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भारत और चीन का रिश्ता व्यापार से मजबूत है लेकिन भरोसे की कमी से उलझा हुआ. ऐसे में यूएई के साथ मिलकर बनी त्रिपक्षीय साझेदारी, सहयोग का एक आसान और सुरक्षित रास्ता दिखाती है.
भारत और चीन का रिश्ता एशिया के सबसे जटिल संबंधों में से एक है. दोनों देश पड़ोसी हैं, सभ्यतागत रूप से पुराने हैं और आर्थिक रूप से गहराई से जुड़े हुए हैं. वित्त वर्ष 2024–25 में भारत-चीन का द्विपक्षीय व्यापार करीब 128 अरब डॉलर तक पहुँच गया. यह मजबूत आर्थिक जुड़ाव दिखाता है लेकिन इसी के साथ एक सच्चाई यह भी है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक अविश्वास लगातार बढ़ा है जिसकी जड़ें दशकों पुराने सीमा विवाद में हैं. यह विवाद 2020 में हिमालय क्षेत्र में फिर उभरकर सामने आया.
भारतीय विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव की एक बड़ी वजह यह भी है कि चीन भारत को अब भी केवल दक्षिण एशिया की शक्ति के रूप में देखता है, न कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के तौर पर. इससे दोनों देशों की सोच में एक स्थायी दूरी बनी रहती है.
इसके अलावा, विदेश नीति को लेकर भी दोनों के नजरिए अलग हैं. चीन राजनीतिक मतभेदों को अलग रखकर आर्थिक सहयोग जारी रखने में विश्वास करता है जबकि भारत के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता किसी भी आर्थिक रिश्ते की पहली शर्त है.
जैसा कि भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कहा है,
“जब तक सीमा पर शांति और स्थिरता नहीं होगी, तब तक भारत-चीन संबंध सामान्य नहीं हो सकते.”
इसका मतलब साफ है- भारत के लिए रणनीतिक भरोसा कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्य शर्त है. भरोसे के बिना दोनों देशों के बीच मौजूद विशाल आर्थिक संभावनाएँ पूरी तरह साकार नहीं हो सकतीं.
ऐसे में केवल द्विपक्षीय (भारत-चीन) रिश्ते पर निर्भर रहने के बजाय एक त्रिपक्षीय ढांचा, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भी शामिल हो, एक अधिक व्यावहारिक और स्थिर रास्ता हो सकता है. यह ढांचा एक नया भू-आर्थिक मॉडल तैयार करता है, जहाँ तीनों देशों की ताकतों का बेहतर उपयोग हो सकता है.
इस व्यवस्था में भारत अपनी विशाल बाजार क्षमता, युवा मानव संसाधन और तेजी से बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को लेकर आता है. बदले में उसे यूएई और चीन से पूंजी, निवेश और तकनीक तक बेहतर पहुंच मिल सकती है.
चीन अपनी उन्नत तकनीक, मजबूत लॉजिस्टिक्स और विशाल पूंजी भंडार के साथ इसमें योगदान दे सकता है. यूएई के माध्यम से उसे भारत के बाजार में एक राजनीति से अलग, भरोसेमंद रास्ता मिलेगा. वहीं यूएई अपनी तटस्थ विदेश नीति, विश्व-स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, मजबूत कानूनी व्यवस्था और वित्तीय केंद्रों के जरिए एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने वाला वैश्विक आर्थिक केंद्र बन सकता है.
भारत और चीन के बीच जारी गतिरोध में यूएई एक खास भूमिका निभा सकता है. उसने अपनी विदेश नीति को तटस्थता और व्यापार-केंद्रित सोच पर खड़ा किया है और भारत व चीन—दोनों के साथ गहरे और भरोसेमंद संबंध बनाए हैं. यूएई यहां राजनीतिक मध्यस्थ नहीं, बल्कि आर्थिक भरोसे का गारंटर बन सकता है.
चूंकि भारत और चीन—दोनों के लिए यूएई के साथ अच्छे रिश्ते बेहद महत्वपूर्ण हैं इसलिए यूएई की छत्रछाया में हुए समझौतों का सम्मान करने की उनकी मजबूरी भी होगी. इससे एक तरह का “भरोसा-बाय-प्रॉक्सी” (Trust by Proxy) तैयार होता है, जहाँ यूएई की विश्वसनीयता भारत और चीन के आर्थिक सहयोग को सहारा देती है.
इस तरह, तीनों देश अपने साझा भू-आर्थिक हितों को आगे बढ़ा सकते हैं, बिना सीधे राजनीतिक अविश्वास में उलझे.
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Samriddhi is an Associate Fellow, Geopolitics at ORF Middle East, where she focuses on producing research and furthering the dialogue on regionally relevant foreign policy ...
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