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अमेरिकी वर्चस्व का युग खत्म हो रहा है और यह बड़ी ताकतों के बीच जबर्दस्त मुकाबले व बढ़ती बहु-ध्रुवीयता के कारण संभव हो सका है.
Image Source: Getty
इस साल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ देखने को मिले, जिनसे शीत युद्ध के बाद के ‘एकध्रुवीय दौर’ का अंत होता लग रहा है. अमेरिकी वर्चस्व का युग खत्म हो रहा है और यह बड़ी ताकतों के बीच जबर्दस्त मुकाबले व बढ़ती बहु-ध्रुवीयता के कारण संभव हो सका है. हालांकि, अमेरिका के पास अब भी महत्वपूर्ण क्षमताएं हैं, लेकिन बदल रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में वैश्विक नतीजों को तय करने की उसकी ताकत तेजी से घटती जा रही है.
‘ट्रंप 2.0’ की शुरुआत इस साल की संभवत: सबसे बड़ी खबर रही. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना कार्यभार साल की शुरुआत में संभाला और वर्षांत होते-होते यह साफ हो गया कि उनके शासन ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है. ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ अब महज बयान नहीं, बल्कि व्यावहारिक हकीकत बन चुका है. उनका प्रशासन शीत युद्ध के बाद की आम सहमति वाली व्यवस्था को नकारकर विकसित हुआ है, जिससे अमेरिका के मित्र और विरोधी, दोनों तरह के देशों के सामने रणनीतिक अनिश्चितता पैदा हुई है.
ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ अब महज बयान नहीं, बल्कि व्यावहारिक हकीकत बन चुका है.
ट्रंप ने ‘भार बांटने’ के बजाय ‘भार सौंपने’ की नीति अपनाई और नाटो सहयोगियों से यह वायदा लेने में सफलता हासिल की कि 2035 तक वे अपनी जीडीपी का पांच प्रतिशत रक्षा पर खर्च करेंगे. ट्रंप की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति यूरोप के ‘देशभक्त’ (अति-दक्षिणपंथी) दलों से रिश्ते बढ़ाने की बात कहती है, जिसकी कीमत मुख्यधारा के लोकतांत्रिक नेता चुकाते हैं.
इस साल अमेरिका ने भारत समेत कई देशों पर टैरिफ का भार डाला. सहयोगियों व प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ टैरिफ का यह दुरुपयोग वैश्विक आपूर्ति शृंखला को प्रभावित कर रहा है, पर साथ ही इसने भारत जैसे मध्यम क्षमता वाले देशों को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का दावा करने को भी प्रेरित किया. ऐसा नहीं है कि महज अमेरिका के पीछे हटने से विश्व व्यवस्था नया आकार ले रही है, बल्कि एक सुचिंतित पुनर्संतुलन के साथ-साथ चीन की तकनीकी क्षमता और आक्रामक सक्रियता के कारण भी यह सब हो रहा है. डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ऐसी ताकत बन गया है, जो अपने अनुकूल वैश्विक व्यवस्था बनाना चाहता है, जबकि उसकी शर्तें पूर्व में खुद उसी ने गढ़ी है.
सहयोगियों व प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ टैरिफ का यह दुरुपयोग वैश्विक आपूर्ति शृंखला को प्रभावित कर रहा है.
साल 2025 में दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के प्रयासों में आई तेजी है. ऐसा ट्रंप प्रशासन द्वारा यूक्रेन और यूरोप को यह साफ करने के बाद हुआ कि युद्ध को लेकर उसका धैर्य अब जवाब दे रहा है. इस बाबत अगस्त में अलास्का में ट्रंप और उनके रूसी समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के बीच मुलाकात हुई, लेकिन इससे कोई अंतिम शांति समझौता नहीं निकल सका. रूस लगातार यूक्रेन के विसैन्यीकरण, यानी उसकी सैन्य क्षमता को कम करने पर जोर दे रहा है, जबकि कीव पक्की सुरक्षा गारंटी चाहता है. ट्रंप प्रशासन 20 सूत्री शांति योजना को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें एक ‘स्थिर’ सीमा रेखा और विसैन्यीकृत बफर क्षेत्र का सुझाव दिया गया है. युद्ध के मैदान में भारी नुकसान झेलने के कारण रूसी सेना धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. माना जाता है कि इस जंग में अब तक उसके 11 से 12 लाख सैनिक मारे गए या घायल हुए हैं, जिनमें से चार लाख तो इसी साल हताहत हुए. वहीं, यूक्रेन को 46,000 से अधिक जवानों का नुकसान हुआ है और लाखों लोग घायल हुए हैं. हाल-फिलहाल परमाणु हथियारों का मुद्दा भी वैश्विक चेतना में फिर से उभरा.
रूस द्वारा अपनी परमाणु नीति में संशोधन करने और अमेरिका द्वारा परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने के एलान के साथ ही ‘तीसरे परमाणु युग’ की शुरुआत हुई. ट्रंप ने मई 2025 में चार कार्यकारी आदेशों पर दस्तख्त किए, जिनका मकसद 2050 तक अमेरिकी परमाणु ऊर्जा क्षमता को चार गुना तक बढ़ाना और परमाणु नियामक आयोग में सुधार करना था. विभिन्न अनुमानों के अनुसार, चीन के पास अब परमाणु हथियारों की संख्या 600 हो चुकी है, जो 2024 में करीब 500 थी. इतना ही नहीं, लगता यही है कि वह ‘लॉन्च ऑफ वार्निंग’ नीति अपना चुका है, जिसमें दुश्मन की तरफ से महज चेतावनी मिलते ही परमाणु मिसाइल दागे जा सकते हैं. उधर, वैश्विक प्रतिबंधों को फिर से लागू करने की समय-सीमा करीब आने के साथ ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम एक संवेदनशील मसला बना हुआ है.
रूस द्वारा अपनी परमाणु नीति में संशोधन करने और अमेरिका द्वारा परमाणु परीक्षण फिर से शुरू करने के एलान के साथ ही ‘तीसरे परमाणु युग’ की शुरुआत हुई.
दक्षिण एशिया की बात करें, तो 2025 में यहां तब तनाव पसर गया, जब भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव शुरू हो गए. दरअसल, 22 अप्रैल को भारतीय पर्यटकों को निशाना बनाकर पहलगाम में आतंकी हमला किया गया, जिसके जवाब में भारत ने पहले सिंधु नदी जल संधि को निलंबित किया और फिर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की कार्रवाई की. 10 मई, 2025 को दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच हुई सीधी बातचीत के बाद इस संघर्ष पर विराम लगा. ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत के एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत है. अब नई दिल्ली ने स्थान की परवाह किए बिना आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करने का अख्तियार हासिल कर लिया है.
इस बीच, इस क्षेत्र की राजनीतिक तस्वीर में भी बदलाव जारी रहे. श्रीलंका और बांग्लादेश में हम पहले ही देख चुके हैं, तो इस साल नेपाल की बारी थी, जहां ‘जेन जेड विद्रोह’ ने दशकों से जड़ें जमाई पारंपरिक राजनीतिक सत्ता को उखाड़ फेंका. इसकी शुरुआत 4 सितंबर को हुई, जब केपी शर्मा ओली सरकार ने यू-ट्यूब और वाट्सएप सहित 26 प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया. असहमति को दबाने का यह दांव उल्टा पड़ा और ‘नेपोकिड्स’ अभियान की शुरुआत हुई, जिसमें नौजवानों ने बेरोजगारी और राजनीतिक भ्रष्टाचार के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की. इस हिंसक विरोध-प्रदर्शन की परिणति प्रधानमंत्री ओली की विदाई से हुई और पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की ने अंतरिम सरकार का जिम्मा संभाला. इस तरह पहली बार यहां कोई महिला प्रधानमंत्री बनी हैं. इस विद्रोह ने बेशक नेपाल को आर्थिक नुकसान पहुंचाया, लेकिन इसने शासन सुधार की राह भी तैयार की, जिसका नतीजा है, मार्च 2026 में राष्ट्रीय चुनाव कराने का एलान.
साफ है, यह साल विश्व राजनीति के लिहाज से काफी उथल-पुथल वाला रहा. निकट भविष्य में इसके थमने की उम्मीद नहीं है. लिहाजा, इससे निपटने के लिए भारत को घरेलू क्षमता-निर्माण पर संजीदगी दिखाने की जरूरत है.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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