Published on Jan 28, 2026 Commentaries 1 Days ago

ट्रंप के ईरान-विरोधी टैरिफ ने चाबहार बंदरगाह को भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बना दिया है- यह लेख इसी बदलती भू-राजनीति की पड़ताल करता है. भारत के लिए संतुलन साधना ज़रूरी है, क्योंकि पीछे हटने पर चाबहार में चीन की एंट्री का जोखिम साफ़ दिखता है.

चाबहार टकराव: भारत बनाम चीन

ट्रंप प्रशासन के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से ही भारत को कूटनीतिक और आर्थिक मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं. भारत को अपनी भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक प्राथमिकताओं में संतुलन बनाए रखने को लेकर नए सिरे से तनाव का सामना करना पड़ रहा है. इसका ताज़ा उदाहरण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा है. हालांकि, ये फैसला सभी देशों पर लागू होता है, लेकिन ट्रंप के इस कदम ईरान के साथ भारत के संबंधों को जटिल बना दिया है, विशेष रूप से ईरान के चाबहार बंदरगाह का मामला चुनौतीपूर्ण हो गया है.

ये टैरिफ चाबहार बंदरगाह पर भारत के संचालन के लिए अक्टूबर 2025 में वाशिंगटन से मिली छह महीने की छूट के तुरंत बाद आए हैं. नए टैरिफ के ख़तरे ने उस रियायत को चुनौती दी है और पहले से ही नाजुक क्षेत्रीय वातावरण में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है. व्यापक रूप से, इससे ईरान और मध्य पूर्व के बीच तनाव बढ़ने का ख़तरा बढ़ गया है.

चाबहार पर ट्रंप ने भारत को ‘धोखा’ दिया?

ईरान के प्रति ट्रंप का कठोर दृष्टिकोण अब एक पैटर्न बन गया है. ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी अमेरिका 2018 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) से हट गया था. अमेरिका ने तेल निर्यात, बैंकिंग, जहाजरानी और तीसरे पक्ष के व्यापार पर व्यापक प्रतिबंधों के माध्यम से तेहरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के उद्देश्य से अधिकतम दबाव अभियान शुरू किया. हालांकि बाइडेन प्रशासन ने कूटनीति के प्रति कुछ वायदे किए लेकिन ज़्यादार प्रतिबंध बरकरार रहे. पाबंदियां लागू करने के तरीकों में उतार-चढ़ाव तो आया लेकिन इनमें कभी भी मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं किया गया. ईरान लंबे समय से भारत-अमेरिका संबंधों में एक अहम मुद्दा रहा है. 2008 में अमेरिका-भारत के बीच हुए नागरिक परमाणु समझौते के समय भी ये देखा गया था. तब भारत पर अपनी ईरान नीति को पश्चिमी देशों के परमाणु अप्रसार उद्देश्यों के अनुरूप करने का दबाव बढ़ा.

ताज़ा उदाहरण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा है. हालांकि, ये फैसला सभी देशों पर लागू होता है, लेकिन ट्रंप के इस कदम ईरान के साथ भारत के संबंधों को जटिल बना दिया है, विशेष रूप से ईरान के चाबहार बंदरगाह का मामला चुनौतीपूर्ण हो गया है.

ट्रंप की वापसी ने इस रणनीति के दमनकारी पहलू को फिर से ज़िंदा कर दिया है. अब टैरिफ का इस्तेमाल तीसरे देशों को ईरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखने से रोकने के लिए किया जा रहा है. यह दृष्टिकोण वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका की पिछली रणनीति से मिलता-जुलता है. वेनेजुएला के तेल निर्यात को रोकने और एक तरह से रणनीतिक नाकाबंदी करने के लिए प्रतिबंधों और अन्य दंडों का इस्तेमाल किया गया था. ईरान के मामले में भी अमेरिका का मक़सद यही लग रहा है. ईरान के साझेदारों को दूर करना, आर्थिक जीवन रेखाओं को नष्ट करना और तेहरान को घेर लेना, जिससे सैन्य बल का सहारा लेने की संभावना बनी रहे.

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक व्यापारिक बंदरगाह परियोजना नहीं है बल्कि यह एक रणनीतिक धरोहर है जो ईरान के साथ सभ्यतागत संबंधों, क्षेत्रीय संपर्क और बढ़ते सुरक्षा हितों को आपस में जोड़ती है. चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं. ईरान पर लगे प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से पैदा हुई बाधाओं ने देशों के बीच संपर्क की परिकल्पना को नुकसान पहुंचाया है.

भारत ने मई 2024 में ईरान के साथ 10 साल का अनुबंध किया था जिसके तहत सरकारी स्वामित्व वाली इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) ने चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल के विकास के लिए लगभग 370 मिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई थी. ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन के साथ किए गए इस समझौते का उद्देश्य परिचालन स्थिरता प्रदान करना था. इसके साथ ही समझौते का मक़सद भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद भारत की भागीदारी जारी रखने की मंशा दिखाना था, लेकिन ट्रंप की घोषणा इसके विपरीत साबित हुई है.

चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं.

लेकिन नई दिल्ली के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि भारत अपने विकल्पों पर फिर से विचार कर रहा है. हालांकि, छह महीने की छूट को शुरू में एक एक्ज़िट रूट के रूप में देखा गया था, लेकिन अब लगता है कि भारत अपनी उपस्थिति बनाए रखने के तरीके तलाश कर रहा है. बंदरगाह निर्माण में शामिल लागतों और भारत की व्यापक समुद्री और हिंद-प्रशांत महत्वाकांक्षाओं के लिए चाबहार का रणनीतिक महत्व है. ईरान पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के नतीजों का सामना करने वाला भारत अकेला देश नहीं है. चीन, यूएई, ब्राज़ील, तुर्किए और रूस जैसे देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं.

चाबहार को लेकर उत्पन्न हुई नई परिस्थितियों के व्यापक निहितार्थ द्विपक्षीय तनावों से कहीं अधिक हैं. ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थित है, जो वैश्विक ऊर्जा प्रवाह और हिंद-प्रशांत आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है. ईरान की अर्थव्यवस्था या सुरक्षा वातावरण में किसी भी प्रकार की अस्थिरता से इस मार्ग पर व्यापार बाधित हो सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ा सकते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए निवेश विश्वास को कमज़ोर कर सकते हैं. भारत मध्य पूर्व में कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में चाबहार बंदरगाह का नुकसान या उसका दर्जा कम होना एक रणनीतिक झटका होगा.

चाबहार में भारत की जगह चीन लेगा?

इन सबका समय बेहद महत्वपूर्ण है. ईरान पहले से ही आंतरिक तनाव से जूझ रहा है. हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा रद्द हुई. इस दौरान चाबहार पर बात होनी थी, लेकिन दौरा रद्द होने से ये बातचीत नहीं हो सकी. वहीं, मध्य पूर्व में अस्थिरता बनी हुई है, जहां नाजुक युद्धविराम और अनसुलझे संघर्ष जारी हैं. ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका द्वारा आर्थिक या सैन्य दबाव की नई कार्रवाई इस क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ा सकता है.

भारत के लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई. भारत एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, दूसरी तरफ वो अपनी पारंपरिक साझेदारियों और क्षेत्रीय स्वायत्तता को भी बनाए रखना चाहता है. चाबहार से भारत की वापसी से पैदा होने वाले रिक्त स्थान को भरने के लिए चीन तुरंत आगे आएगा.
जैसे-जैसे ट्रंप ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे बाहरी घटक भारत के फैसलों को और अधिक प्रभावित करेंगे. ऐसे में भारत को नाजुक संतुलन बनाकर चलना होगा. अमेरिका के साथ बातचीत के सकारात्मक परिणाम भी हासिल करने हैं और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखनी है.


ये लेख मूल रूप में इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है.

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Authors

Harsh V. Pant

Harsh V. Pant

Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...

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Vivek Mishra

Vivek Mishra

Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...

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