रक्षा सौदों से आगे बढ़कर अब भारत-फ्रांस की बात को-प्रॉडक्शन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और डिजिटल साझेदारी तक पहुंच गई है. शीत युद्ध के दौर से बना भरोसा आज फिर काम आ रहा है. क्या भारत-फ्रांस मॉडल बदलती दुनिया में मझोली ताकतों के लिए नया रास्ता दिखा सकता है?
पिछले हफ्ते फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आए. उनका दौरा मुंबई में हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इम्पैक्ट समिट के इर्द-गिर्द रहा, जिसकी मेजबानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की. यह दौरा सिर्फ औपचारिक गर्मजोशी दिखाने तक सीमित नहीं था. दोनों देशों ने रिश्तों को ‘स्पेशल ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के दर्जे पर ले जाने का फैसला किया. साफ है कि बदलती और बंटी हुई दुनिया में दोनों देश अपना रोल मजबूत करना चाहते हैं. कई मायनों में यह दौरा दिखाता है कि भारत और फ्रांस बड़ी ताकतों की तेज होती खींचतान और अस्थिर माहौल के बीच अपने रिश्ते को लंबे समय तक टिकाऊ बनाना चाहते हैं.
भारत रूस और अमेरिका के अलावा भी अपने विकल्प बढ़ाता है. फ्रांस को भी ग्लोबल साउथ में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिलता है. भारत और फ्रांस खुद को एक ऐसे दौर में संतुलन देने वाली ताकत के तौर पर पेश कर रहे हैं, जहां हिंद-प्रशांत, यूक्रेन और पश्चिम एशिया में टकराव जारी है.
‘होराइजन 2047’ रोडमैप पर नजर रखने के लिए हर साल विदेश मंत्रियों की बातचीत तय करना एक अहम कदम है. इससे रिश्ते में सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि अमल और लगातार निगरानी भी जुड़ती है. आज की बहुध्रुवीय दुनिया में अक्सर हालात तय नहीं रहते. ऐसे में यह तय करना कि दोनों मुल्क मिलकर तय ढंग से काम करेंगे, बताता है कि वे समझते हैं कि इरादा ही काफी नहीं, उसे लागू करना भी जरूरी है. इससे यह भी साफ होता है कि दोनों देश बदलती हुई दुनिया को सिर्फ देखते नहीं रहना चाहते, बल्कि उसे आकार देना चाहते हैं.
जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से भी दोनों का करीब आना समझ में आता है. फ्रांस इकलौता बड़ा यूरोपीय मुल्क है जिसके इंडो-पैसिफिक इलाके में अपने क्षेत्र और फौजी मौजूदगी है. दूसरी तरफ भारत की सुरक्षा चिंताएं अब ज्यादा समुद्री इलाकों पर टिकी हैं. इसलिए दोनों का साथ आना सिर्फ बयान नहीं, बल्कि हकीकत की जरूरत है. दोनों ही किसी एक देश के दबदबे से सावधान हैं. खासकर चीन से, और ऐसे अमेरिका से जो अब ज्यादा लेन-देन वाली नीति अपनाता दिखता है. दोनों अपनी रणनीतिक आजादी बचाए रखना चाहते हैं.
यह करीब आना दोनों की अपनी मुश्किलों से भी जुड़ा है. भारत का चीन के साथ सीमा विवाद है. फ्रांस को हिंद महासागर में सप्लाई चेन रुकने की फिक्र रहती है. जब दोनों नेता अपने रिश्ते को ‘ग्लोबल स्टेबिलिटी की ताकत’ कहते हैं, तो कहीं न कहीं वे एकध्रुवीय दबदबे को चुनौती देते हैं. वे नियम से चलने वाली व्यवस्था और बराबरी की बात करते हैं. इस तरह भारत रूस और अमेरिका के अलावा भी अपने विकल्प बढ़ाता है. फ्रांस को भी ग्लोबल साउथ में अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिलता है. भारत और फ्रांस खुद को एक ऐसे दौर में संतुलन देने वाली ताकत के तौर पर पेश कर रहे हैं, जहां हिंद-प्रशांत, यूक्रेन और पश्चिम एशिया में टकराव जारी है.
एम्स में इंडो-फ्रेंच सेंटर फॉर एआई और जॉइंट एडवांस्ड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ग्रुप जैसे प्लेटफॉर्म दिखाते हैं कि दोनों एथिकल एआई के नियम तय करने में भी साथ काम करना चाहते हैं. अमेरिका-चीन टेक राइवलरी के दौर में यह सहयोग दोनों को संतुलन बनाने और अपनी राय कायम रखने का मौका देता है.
रक्षा सहयोग अब भी इस रिश्ते की रीढ़ है. डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट रेन्यू हुआ. कर्नाटक में H125 हेलिकॉप्टर की असेंबली लाइन शुरू हुई. भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और सफरान के बीच हैमर मिसाइल बनाने का जॉइंट वेंचर बना. साफ है कि रिश्ता अब सिर्फ खरीद-बिक्री तक ही नहीं, बल्कि साथ मिलकर बनाने और तैयार करने तक पहुंच गया है. यह देश के आत्मनिर्भर भारत एजेंडा से मेल खाता है, और फ्रांस को इंडो-पैसिफिक में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में मदद करता है. दोनों देशों के अफसरों की आपसी तैनाती से फौजी तालमेल बढ़ता है, भरोसा भी गहरा होता है. लेकिन हर रक्षा साझेदारी की तरह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और एक्सपोर्ट कंट्रोल को सावधानी से संभालना होगा.
टेक्नोलॉजी और इनोवेशन अब नए मोर्चे बन रहे हैं. इंडिया-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन की शुरुआत हुई. AI, क्रिटिकल मिनरल्स और एडवांस मटेरियल जैसे क्षेत्रों में कदम बढ़ाए गए. यानी, आज टक्कर जमीन के साथ-साथ टेक्नोलॉजी में भी है. राष्ट्रपति मैक्रों ने भारत के आधार, यूपीआई और डिजिटल हेल्थ आईडी की तारीफ की. मतलब, फ्रांस भारत के ऐसे मॉडल की कदर करता है जो इनोवेशन और नियम-कायदे को साथ लेकर चलता है. एम्स में इंडो-फ्रेंच सेंटर फॉर एआई और जॉइंट एडवांस्ड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट ग्रुप जैसे प्लेटफॉर्म दिखाते हैं कि दोनों एथिकल एआई के नियम तय करने में भी साथ काम करना चाहते हैं. अमेरिका-चीन टेक राइवलरी के दौर में यह सहयोग दोनों को संतुलन बनाने और अपनी राय कायम रखने का मौका देता है.
आर्थिक रिश्ते भी अब सिर्फ रक्षा सौदों तक सीमित नहीं रहे. स्टार्टअप, क्लीन एनर्जी और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्र बढ़ रहे हैं. भारत के लिए न्यूक्लियर एनर्जी और टेक्नोलॉजी में फ्रांस का अनुभव काम का है. फ्रांस के लिए भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था यूरोप की आर्थिक सुस्ती के बीच एक मौका है. यह रिश्ता आपसी फायदे पर टिका है. लेकिन आगे बढ़ने के लिए नियमों से जुड़ी अड़चनें और यूरोपीय यूनियन-भारत ट्रेड बातचीत को आगे बढ़ाना जरूरी होगा.
एक अहम पहलू साझा मूल्यों का भी है. लोकतंत्र, बहुपक्षीय सिस्टम और अंतरराष्ट्रीय कानून पर साझा भरोसा भी इस रिश्ते की बुनियाद है. इससे यूक्रेन जैसे मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद रिश्ता पटरी से नहीं उतरता. इससे खुलकर बात करने की जगह भी बनती है. शीत युद्ध के दौर से ही भारत-फ्रांस रिश्ते रणनीतिक आजादी पर टिके रहे हैं. भारत सोवियत संघ के करीब था और फ्रांस पश्चिमी गुट में था. फिर भी दोनों सख्त दोध्रुवीय सोच से बचे रहे. भारत के लिए गुटनिरपेक्ष रहना अपनी आजादी बचाने का तरीका था. फ्रांस, खासकर चार्ल्स द गॉल के दौर में, अमेरिकी दबदबे से अलग अपनी पहचान चाहता था. इसी वजह से दोनों अलग सोच के बावजूद साथ काम कर सके.
फ्रांस पहले देशों में था, जिसने 1965 में भारत-पाकिस्तान पर लगे हथियार प्रतिबंध को हटाया . 1971 के युद्ध में जब अमेरिका और चीन पाकिस्तान की तरफ झुके, फ्रांस ने संतुलित रुख अपनाया और कुछ संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों पर मतदान से दूर रहा.
परमाणु सहयोग इसका उदाहरण है. 1951 का द्विपक्षीय परमाणु समझौता शुरुआती भरोसे का संकेत था. 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ा. फिर भी 1980 के दशक में फ्रांस ने तारापुर रिएक्टरों के लिए यूरेनियम दिया. इससे साफ हुआ कि फ्रांस अमेरिका से अलग सोच सकता है. फ्रांस ने भारत की परमाणु नीति को नैतिक चश्मे से नहीं, बल्कि रणनीतिक नजर से देखा. क्षेत्रीय संकटों में भी फ्रांस का रवैया भारत के लिए मददगार रहा. फ्रांस पहले देशों में था, जिसने 1965 में भारत-पाकिस्तान पर लगे हथियार प्रतिबंध को हटाया . 1971 के युद्ध में जब अमेरिका और चीन पाकिस्तान की तरफ झुके, फ्रांस ने संतुलित रुख अपनाया और कुछ संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों पर मतदान से दूर रहा.
भारत के लिए फ्रांस ने बिना वैचारिक शर्तों के उन्नत पश्चिमी टेक्नोलॉजी का रास्ता खोला. इससे भारत की सोवियत निर्भरता कम हुई. फ्रांस को भी भारत के साथ जुड़कर अपनी रणनीतिक आजादी मजबूत करने में मदद मिली. 1998 में पोखरण-II के बाद जब कई देशों ने कड़े प्रतिबंध लगाए, तब फ्रांस ने व्यापक प्रतिबंधों का विरोध किया. शीत युद्ध के दौर में ही आज की मजबूत साझेदारी की नींव रखी गई थी.
आज भारत-फ्रांस रिश्तों के मुख्य आधार हैं- जियोपॉलिटिकल तालमेल, रक्षा सहयोग, टेक्नोलॉजी साझेदारी, आर्थिक विविधता और साझा मूल्य. यह रिश्ता अब सिर्फ लेन-देन से आगे निकल चुका है. असली चुनौती अब लगातार काम करके दिखाने की है. अगर ‘होराइजन 2047’ को लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति और मजबूत सिस्टम का सहारा मिला, तो यह रिश्ता दिखा सकता है कि बदलती दुनिया में मझोली ताकतें कैसे अपनी आजादी बचाते हुए आगे बढ़ सकती हैं. अनिश्चितता के इस दौर में भारत-फ्रांस साझेदारी खुद को अव्यवस्था का तमाशबीन नहीं, बल्कि संतुलन की एक मजबूत कड़ी के तौर पर पेश कर रही है.
यह लेख मूल रूप से फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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