रूस और यूक्रेन भले ही मेल-जोल करने के संकेत दे रहे हों, लेकिन वो ऐसा ट्रंप को अपने पाले में लाने की कोशिश में कर रहे हैं. ऐसे में कोई शांति समझौता होने की संभावना कम ही है.
अलास्का में 15 अगस्त और वाशिंगटन DC में 18 अगस्त को जो शिखर सम्मेलन हुए, उनको लेकर विस्तार से जानकारी के अभाव और सम्मेलन के नतीजों पर पड़े गोपनीयता के पर्दे से ये संकेत ज़रूर मिलता है कि कुछ बड़े क़दमों पर काम हो रहा है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात को पुतिन के लिए आम तौर पर कामयाब ही कहा जा रहा है. क्योंकि पुतिन ने न केवल पश्चिम से अलग थलग होने का सिलसिला तोड़ा और अपने लिए शानदार स्वागत का रास्ता खोला. इसके अलावा उन्होंने इस बातचीत का फ़ायदा उठाकर एक बार फिर से यूक्रेन के मसले पर अपना एजेंडा आगे बढ़ाने की कोशिश की. ये भी माना जा रहा है पुतिन ने इस संघर्ष के समाधान की बारीक़ियों के मामले में ट्रंप को मात दे दी: पुतिन, अमेरिका के प्रतिबंधों की उस नई मार से ख़ुद को बचाने में सफल रहे, जिसे लागू करने की चेतावनी अमेरिका के राष्ट्रपति ने कोई समझौता न हो पाने की सूरत में दी थी. पुतिन ने इसके बदले में अपनी तरफ़ से कोई ख़ास वादा भी नहीं किया. क़रीब तीन घंटे तक चली बातचीत के बाद ट्रंप ने अचानक अपने रुख़ में परिवर्तन लाते हुए, युद्धविराम के बजाय शांति समझौते को अपना फ़ौरी लक्ष्य बताना शुरू कर दिया. ये रूस के दृष्टिकोण से तो मेल खाता है, लेकिन, बातचीत आगे बढ़ाने के लिए यूक्रेन की मांग के ठीक उलट है.
क़रीब तीन घंटे तक चली बातचीत के बाद ट्रंप ने अचानक अपने रुख़ में परिवर्तन लाते हुए, युद्धविराम के बजाय शांति समझौते को अपना फ़ौरी लक्ष्य बताना शुरू कर दिया. ये रूस के दृष्टिकोण से तो मेल खाता है, लेकिन, बातचीत आगे बढ़ाने के लिए यूक्रेन की मांग के ठीक उलट है.
रूस ने अमेरिका को इसके बदले में क्या देने का वादा किया है, ये एक बड़ा सवाल है. ट्रंप प्रशासन की तरफ़ से आए अस्पष्ट बयानों को संकेत मानें, तो रूस ने यूक्रेन के लिए ‘ठोस’ सुरक्षा गारंटी पर सहमति जताई है, ख़ास तौर से यूरोप और अमेरिका की तरफ़ से ‘नैटो की धारा 5 जैसा संरक्षण’ स्वीकार करने का संकेत दिया है. वैसे तो इस सहमति की बारीक़ियां अभी सामने नहीं आई हैं. लेकिन, अगर अमेरिका इस प्रक्रिया में शामिल होता है, तो ये ट्रंप के पहले के रुख़ से अलग होगा.
इस वक़्त, संघर्ष कर रहे पक्षों के बीच ‘सुरक्षा की गारंटी’ के मसले पर शायद ही कोई सहमति है. जहां यूरोप के नेता तमाम विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिसमें यूक्रेन की सेना को सशक्त करने से लेकर उसके सैन्य उत्पादन को बढ़ावा देने और ज़मीन पर अपने सैनिक उतारने तक के क़दम शामिल हैं. वहीं, ट्रंप बार बार ये कहते रहे हैं कि अमेरिका, यूरोप के ज़रिए यूक्रेन को और हथियार तो बेचने को तैयार है. लेकिन, वो सभी पक्षों के बीच ‘तालमेल’ के प्रयासों से आगे नहीं बढ़ेगा. अगर अमेरिका अपने सैनिकों को यूक्रेन में तैनात करने से इनकार भी करता है, तो भी ये सारे क़दम पुतिन के लिए अस्वीकार्य हैं. उन्होंने यूक्रेन को एक निरपेक्ष या फिर ‘विसैन्यीकृत’ देश बनाने के अपने दृष्टिकोण में ज़रा भी बदलाव नहीं किया है. एक तरह से पुतिन यूक्रेन की ‘सुरक्षा की गारंटी’ के तौर पर असल में उसका विसैन्यीकृत करने की ही मांग कर रहे हैं. हालांकि, मौजूदा त्रिशंकु हालात में यूक्रेन इसके लिए राज़ी होगा, इसकी संभावना कम ही है.
एजेंडे का एक और प्रमुख मुद्दा और बात को अटकाने वाला विषय ‘ज़मीन की अदला-बदली’ का है, जिसे अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने पूरे ‘सौदे का केंद्र बिंदु’ बताया है. वैसे तो इसके प्रस्ताव की शर्तें स्पष्ट नहीं हैं. लेकिन, विटकॉफ ने संकेत दिया था कि दूसरे क्षेत्रों में रूस से रियायतें हासिल करने के लिए यूक्रेन को डोनबास का इलाक़ा रूस के हवाले करना होगा. इससे पहले अमेरिका, क्रीमिया पर रूस के नियंत्रण को अंतिम मान ही चुका है. अपनी सैन्य बढ़त को लेकर आश्वस्त रूस अब यूक्रेन के इलाक़ों पर अपनी पकड़ को बातचीत में सौदेबाज़ी के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. पुतिन ने पहले भी चेतावनी दी थी कि अगर यूक्रेन, युद्ध रोकने के लिए उनकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता है, तो रूस की सेना की बढ़त यूक्रेन को और भी बुरी स्थिति की तरफ़ धकेल देगी.
पुतिन ने पहले भी चेतावनी दी थी कि अगर यूक्रेन, युद्ध रोकने के लिए उनकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता है, तो रूस की सेना की बढ़त यूक्रेन को और भी बुरी स्थिति की तरफ़ धकेल देगी.
ज़मीन का मसला राजनीतिक कारणों से भी काफ़ी संवेदनशील है. यूक्रेन और रूस दोनों ने ही विवादित क्षेत्रों को अपने संविधान से संबद्ध कर लिया है. ऐसे में किसी भी पक्ष की ओर से लेन-देन की परिचर्चा वाले पांच क्षेत्रों (लुहांस्क, डोनेत्स्क, ज़फ़ोरज़िशिया, खेरसन और क्राइमिया) पर अमल के लिए एक लंबी और जटिल विधायी प्रक्रिया से गुज़रना होगा. ये बात यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमीर ज़ेलेंस्की को कमज़ोर स्थिति में पहुंचा देती है. क्योंकि, यूक्रेन के कुछ इलाक़े रूस के हवाले करने से शांति समझौते के बाद प्रस्तावित राष्ट्रपति चुनाव में उनकी सियासी महत्वाकांक्षा को नुक़सान हो सकता है.
रूस, यूक्रेन और यूरोप के बीच ट्रंप की शटल कूटनीति ने रूस और यूक्रेन के बीच सीधी बातचीत का दरवाज़ा खोला है. जहां दोनों देशों के बीच इससे पहले के दौर की बातचीत थोड़ी बहुत ही सफल रही थी, जिसमें दोनों देशों ने युद्ध बंदियों की अदला बदली की थी. लेकिन, ये वार्ता युद्धरत देशों के रुख़ में कोई समानता ला पाने में सफल नहीं हुई थी. अब नया लक्ष्य व्लादिमीर पुतिन और ज़ेलेंस्की के बीच सीधी बातचीत का है, जो अभी अधकचरा विचार लग रहा है. रूस ने ज़ेलेंस्की और पुतिन की बैठक की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज तो नहीं किया है. लेकिन, ये ज़रूर कहा है कि इस्तांबुल में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधिमंडल के बीच होने वाली बातचीत का स्तर और बढ़ाया जाए. इस तरह पुतिन और ज़ेलेंस्की के शिखर सम्मेलन को लेकर रूस ने अपना अस्पष्ट रुख़ बनाए रखा है.
जहां ट्रंप की कोशिश ये है कि वो 10 अक्टूबर को नोबेल पुरस्कारों के एलान से पहले एक और ‘शांति समझौता’ करा दें. वहीं, पुतिन को न कोई समय की जल्दी है और न ही देश में विरोध का दबाव है. रूस के राष्ट्रपति ट्रंप को रियायतें दे रहे हैं तो इसलिए, क्योंकि पुतिन को पता है कि ट्रंप का कार्यकाल उनके लिए जीवन में एक बार आने वाले ऐसे मौक़े की तरह है, जब वो रूस और अमेरिका के रिश्तों को सुधार सकें और बड़े सामरिक मसलों पर कोई आम सहमति बना लें. रूस ने ट्रंप को रिझाने के लिए कई रियायतें दी है. जैसे कि आर्कटिक में साझा परियोजनाएं चलाना और अहम खनिजों के भंडार तक पहुंच देना. अलास्का में ट्रंप से मुलाकात से ठीक एक दिन पहले पुतिन ने एक फ़रमान पर दस्तख़त करके अमेरिका की बड़ी तेल कंपनी एक्सन मोबिल को सखालिन-1 तेल और गैस परियोजना में अपनी हिस्सेदारी फिर से हासिल करने की छूट दी थी. मोटे तौर पर अमेरिका और रूस के रिश्ते टकराव से संवाद की दिशा में आगे बढ़े हैं. हालांकि, अभी दूतावासों में फिर से कर्मचारी बढ़ाने और वीज़ा के मसले हल करने जैसे तकनीकी मसलों पर भी उनकी आपसी बातचीत में प्रगति सीमित ही रही है.
यूक्रेन का युद्ध ऐसी उलझी हुई पहेली है, जिसको हल करने के लिए बहुत सब्र और ख़ामोश कूटनीति की ज़रूरत होगी. रूस और यूक्रेन भले ही मेल-जोल के संकेत दे रहे हैं. लेकिन, इसकी मुख्य वजह ट्रंप को अपने पाले में खींचने की कोशिश ही है. ऐसे में संघर्ष का कोई अच्छा समाधान सामने नहीं दिखता. कूटनीतिक दांव-पेंच के बावजूद कोई शांति समझौता होने की उम्मीद कम ही है. न तो अमेरिका और न ही यूरोप के पास रूस पर दबाव बनाने के लिए ज़रूरी और पर्याप्त दांव हैं. वहीं रूस भी यूक्रेन को अपनी शर्तों पर शांति हासिल करने को मजबूर करने में असफल रहा है. इस गतिरोध में आधी अधूरी शांति हासिल करने के प्रयास और लंबा खिंचा ये युद्ध, दोनों चलते रहेंगे.
ये लेख मूल रूप से इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था.
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Aleksei Zakharov is a Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. His research focuses on the geopolitics and geo-economics of Eurasia and the Indo-Pacific, with particular ...
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