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भारत ने ताजिकिस्तान की आयनी एयरबेस छोड़ दिया जिससे उसकी विदेश में एकमात्र सैन्य मौजूदगी खत्म हो गई. यह कदम मध्य एशिया में बदलते भू-राजनीतिक संतुलन और नई रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है.
भारत ने द्विपक्षीय समझौता ख़त्म होने के बाद ताजिकिस्तान में रणनीतिक आयनी एयरबेस को छोड़कर विदेश में अपनी एकमात्र सैन्य मौजूदगी को चुपचाप समाप्त कर दिया. आयनी एयरबेस (जिसे जिस्सार मिलिट्री एयरोड्रोम के रूप में भी जाना जाता है) पूर्व सोवियत संघ का सैन्य केंद्र था जो सोवियत संघ के विघटन के बाद बुरी स्थिति में आ गया. 1991 के बाद रूस ने आर्थिक मुश्किलों का सामना किया और सैनिकों को वेतन देने में भी उसे जूझना पड़ रहा था. इस बीच भारत (जिसे रूस का भरोसेमंद दोस्त समझा जाता है) को आयनी एयरबेस विकसित करने की अनुमति मिल गई.
रूस मध्य एशिया के सुरक्षा ढांचे में भारत की भूमिका का समर्थन करता है, विशेष रूप से ताजिकिस्तान में. इसका कारण अफ़ग़ानिस्तान और चीन के साथ ताजिकिस्तान की संवेदनशील सीमा के साथ-साथ मादक पदार्थों और चरमपंथियों का इस क्षेत्र में प्रवेश भी है. इसके अलावा, 1999 के कारगिल युद्ध ने भारत के रणनीतिक और सुरक्षा हितों को बढ़ा दिया. इस तरह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत की रोकथाम और रणनीतिक क्षमता को बढ़ाने में आयनी एयरबेस महत्वपूर्ण बन गया.
वाखान कॉरिडोर के पास स्थित आयनी एयरबेस को भारत ने 90 के दशक में विकसित किया।
अफ़ग़ानिस्तान के वाखान कॉरिडोर से 20 किमी दूर और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर एवं चीन के शिनजियांग प्रांत की सीमा पर स्थित आयनी एयरबेस को भारत ने 90 के दशक के अंत में विकसित करना शुरू किया. 70 मिलियन डॉलर के निवेश से भारतीय वायु सेना और सीमा सड़क संगठन ने यहां 3,200 मीटर रनवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम और ईंधन डिपो को अपग्रेड किया. एक समय भारत ने सामरिक प्रतिरोध के लिए सुखोई-30MKI लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर भी यहां तैनात किए.
भारत ने ताजिकिस्तान के फरखोर में एक सैन्य अस्पताल भी बनाया. इसका उद्देश्य न केवल तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नॉर्दर्न अलायंस (कई समूहों का गठबंधन) के सदस्यों का इलाज करना था बल्कि मध्य एशिया के सबसे ग़रीब क्षेत्र में अपनी सॉफ्ट पावर का प्रदर्शन करना भी था. भारत ने इस एयरबेस का इस्तेमाल 2021 में काबुल पर तालिबान के फिर से कब्ज़े के बाद अफ़ग़ानिस्तान से भारतीय नागरिकों और अधिकारियों को निकालने में भी किया.
भारत के द्वारा इस रणनीतिक एयरबेस को छोड़ने का फैसला ताजिकिस्तान पर रूस और चीन के बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव से प्रभावित लगता है. इसके अलावा तालिबान के ख़िलाफ़ आयनी एयरबेस का सैन्य और खुफिया समर्थन (जिसका मुख्य कारण नॉर्दर्न अलायंस के साथ भारत का संबंध है) तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद भारत के लिए कम हो गया है. साथ ही एयरबेस को छोड़ना तालिबान के साथ भारत के बढ़ते संबंध के लिए भी मददगार है.
भारत ने 70 मिलियन डॉलर लगाकर रनवे, ATC और फ्यूल डिपो अपग्रेड किए।
लेकिन रूस मध्य एशिया में भारत की बढ़ती मौजूदगी के ख़िलाफ़ नहीं है. उसने चीन का मुकाबला करने में भारत की महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भूमिका का लगातार समर्थन किया है और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत की सदस्यता की पुष्टि की है. रूस ने सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (जिसका उद्देश्य मध्य एशिया के साथ सुरक्षा और सैन्य सहयोग बढ़ाना है) के तहत आतंकवाद और नशीले पदार्थों की तस्करी का मुकाबला करने के लिए अफ़ग़ान सीमा के पास ताजिकिस्तान में रूसी ज़मीन बलों का सैन्य अड्डा भी बनाए रखा है.
दूसरी तरफ चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से बुनियादी ढांचे और ऊर्जा के क्षेत्रों में भारी निवेश से मध्य एशिया के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मज़बूत किया है. चीन ने SCO का इस्तेमाल ताजिकिस्तान के मुरगोब ज़िले में सैन्य अड्डा बनाने और मध्य एशियाई देशों के साथ द्विपक्षीय एवं त्रिपक्षीय स्तर पर नियमित सैन्य अभ्यास करने में किया है. इस तरह चीन ने अपनी सुरक्षा का दायरा बढ़ाया है और पूरे यूरेशिया में “पैक्स सिनिका” (चीन के नेतृत्व में पूर्व एशिया में शांति और स्थिरता का दौर) के लिए एक ठोस आधार बनाया है. चीन इन देशों की सेना को ट्रेनिंग और सैन्य तकनीक के मामले में सहायता भी देता है.
भारत के द्वारा इस रणनीतिक एयरबेस को छोड़ने का फैसला ताजिकिस्तान पर रूस और चीन के बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव से प्रभावित लगता है.”
हाल के वर्षों में मध्य एशिया तेज़ी से उन वैश्विक किरदारों को आकर्षित कर रहा है जो महत्वपूर्ण खनिज और ऊर्जा के विश्वसनीय स्रोत चाहते हैं और जिसका मक़सद मुख्य रूप से चीन पर अपनी निर्भरता कम करना है. 2022 से यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों पर रूस के ध्यान ने मध्य एशियाई देशों को क्षेत्रीय स्थिरता, प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता के उद्देश्य से अलग-अलग देशों के साथ कूटनीतिक संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया. इस तरह उन्होंने कनेक्टिविटी के नए रास्ते (जैसे कि मिडिल कॉरिडोर और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का पूर्वी रूट) विकसित करने के लिए यूरोपियन यूनियन (EU), अमेरिका, तुर्किए, चीन और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को मज़बूत किया. यहां तक कि EU ने भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में संसाधनों से समृद्ध पांच मध्य एशियाई देशों के साथ अपना जुड़ाव बढ़ाया है. 2024 में EU ने मिडिल कॉरिडोर में लगभग 10.6 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की घोषणा की. इसके बाद 2025 में महत्वपूर्ण खनिजों और ऊर्जा के क्षेत्र में 13.2 अरब अमेरिकी डॉलर के एक और निवेश का एलान किया. तुर्किए, ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ टर्किक स्टेट (तुर्क देशों का संगठन) और तुर्क भाषा बोलने वाले देशों का इस्तेमाल रणनीतिक साझेदारी करने और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर हस्ताक्षर करने में कर रहा है ताकि कॉकेशस और मध्य एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार किया जा सके.
पिछले दिनों C5+1 पहल की 10वीं सालगिरह के अवसर पर आयोजित व्हाइट हाउस शिखर सम्मेलन में तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान के नेता एक साथ जुटे. ये सम्मेलन महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकों पर चीन की निर्यात पाबंदी के बीच हुआ. वैसे तो मध्य एशिया को लेकर अमेरिका की नीति दखल नहीं देने की जगह व्यावहारिक भागीदारी की हो गई है लेकिन इसमें रणनीतिक स्पष्टता का अभाव है जिसकी वजह से अक्सर भारत समेत दूसरे समान विचार वाले देशों के द्वारा क्षेत्रीय पहल सीमित हो जाती है. उदाहरण के लिए, अमेरिका ने भारत के द्वारा ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास पर प्रतिबंध नहीं लगा रखा था लेकिन ये छूट रद्द करने से मध्य एशिया के साथ भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाओं में रुकावट आई. वैसे अमेरिका ने बाद में छह महीने के लिए छूट बहाल कर दी लेकिन इससे निवेशकों का भरोसा कमज़ोर हुआ है.
आयनी से वापसी क्षेत्रीय पहुंच सीमित कर सकती है, पर सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत बनाती है।
पिछले तीन दशकों के दौरान भारत ने पुराने सांस्कृतिक संबंधों का सहारा लेते हुए सैन्य तकनीक, रक्षा, आतंकवाद-निरोध और आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों में मध्य एशिया के साथ अपने संबंधों को मज़बूत किया है. 2010 से मध्य एशिया के देशों ने भी अपने सामरिक गठबंधनों में विविधता लाने के लिए भारत के साथ मज़बूत संबंध बनाने की कोशिश की है. भारत को अश्गाबात समझौते तक पहुंच प्रदान करने से उसे यूरेशियन कनेक्टिविटी बढ़ाने और संसाधनों तक पहुंच बनाने में सहायता मिली. मध्य एशियाई देश चाबहार बंदरगाह को निर्यात का बाज़ार बढ़ाने और चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए एक अवसर के रूप में भी देखते हैं.
वैसे तो आयनी एयरबेस से भारत की वापसी उसकी क्षेत्रीय पहुंच को सीमित कर सकती है लेकिन ये सांस्कृतिक और सभ्यतागत कूटनीति पर उसकी पारंपरिक निर्भरता को मज़बूत करती है. चूंकि मध्य एशिया में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है, ऐसे में भारत को पारदर्शी एवं भरोसेमंद कनेक्टिविटी की रणनीतियों को प्राथमिकता देनी होगी और एक विश्वसनीय क्षेत्रीय साझेदार के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करने के लिए अपनी कूटनीतिक और बौद्धिक पूंजी का लाभ उठाना होगा.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President - ORF and Studies at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with ...
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Ayjaz Wani (Phd) is a Fellow in the Strategic Studies Programme at ORF. Based out of Mumbai, he tracks China’s relations with Central Asia, Pakistan and ...
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