Originally Published एनडीटीवी Published on Nov 27, 2025 Commentaries 0 Hours ago

भारत के राफेल से परेशान चीन ने लड़ाई आसमान में नहीं, दिमागों में छेड़ी- AI और प्रोपेगेंडा को हथियार बनाकर. ऐसे में असली सवाल यही है: क्या प्रचार उसकी हथियार तकनीक की कमज़ोरियों को छुपा पाएगा, या और उजागर कर देगा?

राफेल की उड़ान, चीन परेशान- जानें नैरेटिव जंग का पूरा सच

पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई के लिए भारत द्वारा फ्रांस के राफेल लड़ाकू विमानों के सफल इस्तेमाल के बाद बीजिंग ने इन विमानों के ख़िलाफ़ भ्रामक अभियान चलाया था. यह खुलासा नवंबर 2025 में यूएस-चाइना इकोनॉमिक ऐंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन (USCC) ने किया है. उसके मुताबिक, चीन के एजेंटों ने एआई से तैयार तस्वीरों और वीडियो गेम के क्लिप का इस्तेमाल करके राफेल को न सिर्फ़ बेकार बताया बल्कि यह दावा भी किया कि चीन से मिले जे-10 विमानों की मदद से पाकिस्तान ने भारतीय राफेल विमानों को मार गिराया है. इस तरह, बीजिंग ने अपने जे-10 और जे-35 लड़ाकू विमानों को फ्रांस, रूस या भारत के लड़ाकू विमानों से बेहतर बताने की कोशिश की थी.

  • भारत की कार्रवाई के बाद चीन ने राफेल के ख़िलाफ़ भ्रामक अभियान चलाया.
  • चीन का सरकारी मीडिया और उसकी हितैषी संस्थाएं उन कहानियों को प्रचारित करने का काम करती हैं.

उसका यह प्रयास कुछ हद तक सफल भी रहा. उसके संभावित ख़रीदारों में से एक, इंडोनेशिया ने अक्टूबर 2025 में करीब 9 अरब डॉलर में 42 जे-10 विमानों की ख़रीद की. हालांकि, यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़े करता है. जैसे- चीन अपने हथियारों को आक्रामक रूप से कैसे और क्यों बढ़ावा दे रहा है? उसका यह कोई नया प्रयास है या अपने हथियारों की मार्केटिंग का पुराना तरीका? अंतरराष्ट्रीय हथियार निर्यात बाज़ार में अब तक चीन का प्रदर्शन कैसा रहा है?

“जैसा कि राफेल प्रकरण में देखा गया है, बीजिंग अपना काम ख़ास तरीके से करता है.”

ख़ास कार्यप्रणाली, अपेक्षित लाभ

बीजिंग सबसे पहले मनगढ़ंत या भ्रमित करने वाली तस्वीरें ऑनलाइन प्रसारित करता है और फिर उससे जुड़ी ऐसी कहानी बनाता है, जो उसकी शुरुआती धारणाओं से मेल खाती है. इसके बाद, चीन का सरकारी मीडिया और उसकी हितैषी संस्थाएं उन कहानियों को प्रचारित करने का काम करती हैं. उनको न सिर्फ़ बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है बल्कि आधिकारिक रूप से विश्वसनीय बनाने का प्रयास भी किया जाता है. इस प्रक्रिया के अंतिम चरण में चीन के दूतावास, राजनयिक व डिफेंस अताशे अपनी भूमिका निभाते हैं, और वे पूरे मामले को संभावित ख़रीदारों के सामने चालाकी से पेश कर देते हैं. अपनी मनगढ़ंत कहानी को वे इस बात का सुबूत बताते हैं कि हालिया संघर्ष में चीन के हथियारों ने कथित तौर पर अच्छा प्रदर्शन किया है.

“स्वाभाविक ही इससे चीन को अपेक्षित लाभ मिल जाता है.”

हथियारों के बड़े ख़रीदारों के लिए बाज़ार में गिने-चुने ही निर्यातक हैं. इसलिए, ये छोटे-छोटे लाभ भी फ़ायदे का बड़ा सौदा साबित होते हैं, फिर चाहे वह फ़ायदा राजस्व के रूप में मिले या लंबी अवधि के रणनीतिक लाभ के रूप में. असल में, उन्नत हथियारों को बेचने से कोई भी ग्राहक वर्षों तक उनके कल-पुर्ज़ों से जुड़े अनुबंध, प्रशिक्षण व रख-रखाव से बंध जाता है. इससे बीजिंग का प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है, जबकि पश्चिम की हैसियत कमज़ोर हो सकती है. वास्तव में, पश्चिम के हथियारों के ख़िलाफ़ माहौल बनाकर चीन संभावित ख़रीदारों के मन में संदेह पैदा करता है, और विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे अपने बड़े ग्राहकों को अपने हथियारों के प्रति आश्वस्त करता है.

 

तीसरे दर्जे का हथियार निर्यातक

इतना कुछ करने के बाद भी, चीन तीसरे दर्जे का हथियार निर्यातक ही माना जाता है. हथियारों के मामले में आज भी पश्चिम और रूस के रक्षा उद्योगों का ही दबदबा है. दरअसल, बीजिंग का सैन्य-औद्योगिक आधार मूल रूप से सोवियत हथियारों की नकल करके और रिवर्स-इंजीनियरिंग (किसी दूसरे निर्माता के उत्पाद की पड़ताल करके उसका खुद उत्पादन करना) से विकसित हुआ है. 1960 में चीन और सोवियत संघ में टकराव बढ़ने के बाद चीन ने दशकों तक अपने मित्र देशों को छोटे हथियार, हल्के उपकरण और कमतर तकनीक वाले अन्य हथियार बेचने तक ही खुद को सीमित रखा, वह भी आमतौर पर अनुदान के रूप में.

“इतना कुछ करने के बाद भी, चीन तीसरे दर्जे का हथियार निर्यातक ही माना जाता है.”

यह तस्वीर 1980 के दशक में बदली, जब मध्य-पूर्व के संघर्षों के कारण बीजिंग के भारी हथियारों के लिए बड़े बाज़ार खुले. हालांकि, शीत युद्ध की समाप्ति और उसके बाद वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आई तेज़ी ने हथियारों के बाज़ार में चीन की हिस्सेदारी घटा दी. पहले खाड़ी युद्ध से उसे और झटका मिला, क्योंकि उसमें सोवियत के हथियारों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा. इससे मॉस्को की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुंचा, और चूंकि चीन उसकी नकल कर रहा था, इसलिए उसे भी इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा. इसके बाद, कमतर तकनीक वाले हथियारों का आपूर्तिकर्ता होने, उनके प्रदर्शनों में बार-बार आती मुश्किलों और कल-पुर्ज़ों की कमी ने बीजिंग की लोकप्रियता काफ़ी कम कर दी.

साल 2000 के बाद से, बीजिंग ने अपने सीमित ग्राहकों को लक्ष्य करके काम करना शुरू किया, और ज़ल्द ही उनके बीच अपनी एक अलग पहचान बना ली. 2023 तक, हथियार निर्यात के मामले में विश्व में उसकी हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत हो चुकी थी, जबकि अमेरिका की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत और रूस की 16 प्रतिशत है. इसके अलावा, चीन लगभग 60 प्रतिशत सैन्य उत्पाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार को बेचता है, जिनमें विशेष रूप से विमान, मिसाइल, बख़्तरबंद गाड़ियां और सह-उत्पादन वाले नौसैनिक जहाज़ होते हैं. हालांकि, अल्जीरिया, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों को भी चीन ने ड्रोन और निर्देशित ऊर्जा हथियार बेचे हैं, लेकिन उनके नतीजे आमतौर पर मिश्रित या निराशाजनक ही रहे हैं. यही कारण है कि इनमें से कई देश चीन का ऐसा विकल्प मानते हैं, जहां क़ीमतें सस्ती तो हैं, पर सैन्य ख़रीद में अनुबंध पारदर्शी नहीं होते, जिनसे सेना के अभिजात वर्ग में भ्रष्टाचार का ख़तरा बढ़ जाता है.

ख़राब प्रतिष्ठा- आक्रामक मार्केटिंग

हालांकि, हथियार निर्यातक देशों की सीढ़ी पर आगे बढ़ने के प्रयासों में चीन को ढांचागत समस्याओं से भी जूझना पड़ रहा है. म्यांमार के जेएफ-17 से लेकर पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणालियों व नौसैनिक प्लेटफॉर्मों तक, तकनीक, प्रदर्शन और स्थायित्व के मोर्चे पर लगातार मिल रही विफलताओं ने उसके प्रति अविश्वास बढ़ाया है और कथित रूप से सस्ते उपकरणों में छिपे ख़तरों को उजागर किया है. इसी का नतीजा है कि जितना बढ़-चढ़कर वह अपने हथियारों की मार्केटिंग करता है, उन हथियारों का प्रदर्शन उतना ही फीका साबित होता है. नतीजतन, ग्राहक किसी अन्य देश से हथियार ख़रीदने या वारंटी को लेकर सख़्ती बरतने और रखरखाव संबंधी शर्तों की मांग मज़बूती से करने लगे हैं. सेंसर फ्यूजन, लॉजिस्टिक्स और उन्नत तकनीकों में आगे बढ़ने के लिए भी चीन संघर्ष कर रहा है, जबकि इन मामलों में पश्चिम के निर्माता आज भी निर्णायक बढ़त बनाए हुए हैं.

“वास्तव में, पश्चिम के हथियारों के ख़िलाफ़ माहौल बनाकर चीन संभावित ख़रीदारों के मन में संदेह पैदा करता है, और विशेषकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार जैसे अपने बड़े ग्राहकों को अपने हथियारों के प्रति आश्वस्त करता है.”

इन्हीं सब वज़हों से बीजिंग ने अपनी जांची-परखी रणनीति अपनाई हुई है- प्रतिस्पर्धी लाभ उठाने के लिए क़ीमतें कम रखना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में रियायतें देना, कूटनीतिक दबाव बनाना और छवि ख़राब करने वाले अभियान चलाना. ये रणनीतियां फ़ायदेमंद साबित होती हैं और आश्रित ग्राहकों पर उसकी पकड़ मज़बूत बनाती हैं, हालांकि, जब बात प्रदर्शन व पारदर्शिता की आती है, तो उसके हथियार अंतरराष्ट्रीय बाजार में औंधे मुंह गिर जाते हैं. इसके अलावा, भारत, तुर्कीये, दक्षिण कोरिया जैसे नए आपूर्तिकर्ता अब बेहतर तकनीक और प्रतिष्ठा के साथ वैश्विक हथियार बाज़ार में उतर रहे हैं. ऐसे में, चीन के लिए आने वाले वर्षों में तीसरे दर्जे का स्थान बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है.


(यह टिप्पणी मूल रूप से NDTV पर प्रकाशित हुई है)

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