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यह लेख रायसीना फाइल्स 2023 सीरीज़ का हिस्सा है.
भारत को अक्सर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में वर्णित किया जाता है. उस लोकतंत्र की रूपरेखा, उसके वर्तमान स्वरूप में, संविधान द्वारा निर्धारित ढांचे के माध्यम से परिभाषित की जाती है. भारत भी दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्रों में से एक है, इसकी लोकतांत्रिक परंपराएं हज़ारों साल पहले से चली आ रही हैं, [[i]] जो उन सभाओं और समितियों में व्यक्त की गई, जिसकी समानता प्राचीन ग्रीस और रोम में मिलती थीं. इन दो संस्थाओं और उनकी संबंधित भूमिकाओं के बीच का अंतर समय के साथ विकसित हुआ और परिणामस्वरूप इसका विवरण ग्रंथों में अलग-अलग मिलता है. आसान शब्दों में कहें तो, समिति एक सामान्य सभा की तरह थी जिसमें हर घर का प्रतिनिधित्व था, इस बीच, सभा एक कार्यकारी समिति के समान एक छोटा समूह था जिसके पास न्यायिक कार्य भी थे. [[ii]] सभा समिति की एक उप-समुच्चय थी.
मौजूदा समय में चलन के शब्दों के आधार पर एक सभा प्रतिनिधि लोकतंत्र का प्रतीक होता है, और एक समिति प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रतीक है. विशुद्ध रूप से स्थानीय निर्णयों को छोड़कर, प्रत्यक्ष लोकतंत्र शायद ही कभी काम करता है.
जैसा कि आधुनिक राष्ट्र करते हैं, इन प्राचीन सामूहिक निकायों ने विभिन्न निर्णय लिए जिनमें भागीदारी, विचार-विमर्श और व्यापारिक लेन-देन शामिल थे. इन फैसलों से नतीज़े निकलते हैं और ऐसी दुर्लभ स्थिति होती है जहां एक निर्णय से संबंधित सभी को लाभ होता है. अगर स्थिति X एक नतीज़े की ओर ले जाती है जो सभी के लिए स्थिति Y से बेहतर है, तो अर्थशास्त्री X को Y से 'पेरेतो सुपीरियर' होने के रूप में वर्णित करते हैं. हालांकि अधिकांश उदाहरणों में पेरेतो श्रेष्ठता का पता लगाना कठिन होगा. एक निर्णय किसी के लिए लाभ और किसी के लिए नुकसान की वज़ह बन सकता है. उन्हें एक दूसरे के ख़िलाफ़ व्यापार करने की ज़रूरत है और इससे समाज को समग्र लाभ (या नुकसान) का अनुमान लगाया जाता है. इसलिए कल्याणकारी अर्थशास्त्र में क्षतिपूर्ति सिद्धांतों पर सैद्धांतिक कार्य के लिए एक निकाय है. भले ही मुआवजे को लागू किया जा सकता है या नहीं इसके लिए लाभ या हानि की इंटर पर्सनल यानी अंतर-व्यक्तिगत (या इंटर हाउसहोल्ड) तुलना की आवश्यकता होती है. यह वस्तुतः असंभव है, क्योंकि किसी को ना केवल इंटर पर्सनल तुलना बल्कि कार्डिनल मेजरमेंट की भी आवश्यकता होती है. केवल ऑर्डिनल मेजरमेंट (क्रमिक माप) और उचित मान्यताओं के साथ, केनेथ एरो के प्रारंभिक कार्य में निहित सामाजिक पसंद के सिद्धांत में उपरोक्त बताई गई समस्याओं का ज़िक्र मिलता है. [[iii]]
ऐरो की प्रारंभिक संभावना/असंभावना प्रमेय (थ्योरम), जो रिजनेबल सेट ऑफ एक्जियोम यानी स्वयंसिद्धों के उचित सेट द्वारा परिभाषित है, वह एक तानाशाह के अस्तित्व को जन्म देता है. ऐरो धारणाओं के छूट ने बुनियादी समस्या से दूर हुए बिना हाइरारकी और ओलिगार्र्क (पदानुक्रम और कुलीनतंत्र) को जन्म दिया है - यानी, व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को सामूहिक निकाय द्वारा प्राथमिकता के साथ जोड़ना. और यही वो चीज है जिससे लोकतंत्र तैयार होता है.
स्वभाव से, कुछ निर्णय दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा जटिल होते हैं. जैसे-जैसे सामूहिक निकाय आकार में बढ़ते हैं, निर्णय अधिक जटिल होते जाते हैं. मौजूदा समय में चलन के शब्दों के आधार पर एक सभा प्रतिनिधि लोकतंत्र का प्रतीक होता है, और एक समिति प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रतीक है. विशुद्ध रूप से स्थानीय निर्णयों को छोड़कर, प्रत्यक्ष लोकतंत्र शायद ही कभी काम करता है. भागीदारी, चर्चा और ट्रेड ऑफ यानी व्यापारिक लेन-देन के लिए सामूहिक निकाय बहुत बड़ा हो जाता है. आधुनिक राष्ट्र इस प्रकार प्रत्यक्ष लोकतंत्र से दूर हो गए हैं, यहां तक कि अक्सर उद्धृत स्विस सिद्धांतों में भी. प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उदाहरण जनमत संग्रह है लेकिन एक जनमत संग्रह तब काम करता है जब एक ख़ास प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने को लेकर विकल्प बाइनरी (द्विआधारी) होते हैं; ब्रेक्सिट जनमत संग्रह इसकी बेहतर मिसाल है. सामूहिक निर्णय दुर्लभ होता है, जहां पक्ष-विपक्ष पर चर्चा की जाती है, जो इस तरह के बाइनरी नेचर (द्विअर्थी प्रकृति) का होता है.
पंचायती राज संरचना इस अंतर को दर्शाती है. नामकरण को लेकर देश भर में थोड़ी भिन्नता ज़रूर देखी जा सकती है लेकिन यह ज़िला परिषद (ज़िला-स्तर), पंचायत समिति (ब्लॉक-स्तर) और ग्राम पंचायत (ग्राम-स्तर) के साथ एक त्रि-स्तरीय संरचना है. भारत में निर्णय लेने के बारे में पूरी तरह से अलग तर्क है कि यह स्वतंत्रता पूर्व औपनिवेशिक विचारों और स्वतंत्रता के बाद की योजना प्राथमिकताओं से प्रेरित होता है. कई आयोगों और समितियों ने इसे चिन्हित किया है और निर्णय लेने का विकेंद्रीकरण अकेले फिसकल डिवॉल्यूशन (राजकोषीय विचलन) से परे होता है. [[iv]] यह संघ से राज्यों में और राज्यों के भीतर, नीचे स्थानीय निकायों में विकेन्द्रीकरण से जुड़ा होता है. [[v]] भारत की शासन संरचना में केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और स्थानीय सरकारें हैं. प्रत्येक सामूहिक निर्णय के लिए, एक ऑप्टिमल लेवल (इष्टतम स्तर) होता है जिस पर इसे लिया जाना चाहिए - संघ, राज्य और स्थानीय. ऊपर और नीचे दोनों सब-ऑप्टिमल (उप-इष्टतम) हैं और एक ठोस तर्क यह है कि वर्तमान संरचना अत्यधिक केंद्रीकृत और सब-ऑप्टिमल है. [[vi]] यह अभी भी सवाल उठाता है, हालांकि: एक बार जिस स्तर पर निर्णय लिया जाना है, तय हो जाने के बाद, क्या संपूर्ण सामूहिक निकाय निर्णय लेने के लिए इकट्ठा होता है, या यह सामान्य निकाय का एक निर्वाचित उप-समूह है? गांव के स्तर पर, ग्राम सभा सामान्य निकाय का प्रतिरूप है लेकिन ग्राम सभा को जानकारी के साथ आम तौर पर निर्वाचित ग्राम पंचायत द्वारा ही फैसले लिए जाते हैं.
आजकल विभिन्न संकेतकों के आधार पर देशों को रैंक देना एक तरह का फैशन बन गया है. फिर भी ये संकेतक अक्सर वैल्यू जजमेंट (मूल्य निर्णयों) को दर्शाते हैं. संकेतकों को शीर्षों में वर्गीकृत किया जाता है, उन्हें भार दिया जाता है और प्रत्येक शीर्ष के लिए एक सूचकांक प्राप्त किया जाता है.
दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र प्रति बल प्रतिनिधि का सूचक है और प्रत्यक्ष नहीं है. कुछ हद तक संदर्भ से बाहर ले जाने पर, यह ओल्सन के विरोधाभास के अलावा और कुछ नहीं है. [[vii]] बड़े समूह बहस करते हैं और विरोधाभास पैदा होता है. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) महासभा इसका एक उदाहरण है. छोटे समूह जल्द ही निर्णय लेते हैं. एक कारण यह है कि प्रभावी निर्णय लेने के लिए सूचना तक पहुंच की आवश्यकता होती है, जिसे हमेशा बड़े समूहों के बीच साझा नहीं किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, क्या 1974 और 1998 में पोखरण परीक्षणों से पहले जनमत संग्रह की कल्पना की जा सकती थी? क्या कोई जनमत संग्रह का विकल्प चुन सकता है जब बाहरी और आंतरिक सुरक्षा दांव पर हो? व्युत्पत्ति के अनुसार, लोकतंत्र का अर्थ है लोगों द्वारा शासन. हालांकि जटिल समाज में लोग प्रत्यक्ष रूप से नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों के ज़रिए शासन करते हैं.
आजकल विभिन्न संकेतकों के आधार पर देशों को रैंक देना एक तरह का फैशन बन गया है. फिर भी ये संकेतक अक्सर वैल्यू जजमेंट (मूल्य निर्णयों) को दर्शाते हैं. संकेतकों को शीर्षों में वर्गीकृत किया जाता है, उन्हें भार दिया जाता है और प्रत्येक शीर्ष के लिए एक सूचकांक प्राप्त किया जाता है. इसके बाद प्रमुख को भार दिया जाता है और संबंधित देश या राज्य के लिए सूचकांक का वैल्यू हासिल किया जाता है. इस प्रकार वे किसी ऐसी चीज की मात्रा निर्धारित करने और मापने में सफल होते हैं जो अक्सर अथाह और अमूर्त होती है, जो एक ऐसी मज़बूती का सुझाव देती है जो मौज़ूद नहीं है लेकिन वस्तुनिष्ठ आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने पर यह और भी बुरा हो जाता है. नमूने के छोटे आकार के बावज़ूद, एक धारणा-आधारित प्रश्नावली का संचालन करता है, उत्तर देने वालों को एक स्केल पर स्कोर देने के लिए कहा जाता है, फिर उन्हें जोड़ा जाता है और तब कहीं फाइनल स्कोर दिया जाता है. यह सार्वजनिक नीति के कई क्षेत्रों के लिए किया जाता है लेकिन ऐसे अध्ययनों में उस पारदर्शिता की कमी होती है जिसकी वे स्वयं वकालत करते हैं. लोकतंत्र के लिए, इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) वह संगठन है जो असंभव को संभव करने का प्रयास करता है. अपनी 2022 रैंकिंग में, भारत को फ्रांस की तरह एक फ्लॉड डेमोक्रेसी (त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र') के रूप में वर्णित किया गया है. [[viii]] संयुक्त राज्य अमेरिका को भी 'त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र' के रूप में वर्णित किया गया है. जबकि ब्रिटेन को 'पूर्ण लोकतंत्र' के रूप में वर्णित किया गया है. हालांकि ब्रिटेन के लोकतंत्र के हाल के कामकाज में कुछ ख़ामियां सामने आई हैं, जो किसी भी व्यक्ति के लिए स्पष्ट है और इसके लिए ज़रूरी नहीं कि वो व्यवस्था के अंदर का हो. कनाडा एक 'पूर्ण लोकतंत्र' है - एक ऐसा देश जहां आदिवासियों (पुरुषों और महिलाओं दोनों) को 1960 तक वोट देने का अधिकार नहीं था. भारत में संविधान की घोषणा के बाद, सभी वयस्क सार्वभौमिक मताधिकार के तहत 1951-52 में पहला राष्ट्रीय चुनाव हुआ.
लोकतंत्र और विकास का संबंध
ईआईयू के अनुसार भी ऑस्ट्रेलिया एक 'पूर्ण लोकतंत्र' है. फिर भी यह केवल 1962 में था जब स्वदेशी ऑस्ट्रेलियाई लोगों को मतदान करने की अनुमति दी गई थी. 'पूर्ण लोकतंत्र' के रूप में वर्गीकृत एक अन्य देश स्विट्जरलैंड है, जहां 1971 तक महिलाएं राष्ट्रीय चुनावों में मतदान नहीं कर सकती थीं.
इस तरह के सर्वेक्षण हमें जो भी बताते हैं, उसके बावज़ूद कुछ बिंदु बेहद स्पष्ट हैं. पहला, भारत में लोकतंत्र की परंपरा हज़ारों साल पुरानी है. शायद इसीलिए अपने कुछ निकटवर्ती पड़ोसियों के विपरीत भारत में, जून 1975 और मार्च 1977 के बीच आपातकाल की अवधि को छोड़ दिया जाए तो, लोकतंत्र बिना रोक-टोक के जारी रहा है. दूसरा, शहरी अभिजात वर्ग की सनक और गैर-भागीदारी के बावज़ूद, मतदान प्रतिशत भारत में चुनाव के सभी स्तरों पर उल्लेखनीय रूप से उच्च रहा है. उदाहरण के लिए, कई देशों से तुलना के रूप में, 2019 के संसदीय चुनावों में भारत में मतदान का प्रतिशत 67.4 प्रतिशत था. ब्रिटेन में – जिसे ईआईयू ने 'पूर्ण लोकतंत्र' के रूप में वर्गीकृत किया है – वहां साल 2019 के संसदीय चुनावों में मतदान 67.55 फीसदी था.[[ix]]
तीसरा, हर देश में हर नागरिक और हर मतदाता को अपने देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कामकाज और उसकी ख़ामियों के बारे में शिकायत होगी लेकिन यह लोकतंत्र के ख़िलाफ़ जाने वाला तर्क नहीं हो सकता है. दरअसल, लोकतंत्र की तुलना अक्सर ऑक्सीजन से की जाती है: इसकी सराहना तभी की जाती है जब यह मौज़ूद नहीं होता है. जैसा कि विंस्टन चर्चिल ने नवंबर 1947 में हाउस ऑफ कॉमन्स में एक बार अपने भाषण में कहा था: "सरकार के कई रूपों को आज़माया गया है, और पाप और शोक की इस दुनिया में आज़माया जाएगा. कोई भी यह ढ़ोंग नहीं करता कि लोकतंत्र पूर्ण या सर्वज्ञानी है. वास्तव में यह कहा गया है कि समय-समय पर आज़माए गए अन्य सभी रूपों को छोड़कर लोकतंत्र सरकार का सबसे ख़राब रूप है."[[x]]
कल्याण की दृष्टि से लोकतंत्र अच्छे निर्णय लेने की गति को धीमा कर सकता है लेकिन यह चेक और लिमिट्स की भी गुजांइश छोड़ता है जिससे ख़राब निर्णय लेने की संभावनाओं को सीमित किया जा सकता है. इसलिए ‘डेमोक्रेसी टैक्स” जैसे भाव एक ही पक्ष को देखते हैं. इसके अलावा 'लोकतंत्र सब्सिडी' भी एक तत्व है.
सवाल शायद यह है कि क्या लोकतंत्र और विकास के बीच कोई संबंध है. शुरुआत करने के लिए, दोनों शब्द - 'लोकतंत्र' और 'विकास'- को कई तरह से वर्णित किया जा सकता है और ऐसे पर्याप्त दस्तावेज़ मौज़ूद हैं जो उनके बीच के संबंधों को उजागर करते हैं.
एक स्तर पर यह तर्क दिया जा सकता है कि लोकतंत्र अपने आप में एक साध्य है; कि यह एक ऐसी कीमत (वैल्यू) है जिसके लिए हर व्यक्ति को प्रयास करना चाहिए ना कि इसे केवल विकास के साधन का ज़रिया मान लेना चाहिए. यह मानते हुए कि इसमें सकारात्मक सह-संबंध हैं, हालांकि सह-संबंध का अर्थ कार्य-कारण नहीं है. लोकतंत्र के कुशल संचालन से बेहतर विकास परिणाम प्राप्त हो सकते हैं; बेहतर विकास के नतीजे तब लोकतंत्र को और ज़्यादा बेहतर तरीक़े से चलाने का दबाव बना सकते हैं. दरअसल, दुनिया भर में लोकतांत्रिक परंपराओं में कमी की वजह से ये जगह अब फिर से लोकतंत्र ही तेज़ी से लेता जा रहा है.
दोनों के बीच संबंध भ्रमित करने वाला भी हो सकता है, इस अर्थ में कि यह किसी बाहरी चीज द्वारा प्रभावित होता है. लोकतंत्र से ही पूरी तरह संबंधित एक और शब्द शासन के बारे में भी यही कहा जा सकता है. विश्व बैंक के शासन संकेतकों का सेट आवाज और जवाबदेही, राजनीतिक स्थिरता और हिंसा/आतंकवाद की गैर मौज़ूदगी, सरकार की प्रभावशीलता, नियामक गुणवत्ता, कानून के शासन और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के छह आयामों पर आधारित है. [[xi]] क्रॉस-कंट्री तुलनाओं की समस्याओं के बारे में पहले जो कहा गया था, उसके अधीन ये आयाम लोकतंत्र की धारणाओं के साथ ओवरलैप करते हैं. यह कहने के बाद, क्रॉस-कंट्री इंपिरिकल साहित्य बताता है कि विकास के लिए लोकतंत्र ना तो आवश्यक है और ना ही पर्याप्त है. ऐसा भी नहीं है कि अधिनायकवादी शासन विकास के लिए अनुकूल होते हैं. चीन और वियतनाम सहित पूर्वी एशिया या फिर अधिनायकवादी तेल-समृद्ध देश, इस अवधारणा को गलत नहीं साबित करते.
बेशक, सत्तावादी लोगों की तुलना में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं धीमी हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि अधिनायकवादी निर्णय श्रेष्ठ होता है. कल्याण की दृष्टि से लोकतंत्र अच्छे निर्णय लेने की गति को धीमा कर सकता है लेकिन यह चेक और लिमिट्स की भी गुजांइश छोड़ता है जिससे ख़राब निर्णय लेने की संभावनाओं को सीमित किया जा सकता है. इसलिए ‘डेमोक्रेसी टैक्स” जैसे भाव एक ही पक्ष को देखते हैं. इसके अलावा 'लोकतंत्र सब्सिडी' भी एक तत्व है.
2022 में सीयूटीएस (कट्स) इंटरनेशनल ने सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सामने चुनिंदा मामलों के आर्थिक प्रभाव की जांच की. पांच मामलों का अध्ययन करते हुए, पाया गया कि 2018 के मध्य और 2021 के मध्य के बीच, भारत में लगभग 75,000 व्यक्ति उन फैसलों से प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए और लगभग 16,000 श्रमिकों ने अपनी नौकरी खो दी. “सरकार को लगभग 8000 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त नहीं हुआ जो अगर पूंजीगत व्यय के रूप में प्राप्त और निवेश किए गए होते, तो इस निवेश का 20000 करोड़ के बराबर का आर्थिक प्रभाव हो सकता था. भारतीय उद्योगों ने 15000 करोड़ के बराबर राजस्व गंवाए और इस दौरान श्रमिकों को लगभग 500 करोड़ की आय का नुकसान उठाना पड़ा”[[xii]] यह सुनिश्चित करने के लिए, ज्यूडिशियल ओवररीच (न्यायिक अति-पहुंच) और उचित न्यायिक प्रभाव आकलन करने में न्यायपालिका की विफलता के ख़िलाफ़ तर्क दिए जा सकते हैं जिसे लेकर सहानुभूति भी हो सकती है.[[xiii]]
किसी भी लोकतंत्र में लोकतंत्र के निर्माण में मदद करने वाली संस्थाएं क्या हैं? संविधान दोनों संघ और राज्य-स्तरीय सरकारों में तीन अंगों का वर्णन करता है: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका और ये सभी निर्वाचित नहीं होते हैं. अगर 'शासन' शब्द का उपयोग किया जाता है, जैसा कि विश्व बैंक के संकेतक भी बताते हैं, शासन सरकार की तुलना में व्यापक होना चाहिए. दरअसल, शासन और लोकतंत्र में नागरिक, नागरिक समाज और मीडिया भी शामिल हैं और संविधान के राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत (अनुच्छेद 51ए [[xiv]]) नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की वकालत करते हैं.
भारत में एक फलता-फूलता नागरिक समाज और मीडिया है जो तथाकथित पूर्ण लोकतंत्र कहे जाने वाले देशों के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सकता है. शासन की त्रुटिपूर्ण कार्यप्रणाली की ओर उंगली उठाना नागरिकों का अधिकार है. ये प्रतिकारी दबावों की तरह कार्य करते हैं. विशेष रूप से, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर)[[xv]] और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च [[xvi]] का यहां उल्लेख करना चाहिए. इस तरह के अभ्यास से पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार होता है और उनका ध्यान संसद के कामकाज पर रहता है. [[xvii]] हालांकि कार्यपालिका और न्यायपालिका की अपेक्षाकृत कम छानबीन होती है क्योंकि वे निर्वाचित नहीं होते हैं.
हालांकि, आलोचनाओं के साथ दो बिंदुओं का उल्लेख करना ज़रूरी है. सबसे पहले, भारत, कई अन्य देशों की तरह, एक अप्रत्यक्ष और प्रतिनिधि लोकतंत्र है. अगर कोई शासन के संस्थानों में विश्वास को कमज़ोर करता है तो यह लोकतंत्र को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर करेगा. दूसरा, बाहर की ओर उंगली उठाने के अलावा, भीतर की ओर इशारा करने का भी सवाल है कि किस हद तक व्यक्ति और उद्यम अपनी सीमाओं के भीतर लोकतंत्र का निर्माण करने में मदद करते हैं. आख़िरकार, संविधान की प्रस्तावना इन शब्दों से शुरू होती है, "वी द पीपल".
वास्तव में हम लोगों ने हज़ारों वर्षों से भारत में लोकतंत्र को धीरे-धीरे मज़बूत किया है. अपने आप में लोकतंत्र अच्छा है और अपने आप में एक ज़रिया भी है. उस लोकतंत्र की खोज और उसकी पूर्णता, प्रगति की तलाश है. ख़ामियों को "ख़राब लोकतंत्र" के रूप में वर्णित किया जा सकता है लेकिन अधिकांश भारतीयों के लिए लोकतंत्र को लेकर कोई शर्त मान्य नहीं है.
[i] Some of these strands are documented in India: The Mother of Democracy, Raghuvendra Tanwar and Umesh Ashok Kadam, eds. (Indian Council of Historical Research, 2022).
[ii] In Rig Veda descriptions, there is no evidence of a gender bias.
[iii] Kenneth J. Arrow, Social Choice and Individual Values (Yale University Press, 1951).
[iv] The First Administrative Reforms Commission (1966), Rajmannar Committee (1969), Sarkaria Commission (1983), the Second Administrative Reforms Commission (2005) and the Punchhi Commission (2007) are examples. Reflecting the mindset, the Punchhi Commission was called the Commission on Centre State Relations, suggesting a Centre at the core and States at the periphery. The Constitution uses the word ‘Union,’ not ‘Centre,’ though ‘Centre’ is routinely used.
[v] States have been reluctant to devolve downwards to Panchayati Raj institutions (PRIs) and urban local bodies (ULBs). There is also a broader issue of revamping the Seventh Schedule of the Constitution, based essentially on the Government of India Act of 1935.
[vi] There is the tangential but related argument of state formation. States have not been constituted on governance principles—not at the time of the States Reorganization Commission or subsequently.
[vii] In the sense that the size of the group matters, in reference to Mancur Olson, The Logic of Collective Action (Harvard University Press, 1965). Olson was interested in the provision of public goods.
[viii] “A New Low for Global Democracy,” The Economist, February 9, 2022.
[ix] “Voter Turnout by Country 2023,” World Population Review.
[x] “The Worst Form of Government,” Winston Churchill. The expression “Indeed it has been said” indicates that Churchill was paraphrasing and quoting a prevalent thought rather than this being a Churchill original.
[xi] “Worldwide Governance Indicators,” World Bank.
[xii] CUTS International, Economic Impact of Select Decisions of the Supreme Court and National Green Tribunal of India, 2022. Of the five cases, three were by Supreme Court and two by the National Green Tribunal.
[xiii] This is equally true of legal impact assessments.
[xiv] Inserted in 1977.
[xv] Association for Democratic Reforms.
[xvi] PRS Legislative Research.
[xvii] For example, productivity, electoral affidavits, criminalisation of politics, and politicisation of criminals.
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Bibek Debroy is Chairman, Economic Advisory Council to the Prime Minister of India (EAC-PM). ...
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