Author : Soumya Awasthi

Published on Jan 12, 2026 Commentaries 3 Days ago

आज के समय में देश सीधे युद्ध की बजाय साइबर हमलों के ज़रिये आपस में टकराते हैं. इन हमलों में बिजली, इंटरनेट और सुरक्षा सिस्टम को निशाना बनाकर विरोधी को बिना लड़ाई के कमजोर किया जाता है. यही ग्रे-ज़ोन युद्ध की नई रणनीति है.

ग्रे-ज़ोन युद्ध: संघर्ष की अदृश्य शुरुआत

आज के दौर में देशों के बीच टकराव अक्सर खुले युद्ध की बजाय ग्रे-ज़ोन में हो रहा है. यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ औपचारिक युद्ध की घोषणा नहीं होती लेकिन असर वही होता है जो पारंपरिक सैन्य हमलों से पड़ता है. इस बदलाव का केंद्र अब साइबर क्षेत्र बन चुका है जो केवल सहायक भूमिका में नहीं बल्कि एक स्वतंत्र और निर्णायक युद्धक्षेत्र के रूप में उभरा है. साइबर हमलों के ज़रिये किसी देश की महत्वपूर्ण अवसंरचना को कमजोर किया जाता है ताकि पारंपरिक सेना के इस्तेमाल से पहले ही विरोधी भ्रम और अव्यवस्था में फंस जाए.

आधुनिक संघर्षों में सबसे पहले निशाना बिजली ग्रिड, दूरसंचार नेटवर्क, परिवहन व्यवस्था और कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम बनते हैं. जनवरी 2026 में वेनेज़ुएला की बिजली व्यवस्था ठप होना इसका ताज़ा उदाहरण माना जा रहा है जिसके बाद अमेरिकी बलों ने कराकास में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई महीनों की गुप्त निगरानी, योजना और साइबर-इलेक्ट्रॉनिक क्षमताओं के इस्तेमाल का नतीजा थी जिसने हमले से पहले ही वायु रक्षा और अहम ढांचों को निष्क्रिय कर दिया.

साइबर हमलों के ज़रिये किसी देश की महत्वपूर्ण अवसंरचना को कमजोर किया जाता है ताकि पारंपरिक सेना के इस्तेमाल से पहले ही विरोधी भ्रम और अव्यवस्था में फंस जाए.

इस रणनीति के पीछे साफ़ सोच है. बिजली या संचार व्यवस्था ठप करने से मिसाइल हमलों जैसी तुरंत राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं होती लेकिन इससे किसी देश की शासन क्षमता, सैन्य तैयारी और निर्णय-प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है. ग्रे-ज़ोन संघर्ष में लक्ष्य त्वरित जीत नहीं बल्कि विरोधी को रणनीतिक रूप से पंगु बनाना होता है, वह भी जिम्मेदारी से इनकार की गुंजाइश बनाए रखते हुए. लिहाजा साइबर ऑपरेशन आज दबाव बनाने का साधन भी हैं और पारंपरिक सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ाने वाला कारक भी.

डिजिटल मोर्चे पर लड़ी जा रही जंग

अब यह साफ़ हो चुका है कि साइबर हमला किसी भी संघर्ष का पहला प्रहार हो सकता है. बिजली ग्रिड जैसे ढांचों पर साइबर घुसपैठ वर्षों पहले की जा सकती है, जहाँ मैलवेयर चुपचाप छिपा रहता है और सही समय पर सक्रिय होता है जैसा कि 2015-16 में यूक्रेन के बिजली ग्रिड के साथ हुआ. जब ये हमले होते हैं तो वे तकनीकी खराबी या प्राकृतिक आउटेज जैसे दिख सकते हैं जिससे दोष तय करना और जवाब देना मुश्किल हो जाता है. यही कारण है कि साइबर क्षमताएँ आज ग्रे-ज़ोन युद्ध का सबसे प्रभावी हथियार बनती जा रही हैं.

वेनेज़ुएला की बिजली व्यवस्था पर हुए अमेरिकी साइबर हमलों को लेकर हाल की चर्चाओं ने यह साफ कर दिया है कि आज के युद्धों में साइबर और पारंपरिक सैन्य कार्रवाइयाँ एक-दूसरे से अलग नहीं रहीं. ज़मीन पर सैनिकों की कार्रवाई भले ही दिखाई दे लेकिन उसके लिए ज़मीन पहले साइबर हमलों के ज़रिये तैयार की जाती है. वेनेज़ुएला के मामले में भी साइबर ऑपरेशनों ने सेना की प्रतिक्रिया क्षमता को कम किया और निर्णय लेने का समय घटा दिया. साइबर घुसपैठ के कारण बिजली ग्रिड प्रभावित हुआ जिससे सैन्य ठिकानों को बैकअप बिजली पर जाना पड़ा. इस प्रक्रिया में कुछ समय के लिए सिस्टम बंद होते हैं और दोबारा चालू होने में देरी होती है. यही छोटी-सी देरी निगरानी और वायु रक्षा प्रणालियों में अस्थायी अंधे क्षेत्र पैदा कर देती है जिसका फायदा हमलावर उठा सकते हैं.

इसके साथ-साथ वेनेज़ुएला की वायु रक्षा प्रणाली, खासकर रडार नेटवर्क को भी साइबर हमलों का निशाना बनाया गया. रडार डेटा को प्रोसेस करने वाले सॉफ़्टवेयर में घुसपैठ से सिस्टम या तो खराब दिखने लगता है या फिर गलत तस्वीर पेश करता है. यह स्थिति ज़्यादा खतरनाक होती है क्योंकि ऑपरेटर को यह एहसास ही नहीं होता कि सिस्टम से छेड़छाड़ की जा चुकी है. संचार व्यवस्था को बाधित करना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा था. एल वोल्कान क्षेत्र में एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन में हस्तक्षेप और अहम फाइबर-ऑप्टिक लिंक काटे जाने से कमांड चेन टूट गई. जब संचार ठप होता है तो आदेश देने और जवाबी कार्रवाई करने में देरी होती है जिससे रक्षा कमजोर पड़ जाती है.

हाल की चर्चाओं ने यह साफ कर दिया है कि आज के युद्धों में साइबर और पारंपरिक सैन्य कार्रवाइयाँ एक-दूसरे से अलग नहीं रहीं. ज़मीन पर सैनिकों की कार्रवाई भले ही दिखाई दे लेकिन उसके लिए ज़मीन पहले साइबर हमलों के ज़रिये तैयार की जाती है.

एक और महत्वपूर्ण पहलू निगरानी ढांचे का दुरुपयोग रहा. वेनेज़ुएला समेत कई देशों ने स्मार्ट सिटी तकनीक में भारी निवेश किया है जैसे नेटवर्क से जुड़े कैमरे और बायोमेट्रिक सिस्टम, जिनमें से कई चीनी कंपनियों (जैसे ZTE) के हैं. ये सिस्टम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लगाए जाते हैं लेकिन बाहरी ताकतें इन्हें खुफिया जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं. इस पूरे घटनाक्रम से एक अहम बात सामने आती है- ऐसी कार्रवाइयों के लिए वर्षों की तैयारी होती है. खुफिया जानकारी जुटाना, सप्लाई चेन में सेंध लगाना, अंदरूनी पहुँच बनाना और मैलवेयर को लंबे समय तक छिपाकर रखना, यह सब संकट से बहुत पहले किया जाता है. यानी साइबर कमजोरी अक्सर तब सामने आती है जब संकट सिर पर आ चुका होता है.

साइबर विकास अब भारत की प्राथमिकता

भारत का अनुभव भी इसी ओर इशारा करता है. 2020 में गलवान संघर्ष के बाद भारत–चीन तनाव के दौरान भारतीय बिजली ग्रिड में चीनी साइबर घुसपैठ की कोशिशें सामने आईं. माना गया कि इसका मकसद तुरंत नुकसान पहुँचाना नहीं बल्कि अहम ढाँचों तक पहुँच का संकेत देना था. उसी साल मुंबई में हुई बिजली कटौती, जिसे चीनी साइबर हमले से जोड़ा गया, ने दिखाया कि कैसे नागरिक बिजली व्यवस्था को रणनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. हालांकि, भारत ने हालात संभाले, सेवाएँ जल्दी बहाल कीं और हालात को बिगड़ने से रोका. आगे की चुनौती चीन–पाकिस्तान के संभावित सहयोग से और बढ़ सकती है. बिजली, संचार और परिवहन नेटवर्क पर साइबर हमलों के ज़रिये बिना खुले युद्ध के हालात बनाए जा सकते हैं और फैसलों में देरी कराई जा सकती है. यह दिखाता है कि भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ बढ़ रही हैं जबकि साइबर प्रतिरोध की नीति अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है.

भारत ने साइबर खतरों को पहचानने में कुछ प्रगति ज़रूर की है लेकिन ग्रे-ज़ोन युद्ध के संदर्भ में कई कमजोरियाँ बनी हुई है. साइबर सुरक्षा से जुड़े संस्थान मौजूद हैं. फिर भी नागरिक, सैन्य और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल असमान है. यही वजह है कि आने वाले समय में साइबर सुरक्षा को केवल तकनीकी मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में लाने की ज़रूरत और भी बढ़ जाती है. भारत की साइबर सुरक्षा में एक बड़ी कमजोरी नागरिक और सैन्य ढांचों के बीच साफ़ बंटवारा है. बिजली ग्रिड, बंदरगाह और दूरसंचार नेटवर्क ज़्यादातर नागरिक संस्थाओं के अधीन हैं लेकिन इनमें किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है. इसके बावजूद साइबर सुरक्षा अभ्यास अक्सर ऐसे हालात की कल्पना नहीं करते, जहाँ साइबर और पारंपरिक सैन्य दबाव एक साथ और लंबे समय तक बना रहे. नतीजतन, भारत अलग-अलग साइबर घटनाओं से निपटने में तो सक्षम है लेकिन समन्वित और बड़े अभियानों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं दिखता.

आने वाले समय में साइबर सुरक्षा को केवल तकनीकी मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में लाने की ज़रूरत और भी बढ़ जाती है.

एक और गंभीर चिंता सप्लाई चेन से जुड़ी है. भारत की अहम अवसंरचना में इस्तेमाल होने वाला हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर बड़ी मात्रा में आयातित है जिनमें कई घटक ऐसे देशों से आते हैं जो भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील हैं. हालाँकि इस जोखिम को लेकर जागरूकता बढ़ी है लेकिन व्यापक जांच और वैकल्पिक स्रोतों की व्यवस्था अभी अधूरी है. वैश्विक अनुभव बताता है कि समझौता किया गया हार्डवेयर शांति के समय कोई संकेत नहीं देता; उसका असर संकट के समय ही सामने आता है. ग्रे-ज़ोन साइबर युद्ध भारत की एक पुरानी रणनीतिक दुविधा को भी उजागर करता है-हमले के स्रोत की पहचान. साइबर हमलों में दोष तय करना मुश्किल होता है और भारत की साइबर जवाबी कार्रवाई को लेकर घोषित नीति अभी स्पष्ट नहीं है. जब तक लाल रेखाएँ और अनुपातिक जवाब के संकेत साफ़ नहीं होंगे, तब तक विरोधी यह मान सकते हैं कि साइबर दबाव डालने का जोखिम कम है. साइबर क्षेत्र में प्रतिरोध केवल क्षमता से नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और स्पष्टता से बनता है.

आगे की राह 

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सोच में बदलाव ज़रूरी है. साइबर सुरक्षा को केवल तकनीकी मुद्दा मानने के बजाय सैन्य योजना का अहम हिस्सा बनाना होगा. महत्वपूर्ण ढांचों की नियमित जाँच, नागरिक और सैन्य एजेंसियों के संयुक्त अभ्यास, और साइबर-सक्षम ग्रे-ज़ोन संघर्षों की पूर्व तैयारी बेहद आवश्यक है. साथ ही, रणनीतिक संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है. भारत को यह दिखाना होगा कि वह साइबर हमलों का पता लगा सकता है, जिम्मेदारी तय कर सकता है और प्रभावी जवाब देने में सक्षम है. प्रतिरोध का मतलब यह नहीं कि हर हमले का उसी तरह जवाब दिया जाए बल्कि यह भरोसा दिलाना है कि साइबर दबाव की कीमत चुकानी पड़ेगी-चाहे वह कूटनीतिक हो, आर्थिक हो या साइबर माध्यम से.

ग्रे-ज़ोन युद्ध ने संघर्ष की प्रकृति ही बदल दी है. अब बिजली ग्रिड और महत्वपूर्ण अवसंरचना पर साइबर हमले केवल जासूसी तक सीमित नहीं रहे बल्कि वे आधुनिक राज्य-से-राज्य टकराव की पहली चोट बनते जा रहे हैं. चीन के साथ तनाव के दौरान भारत का अनुभव और वेनेज़ुएला जैसे मामलों से सामने आई रणनीति इस बदलते दौर की तस्वीर पेश करती है. भारत के लिए चुनौती सिर्फ़ तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक है. यदि बेहतर समन्वय, स्पष्ट नीति और मज़बूत प्रतिरोध संकेत नहीं बनाए गए, तो साइबर कमजोरियाँ विरोधियों के लिए कम जोखिम और ज़्यादा असर वाला हथियार बनी रहेंगी. ग्रे-ज़ोन में तैयारी की कमी खुद एक कमजोरी है, जिसका आने वाले समय में फ़ायदा उठाया जा सकता है.


यह लेख मूल रूप से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था.

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Soumya Awasthi

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Dr Soumya Awasthi is Fellow, Centre for Security, Strategy and Technology at the Observer Research Foundation. Her work focuses on the intersection of technology and national ...

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