दुनिया में परमाणु हथियार कम होने के बजाय और आधुनिक व खतरनाक बनते जा रहे हैं. बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कमजोर होते नियमों के बीच खतरा है कि दुनिया फिर अस्थिर परमाणु दौर में जा सकती है. पढ़ें पूरा विश्लेषण.
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न्यूयॉर्क में हाल ही में शुरू हुए 2026 के NPT रिव्यू कॉन्फ्रेंस की पृष्ठभूमि में, वैश्विक परमाणु व्यवस्था एक ऐसे मोड़ (इन्फ्लेक्शन पॉइंट) पर दिखाई देती है, जहाँ शीत युद्ध के बाद के संयम की निश्चितताएँ धीरे-धीरे एक अधिक प्रतिस्पर्धी और खंडित परिदृश्य को जगह दे रही हैं. जो व्यवस्था कभी क्रमिक कटौतियाँ, मानक प्रतिबद्धताओं और द्विपक्षीय हथियार नियंत्रण पर आधारित थी, वह अब नए सिरे से प्रतिस्पर्धा, तकनीकी व्यवधान और सुरक्षा-नियमों (गार्डरेल्स) के स्पष्ट क्षरण से चिह्नित हो रही है.
उभरती तकनीकों का परमाणु रणनीति में समावेश स्थिति को और जटिल बना रहा है. हाइपरसोनिक डिलीवरी सिस्टम, परमाणु कमांड और नियंत्रण में साइबर कमजोरियाँ, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका निर्णय लेने के समय को कम कर रही हैं, जिससे पारंपरिक प्रतिरोधक स्थिरता कमजोर पड़ रही है.
आज दुनिया में लगभग 12,000 परमाणु वारहेड्स मौजूद हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा सक्रिय है और चिंताजनक संख्या उच्च सतर्कता स्तर पर रखी गई है. संख्यात्मक रूप से धीरे-धीरे कमी दिखने के बावजूद, इसके पीछे एक गहरा संरचनात्मक बदलाव छिपा है-परमाणु हथियारों का गुणात्मक महत्व फिर से बढ़ रहा है.
इस बदलाव की खास बात वैश्विक आधुनिकीकरण है. सभी नौ परमाणु देश शस्त्रागार उन्नत कर रहे हैं, जबकि अमेरिका-रूस डिलीवरी सिस्टम, वारहेड और कमांड-एंड-कंट्रोल में बड़े सुधार कर रहे हैं. चीन का तेजी से विस्तार विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, जो उसकी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और पारंपरिक न्यूनतम दृष्टिकोण से बढ़ती असहजता को दर्शाता है. वहीं अन्य परमाणु शक्तियां भी धीरे-धीरे अपनी क्षमता और सामर्थ्य दोनों बढ़ा रही हैं, जिससे परमाणु प्रतिस्पर्धा अब केवल महाशक्तियों तक सीमित नहीं रह गई है.
इसके साथ ही उभरती तकनीकों का परमाणु रणनीति में समावेश स्थिति को और जटिल बना रहा है. हाइपरसोनिक डिलीवरी सिस्टम, परमाणु कमांड और नियंत्रण में साइबर कमजोरियाँ, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका निर्णय लेने के समय को कम कर रही हैं, जिससे पारंपरिक प्रतिरोधक स्थिरता कमजोर पड़ रही है. अब परमाणु क्षेत्र अलग-थलग नहीं रहा; यह पारंपरिक, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं के साथ गहराई से जुड़ गया है, जिससे अनजाने में संघर्ष बढ़ने का जोखिम बढ़ रहा है.
व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि और व्यापक परमाणु अप्रसार संधि ढांचे पर बढ़ते दबाव मौजूदा व्यवस्था की नाजुकता को और उजागर करते हैं. क्षेत्रीय स्तर पर, उत्तर कोरिया बिना किसी खास रोक-टोक के अपनी क्षमताओं को आगे बढ़ा रहा है, जबकि पश्चिम एशिया में ईरान एक महत्वपूर्ण अनिश्चितता बना हुआ है.
आधुनिकीकरण निरंतरता दिखाता है, पर हथियार नियंत्रण का पतन गहरा संकट है; 2026 में न्यू START समाप्ति से अमेरिका-रूस के बीच कानूनी सीमाएं खत्म, जो राजनीतिक टूटाव दर्शाता है. साथ ही, व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) और व्यापक परमाणु अप्रसार संधि (NPT) ढांचे पर बढ़ते दबाव मौजूदा व्यवस्था की नाजुकता को और उजागर करते हैं. क्षेत्रीय स्तर पर, उत्तर कोरिया बिना किसी खास रोक-टोक के अपनी क्षमताओं को आगे बढ़ा रहा है, जबकि पश्चिम एशिया में ईरान एक महत्वपूर्ण अनिश्चितता बना हुआ है. मध्य पूर्व और पूर्वी एशिया में परमाणु प्रसार की श्रृंखला (प्रोलिफरेशन कैस्केड) की संभावना अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है. इसके अलावा, उभरते भू-राजनीतिक गठबंधनों ने संवेदनशील तकनीकों के प्रसार को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं, जिससे ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज दोनों प्रकार के प्रसार की गति तेज हो सकती है.
प्रमुख और क्षेत्रीय शक्तियों की परमाणु नीतियों में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव भी उतना ही अहम है. अब परमाणु हथियारों को केवल अंतिम विकल्प के रूप में अलग-थलग नहीं देखा जा रहा, बल्कि इन्हें जबरदस्ती की व्यापक कूटनीति के हिस्से के रूप में शामिल किया जा रहा है, जिसमें पारंपरिक सटीक हमले, साइबर ऑपरेशन और अंतरिक्ष-आधारित क्षमताएँ भी शामिल हैं. यह एक बढ़ते विश्वास को दर्शाता है कि परमाणु संकेत (न्यूक्लियर सिग्नलिंग) को संतुलित तरीके से अन्य साधनों के साथ मिलाकर प्रतिद्वंद्वी के व्यवहार को प्रभावित किया जा सकता है, बिना पूर्ण परमाणु युद्ध की सीमा को पार किए. ऐसे माहौल में, प्रतिरोधक क्षमता (डिटरेंस) स्थिर संतुलन से कम और गतिशील संकेतों पर अधिक निर्भर हो जाती है, जिससे यह सवाल उठता है कि सीमाएँ (थ्रेशोल्ड) कैसे समझी जाती हैं-और उससे भी महत्वपूर्ण, कैसे गलत समझी जा सकती हैं.
यह सैद्धांतिक बदलाव खासकर तथाकथित ‘टैक्टिकल’ या कम-शक्ति (लो-यील्ड) वाले परमाणु हथियारों पर नए सिरे से जोर में दिखाई देता है. रूस जैसे देश गैर-रणनीतिक परमाणु प्रणालियों पर अपनी निर्भरता बढ़ा रहे हैं, जिसे अक्सर पारंपरिक सैन्य असमानताओं को संतुलित करने के साधन के रूप में देखा जाता है. वहीं अमेरिका अपने प्रतिरोधक ढांचे में लचीले प्रतिक्रिया विकल्पों की खोज कर रहा है. इसी तरह, अन्य परमाणु-सशस्त्र देश भी विभिन्न स्तरों पर ऐसे विश्वसनीय ‘एस्केलेशन लैडर’ विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जो पूर्ण परमाणु युद्ध से पहले ही रुक सकें.
चुनौती केवल पुराने ढांचों को पुनर्जीवित करने की नहीं, बल्कि एक अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी युग के अनुरूप नए वैश्विक शासन तंत्र की कल्पना करने की है. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर सकती है जहाँ परमाणु हथियार पृष्ठभूमि में जाने के बजाय फिर से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ जाएंगे, और इसके साथ जुड़े सभी खतरे भी बढ़ जाएंगे.
पाकिस्तान द्वारा कम दूरी और कम-शक्ति वाले परमाणु हथियारों का विकास यह संकेत देता है कि वह केवल रणनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सीमित पारंपरिक संघर्षों में भी प्रतिरोधक क्षमता स्थापित करना चाहता है. लेकिन यह धारणा कि परमाणु उपयोग सीमित, नियंत्रित या ‘प्रबंधनीय’ हो सकता है, खतरनाक अस्पष्टताओं को जन्म देती है-खासकर संकट की तीव्र स्थितियों में, जहाँ संकेतों को आसानी से गलत समझा जा सकता है.
इन जोखिमों को और बढ़ाता है समकालीन संघर्षों में परमाणु बयानबाजी का सामान्य होना. खुली धमकियों से लेकर सूक्ष्म संकेतों तक, परमाणु हथियारों का उल्लेख अब पहले की तुलना में कहीं अधिक बार किया जा रहा है. यह प्रवृत्ति ‘न्यूक्लियर टैबू’ की मानक शक्ति पर दबाव डालती है-वह लंबे समय से चला आ रहा निषेध, जिसने 1945 के बाद से परमाणु हथियारों के उपयोग को रोके रखा है. हालांकि यह निषेध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन राज्यों द्वारा खुले तौर पर परमाणु क्षमताओं का उपयोग दबाव बनाने के साधन के रूप में करना इसके क्षरण को दर्शाता है. एक बहुध्रुवीय और अस्थिर रणनीतिक परिदृश्य में, यह बदलाव उपयोग की मानसिक बाधाओं को कम कर सकता है, जिससे जानबूझकर या अनजाने में संघर्ष बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.
इन रुझानों से स्पष्ट है कि शीत युद्ध बाद की परमाणु व्यवस्था कमजोर हो रही है और दुनिया बहुध्रुवीय, प्रतिस्पर्धी व अविश्वासपूर्ण दौर में प्रवेश कर रही है, जहाँ स्थिरता कठिन है; ऐसे में 2026 समीक्षा सम्मेलन यह परखेगा कि क्या वैश्विक समुदाय परमाणु अव्यवस्था को रोक या नियंत्रित कर सकता है. चुनौती केवल पुराने ढांचों को पुनर्जीवित करने की नहीं, बल्कि एक अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी युग के अनुरूप नए वैश्विक शासन तंत्र की कल्पना करने की है. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर सकती है जहाँ परमाणु हथियार पृष्ठभूमि में जाने के बजाय फिर से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ जाएंगे, और इसके साथ जुड़े सभी खतरे भी बढ़ जाएंगे.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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