Author : Harsh V. Pant

Originally Published NDTV Published on Feb 16, 2026 Commentaries 0 Hours ago

2026 में न्यू START संधि खत्म होने और बढ़ते अमेरिका-चीन तनाव के बीच चीन के कथित 2020 परमाणु परीक्षण का खुलासा नई चिंता पैदा करता है. यह मामला कैसे वैश्विक परमाणु नियमों, भारत की रणनीति और एशिया के सुरक्षा संतुलन को प्रभावित कर सकता है- जानिए इस लेख में.

चीन का 2020 न्यूक्लियर टेस्ट: फिर क्यों बहस?

हाल ही में United States के कुछ अधिकारियों ने दावा किया कि China ने वर्ष 2020 में एक गुप्त परमाणु परीक्षण किया था. इस दावे ने पहले से ही कमजोर मानी जा रही वैश्विक परमाणु व्यवस्था को लेकर नई चिंता और अनिश्चितता पैदा कर दी है. अमेरिकी पक्ष के अनुसार, यह परीक्षण 22 जून 2020 को शिनजियांग के Lop Nur क्षेत्र में किया गया था और यह यील्ड-उत्पादक यानी वास्तविक विस्फोट वाला परीक्षण था, न कि केवल प्रयोगशाला स्तर की गतिविधि. बताया जाता है कि यह घटना India के साथ गलवान घाटी में हुई झड़प के कुछ ही दिनों बाद हुई इसलिए इसके समय को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

यदि China पर लगा गुप्त परमाणु परीक्षण का आरोप सही है तो उसने वैश्विक परीक्षण रोक की भावना तोड़ी. डिकपलिंग तकनीक से परीक्षण छिपाने के दावे ने United States की चिंता बढ़ाईं. इससे भरोसा घटता, हथियार होड़ और वैश्विक सुरक्षा अस्थिरता बढ़ सकती है.

समय का महत्व

इस खुलासे का समय भी महत्वपूर्ण है. यह अमेरिका-रूस न्यू START संधि की फरवरी 2026 में समाप्ति के साथ मेल खाता है जिससे दशकों में पहली बार दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु भंडारों पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं रहेगी. 2020 के परीक्षण के आरोप को प्रमुखता देकर, वॉशिंगटन ने अपने इस पुराने तर्क को मजबूत करने की कोशिश की है कि बहुध्रुवीय परमाणु माहौल में द्विपक्षीय हथियार नियंत्रण ढांचे अब पर्याप्त नहीं हैं. चीन का तेज़ी से बढ़ता परमाणु भंडार और संख्यात्मक असमानता का हवाला देकर हथियार नियंत्रण वार्ताओं में शामिल होने से उसका इनकार, अमेरिकी चिंताओं को और गहरा करता है कि रणनीतिक स्थिरता अब शीत युद्ध कालीन ढांचों से प्रबंधित नहीं की जा सकती.

अमेरिकी पक्ष के अनुसार, यह परीक्षण 22 जून 2020 को शिनजियांग के Lop Nur क्षेत्र में किया गया था और यह यील्ड-उत्पादक यानी वास्तविक विस्फोट वाला परीक्षण था, न कि केवल प्रयोगशाला स्तर की गतिविधि. बताया जाता है कि यह घटना India के साथ गलवान घाटी में हुई झड़प के कुछ ही दिनों बाद हुई इसलिए इसके समय को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

चीन की अपनी कार्रवाइयां-नए ICBM साइलो क्षेत्रों के निर्माण से लेकर हाइपरसोनिक डिलीवरी प्रणालियों में प्रगति तक-उसकी घोषित न्यूनतम प्रतिरोधक नीति पर संदेह बढ़ाती हैं. बीजिंग के लिए ये आरोप एक परिचित कथा का हिस्सा हैं. चीन ने इन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है जिनका उद्देश्य चीन खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और त्रिपक्षीय हथियार नियंत्रण वार्ताओं के लिए दबाव बनाना है. फिर भी, चीन की कार्रवाइयां-नए ICBM साइलो निर्माण से लेकर हाइपरसोनिक प्रणालियों में प्रगति तक-उसकी न्यूनतम प्रतिरोधक प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े करती हैं. यह माना जा रहा है कि China कई संभावित दुश्मनों को ध्यान में रखकर अपनी परमाणु ताकत को ज्यादा मजबूत और लचीला बना रहा है ताकि किसी भी हालत में सुरक्षित रह सके. इससे मौजूदा परमाणु हथियार नियंत्रण नियमों और समझौतों पर लोगों का भरोसा और कम हो रहा है.

भारत के लिए समस्या

इन आरोपों के असर केवल United States-China प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं हैं बल्कि भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. 2020 का कथित परीक्षण गलवान संकट के तुरंत बाद बताया जाता है जिससे नई दिल्ली की यह चिंता बढ़ती है कि चीन तनाव के समय बहु-क्षेत्रीय सैन्य संकेत देता है. भारत की परमाणु नीति अब तक न्यूनतम प्रतिरोध और ‘पहले उपयोग नहीं’ सिद्धांत पर आधारित रही है लेकिन चीन के तेज आधुनिकीकरण से रणनीतिक असमानता बढ़ सकती है. इसलिए भारत ने संख्या बढ़ाने के बजाय मिसाइल, समुद्री प्रतिरोधक क्षमता और MIRV तकनीक से विश्वसनीयता मजबूत करने पर ध्यान दिया है.

आज परमाणु हथियार फिर से ताकत दिखाने के साधन की तरह देखे जा रहे हैं. नतीजा यह है कि हथियार नियंत्रण अब देशों की प्रतिस्पर्धा को रोकने का साधन कम और उसी प्रतिस्पर्धा का शिकार ज्यादा बनता जा रहा है.

किसी एक देश के परमाणु व्यवहार में अस्पष्टता का असर कई क्षेत्रों पर पड़ता है. इससे हथियार नियंत्रण पर भरोसा घटता, प्रतिस्पर्धी आधुनिकीकरण बढ़ता और गलत आकलन का खतरा बढ़ जाता है. खासकर एशिया में यह जोखिम अधिक है. पारदर्शिता बिना वैश्विक परमाणु व्यवस्था और अस्थिर होगी.

पुरानी परमाणु व्यवस्था समाप्ति की ओर

आसान शब्दों में समझें तो वैश्विक परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था आज कमजोर पड़ती दिख रही है क्योंकि जिन राजनीतिक और रणनीतिक हालातों ने पहले इसे संभालकर रखा था, वे अब पहले जैसे नहीं रहे. शीत युद्ध के समय दुनिया दो बड़े गुटों में बंटी थी और दोनों पक्ष कुछ साझा नियमों और संतुलन को मानते थे. उन्हें पता था कि परमाणु युद्ध दोनों के लिए विनाशकारी होगा, इसलिए नियंत्रण के समझौते चल पाए.

अब स्थिति बदल चुकी है. दुनिया में कई नई ताकतें उभरी हैं, जैसे China और अलग-अलग क्षेत्रों में परमाणु प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. साथ ही हाइपरसोनिक हथियार, मिसाइल रक्षा प्रणाली और साइबर तकनीक जैसी नई तकनीकें भी आ गई हैं, जिससे सुरक्षा गणना और जटिल हो गई है.

बड़ी शक्तियों के बीच अविश्वास बढ़ा है. इसी कारण कई पुराने परमाणु समझौते टूट रहे हैं या कमजोर हो गए हैं, और उनकी निगरानी व सत्यापन व्यवस्था भी पहले जितनी मजबूत नहीं रही. आज परमाणु हथियार फिर से ताकत दिखाने के साधन की तरह देखे जा रहे हैं. नतीजा यह है कि हथियार नियंत्रण अब देशों की प्रतिस्पर्धा को रोकने का साधन कम और उसी प्रतिस्पर्धा का शिकार ज्यादा बनता जा रहा है.


यह लेख मूल रूप से एनडीटीवी में प्रकाशित हुआ था. 

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