Author : Harsh V. Pant

Originally Published हिन्दुस्तान Published on Feb 04, 2026 Commentaries 2 Days ago

दोनों देशों की इस व्यापारिक सहमति की उम्र निजी रिश्तों से ज्यादा इस बात पर निर्भर करेगी कि रणनीतिक संबंधों को यह आर्थिक राष्ट्रवाद से कितना जोड़ पाती है‌?

अमेरिका से दोस्ती या सौदेबाज़ी? भारत को मिलेगा कितना फायदा

भारत और अमेरिका के बीच 2 फरवरी, 2026 को हुए प्रारंभिक व्यापार समझौते की घोषणा दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक अहम बदलाव दिखाती है. भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने से यह समझौता हमारे निर्यातकों पर तात्कालिक दबाव कम करता है, साथ ही लेन-देन के उस तर्क को भी रेखांकित करता है, जो दूसरे देशों के साथ अमेरिका की आर्थिक नीतियों को नियंत्रित कर रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर हुई बातचीत के बाद घोषित व्यवस्था, टैरिफ में मिली राहत को रूस से तेल आयात को धीरे-धीरे कम करने और ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि व कोयला आदि क्षेत्रों में अमेरिका से अधिक खरीद के वादे से जोड़ती है. भारतीय अधिकारियों ने हालांकि इस समझौते को ‘ऐतिहासिक’ व ‘मेक इन इंडिया’ पहल को बढ़ावा देने वाला बताया है, लेकिन यह करार एक साल की कठिन बातचीत के बाद सामने आया है. इसमें लगे वक्त से अलग-अलग प्राथमिकताओं वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की गहरी चुनौतियां भी स्पष्ट होती हैं. वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताओं के बीच यह एक तरफ व्यावहारिक भू-राजनीतिक पैंतरेबाजी को उजागर करता है, तो दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा के मामले में हमारी कमजोरियों और अमेरिका की टैरिफ कूटनीति की सीमाओं को भी रेखांकित करता है.

अमेरिकी टैरिफ नीति

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार-वार्ता भारतीय टैरिफ सिस्टम, खासकर खेती व बौद्धिक संपदा से जुड़ी इसकी बड़ी बाधाओं को लेकर अमेरिकी शिकायतों की पृष्ठभूमि में हुई. राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत को ‘टैरिफ किंग’ बताया, जिसका नतीजा यह हुआ कि धीरे-धीरे दोनों तरफ टैरिफ बढ़े. अगस्त 2025 में यह 50 फीसदी शुल्क के रूप में सामने आया. रूस से रियायती दर पर तेल आयात के विरुद्ध जो अतिरिक्त शुल्क अमेरिका ने लगाया, वह भारत की ऊर्जा चिंताओं के प्रति अमेरिकी रुख में एक बड़ा बदलाव था. भारतीय निर्यातकों, खासकर वस्त्र, रसायन व दवा क्षेत्र के कारोबारियों पर काफी ज्यादा असर पड़ा. नतीजतन, अमेरिका के साथ नई दिल्ली का ‘ट्रेड सरप्लस’ तेजी से कम हो गया.

भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने से यह समझौता हमारे निर्यातकों पर तात्कालिक दबाव कम करता है, साथ ही लेन-देन के उस तर्क को भी रेखांकित करता है, जो दूसरे देशों के साथ अमेरिका की आर्थिक नीतियों को नियंत्रित कर रहा है.

अप्रैल 2025 में जो ट्रेड सरप्लस 3.17 बिलियन डॉलर था, वह घटकर नवंबर तक 1.73 बिलियन डॉलर रह गया. भारत के लिए, चुनौती कई तरह की थी : सस्ती ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखना और मॉस्को से अलग होने के अमेरिकी दबाव से निपटना. गौर कीजिए, 2025 में भारत के कुल तेल आयात में रूस का हिस्सा 40 प्रतिशत से ज्यादा था. इस दबाव ने रणनीतिक स्वायत्तता के पुराने सिद्धांत की सीमाओं को सामने ला दिया. इस सिद्धांत के तहत भारत ने बड़ी ताकतों की होड़ के बीच अपना रुख लचीला बनाए रखा, मगर अब बिखरी हुई विश्व-व्यवस्था में उसके इस रुख के लिए गुंजाइश कम होती जा रही है.

भू-राजनीतिक चुनौतियों ने व्यापार-वार्ता के माहौल को और मुश्किल बना दिया. दरअसल, पहलगाम में 2025 के आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष-विराम कराने के राष्ट्रपति ट्रंप के दावों ने नई दिल्ली को काफी दुखी किया, जिससे इस समझौते की घरेलू राजनीतिक कीमत बढ़ी. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को रोके जाने और इस्लामाबाद के साथ वाशिंगटन के नए रिश्ते ने अमेरिका को लेकर भारत की सशंकित सोच को और पक्का कर दिया. ठीक इसी समय, यूरोपीय संघ के साथ भारत के समानांतर कारोबारी रिश्ते ने व्यापार-वार्ता में उसकी ताकत को मजबूत किया, इससे हिंद-प्रशांत में चीन से पिछड़ने को लेकर अमेरिका की चिंताएं बढ़ रही थीं.

बहरहाल, साल भर चली इस बातचीत में राजनीतिक नेतृत्व के स्तर की कूटनीति के साथ-साथ बेहद श्रमसाध्य तकनीकी सौदेबाजी भी शामिल रही. हालांकि, फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते के मकसद से दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई, पर इसकी प्रगति एक समान नहीं रही. छह दौर की औपचारिक बातचीत हुई और कई अनौपचारिक संपर्क हुए. इस बीच टैरिफ बढ़ने व भू-राजनीतिक कारणों से रुकावटें भी आईं, मगर दोनों पक्षों के प्रभावशाली सलाहकारों की मदद से पिछले दरवाजे की कूटनीति ने इस वार्ता-प्रक्रिया को जिंदा रखा.

इसमें दोराय नहीं कि भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कमियों को दूर करने में बेहद खामोशी से अहम भूमिका निभाई है. तनावपूर्ण मोड़ों पर व्यापार-वार्ता को आसान बनाने के लिए उन्होंने अपने असर का अच्छा इस्तेमाल किया. विदेश मंत्री एस जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल समेत वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों के शामिल होने से यह सुनिश्चित हुआ कि व्यापार-वार्ता रक्षा, दुर्लभ खनिज और आपूर्ति श्रृंखला को शामिल करते हुए एक बड़ी रणनीतिक बातचीत का हिस्सा बनी रहेगी.

भारत के लिहाज से यह बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में अमेरिका के साथ गहरे संबंधों की ओर एक व्यावहारिक बदलाव का संकेत है, पर यह सफलता ऊर्जा स्वायत्तता की कीमत पर हासिल हुई है. अमेरिका के लिए यह दबाव की कूटनीति के जरिये ‘अमेरिका फर्स्ट’ का उदाहरण है.

यह कामयाबी एक चिर-परिचित लेन-देन पर टिकी थी. रूस से तेल आयात में धीरे-धीरे कमी लाने और अमेरिकी कारोबारियों को प्राथमिकता देने की इच्छा दिखाकर भारत अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं से करीब से जुड़ने को सहमत हुआ है. बदले में, वाशिंगटन ने टैरिफ में राहत दी है, जिससे हमारे निर्यात को प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले अतिरिक्त योग्यता वापस मिल गई है. फिर भी, इस समझौते की कुछ बातें गौरतलब हैं. राष्ट्रपति ट्रंप का 500 बिलियन डॉलर की संभावित भारतीय खरीद का दावा जहां उम्मीद जगाता है, वहीं कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में समझौते की बातें बहुत साफ नहीं हुई हैं.

आगे की राह 

यह समझौता आर्थिक राष्ट्रवाद और रणनीतिक जरूरतों के बीच एक मुश्किल रास्ता है, जिससे भारतीय निर्यात और अमेरिका के कृषि राजस्व में बढ़ोतरी हो सकती है. फिर भी, अभी यह शुरुआती स्तर पर है, आईपी विवादों और श्रम मानक जैसी चुनौतियों के बीच एक पूरा मुक्त व्यापार समझौता अभी लंबित है. भारत के लिहाज से यह बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में अमेरिका के साथ गहरे संबंधों की ओर एक व्यावहारिक बदलाव का संकेत है, पर यह सफलता ऊर्जा स्वायत्तता की कीमत पर हासिल हुई है. अमेरिका के लिए यह दबाव की कूटनीति के जरिये ‘अमेरिका फर्स्ट’ का उदाहरण है. हालांकि, इसमें एक जोखिम भी है. जैसे, तेल प्रतिबंध तनाव को फिर से बढ़ा सकते हैं.

जैसे-जैसे विश्व-व्यापार बंटेगा, इस समझौते की स्थिरता भारत-अमेरिकी रणनीतिक संबंधों की मजबूती भी परखेगी. इस व्यापारिक सहमति की उम्र निजी रिश्तों से ज्यादा दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को आर्थिक राष्ट्रवाद से जोड़ने की क्षमता पर निर्भर करेगी.


यह लेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. 

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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...

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