाव के जरिये सौदेबाजी को प्राथमिकता देते हैं. दबाव की इसी रणनीति के तहत ईरान को लंबे समय से अस्थिरता फैलाने वाले देश के रूप में पेश किया जाता रहा है. खासतौर से उसकी परमाणु क्षमताओं और उसके रूप में इजरायल के अस्तित्व पर सदा मंडराते खतरे को. इस आख्यान में सैन्य कार्रवाई रक्षात्मक एवं आक्रामक, दोनों कसौटियों पर खरी बताई जाती है. एक तो ईरान को दंडित करना और दूसरा उसकी क्षमताओं को इतना कुंद कर देना कि उसके पास बातचीत के अलावा और कोई विकल्प शेष ही न बचे. इसके बाद किसी संभावित समझौते को सदाशयता के रूप में चित्रित किया जाता है, पर इसमें ईरान के लिए विकल्प नहीं बचते.

होर्मुज जलमार्ग के खुलने होने से ऊर्जा बाजार में स्थिरता आ सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुछ राहत की सांस मिलेगी. वाशिंगटन के लिए भी यह लंबे सैन्य हस्तक्षेप के बोझ से मुक्ति के साथ ही अपने लक्ष्य पूर्ति का पड़ाव बन जाएगा. परमाणु अप्रसार को लेकर उसकी विश्वसनीयता और प्रयासों को प्रतिष्ठा मिलेगी.

किसी संभावित वार्ता में यदि समृद्ध यूरेनियम को हटाने का मुद्दा आता है तो संप्रभुता का सवाल भी आड़े आएगा. इस पर भी सवाल उठेंगे कि क्या ऐसा किया जाना संभव भी होगा. लगता नहीं कि तेहरान में इस पर सहमति बन पाएगी. ईरान द्वारा औपचारिक वार्ताओं से साफ इन्कार संदेह और तनाव दोनों को उजागर करता है. वार्ता को लेकर इजरायल को यह डर सता रहा है कि तनाव घटने से उन उपलब्धियों का महत्व भी घट जाएगा, जिन्हें बड़ी कठिनाई से हासिल किया गया है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव 

यदि ऐसा कोई ढांचा अस्तित्व में आता है तो यकीनन उसके दूरगामी प्रभाव होंगे. इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पूरी तरह पर्दा पड़ने के साथ ही उसके छद्म संगठनों पर लगाम लग जाएगी. परिणामस्वरूप क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ सकता है. होर्मुज जलमार्ग के खुलने होने से ऊर्जा बाजार में स्थिरता आ सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को कुछ राहत की सांस मिलेगी. वाशिंगटन के लिए भी यह लंबे सैन्य हस्तक्षेप के बोझ से मुक्ति के साथ ही अपने लक्ष्य पूर्ति का पड़ाव बन जाएगा. परमाणु अप्रसार को लेकर उसकी विश्वसनीयता और प्रयासों को प्रतिष्ठा मिलेगी. इसके अपने जोखिम भी हैं. ईरान की अपनी एक विशिष्ट रणनीतिक संस्कृति है. दबाव के बीच भी दृढ़ता इस संस्कृति की विशेषता है. अगर उसे ऐसा लगता है कि किसी भी तरह का संघर्ष विराम अस्थायी एवं रणनीतिक है तो बातचीत बिगड़ सकती है.

इसका नतीजा प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर हमले के रूप में सामने आ सकता है. इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ेगी और ऊर्जा संसाधनों की कीमतों का रुख परेशानी बढ़ाएगा. अगर रणनीतिक बढ़त को लेकर अमेरिका एवं इजरायल के बीच असहमति बढ़ती है तो उनके समीकरण भी बदलेंगे. अब जो परिदृश्य आकार ले रहा है, वह शांति के बजाय यही दर्शाता है कि आने वाले दिनों में संघर्ष अन्य स्वरूपों में जारी रहेगा. तमाम तरह के कूटनीतिक प्रस्तावों के जरिये ट्रंप सामरिक मोर्चे पर मिली बढ़त को कूटनीतिक परिणामों में बदलने का प्रयास कर रहे हैं. क्या बातचीत की ऐसी पेशकश पश्चिम एशिया से जुड़े सभी समीकरणों को नए सिरे से तय करने का काम करेगी या यह फिर यह एक अस्थायी विराम होगा? इसकी नियति केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि इरादों से तय होगी, जिसमें भरोसे की बड़ी अहमियत होने वाली है.


यह लेख जागरण में प्रकाशित हो चुका है. 

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Harsh V. Pant

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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...

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