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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया यात्राएँ यह दिखाती हैं कि भारत अफ्रीका को केवल कूटनीतिक साझेदार नहीं बल्कि ग्लोबल साउथ में अपने रणनीतिक सहयोगी के रूप में देख रहा है. वैश्विक दबावों के बीच भारत भरोसे और बराबरी पर आधारित रिश्तों को मज़बूती से आगे बढ़ा रहा है.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अफ्रीका यात्राएँ-दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया-सिर्फ़ औपचारिक कूटनीतिक दौरे नहीं थीं. एक महीने के भीतर दो अहम अफ्रीकी देशों की यात्रा यह दिखाती है कि भारत की विदेश नीति में एक गहरा बदलाव आ रहा है. भारत अब केवल गुटनिरपेक्षता की पुरानी नीति तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों के साथ आत्मविश्वास से भरी रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया दोनों ही ब्रिक्स समूह के सदस्य हैं और भारत 2026 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करने जा रहा है. ऐसे समय में, जब ब्रिक्स पर अमेरिका का दबाव बढ़ रहा है, इन दोनों देशों के साथ भारत की सक्रियता यह संकेत देती है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहता है.
अफ्रीका के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव यह भी दिखाता है कि भारत अब खुद को ग्लोबल साउथ के एक भरोसेमंद नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहता है- जहाँ भरोसा, विकास और आपसी सम्मान को प्राथमिकता दी जाती है. नवंबर में दक्षिण अफ्रीका और दिसंबर में इथियोपिया की यात्राएँ इस बात का संकेत हैं कि भारत, वाशिंगटन के राजनीतिक और आर्थिक दबावों के बावजूद, सिद्धांतों पर आधारित साझेदारियों को निभाने के लिए तैयार है.
दक्षिण अफ्रीका की 2025 की G20 अध्यक्षता ऐसे समय में हुई, जब वैश्विक राजनीति अस्थिर दौर से गुजर रही थी. यूक्रेन और ग़ाज़ा युद्ध, महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बहुपक्षीय संस्थाओं से लोगों का भरोसा उठना-इन सबने वैश्विक शासन व्यवस्था को कमजोर किया है.
अफ्रीका के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव यह भी दिखाता है कि भारत अब खुद को ग्लोबल साउथ के एक भरोसेमंद नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहता है- जहाँ भरोसा, विकास और आपसी सम्मान को प्राथमिकता दी जाती है.
हालाँकि, दक्षिण अफ्रीका को एक खास मौका भी मिला. वह लगातार चार वर्षों तक G20 की अध्यक्षता करने वाले ग्लोबल साउथ देशों-इंडोनेशिया, भारत और ब्राज़ील-की श्रृंखला का हिस्सा था. भारत की 2023 की G20 अध्यक्षता इस मामले में खास रही. दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने खुद स्वीकार किया कि भारत के अनुभव से दक्षिण अफ्रीका ने कई अहम सबक सीखे.
भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना के साथ G20 एजेंडे में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्त, बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार और समावेशी विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा जो ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताएँ हैं. गंभीर भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद भारत ने G20 नेताओं की साझा घोषणा को संभव बनाया जो दक्षिण अफ्रीका के लिए भी एक उदाहरण बना. भारत की ही पहल पर अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया जिससे दक्षिण अफ्रीका को वैश्विक मंच पर अधिक ताकत और वैधता मिली.
दक्षिण अफ्रीका ने भी भारत की तरह अफ्रीकी मुद्दों को अलग-थलग रखने के बजाय उन्हें वैश्विक विकास से जोड़ा. ऊर्जा परिवर्तन, स्वास्थ्य सुरक्षा, टिकाऊ ढाँचा और वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार जैसे विषयों को पूरी दुनिया के हित से जोड़कर पेश किया गया.
डिजिटल क्षेत्र में भी भारत का प्रभाव दिखा. भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुभव से प्रेरित होकर दक्षिण अफ्रीका ने अफ्रीका में ब्रॉडबैंड, डिजिटल भुगतान, डिजिटल पहचान और साइबर सुरक्षा को आगे बढ़ाने की बात रखी.
जहाँ दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण निरंतरता को दिखाता है, वहीं इथियोपिया भारत की बढ़ती रणनीतिक हिम्मत को दर्शाता है. 16-17 दिसंबर को मोदी की इथियोपिया यात्रा ऐसे समय हुई जब इथियोपिया के पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के साथ संबंध तनावपूर्ण चल रहे हैं.
भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना के साथ G20 एजेंडे में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु वित्त, बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार और समावेशी विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखा जो ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताएँ हैं.
इस यात्रा में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद ने नरेंद्र मोदी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया. यह सम्मान प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ यह भी दर्शाता है कि इथियोपिया भारत को एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार मानता है.
इथियोपिया को 2022 में अमेरिकी व्यापार योजना (AGOA) से बाहर किए जाने और मानवीय सहायता रोके जाने से बड़ा आर्थिक झटका लगा. ऐसे में भारत इथियोपिया के लिए एक ऐसा साझेदार बनकर उभरा है जो बिना शर्तों के विकास में सहयोग कर सकता है और उसके निर्यात आधारित उद्योगों को नए बाज़ार दे सकता है.
भारत के लिए भी यह साझेदारी अहम है. चीन, तुर्किये और पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रभाव के बीच इथियोपिया भारत को अफ्रीका में अपनी पारंपरिक भूमिका फिर से मज़बूत करने का अवसर देता है. लाल सागर और नील नदी क्षेत्र में स्थित होने के कारण इथियोपिया रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया यात्राएँ भारत की बदलती विदेश नीति का स्पष्ट संकेत देती हैं. ये दौरे यह साबित करते हैं कि भारत अब केवल संतुलन साधने की कूटनीति तक सीमित नहीं है बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के साथ खुले तौर पर खड़ा होने और उनके हितों का समर्थन करने के लिए तैयार है. ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति तीव्र दबावों, गुटबंदी और प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है, भारत ने यह संदेश दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति के दबाव में तय नहीं होगी.
यह भारत की उस विदेश नीति को दर्शाता है जो दबावों के बावजूद अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहती है और एक अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की दिशा में काम करती है.
भारत भली-भांति जानता है कि आर्थिक दृष्टि से वह अमेरिका जैसे देशों की जगह नहीं ले सकता. अमेरिका आज भी वैश्विक वित्त, व्यापार और तकनीक में एक प्रमुख भूमिका निभाता है. इसके बावजूद भारत यह भी समझता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल आर्थिक ताकत से नहीं टिकते. दीर्घकालिक साझेदारियाँ भरोसे, समानता और साझा हितों पर आधारित होती हैं. इसी सोच के साथ भारत अफ्रीका के साथ अपने रिश्तों को आगे बढ़ा रहा है.
अफ्रीकी देशों के लिए भारत की पेशकश अलग और विशिष्ट है. भारत विकास सहयोग को किसी शर्त या दबाव से नहीं जोड़ता. वह अफ्रीका को एक समान भागीदार मानते हुए उसके विकास सफर में साथ चलने की बात करता है. बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत का अनुभव अफ्रीका के लिए उपयोगी साबित हो सकता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत का दृष्टिकोण सम्मान और आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखता है.
दक्षिण अफ्रीका और इथियोपिया के साथ भारत की बढ़ती निकटता यह दिखाती है कि भारत ग्लोबल साउथ में नेतृत्व केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से स्थापित करना चाहता है. भारत न तो प्रभुत्व थोपना चाहता है और न ही किसी को अपने प्रभाव क्षेत्र में बांधना. यह भारत की उस विदेश नीति को दर्शाता है जो दबावों के बावजूद अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहती है और एक अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की दिशा में काम करती है.
समीर भट्टाचार्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
यह लेख मूल रूप से RT में प्रकाशित हुआ था.
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Samir Bhattacharya is an Associate Fellow at Observer Research Foundation (ORF), where he works on geopolitics with particular reference to Africa in the changing global ...
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