Author : Samir Saran

Originally Published द इंडियन एक्सप्रेस Published on Aug 21, 2025 Commentaries 0 Hours ago

भविष्य उन लोगों का है, जो इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि तकनीकी और आर्थिक प्रगति ने मानव समूहों को सामाजिक रूप से एक पुरातन दौर में वापस ला दिया है. इस समय समृद्धि, प्रभाव और कल्याण की मुद्रा देखभाल और अपनापन है.

"अफेक्शन इकोनॉमी": समानता, समुदाय और सॉफ्ट पावर ही है नए युग की नई मुद्रा

Image Source: Illustration by C R Sasikumar

मानव इतिहास के हर युग में एक विशिष्ट मुद्रा होती है, जो ये तय करती है कि शक्ति का वितरण कैसे होता है, साझेदारियां कैसे बनती हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास और प्रबंधन कैसे होता है. इतिहास के शुरुआती दौर में उपजाऊ भूमि को बुनियादी मुद्रा माना जाता था. फिर खनिज संसाधनों ने ये भूमिका निभाई. मौजूदा दौर में, जनसांख्यिकी, नवाचार या रचनात्मकता ही वो मुद्रा है, जो मूल्य, राष्ट्रीय उद्देश्य और वैश्विक शक्ति का निर्धारण कर रही है.

"अफेक्शन इकोनॉमी" क्या है?

जैसे-जैसे पुरानी व्यवस्थाएं खुद को बदलती है, नए आर्थिक रूप उभर रहे हैं. सूचना युग के उदय ने हमें डेटा अर्थव्यवस्था और 'अटेंशन इकोनॉमी' दी है. 'अटेंशन इकोनॉमी' का अर्थ एक ऐसी प्रणाली से है, जहां मानवीय ध्यान को एक मूल्यवान और दुर्लभ संसाधन के रूप में माना जाता है. कीमती संसाधन के मामले में इसे समय और धन के टक्कर का माना जाता है. आज की विखंडित, विभाजित, परमाणुवादी यानी एकलवादी दुनिया में हमें एक और शब्द पर विचार करना चाहिए. ये शब्द है "अफेक्शन इकोनॉमी". अफेक्शन इकोनॉमी यानी "स्नेह अर्थव्यवस्था" से तात्पर्य ऐसी प्रणाली से है, जहां औपचारिक संस्थानों या बाज़ार की ताकतों के बजाय व्यक्तिगत संबंध और भावनात्मक बंधन संसाधनों के आवंटन, सामाजिक समर्थन और यहां तक कि आर्थिक गतिविधियों में मुख्य भूमिका निभाते हैं. ये विशुद्ध रूप से लेन-देन संबंधों और माप-आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर, एक अधिक टिकाऊ और संपूर्ण विश्व के निर्माण में सहानुभूति, समुदाय और साझा मूल्यों के महत्व पर ज़ोर देती है.

अफेक्शन इकोनॉमी यानी "स्नेह अर्थव्यवस्था" से तात्पर्य ऐसी प्रणाली से है, जहां औपचारिक संस्थानों या बाज़ार की ताकतों के बजाय व्यक्तिगत संबंध और भावनात्मक बंधन संसाधनों के आवंटन, सामाजिक समर्थन और यहां तक कि आर्थिक गतिविधियों में मुख्य भूमिका निभाते हैं.

आज व्यापार, नवाचार, मूल्य सृजन में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितनी कामयाबी से एक समुदाय का निर्माण करते हैं. आप कितने प्रभावी रूप से भाईचारा बढ़ाते है, आप कितनी सावधानी से समूहों की देखभाल करते हैं. समूह, समानता या रिश्तेदारी और समुदाय: अब इन्हें ही सहयोग और आर्थिक सफलता के आधार स्तंभ माना जाता है.

हम पहले ही अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के सबसे तर्कसंगत, यथार्थवादी क्षेत्रों में भी इस विचार की झलक देख चुके हैं. आखिरकार, जब हम "समान विचारधारा वाले" राष्ट्रों की बात करते हैं, तो इससे हमारा क्या मतलब होता है? समान विचारधारा समानता पैदा करती है. ये एक साझा उद्देश्य बनाती है और एक समान दिशा सुनिश्चित करती है. इसका मतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा वर्तमान में पैदा की जा रही अस्थायी उथल-पुथल के बावजूद भी वैश्विक स्तर पर मूल विश्वास कायम रहेंगे.

अफेक्शन इकोनॉमी का कारोबार जगत पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ता है. कंपनियां और देश, दोनों ही स्नेह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. वो सहानुभूतिपूर्ण जुड़ाव और देखभाल के प्रति समर्पण के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं.

"अफेक्शन इकोनॉमी" से कौन देश उठा रहे हैं फायदा?

दुबई जैसे सबसे स्मार्ट शहरों ने अपनी जनसांख्यिकी और विकास नीतियां चुनिंदा समुदायों के इर्द-गिर्द गढ़ी हैं. हालांकि ये बात सही है कि वीज़ा व्यावसायिक कारणों से दिए जाते हैं, लेकिन असल में ये वीज़ा स्नेह का एक सुनहरा समूह बनाने का काम भी करते हैं. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य लोगों को दुबई से जुड़ना, दुबई से भावनात्मक संबंध बनाना सिखाना है. लोगों दुबई को पसंद करें, दुबई की एयरलाइंस से उड़ें, दुबई से ही सामान और घर खरीदें, दुबई में ही रहें.

संयुक्त अरब अमीरात एक आदर्श उदाहरण हो सकता है, लेकिन ये अकेला नहीं है. कई दूसरे देश भी समान हित-समुदायों के इर्द-गिर्द सॉफ्ट पावर रणनीतियां बना रहे हैं या बना चुके हैं. जर्मनी भी इसमें एक है; ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी, और निश्चित रूप से सिंगापुर भी.

कई कंपनियों ने ने भी ऐसा किया है. भारत में, धीरूभाई अंबानी द्वारा शुरू किया गया हितधारक पूंजीवाद, रिलायंस इंडस्ट्री के हजारों सह-स्वामियों से स्टेडियमों को भरना, इसका एक उदाहरण पेश करता है. रिलायंस की मूल सोच में अब भी यही भावना है. हालांकि अब इक्विटी समुदाय का स्थान डेटा इक्विटी समुदाय ने ले लिया है, और ब्रॉडबैंड को पिरामिड के निचले स्तर यानी आम लोगों तक पहुंचाया है.

क्या अमेरिका को नुकसान पहुंचा रहे हैं ट्रंप?

अमेरिका एक विशेष मामला है. एप्पल जैसी कंपनियों ने इसी आधार पर वैश्विक उत्पादन और उपभोग नेटवर्क स्थापित किए हैं जो प्रेरणा के लिए कैलिफोर्निया की ओर देखते हैं. अमेरिका की संघीय सरकार ने निजी क्षेत्र को अफेक्शन इकोनॉमी चलाने की मंजूरी दे दी है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने तुनकमिजाजी वाले बर्ताव से इसी संचित स्नेह-पूंजी को तेज़ी से खत्म कर रहे हैं. आज देशों और कंपनियों को जो चीज़ अलग करती है, वो है उनका नेटवर्क. लंबे समय से ये माना जाता रहा है कि चीन में सॉफ्ट पावर की कमी है. चीन के चमत्कारिक विकास का सम्मान तो होता है, लेकिन उसे पसंद नहीं किया जाता था. सॉफ्ट पावर की कमी ने 21वीं सदी में चीन के उत्थान पर एक कठोर सीमा लगा दी. अमेरिका के लिए ऐसा कोई कठोर बंधन नहीं था, जब तक कि उसने अपने लिए खुद एक बाधा नहीं खड़ी कर ली.

अब सवाल है कि वर्तमान में अफेक्शन इकोनॉमी इतनी हावी कैसे हो गई है? डिजिटल तकनीक द्वारा दुनिया के एक बराबरी पर आने का इसमें कुछ योगदान है.

अब सवाल है कि वर्तमान में अफेक्शन इकोनॉमी इतनी हावी कैसे हो गई है? डिजिटल तकनीक द्वारा दुनिया के एक बराबरी पर आने का इसमें कुछ योगदान है. पहले आस-पड़ोस और कार्यस्थलों में सहज संबंध बनते थे, अब इसकी जगह डिजिटल प्रौद्योगिकी से बनने वाले ऑनलाइन लेकिन ज़्यादा बिखरे, और नाजुक रिश्तों ने ले ली है.

लेकिन ये ऑनलाइन संबंध और वैयक्तिकरण दशकों से चल रहे हैं. राजनीति विज्ञानी रॉबर्ट पुटनाम ने 1990 के दशक में "सामाजिक पूंजी" का एक सिद्धांत विकसित किया. इसमें बताया गया था कि कैसे व्यक्ति-से-व्यक्ति संबंध आधुनिक अमेरिका के लिए आधारभूत थे. अपनी पुस्तक "बॉलिंग अलोन" में, उन्होंने तर्क दिया कि अब ये सामाजिक पूंजी घट रही है और इसके साथ ही नागरिक चेतना भी कम हो रही है. इससे समस्याएं पैदा होंगी, क्योंकि समुदाय ही सफलता का वास्तविक निर्धारक और विभेदक है. फ्रांसिस फुकुयामा ने अपनी किताब "ट्रस्ट" (1995) में दिखाया था कि कैसे सामाजिक पूंजी राष्ट्रों के भीतर विश्वास पैदा करती है, और कैसे इसी विश्वास के दम पर स्थिरता और आर्थिक विकास का मार्ग आसान होता है.

सामुदायिक व्यवस्था की तरफ लौट रही है दुनिया?

रॉबर्ट पुटनाम को इस बात पर कोई हैरानी नहीं है कि समुदायों के छिन्न-भिन्न होने की वजह से चरमपंथी आंदोलन उभर रहे हैं. राजनीतिक कार्यकर्ता स्टीव बैनन ने सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया है कि "बॉलिंग अलोन" किताब ने उन्हें प्रभावित किया. बैनन ने कहा कि इस किताब ने उन्हें और अन्य लोगों को अपने राजनीतिक आंदोलन को कई अमेरिकियों द्वारा महसूस किए जा रहे सामाजिक अलगाव के इलाज के रूप में पहचानने के लिए प्रेरित किया. यही घटना दुनिया भर में दोहराई जा रही है. व्यक्तिवादी समाज अकेलेपन से जूझ रहे अपने सदस्यों को चरमपंथी समुदायों के लिए छोड़ रहे हैं. ये चरमपंथी समूह और आंदोलन उस सच्ची एकजुटता और भाईचारे की एक धुंधली नकल मात्र हो सकते हैं जो विश्वास पैदा करती है. इसके बावजूद ये समूह उन लोगों के लिए समुदाय हैं जिनके पास अपना और कोई नहीं है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वसुधैव कुटुम्बकम: एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य की बात करते हुए इसी बात को दोहरा रहे थे. ये वास्तव में स्नेह और सामाजिक सद्भाव की ओर लौटने का समय है.

एक बात तो तय है, वैश्विक समाज को बदलने के लिए जो अंतिम धक्का चाहिए, वो कोई वैश्विक घटना ही होगी. कोविड एक बड़ी घटना थी. कोविड महामारी के दौरान अलगाव गहरा गया, कार्यस्थल अप्रासंगिक हो गए. उन लोगों की अहमियत बढ़ गई थी, जो अकेले रहकर काम को अंजाम दे सकते थे. आज, डिजिटल खानाबदोश और एकाकी आतंकवादी (लोन-वुल्फ टेररिस्ट) एक ही सिक्के के दो पहलू हो गए हैं.

भविष्य उन लोगों का होगा जो इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि तकनीकी और आर्थिक प्रगति ने मानव समूहों को सामाजिक रूप से एक पुरातन दौर में वापस ला दिया है. हम वास्तव में उस आदिम अवस्था में लौट आए हैं, जहां समुदाय किसी भी चीज से ज़्यादा मायने रखते हैं. इस समय समृद्धि, प्रभाव और कल्याण की मुद्रा देखभाल और अपनापन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वसुधैव कुटुम्बकम: एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य की बात करते हुए इसी बात को दोहरा रहे थे. ये वास्तव में स्नेह और सामाजिक सद्भाव की ओर लौटने का समय है.


यह लेख मूल रूप से द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हो चुका है.

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.