महिलाएं कृषि में बड़ी भूमिका निभाती हैं लेकिन अक्सर कम आय वाले काम तक ही सीमित रहती हैं. समझिए, क्यों उनके पास संसाधन और अधिकार कम हैं और जानिए, अगर उन्हें बराबरी का मौका मिले तो खेती और खाद्य सुरक्षा कैसे बेहतर हो सकती है.
वैश्विक दक्षिण के कई हिस्सों में कृषि धीरे-धीरे महिलाओं पर अधिक निर्भर होती जा रही है. महिलाएं वैश्विक कृषि कार्यबल का लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा हैं जबकि दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के कई क्षेत्रों में उनकी भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र की थीम ‘अधिकार, न्याय,कार्रवाई, सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए’ इस बात पर जोर देती है कि महिलाओं की भूमिका को केवल मान्यता देने से आगे बढ़कर उन्हें वास्तविक निर्णय-क्षमता और अधिकार दिए जाएं. इसी संदर्भ में 2026 को ‘महिला किसान का अंतरराष्ट्रीय वर्ष’ भी घोषित किया गया है.
कृषि मूल्य शृंखला के निचले स्तरों में महिलाओं की अधिक भागीदारी है. ये स्तर श्रम-प्रधान होते हैं और इनमें आय अपेक्षाकृत कम होती है. पुरुषों का शहरों या अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन और अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों ने कृषि के स्त्रीकरण को बढ़ाया है. दुनिया के अधिकांश किसान छोटे किसान हैं और वे वैश्विक खाद्य उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा पैदा करते हैं. कटाई के बाद के कार्य-जैसे प्रसंस्करण, संभाल और भंडारण-में भी महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है. निम्न और मध्यम आय वाले देशों में ऐसे कार्यों का लगभग आधा हिस्सा महिलाएँ करती हैं.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र की थीम ‘अधिकार, न्याय,कार्रवाई, सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए’ इस बात पर जोर देती है कि महिलाओं की भूमिका को केवल मान्यता देने से आगे बढ़कर उन्हें वास्तविक निर्णय-क्षमता और अधिकार दिए जाएं. इसी संदर्भ में 2026 को ‘महिला किसान का अंतरराष्ट्रीय वर्ष’ भी घोषित किया गया है.
फिर भी ये गतिविधियाँ प्रायः अनौपचारिक होती हैं जिनमें पूँजी निवेश कम होता है और औपचारिक बाजारों से जुड़ाव सीमित रहता है. उदाहरण के लिए, नाइजीरिया के डेल्टा राज्य में कसावा प्रसंस्करण का लगभग 90 प्रतिशत काम महिलाएं करती हैं. यह स्थिति व्यापक संरचनात्मक प्रवृत्ति को दर्शाती है, जहाँ मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ने पर मुनाफा और मूल्य संवर्धन बढ़ते हैं लेकिन महिलाओं की भागीदारी घटती जाती है. भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है-केवल 13 प्रतिशत महिला किसान ही औपचारिक एपीएमसी मंडियों के माध्यम से अपनी उपज बेचती हैं. बड़े कृषि और संबद्ध उद्यमों में भी महिलाओं की भागीदारी केवल 6 से 10 प्रतिशत के बीच है जबकि स्वामित्व और प्रबंधन में उनकी हिस्सेदारी इससे भी कम है.
यह असमानता मुख्य रूप से संरचनात्मक बाधाओं से जुड़ी है जिनमें सबसे महत्वपूर्ण भूमि स्वामित्व में असमानता है. कई विकासशील देशों में महिलाएं कृषि कार्यबल का लगभग आधा हिस्सा हैं लेकिन वैश्विक स्तर पर केवल लगभग 15 प्रतिशत महिलाओं के पास ही भूमि का स्वामित्व है.
भूमि अक्सर ऋण प्राप्त करने के लिए गिरवी के रूप में काम करती है और सरकारी योजनाओं के लिए पात्रता का आधार भी होती है इसलिए सीमित भूमि स्वामित्व महिलाओं की वित्त, बीमा और व्यावसायिक नेटवर्क तक पहुँच को भी सीमित कर देता है जिससे वे कम आय वाले कार्यों तक ही सीमित रह जाती हैं. इसके साथ ही समय की कमी (टाइम पॉवर्टी) भी एक बड़ी बाधा है. महिलाएं पुरुषों की तुलना में औसतन 2.5 गुना अधिक समय अवैतनिक देखभाल कार्यों में लगाती हैं जिससे उनकी गतिशीलता और उच्च-मूल्य वाले कार्यों में भागीदारी सीमित हो जाती है. वित्तीय बहिष्करण भी मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ने की संभावनाओं को बाधित करता है. अधिकांश महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों में ऋण की मांग पूरी नहीं हो पाती, जबकि माइक्रोफाइनेंस योजनाएं अक्सर इतनी छोटी और अल्पकालिक होती हैं कि वे यंत्रीकरण या नवाचार के लिए पर्याप्त नहीं होतीं.
नीतिगत हस्तक्षेपों को उन संस्थागत व्यवस्थाओं को बदलने पर ध्यान देना चाहिए जो महिलाओं को मूल्य श्रृंखला के निचले स्तरों तक सीमित रखती हैं. सुरक्षित भूमि अधिकार इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं, क्योंकि इससे महिलाओं की सौदेबाजी शक्ति बढ़ती है
डिजिटल विभाजन भी इन समस्याओं को बढ़ाता है. कृषि जानकारी और डिजिटल प्लेटफार्मों तक सीमित पहुँच के कारण महिलाओं की सौदेबाजी क्षमता कम हो जाती है और वे बाज़ार संकेतों पर उतनी तेजी से प्रतिक्रिया नहीं दे पाती. जलवायु परिवर्तन का दबाव भी इन चुनौतियों को और बढ़ाता है. खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार महिला-प्रधान कृषि परिवारों को अत्यधिक गर्मी और चरम मौसम घटनाओं के कारण आय में अपेक्षाकृत अधिक नुकसान होता है, क्योंकि उनके पास संसाधनों और बीमा तक पहुँच सीमित होती है.
इसके बावजूद महिलाएं पारंपरिक ज्ञान और कृषि-पारिस्थितिक प्रथाओं की संरक्षक भी हैं, जो पीढ़ियों से टिकाऊ खेती को बनाए रखती आई हैं. दुर्भाग्य से इस ज्ञान को अक्सर नीति निर्माण में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता. इन असमानताओं की आर्थिक कीमत भी बहुत बड़ी है. FAO के अनुसार यदि कृषि संसाधनों तक पहुँच में लैंगिक अंतर को कम किया जाए तो महिलाओं की कृषि उत्पादकता 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, विकासशील देशों में कृषि उत्पादन लगभग 4 प्रतिशत तक बढ़ सकता है और भूख में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है.
इससे स्पष्ट है कि कृषि में लैंगिक असमानता केवल सामाजिक समस्या नहीं है बल्कि यह श्रम, भूमि और पूंजी के कम उपयोग के कारण उत्पन्न आर्थिक अक्षमता भी है.
कृषि मूल्य श्रृंखला में महिलाओं को ऊपर के और अधिक लाभ वाले हिस्सों तक पहुँच दिलाना जरूरी है क्योंकि इससे उत्पादन बढ़ेगा, बराबरी मजबूत होगी और खेती जलवायु चुनौतियों के सामने अधिक टिकाऊ बन सकेगी.
इसलिए नीतिगत हस्तक्षेपों को उन संस्थागत व्यवस्थाओं को बदलने पर ध्यान देना चाहिए जो महिलाओं को मूल्य श्रृंखला के निचले स्तरों तक सीमित रखती हैं. सुरक्षित भूमि अधिकार इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं, क्योंकि इससे महिलाओं की सौदेबाजी शक्ति बढ़ती है और उन्हें औपचारिक वित्त तथा सरकारी कार्यक्रमों तक पहुँच मिलती है. भूमि स्वामित्व योजनाओं को ऐसी ऋण सुविधाओं से जोड़ना भी जरूरी है जैसे विशेष कर्ज योजनाएँ, जोखिम सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन कोष, ताकि ये सुविधाएं अधिक संख्या में महिला समूहों तक पहुँच सकें.
जलवायु नीतियों में महिलाओं के पारंपरिक खेती के ज्ञान को शामिल करना और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में जगह देना भी जरूरी है. कृषि मूल्य श्रृंखला में महिलाओं को ऊपर के और अधिक लाभ वाले हिस्सों तक पहुँच दिलाना जरूरी है क्योंकि इससे उत्पादन बढ़ेगा, बराबरी मजबूत होगी और खेती जलवायु चुनौतियों के सामने अधिक टिकाऊ बन सकेगी.
यह लेख मूल रूप से एबीपी लाइव में प्रकाशित हुआ था.
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Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...
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Sharon Sarah Thawaney is the Executive Assistant to the Director - ORF Kolkata and CNED, Dr. Nilanjan Ghosh. She holds a Master of Social Work ...
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