बदलते दौर में भारत ने अपनी रणनीति बदली है. अब समुद्र की गहराइयों में छिपी परमाणु पनडुब्बियां दुश्मनों के लिए अदृश्य खतरा बन रही हैं. आखिर युद्ध के इस दौर में ज़मीन, हवा और समंदर... हर मोर्चे पर ताक़त बढ़ाना देश के लिए क्यों ज़रूरी है, आसान भाषा में समझें.
3 अप्रैल को, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के सोशल मीडिया (X) पोस्ट पर ‘अरिदमन’ शब्द का ज़िक्र आया, तो अटकलें तेज़ हो गईं. माना गया कि यह SSBN (परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी) कार्यक्रम की तीसरी पनडुब्बी ‘आईएनएस अरिदमन’ को चुपचाप (बिना किसी आयोजन के) भारतीय नौसेना में शामिल करने, यानी कमीशन का संकेत है. साल 2009 में इस परियोजना की शुरुआत हुई है और वर्ष 2016 में नौसेना ने अपनी पहली SSBN आईएनएस अरिहंत को कमीशन किया था. इसके बाद दूसरी पनडुब्बी आईएनएस अरिघात 2024 में भारतीय नौसेना का हिस्सा बनी. इस श्रृंखला की अगली पनडुब्बी, जो अरिहंत श्रेणी की है, अगले साल समुद्र में उतारी जा सकती है.
इस पनडुब्बी के कमीशन से समुद्री क्षेत्र में भारत की प्रतिरोध क्षमता और बढ़ गई है. यह क्षमता काफ़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का एक मज़बूत सैन्य ताक़त बनना इसी से जुड़ा है. निश्चय ही, भारत परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन हिंद महासागर का सामरिक माहौल लगातार बिगड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति है.
आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात की तुलना में आईएनएस अरिदमन की मारक क्षमता कहीं अधिक है, जो बताता है कि SSBN श्रृंखला के सबमरीन लगातार बेहतर हो रहे हैं. यह 7,000 टन की बड़ी पनडुब्बी है और माना जाता है कि 24 के-15 सागरिका मिसाइल और आठ परमाणु युक्त के-4 या के-5 मिसाइलों को ले जाने में यह सक्षम है. जबकि, इसी श्रृंखला की पिछली पनडुब्बियों में 12 के-15 सागरिका मिसाइल और चार के-4 मिसाइल ले जाने की क्षमता है.
आईएनएस अरिदमन के नौसेना में शामिल होने के बाद भारत ने परमाणु त्रिपक्षीय सैन्य सुरक्षा को और मज़बूत बना लिया है. परमाणु त्रिपक्षीय का मतलब है, भूमि, समुद्र और वायु, तीनों से परमाणु मिसाइल दागने की क्षमता विकसित करना. भारत के अलावा, पी-5 देशों (अमेरिका, रूस, चीन, फ़्रांस और ब्रिटेन) के पास ही यह ताक़त है. इसके अलावा, इस पनडुब्बी के कमीशन से समुद्री क्षेत्र में भारत की प्रतिरोध क्षमता और बढ़ गई है. यह क्षमता काफ़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का एक मज़बूत सैन्य ताक़त बनना इसी से जुड़ा है. निश्चय ही, भारत परमाणु हथियारों का पहले इस्तेमाल न करने को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन हिंद महासागर का सामरिक माहौल लगातार बिगड़ रहा है, जिसका मुख्य कारण इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती उपस्थिति है. बीजिंग के पास अनुसंधान और सर्वेक्षण करने वाले जहाज़ हैं, जिनका दोतरफ़ा उपयोग किया जा सकता है. चूंकि इनसे खुफ़िया जानकारियां भी जुटाई जा सकती हैं, इसलिए इनकी तैनाती से महासागर में ख़तरा बढ़ गया है. चीन और पाकिस्तान यहां शत्रुतापूर्ण युद्धाभ्यास भी करते रहते हैं, जिनको रोकने के लिए समुद्र में प्रतिरोध क्षमता विकसित करना हमारे लिए अहमियत रखता है.
उल्लेखनीय है कि हिंद महासागर लंबे समय से इसलिए शांत रहा है, क्योंकि यहां समुद्री सुरक्षा को लेकर कोई बड़ा संघर्ष नहीं हुआ है. हालांकि, आज के समय में युद्ध की प्रकृति बदल चुकी है और एक क्षेत्र से दूसरे में यह तेज़ी से फैलने लगा है, इसलिए भूमि, वायु और समुद्र, तीनों में प्रतिरोध क्षमता बढ़ाना ज़रूरी हो गया है. पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष इसका ताज़ा उदाहरण है. ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका और इज़रायल के मिसाइल हमलों से इस जंग की शुरुआत हुई थी, जो तेज़ी से समुद्र तक फैल गई और होर्मुज़ जलमार्ग इस युद्ध के भविष्य को तय करने वाला केंद्र बन गया. इतना ही नहीं, पिछले साल पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत की सुनियोजित आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भी समुद्री सीमा पर तनाव फैलने की आशंका खूब थी. आधुनिक युद्ध की यही जटिलता बताती है कि परमाणु त्रिपक्षीय सैन्य क्षमताओं का मज़बूत होना भारत की सुरक्षा के लिए कितना महत्वपूर्ण है, ख़ास तौर से अपनी प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने के लिहाज़ से.
यह संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है, ख़ास तौर से तब, जब भारतीय नौसेना की ताक़त की तुलना चीन से की जा रही हो. वास्तव में, नई दिल्ली के लिए बीजिंग के साथ कदमताल मिलाना अब ज़रूरी हो गया है.
SSBN परियोजना ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों के प्रयासों को भी गति दी है. विभिन्न युद्धों और संघर्षों के कारण वैश्विक रक्षा-आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ते तनाव को देखते हुए इसकी ज़रूरत है भी. जैसे- लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को देखते हुए हमने रक्षा-उत्पादन क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की योजना तेज़ कर दी है, क्योंकि मॉस्को हमारा एक महत्वपूर्ण पारंपरिक रक्षा साझेदार रहा है.
इन सबके अलावा, अरिहंत श्रेणी के चौथे पोत को ज़ल्द नौसेना में शामिल करने की योजना से भारत के SSBN कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में मदद मिलने की संभावना है. उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली साल 2036 तक भारत की पहली पूर्णतः स्वदेशी परमाणु हमलावर पनडुब्बी (SSN) नौसेना में शामिल करना चाहती है. इस परियोजना की दूसरी पनडुब्बी को साल 2038 में समुद्र में उतारने की योजना है. अपने परमाणु संचालित पनडुब्बी कार्यक्रम को तेज़ी से आगे बढ़ाने की भारतीय नौसेना की कोशिश यही बताती है कि अब पनडुब्बी में प्रभुत्व हासिल करना समुद्र में मज़बूत प्रतिरोध क्षमता बनाने की नई दिल्ली की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है.
यह राह बहुत आसान नहीं है. हालांकि, मुश्किलें इस बात पर निर्भर करेंगी कि नई दिल्ली अपने पनडुब्बी कार्यक्रम पर कितना ख़र्च करती है और इन पोतों के डिजाइन व उत्पादन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) या स्वचालित तकनीकों का कितनी कुशलता से इस्तेमाल होता है. यह संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है, ख़ास तौर से तब, जब भारतीय नौसेना की ताक़त की तुलना चीन से की जा रही हो. वास्तव में, नई दिल्ली के लिए बीजिंग के साथ कदमताल मिलाना अब ज़रूरी हो गया है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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Sayantan Haldar is an Associate Fellow with ORF’s Strategic Studies Programme. At ORF, Sayantan’s work is focused on Maritime Studies. He is interested in questions on ...
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