Author : Jaibal Naduvath

Special ReportsPublished on Apr 14, 2025
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American Aid And Regime Change In Bangladesh A Primer

बांग्लादेश में अमेरिकी सहायता के परिप्रेक्ष्य में सत्ता परिवर्तन: एक शुरुआती विश्लेषण

  • Jaibal Naduvath

    इस रिपोर्ट में यूनाइटेड स्टेट्‌स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID), द नेशनल एंडॉवमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) तथा उनके ग्रांटिस्‌ यानी उपयोगकर्ता इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI) और द नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (NDI) की बांग्लादेश के राजनीतिक परिणामों को आकार देने में अदा की गई भूमिका का परीक्षण किया गया है. यह विश्लेषण 2024 में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने की पृष्ठभूमि में किया गया है. इस रिपोर्ट में इन आरोपों को परखा गया है कि क्या कोवर्ट इंफ्लूएंस ऑपरेशंस यानी गोपनीय प्रभाव अभियान, वैचारिक एजेंडा को आगे बढ़ाने और सहायता देने की आड़ में राजनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है. इसमें लोकतंत्र को प्रोत्साहित करने के नाम पर किए जाने वाले विदेशी हस्तक्षेप के आशय की समीक्षा की गई है.

Attribution:

जैबल नदुवथ, बांग्लादेश में अमेरिकी सहायता के परिप्रेक्ष्य में सत्ता परिवर्तन: एक शुरुआती विश्लेषण,” ORF स्पेशल रिपोर्ट नं. 253, मार्च 2025, ऑर्ब्जवर रिसर्च फाउंडेशन.

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प्रस्तावना

26 जनवरी 2025 को यूनाइटेड स्टेट्‌स (US) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते ही US स्टेट डिपार्टमेंट यानी विदेश मंत्रालय तथा यूनाइटेड स्टेट्‌स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) की ओर से उपलब्ध करवाई जाने वाली सारी विदेशी सहायता निलंबित कर दी गई. उनका कहना है कि इस तरह की सहायता US की विदेश नीति के उद्देश्यों से मेल नहीं खाती, बल्कि अनेक मामलों में यह US के हितों को नुकसान पहुंचा रही है. ट्रंप लंबे वक़्त से अपनी छवि को कुछ इस प्रकार से गढ़ रहे है कि वे वॉशिंगटन के कैपिटल हिल में चलने वाली बड़ी साजिशों से दूर रहेंगे और एक रोज़मर्रा के व्यक्ति यानी सामान्यजन की तरह काम करेंगे. ऊपर चर्चा किए गए कार्यकारी आदेश को जारी करने का उनका फ़ैसला इसी छवि को बनाए रखने की कोशिश है. USAID पर लगाई गई व्यापक पाबंदियों के कारण इस संगठन की क्षमता में 94 प्रतिशत-5,000 में से केवल 290- रह जाएगी और इस एजेंसी के माध्यम से चलाए जाने वाले ऑपरेशंस लगभग ठप हो जाएंगे. इस फ़ैसले के साथ ही एजेंसी के एक ऐसे लंबे युग पर पर्दा गिर गया है, जिसमें एजेंसी ने अपने मानवाधिकार संबंधी प्रयासों के अलावा विदेशों में गोपनीय प्रभाव ऑपरेशंस चलाने के बिचौलिए की भी भूमिका अदा करते हुए वामपंथी विचारधारा के एजेंडे को आगे बढ़ाया था.

ट्रंप के उभार और डिपार्टमेंट ऑफ गर्वनमेंट एफिशिएंसी (DOGE) का गठन होने से अब इस बात को लेकर लोगों की रुचि दोबारा जागृत हो गई है कि पूर्व के प्रशासनों में US के करदाताओं का पैसा कैसे ख़र्च किया जाता था. इसी वजह से USAID, द नेशनल एंडॉवमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) तथा उनके ग्रांटिस्‌ यानी उपयोगकर्ता इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट (IRI) और द नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (NDI) जैसे संगठनों की कार्यशैली चर्चा में आते ही इनके ऑपरेशंस में मौजूद विसंगतियां उजागर हो गई है., लंबे समय से ये चिंताएं भी कि ये संगठन सार्वजनिक धन का उपयोग घरेलू और विदेशी स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप करने के लिए करते हैं. अब इन चिंताओं की पुष्टि हो गई है. न्यूनतम पारदर्शिता, जवाबदेही अथवा पर्यवेक्षण के साथ काम करने वाले इन संगठनों पर यह भी आरोप है कि ये लोकतंत्र को प्रोत्साहित करने की आड़ में अपने संकुचित राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं. इस काम को अंजाम देने के लिए ये संगठन सिविल सोसाइटी/सोसायटी ऑर्गनाइेशंस, फाउंडेशंस, चेंबर ऑफ कॉमर्स, अकादमिया, मीडिया, आर्टिस्ट्‌स और मानवाधिकार संगठनों के नेटवर्क को माध्यम बनाते हैं. 

USAID

USAID की स्थापना 1961 के फॉरेन असिस्टेंस एक्ट के तहत की गई. इस एक्ट के तहत US फॉरेन एड प्रोग्राम्स अर्थात अमेरिकी विदेशी सहायता को कारगर बनाना था. शीत युद्ध के दौरान स्थापित इस संगठन का मुख़्य उद्देश्य सोवियत प्रभाव को सीमित करते हुए विदेशों में प्रगतिशील एजेंडा को समर्थन देते हुए वामपंथी के प्रसार को रोकना था. इस संगठन ने पिछले अनेक वर्षों से स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा राहत के क्षेत्र में संकट के दौरान मानवीय सहायता मुहैया करवाते हुए उल्लेखनीय काम किया है. इसके बावजूद इसकी कार्यशैली हमेशा से विवादों में ही रही है. 

ट्रंप लंबे वक़्त से अपनी छवि को कुछ इस प्रकार से गढ़ रहे है कि वे वॉशिंगटन के कैपिटल हिल में चलने वाली बड़ी साजिशों से दूर रहेंगे और एक रोज़मर्रा के व्यक्ति यानी सामान्यजन की तरह काम करेंगे.

हाल ही में हुए ख़ुलासों के कारण USAID को लेकर पहले जो सोचा गया था स्थिति उससे भी ख़राब है. व्हाइट हाऊस की वेबसाइट पर प्रकाशित एक फैक्टशीट में एजेंसी पर अनेक आरोप लगाए गए हैं. इसमें “एक निर्दिष्ट या घोषित आतंकी संगठन से संबंधित नॉन-प्रॉफिट,” को पैसा मुहैया करवाने, “सीरिया में अल-कायदा के लड़ाकों,” को भोजन उपलब्ध करवाने तथा “अफ़गानिस्तान में पॉपी अर्थात अफ़ीम की खेती और हेरोइन उत्पादन” को प्रोत्साहित करना शामिल है. हेरिटेज फाउंडेशन के एक विश्लेषक के अनुसार नए ख़ुलासों से दिखता है कि एजेंसी का उपयोग “वोक” यानी सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागृत कारणों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया. इसके अलावा इस एजेंसी का उपयोग करते हुए बाहरी देशों पर “एलियन वैल्यूज़” अर्थात बाहरी मूल्य लादते हुए “सांस्कृतिक उपनिवेशवाद” को प्रोत्साहित किया गया. इस काम को इस तरीके से किया गया कि ये न केवल स्थानीय परंपराओं, बल्कि US के राष्ट्रीय हितों के भी विपरीत थे. संदिग्ध और प्राधिकृत आउटफिट्‌स अर्थात संगठनों को बगैर पर्याप्त जांच के बिलियंस ऑफ डॉलर्स सौंप दिए गए. यह बात इतनी गंभीर थी कि 23 जनवरी 2025 को एजेंसी के इंटरनल वॉचडॉग अर्थात अंदरुनी निगरानीकर्ता इंस्पेक्टर जनरल पॉल के. मार्टिन ने एजेंसी के कार्यवाहक प्रशासक जेसन ग्रे तथा उनके चीफ ऑफ स्टाफ मैट हॉपसन को एक कड़े शब्दों वाला इंटरनल मेमो अर्थात अंदरुनी पत्र भेजकर इन गंभीर बातों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित किया.

उल्लेखनीय है कि USAID ने न्यूयॉर्क स्थित ईस्ट-वेस्ट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (EWMI) को 15 वर्षों की अवधि के दौरान 270 मिलियन अमेरिकी डॉलर की फंडिंग उपलब्ध करवाई. इसी इंस्टीट्यूट को 90 मिलियन अमेरिकी डॉलर और दिए जाने थे. आरोप है कि इन धनराशि का उपयोग अनेक देशों, जिसमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं, में राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया गया. EWMI’s के सहयोगियों में हंगेरियन मूल के US बिलियनेर जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसायटी फाउंडेशंस (OSF) भी शामिल है. इसी प्रकार USAID, सोरोस की अन्य इकाईयों जैसे एंटी-करप्शन एक्शन सेंटर को धन देने वाली सबसे बड़ी एजेंसी है. सोरोस और उसके पुत्र अलेक्जेंडर का नाम वर्जिनिया स्थित मीडिया वॉचडॉग यानी निगरानी संस्था मीडिया रिसर्च सेंटर की ओर से 2024 में जारी की गई एक रिपोर्ट में भी आया था. यह रिपोर्ट सोरोस समर्थित विभिन्न अधिवक्ताओं के बीच लगभग 8,000 पन्नों के गुप्त संवाद संबंधी दस्तावेज़ों पर आधारित थी. इस रिपोर्ट ने एक विस्तृत योजना का ख़ुलासा करते हुए यह उजागर किया था कि कैसे सोरोस परिवार ने संसाधनों और प्रभाव का उपयोग करते हुए धूर-वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने और US की न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित किया था. इस रिपोर्ट में काफ़ी विस्तार से यह बताया गया था कि कैसे अहम न्यायिक पदों को लक्षित करते हुए उन पर कब्ज़ा करने के लिए समन्वित प्रयास किए गए. इसके अलावा यह भी साफ़ हुआ था कि यह रास्ता अपनाते हुए मुकादमा चलाने की प्राथमिकताओं को लेकर दबाव डालकर सोरोस की राजनीतिक विचारधारा से मेल खाने वाले नीतियों पर अमल किया जाता था.

कुछ आलोचकों का यह भी दावा है कि फरवरी 2021 में USAID प्रायोजित सेंटर फॉर एक्सलेंस इन डेमोक्रेसी, ह्यूमन राइट्‌स एंड गर्वनंस की ओर से प्रकाशित ‘डिसइंर्फोमेशन प्राइमर’-वैश्विक डिसइंर्फोमेशन अर्थात दुष्प्रचार के प्रयासों का विश्लेषण और उसका प्रतिकार करने के मार्ग- का दरअसल एक दूसरा ही उद्देश्य था. इसमें पर्यायी नैरेटिव खड़ा करने, विरोध को सीमित करने और प्रभावी रूप से फ्री स्पीच यानी बोलने की आजादी को समाप्त करने की रणनीति तैयार करने की रूपरेखा दी गई थी. इन आलोचकों का मानना है कि इस दस्तावेज़ में सुझाए गए उपाय जैसे स्वतंत्र या पर्यायी मीडिया से दर्शकों को दूर ले जाने, टेक कंपनियों तथा विज्ञापनदाताओं के साथ कंटेंट अर्थात सामग्री को दबाने और इन कार्रवाईयों को फेक न्यूज का मुकाबला करने का साधन बताने की कोशिश की आड़ में दरअसल लोकतांत्रिक बहस को पलट देने अथवा ध्वस्त करने और सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश की गई थी. DOGE के प्रमुख एलन मस्क ने वॉशिंगटन के राजनीतिक मूड को यथोचित रूप से सबके सामने रखते हुए ट्विट किया था: “USAID एक आपराधिक संगठन है. अब इसकी मृत्यु का वक़्त आ गया है.”

NED 

सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) के पूर्व ऑपरेटिव और ‘इनसाइड द कंपनी : CIA डायरी’ के लेखक ने NED को CIA की ‘साइडकिक’ अर्थात सहायक निरुपित किया था. NED की स्थापना US के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 1983 में की थी. उन्होंने इसकी स्थापना 1967 के रैम्पर्टस मैगजीन स्कैंडल के बाद CIA की ओर से विभिन्न समूहों को दिए जाने वाले वित्त पोषण को वैधता प्रदान करने के लिए की थी. इस ख़ुलासे में CIA की ओर से US नेशनल स्टूडेंट्‌स एसोसिएशन नामक प्रोग्राम के साथ की जा रही हेरफेर अथवा उसके दुरुपयोग पर से पर्दा उठाते हुए बताया गया था कि कैसे विभिन्न विदेशी संगठन और फाउंडेशंस को गुप्त रूप से धन मुहैया करवाया जा रहा है. इसे लेकर सार्वजिनक रूप से हंगामा मचते ही तत्कालीन US राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इस तरह की सारी फंडिंग पर रोक लगा दी थी. इसके परिणामस्वरूप फ्लोरिडा के तत्कालीन Rep./रिप डांटे फैसकल ने CIA की ओर से विदेशी इकाईयों, जिसमें सरकारी संस्थाएं, राजनीतिक समूह, मीडिया आउटलेट्‌स और छात्र संगठनों का समावेश था, को वित्त पोषण देने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने की पैरवी की थी. उनकी इसी पैरवी ने ही अंतत: NED की स्थापना का आधार खड़ा किया था. इसकी स्थापना के पीछे CIA के तत्कालीन निदेशक विलियम केसी ने रचनाकार की भूमिका अदा की थी. इसकी स्थापना राष्ट्रपति रीगन के ‘प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’ के एक हिस्से के रूप में की गई थी.

NED ने केवल 2020 से 2023 के बीच ही ‘पूरी दुनिया में आज़ादी को समर्थन’ देने के अपने अभियान के तहत ही 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का उपयोग किया है. विदेशों में चलाए जाने वाले राजनीतिक अभियानों को लेकर उसकी आलोचना होती है.

NED ने केवल 2020 से 2023 के बीच ही ‘पूरी दुनिया में आज़ादी को समर्थन’ देने के अपने अभियान के तहत ही 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का उपयोग किया है. विदेशों में चलाए जाने वाले राजनीतिक अभियानों को लेकर उसकी आलोचना होती है. इसी प्रकार वेनेजुएला, ब्राजील, क्यूबा और द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो (DRC) की राष्ट्रीय सार्वभौमिकता को कथित रूप से कमज़ोर करने तथा वहां मौजूद सामाजिक तनावों में इज़ाफ़ा करने के लिए भी उसकी आलोचना होती है. 2023 में जारी वॉशिंगटन एग्जामीनर की रिपोर्ट में पाया गया कि UK स्थित ग्लोबल डिसइंर्फोमेशन इंडेक्स (GDI) को भी NED की ओर से धन मुहैया करवाया जाता है. GDI का काम न्यूज सोर्सेस यानी समाचार स्रोतों और वेबसाइट्‌स को विश्वसनीयता के पैमाने पर रेट करना अर्थात उनका वर्गीकरण करना है. इस वर्गीकरण के आधार पर ही दुष्प्रचार फ़ैलाने वाले न्यूज सोर्सेस और वेबसाइट्‌स के वित्तीय प्रोत्साहनों को सीमित किया जाता है. उल्लेखनीय है कि GDI ने प्रमुखता से कंज़रवेटिव प्लेटफार्म्स यानी रुढ़िवादी मंचों जैसे कि द न्यूयॉर्क पोस्ट और द अमेरिकन कंजरवेटिव, को न्यूनतम रेटिंग्स दी गई थी. संभवत: इस रेटिंग के आधार पर ही इन प्रतिष्ठानों को विज्ञापन राजस्व में मिलियंस का नुकसान उठाना पड़ा होगा और बाज़ार में इनके प्रभाव पर भी विपरीत असर पड़ा होगा या कम हुआ होगा. ख़ुलासा होने के बाद यह फंडिंग रुक गई है. 

US के पूर्व कांग्रेसमैन अर्थात सांसद रोनाल्ड पॉल ने NED को लेकर कहा था कि “यह US करदाताओं का पैसा विदेशों में अपने पसंदीदा राजनेताओं और राजनीतिक दलों को देने वाला एक महंगा कार्यक्रम से ज़्यादा कुछ नहीं है. NED की ओर से विदेशों में जो कुछ किया जाता है…वह यूनाइटेड स्टेट्‌स में सीधे-सीधे कानूनी रूप से गैरकानूनी होगा. NED अपनी ‘सॉफ्ट मनी’ को विदेशों के चुनाव में किसी एक या दूसरी पार्टी को समर्थन देने के लिए देता है. ऐसे में विदेशी चुनावों में हस्तक्षेप को ‘लोकतंत्र को प्रोत्साहन’ कहना ऑरवेलियन कहा जाएगा. अमेरिकी लोगों को उस वक़्त कैसा महसूस होगा जब चीनी मिलियंस ऑफ डॉलर अर्थात ढेर सारा पैसा लेकर चीन के प्रति दोस्ताना भाव रखने वाले कुछ चुनिंदा उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे?”

बीच बवंडर में

दक्षिण एशिया में यदि US की ओर से होने वाले हस्तक्षेप में कोई सच्चाई है तो इन हस्तक्षेपों ने बांग्लादेश के लिए सबसे ज़्यादा समस्याएं खड़ी की हैं और यह वहां बेहद अहम साबित हुआ है. 5 अगस्त 2024 को तख़्तापलट का शिकार हुई बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने वॉशिंगटन (अर्थात USAID तथा NED) पर इंफ्लुएंस ऑपरेशंस के व्यापक जाल के माध्यम से उनकी सरकार को कमज़ोर करने का आरोप लगाया है. आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उनकी सरकार ने कथित रूप से बंगाल की खाड़ी में आने वाले सेंट मार्टिन द्वीप को US को सौंपने से मना कर दिया था. US की इस द्वीप में एक हवाई ठिकाना बनाकर वहां से चीन को नियंत्रित करने की योजना थी. US सरकार ने इन आरोपों का खंडन किया है. इसी बीच हसीना के बेटे सजीब वाजेद जॉय, जो एक US नागरिक हैं, ने कहा है कि पूर्व PM के साथ जोड़ा जा रहा यह बयान मनगढ़ंत है.

कुछ वर्षों पूर्व, 2017 में, हसीना ने यह दावा किया था कि जब हिलेरी क्लिंटन, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (2009-2013) थीं तो उनके सहयोगियों ने जॉय को धमकी देते हुए गुज़ारिश की थी कि उन्हें अपने मां को “समझाना’’ चाहिए कि उन्हें अर्थात शेख़ हसीना को बांग्लादेश की वर्तमान अंतरिम सरकार के मुख़्य सलाहकार, मोहम्मद यूनुस की ग्रामीण बैंक के ख़िलाफ़ की जा रही जांच को रोक देना चाहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो जॉय को US के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की ओर से ऑडिट का सामना करना होगा. यूनुस क्लिंटन परिवार के मित्र रहे हैं और क्लिंटन फाउंडेशन के दानदाताओं में से भी एक है. ऐसे में एक सवाल पैदा होता है कि क्या बांग्लादेश के वर्तमान नेतृत्व तथा अमेरिकी इस्टैब्लिशमेंट/स्थापना में शामिल प्रभावी लोगों के बीच की सांठ-गांठ ही मौजूदा तख़्तापलट अभियान के पीछे मौजूद प्रोत्साहन का अतिरिक्त कारण थी. 

बांग्लादेश की राजनीति में हस्तक्षेप का निर्णय लेने वाले US के लोगों के पास ऐसा करने का एक और कारण बांग्लादेश पर भारत के प्रभाव को लेकर बनी धारणा रही होगी. इसकी अहम वजह यह है कि 2009 से देश पर राज कर रही हसीना की पार्टी अवामी लीग के भारत के साथ काफ़ी मज़बूत संबंध है. लेकिन संबंधों की इसी मज़बूती को US में बैठे लोगों ने अत्यधिक समझ लिया होगा.

बांग्लादेश की राजनीति में हस्तक्षेप का निर्णय लेने वाले US के लोगों के पास ऐसा करने का एक और कारण बांग्लादेश पर भारत के प्रभाव को लेकर बनी धारणा रही होगी. इसकी अहम वजह यह है कि 2009 से देश पर राज कर रही हसीना की पार्टी अवामी लीग के भारत के साथ काफ़ी मज़बूत संबंध है. लेकिन संबंधों की इसी मज़बूती को US में बैठे लोगों ने अत्यधिक समझ लिया होगा. हस्तेक्षपकर्ताओं का मानना था कि अवामी लीग को मिल रहा यह समर्थन ही हसीना की सत्ता पर पकड़ को मजबूत कर रहा है और इसी कारण से उनकी सरकार लगातार “दबंग और भ्रष्ट” होती जा रही है और इसके चलते बांग्लदेश में लोकतांत्रिक ढांचा “नष्ट” होता जा रहा है. उनके परिप्रेक्ष्य से US का हस्तक्षेप भारत के बढ़ते दबदबे को रोकने का साधन और अवामी लीग के वर्चस्व को कम करने का साधन था. ऐसा करते हुए US के हस्तक्षेपकर्ता व्यापक राजनीतिक दायरे में पर्यायी आवाजों को पैदा कर रहे हैं जो लोकतांत्रिक प्रशासन में एक महत्वपूर्ण पहलू होता है. सत्ता परिवर्तन परियोजना के पीछे मौजूद प्रोत्साहन अनेक वजह अथवा कारणों का मिश्रण हो सकता है. इसमें भूराजनीति, US तथा चीन के बीच चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा या फिर भारत की सहायता से लगातार काम कर रही दबंग सरकार को कमज़ोर करते हुए “लोकतंत्र को बहाल” करने की इच्छा भी शामिल है. या फिर यह भी हो सकता है कि वर्तमान में बांग्लादेश के अंतरिम नेतृत्व और US में असरदार हल्कों के बीच सांठ-गांठ का लाभ उठाने वाले कुछ स्वार्थी तत्व भी सत्ता परिवर्तन परियोजना के पीछे हो. 

एक बात तो निर्विवाद रूप से सच है कि हसीना सरकार के गिर जाने की वजह से दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था ख़तरे में पड़ गई है और इस वजह से वर्षों से आतंकवाद और इस क्षेत्र में कट्टरता को रोकने के लिए की गई मेहनत पर पानी फिरने का ख़तरा मंडराने लगा है. यह बात इसलिए और भी चिंताजनक है कि इस क्षेत्र के कुछ देश अपनी विदेश नीति के साधन के रूप में आतंकवाद का उपयोग करते हैं. यही देश वैश्विक आतंकी संगठनों के लिए सोर्स कोड्‌स की आपूर्ति करते हैं. USAID के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई और उस कार्रवाई के कारण NED जैसे संगठनों पर पड़े असर ने इस तरह के अर्ध-आधिकारिक संगठनों की तिजोरी में बंद पड़े कुछ नए रहस्यों को सार्वजनिक कर दिया है. इस वजह से इन संगठनों की ओर से चलाए जाने वाले ऑपरेशंस और सुदूर क्षेत्रों में सत्ता परिवर्तन करने की उनकी क्षमता की असामान्य झलक देखने को मिल रही है.

फरवरी में X पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में मस्क ने पूर्व US अफसर माइक बेंज के एक इंटरव्यू को साझा किया था. इसमें माइक बेंज ने स्वीकार किया है कि 2018 में बांग्लादेश के चुनाव के परिणामों को लेकर US विदेश मंत्रालय में असंतोष था. इस चुनाव में हसीना सत्ता में पुन: लौटी थी. इसी वजह से विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने USAID तथा NED द्वारा वित्त पोषित IRI से हसीना सरकार को अस्थिर करने की रणनीति को लेकर चर्चा की थी. हसीना सरकार को मिले लोकप्रिय जनादेश का विचार करते हुए राजनीतिक असंतोष को भड़काना ही सत्ता परिवर्तन का एकमात्र व्यवहार्य मार्ग दिखाई दिया था. 

PAIRS और उसके आगे 

इस चर्चा के बाद ही PAIRS का गठन किया गया. सितंबर 2024 में द ग्रेज़ोन नामक US न्यूज वेबसाइट पर गुप्त तरीके से जारी किए गए दस्तावेज़ों के आधार पर तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार PAIRS यानी ‘प्रोमोटिंग अकाउंटेबिलिटी, इंक्यूलिसिविटी एंड रेजिलियंसी सपोर्ट प्रोग्राम, बांग्लादेश’ IRI का एक प्रोग्राम है. मार्च 2019 से दिसंबर 2020 तक चले इस प्रोग्राम की वजह से ही घटनाओं की ऐसी श्रृंखला चली, जिसका अंत हसीना के तख़्तापलट के साथ हुआ. इन दस्तावेज़ों की वैधता की अभी भी पुष्टि नहीं हो सकी है. लेकिन इनके अवलोकन से काफ़ी चौंकाने वाली जानकारी उजागर होती है. इन दस्तावेज़ों से साफ़ हो जाता है कि एक ऐसी योजना पर अमल किया गया, जिसमें सिविल सोसायटी समूहों और छात्र एक्टीविस्टस्‌, म्युजिक आर्टिस्टस्‌ और LGBTQI+ समुदाय के लोगों का उपयोग करते हुए हसीना के ख़िलाफ़ जनाक्रोश पैदा किया गया.

यह दस्तावेज़ ख़ुद को "प्रोग्राम रिपोर्ट" कहता है. इसमें इसका "राजनीतिक संदर्भ" भी शामिल है. इस राजनीतिक संदर्भ में बांग्लादेश में "राजनीतिक विरोध और आलोचना" के लिए कम होती जा रही स्पेस अर्थात जगह को "एंटी डेमोक्रेटिक ट्रेंड्‌स" यानी लोकतंत्र विरोधी प्रवाह बताया गया है. इसमें इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि विपक्षी बांग्लादेश नेशनल पार्टी विपक्ष को "सफ़लतापूर्वक संगठित अथवा एकजुट करने" में सक्षम नहीं है. इस दस्तावेज़ में ही यह बात भी स्वीकारी गई है कि यह पार्टी यानी बांग्लादेश नेशनल पार्टी  ही "भविष्य में सत्ता में परिवर्तन के लिए सबसे ज़्यादा उपयुक्त" पार्टी है. इस दस्तावेज़ में सरकार का विरोध करने वाले व्यक्तिगत लोगों पर रणनीतिक ध्यान केंद्रित करने के साथ ही "विशेष रूप से उपेक्षित समुदायों" जैसे बिहारी [a] समेत अन्य जातीय अल्पसंख्यकों और देश के LGBTQI+ समुदाय पर भी ध्यान देने की चर्चा की गई है. इस दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि प्रोग्राम के तहत जो उद्देश्य हासिल किया जाना है उसे आगे बढ़ाने में इन समुदायों का उपयोग किया जा सकता है. इसमें यह दावा किया गया है कि इन समुदायों को "आसानी से दबाया नहीं जा सकता और इन समुदायों की लोकतंत्रिक और सुधारवादी संदेश देने की शक्ति के कारण पहुंच बेहद व्यापक वर्ग" तक है. इसके अलावा यह भी कहा गया है कि इनके सामाजिक दर्ज़े के कारण सरकार का इन समुदायों की गतिविधियों पर ध्यान भी आसानी से नहीं जाता है. वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार इस ऑपरेशन का आरंभिक काम 2018 के चुनाव के तुरंत बाद ही शुरू हो गया था. इसके तहत एक बेसलाइन असेसमेंट यानी आधारभूत मूल्यांकन किया गया. आरंभिक चरण में बांग्लादेश के विभिन्न जिलों में 304 "इंर्फोमेंट्‌स" यानी मुखबिरों के समूह में और व्यक्तिगत साक्षात्कार लिए गए. इसके बाद इनमें से "बांग्लादेश की राजनीति में अस्थिरता लाने के लिए IRI के साथ सहयोग करने वाले 170 लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं " की शिनाख़्त की गई.

USAID का मानना था कि “संसदीय लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की गैरमौजूदगी की वजह से चेक्स-एंड-बैलेंसेस अर्थात नियंत्रण और संतुलन का अभाव तैयार होता है और इस अभाव के कारण लोकतंत्र कमज़ोर होता है.” इस तरह के हस्तक्षेपों का समर्थन करने के लिए IRI ने विभिन्न ‘पब्लिक ओपिनियन’ सर्वे का हवाला दिया है.

इस रिपोर्ट में आधारभूत मूल्यांकन के पश्चात पब्लिक ओपिनियन अर्थात जनभावना को आकार देकर विरोध को उत्प्रेरित करने के लिए शुरू की गई सांस्कृतिक एवं आधारभूत पहलों का भी जिक्र किया गया है. इसमें सबसे उल्लेखनीय बात यह दर्ज़ की गई है कि कैसे स्थानीय संगीतकारों तथा कलाकारों को समर्थन देकर उनकी क्षमता में वृद्धि करने के लिए उन्हें वित्तीय सहायता पहुंचाई गई. यह बात विशेष रूप से कंटेंपररी आर्ट फार्म्स यानी समकालीन कला पद्धतियों से जुड़े कलाकारों पर लागू होती है. इसका कारण यह था कि युवा वर्ग ऐसे कलाकारों को काफ़ी पसंद करता है. कलाकारों के लिए कैपेसिटी-बिल्डिंग वर्कशॉप्स का आयोजन भी किया गया. इन वर्कशॉप्स के माध्यम से कलाकारों को एक मंच पर लाकर इस बात पर विचार-विमर्श करने के लिए प्रोत्साहित किया गया कि कैसे "सामाजिक रूप से जागृत अभियान चलाकर राजनीतिक परिवर्तन लाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जोड़ा" जा सकेगा. इन गतिविधियों की वजह से ही इन समूहों तथा व्यक्तिगत लोगों की ओर से फोटो प्रदर्शनी, थिएटर कार्यक्रम, डॉक्यूमेंटरिज़ और पुस्तकों के प्रकाशन की श्रृंखला चलाकर इनके वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाए गए.

इस रिपोर्ट में वकील और रैपर तौफीक अहमद का उदाहरण दिया गया है. इसके अनुसार तौफीक को दो म्यूजिक वीडियो बनाने के लिए एडवोकेसी ग्रांट दी गई. इसमें तुई परिश (यू कैन) तथा ई डाय कार (डिमांड इट) वीडियो का समावेश था. इन्हें फेसबुक और यूट्यूब पर रिलीज किया गया. इसमें से पहले वीडियो में सरकार से नाराज़ शहरी युवाओं को एकजुट होकर सड़कों पर उतरने का आवाहन किया गया है जबकि दूसरा वीडियो गरीबी, और श्रमिक हितों की उपेक्षा किए जाने जैसी सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डालता है. रिपोर्ट के अनुसार ये सारी गतिविधियां, "सरकार के ख़िलाफ़ निराशा को बढ़ा कर उसके विरोध" को प्रोत्साहित करने वाली थी. (2024 में हसीना के ख़िलाफ़ हुए छात्रों के विरोध प्रदर्शन में अहमद ने प्रदर्शनकारियों को कानूनी सहायता मुहैया कराने की पेशकश की थी) इसके बाद में राजनीतिक बदलाव लाने के लिए LGBTQI+ समुदाय को शामिल करने के लिए ट्रांसजेंडर डांस ट्रूप्स को शहरी केंद्रों पर स्टेज के कार्यक्रम आयोजित करने के लिए ग्रांट दी गई. इसका उद्देश्य प्रतिकार के ख़िलाफ़ डटकर खड़ा होना था. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ ग्रुप्स को एकत्रित कर राष्ट्रीय TV पर उनके कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. रिपोर्ट के अनुसार यह, "सहनशीलता, सिविक राइट तथा सुधार प्रक्रियाओं" का संदेश देने की कोशिश थी.

इस रिपोर्ट के मुताबिक IRI ने कलाकारों, संगीतकारों, परफॉर्मर्स तथा संगठनों को कुल 11 एडवोकेसी ग्रांट दी थी. इसका उपयोग करते हुए राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे उठाने वाले 225 आर्ट पीसेस अर्थात कलाकृतियां तैयार की गई. इसमें बिहारी, LGBTI+ तथा अन्य 'जातीय समुदायों' को आकर्षित करने की कोशिश के आंकड़े भी दिए गए हैं. 77 एक्टिविस्ट्स को प्रशिक्षण दिया गया, 326 नागरिकों की सहायता से 43 नीतिगत सुझाव तैयार किए गए. बाद में इन सुझावों को 65 सरकारी अधिकारियों को सौंपा गया. एक्टिविस्ट्स को एडवोकेसी ट्रेनिंग देने के साथ ही आपस में समन्वित तरीके से संगठित होने के लिए सहायता दी गई. इन सारी बातों को नागरिकों की हिस्सेदारी को व्यापक करने की कोशिश बताया गया. ऐसे में यह निश्चित रूप से कहा जाता है कि इस प्रोग्राम ने हाशिए पर बैठे लोगों को सरकार के अधिकार को चुनौती देने का वैचारिक तथा प्रत्यक्ष साधन उपलब्ध कराया है.

PAIRS के अलावा भी कुछ इसी तरह का काम करने वाले अन्य प्रोग्राम भी चलाए गए. मसलन IRI का एक और प्रोजेक्ट फरवरी 2021 से सितंबर 2022 के बीच चलाया गया था. NED ने इसे 900,000 अमेरिकी डॉलर का वित्त पोषण दिया था. इसका उपयोग "हाशिए पर बैठे तबकों, विशेषतः युवा एवं महिलाओं, की आवाज़ को राजनीतिक चर्चा और निर्णय प्रक्रिया" में मुखर बनाने के लिए किया गया. उसके साथ ही इस प्रोग्राम के तहत, "महिला राजनेताओं, निर्वाचित प्रतिनिधियों और राजनीतिक उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करने और सब-नेशनल लेवल पर नेतृत्व सौंपने की तैयारी" की गई थी.

2018 के आम चुनावों के बाद इन एजेंसियों की ओर से की गई फ्रेंचाइजी बिल्डिंग में यानी विशेष सुविधा उपलब्ध करवाने की कोशिशों में छात्र राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना भी शामिल था. इसका उद्देश्य बांग्लादेश की छात्र राजनीति में लचीलापन लाना, विभिन्न तरह के सिविल सोसायटी संगठनों की क्षमता में वृद्धि करने वाले कार्यक्रम आयोजित करना शामिल था. इसके अलावा USAID की एक रिपोर्ट के अनुसार मुख़्यधारा के सैकड़ों राजनेताओं को भी प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की गई थी. इसका कारण यह था कि USAID का मानना था कि “संसदीय लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की गैरमौजूदगी की वजह से चेक्स-एंड-बैलेंसेस अर्थात नियंत्रण और संतुलन का अभाव तैयार होता है और इस अभाव के कारण लोकतंत्र कमज़ोर होता है.” इस तरह के हस्तक्षेपों का समर्थन करने के लिए IRI ने विभिन्न ‘पब्लिक ओपिनियन’ सर्वे का हवाला दिया है. उसके अनुसार इन सर्वे ने इस बात की “पुष्टि” की थी कि देश में लोकतंत्र पीछे पड़ता जा रहा है और हसीना सरकार के ख़िलाफ़ सार्वजनिक नाराज़गी काफ़ी ऊंचाई पर है. इस पृष्ठभूमि में मार्च 2024 की ‘NDI/IRI ज्वाइंट टेक्नीकल असेसमेंट मिशन (TAM)-बांग्लादेश’ रिपोर्ट को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए. यह रिपोर्ट 2024 में हुए आम चुनाव के पहले और बाद की स्थिति को लेकर तैयार की गई है. इस रिपोर्ट में राजनीतिक ध्रुवीकरण और विपक्ष के सदस्यों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा का जिक्र करते हुए इस बात का संकेत दिया गया है कि चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ की गई है. ऐसे में तार्किक रूप से यह आकलन किया जा सकता है कि इस रिपोर्ट में ही जल्द होने वाले तख़्तापलट की ओर हल्का इशारा किया गया है. और तख़्तापलट के लिए ज़मीनी स्तर पर पूरी बारीकी के साथ बीते वर्षों में तैयार कर ही ली गई थी.

ताज़ा हक़ीक़त 

शेख़ हसीना सरकार के अंतिम दिनों में घटनाक्रम काफ़ी तेजी से बिगड़ता गया. उनके एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ आरंभ हुआ आंदोलन देखते ही देखते राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन में परिवर्तित हो गया. यह आंदोलन सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर किया गया था. शेख़ हसीना सरकार ने पाकिस्तान के साथ देश की आजादी की 1971 की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले लोगों के बच्चों तथा उनके नाती-पोतों के लिए सभी सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण देने का फ़ैसला किया था. इस फ़ैसले को छात्रों ने भेदभावपूर्ण बताते हुए आंदोलन शुरू किया था. जुलाई 2024 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह फ़ैसला दिया कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण के इस कोटे को घटाकर 5% कर दिया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए था. इसके बावजूद हसीना के ख़िलाफ़ जारी विरोध प्रदर्शनों में इज़ाफ़ा हुआ और देखते ही देखते छात्र आंदोलनकर्ताओं को विपक्षी राजनीतिक दलों ने बड़ी ही बारीकी के साथ अपने में समायोजित कर लिया.

विदेशी हस्तक्षेप न केवल अफरा-तफरी मचाते है, बल्कि वे पहले से मौजूद विभाजन को बढ़ाने का काम करते हैं. ऐसे में ये राजनीतिक सीमाओं से परे असर डालते हैं. प्रदर्शनों के दौरान तथा अंतरिम प्रशासन के सत्ता संभालने के बाद बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी हिंसा और इसके परिणामस्वरूप भारत में जाकर सुरक्षित आश्रय पाने की कोशिश कर रहे हिंदू शरणार्थियों को इसका पर्याप्त उदाहरण माना जा सकता है.

हसीना सरकार के तख़्तापलट और उनके जल्दबाजी में भारत रवाना होने का कारण बने इस आंदोलन का ढांचा कुछ ऐसा था जो इस बात की ओर संकेत करता है कि यह सारी योजना बेहद सावधानीपूर्वक तैयार की गई थी. इस योजना को स्वयंस्फूर्त कह देना उचित नहीं होगा. उनके भारत रवाना होने से पहले बेहद संगठित विरोध प्रदर्शन, कपोल-कल्पित और गढ़ी हुई ऐसी कहानियां जिन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार की छवि को ख़राब करने वाले नैरेटिव को आकार दिया और हसीना सरकार का विरोध करने वाले सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स की संख्या में अचानक हुई वृद्धि इसी बात की तरफ इशारा करती है कि यह आंदोलन ऑर्गेनिक अर्थात तत्काल तैयार हुआ आंदोलन नहीं था. बांग्लादेश के अनुभव से यह बात समझ लेनी चाहिए कि मॉडर्न इंफ्लुएंस ऑपरेशंस यानी आधुनिक प्रभाव ऑपरेशन की प्रकृति बदल रही है. अब इसमें ऐसे उदार यानी सरल तरीकों का उपयोग करके भी मनचाहा राजनीतिक परिणाम हासिल किया सकता है. जैसा कि NED के पूर्व अध्यक्ष एलन वेनस्टीन ने 1991 में वॉशिंगटन पोस्ट को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था, “आज हम जो कुछ कर रहे हैं उसमें से बहुत सारा काम 25 वर्ष पूर्व CIA की ओर से गुप्त रूप से किया जाता था. उस वक़्त में और अब हो रहे काम में अंतर यह है कि जब इस तरह की गतिविधियां ख़ुले रूप से चलाई जाती है तो इसका फ्लैप पोटेंशियल ज़ीरो के पास होता है यानी एजेंसी को शर्मिंदा होने की संभावना बेहद कम होती है. सार्वजनिक तौर पर होने वाली गतिविधियां स्वयं अपनी रक्षा कर लेती हैं.”

भलाई करने का दम भरने वाले हस्तक्षेपों की वजह से इंफ्लुएंस ऑपरेशंस की पहुंच अब पूर्णत: फ्रेंचाइजी बिल्डिंग यानी विशेष सुविधा उपलब्ध करवाने तक विस्तारित हो चुकी है. सिविल सोसायटी ऑर्गनाइजेशंस, मीडिया और एंटरटेनमेंट अर्थात मनोरंजन आउटलेट्‌स और ग्रासरुट एजेंसियों का एक साथ उपयोग करते हुए गढ़े गए नैरेटिव्स यानी आख्यानों को प्रचारित किया जाता है. ऐसे में बांग्लादेश एक ऐसी चेतावनी देने वाली कहानी बन गया है जो यह बताती है कि कैसे एजेंडा-ड्रिवन यानी विशेष लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम करने वाले नेटवर्क और नैरेटिव्स की आड़ लेकर सत्ता संचालित की जा रही है.

एक नई शुरुआत की ज़रूरत

US के वित्त वर्ष 2020 और 2024 के बीच बांग्लादेश को कुल 2.29 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता दी गई थी. इसमें से 1.73 बिलियन अमेरिकी डॉलर USAID के माध्यम से उपलब्ध करवाए गए थे. बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के सत्ता संभालते ही USAID ने उसके साथ 200 मिलियन डॉलर के विकास समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. USAID के अनुसार यह समझौता, “विकास को आगे बढ़ाने, प्रशासन को मजबूत करने, व्यापार को विस्तार करते हुए बांग्लादेशी नागरिकों के लिए अधिक उज्जवल और संपन्न भविष्य उपलब्ध करवाने के लिए ज़्यादा बेहतर अवसर मुहैया करवाने” के लिए किया गया है.

यहां इस बात साफ करना ज़रूरी है कि पश्चिमी नीति-निर्माता और विशेषज्ञ हमेशा यह कथित दावा करते आए हैं कि इस तरह के हस्तक्षेप लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए किए जाते हैं. उनके ये दावे नियो-इंपीरियलिस्टिक अर्थात नव-साम्राज्यवादी हैं. ऐसे हस्तक्षेप उपनिवेशवाद के दौर की याद को ताज़ा कर देते हैं, जब अपनी सत्ता को विस्तार देने के लिए यह कहा जाता था कि ‘मूल निवासियों’ को सभ्य बनाना ज़रूरी है. पश्चिमी नीति-निर्माताओं के ये सारे दावे अहंकार में डूबे हुए हैं. लोकतंत्र के नाम पर प्रभाव डालने और विदेशी मूल्यों को थोपने की यह हवाई कोशिशें स्थानीय जटिलताओं को ध्यान में नहीं रखती. ऐसे में ये कोशिशें स्थानीय स्तर पर मौजूद नाजुक सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन में व्यावधान डालने का ही काम करती हैं. यह नाजुक सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन ही स्थानीय समाज को जोड़े रखने में अहम भूमिका अदा करता है. इस बात की उपेक्षा करते हुए कथित तौर पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए चलाए जाने वाले अभियानों के कारण स्थानीय स्तर पर मौजूद ऐसे तत्वों को इस अवसर का लाभ उठाने का मौका मिल जाता है जो सत्ता में किसी भी रिक्ती यानी खालीपन का इंतज़ार कर रहे होते हैं. इस तरह के हस्तक्षेप लोकतंत्र के प्राकृतिक रूप से विकसित होने की प्रक्रिया में भी बाधा डालते हैं. इस प्राकृतिक विकास के दौरान समाज में कभी ऊंच तो कभी नीच देखी जाती है. लेकिन यह लोकतंत्र को समझने की प्रक्रिया में जुटे देश के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है. इस प्रक्रिया से गुजरकर ही देश अपने लिए लोकतंत्र के बाहरी संस्करण को अपनाने से बचता है और अपने लिए सबसे बेहतर और अनूठी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाता है. यह वास्तविक लोकतंत्र की जड़े मजबूत करने और उसे लचीला बनाने के लिए बेहद ज़रूरी है.

विदेशी हस्तक्षेप न केवल अफरा-तफरी मचाते है, बल्कि वे पहले से मौजूद विभाजन को बढ़ाने का काम करते हैं. ऐसे में ये राजनीतिक सीमाओं से परे असर डालते हैं. प्रदर्शनों के दौरान तथा अंतरिम प्रशासन के सत्ता संभालने के बाद बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी हिंसा और इसके परिणामस्वरूप भारत में जाकर सुरक्षित आश्रय पाने की कोशिश कर रहे हिंदू शरणार्थियों को इसका पर्याप्त उदाहरण माना जा सकता है. ऐसे में यह यकीनन कहा जा सकता है कि बांग्लादेश में किया गया हस्तक्षेप लोकतंत्र को प्रोत्साहन देने के नाम पर संकुचित भूराजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने की ही कोशिश थी. इस हस्तक्षेप का स्थानीय आवाजों को मजबूती प्रदान करने से कोई लेना-देना नहीं था. 

अब हमें सहायता मुहैया करवाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी एजेंसियों में से एक USAID पर अंकुश लगाने के प्रयासों से लगे झटके और भय से आगे बढ़ना चाहिए. अब USAID को दिए गए मैंडेट यानी अधिदेश तथा उसके ऑपरेशंस की नए सिरे से कल्पना की जानी चाहिए. इसके साथ ही इसके पूरे दायरे, जिसमें NED का भी समावेश है, में पारदर्शिता लाने की कोशिश होनी चाहिए. ऐसा होने पर ही US के सिस्टम यानी व्यवस्था में एक नया भरोसा पैदा होगा और ऐसा हुआ तो USAID उसकी विदेश नीति के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बेहतर ढंग से काम कर सकेगा. US के सिस्टम और उसके संवैधानिक ढांचे के लचीलेपन संबंधी इतिहास को ध्यान में रखकर ही यह भरोसा किया जा सकता है कि USAID को लेकर इस तरह का रीकैलिब्रेशन या सुधार संभव हो सकता है. यदि ऐसा किया गया तो इसकी प्रशंसा की जाएगी. छोटे खिलाड़ियों के पास भी इसी तरह की संस्थाएं मौजूद हैं. वे भी वैश्विक राजनीतिक में उपलब्ध लाभ का दोहन करने के लिए ऐसी संस्थाओं का उपयोग कर सकती हैं.

यह इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि नई और दबंग शक्तियां भी USAID की तर्ज़ पर ही अपने यहां ऐसी ही संस्थाओं का गठन कर रही हैं. वे भी वैश्विक राजनीतिक प्रभाव नेटवर्क्स को बढ़ावा देकर वैश्विक व्यवस्था को मोड़ने की कोशिश कर रही हैं. ये नई और दबंग शक्तियां भी चाहती है कि वे भी सहायता और मुआवजे की आड़ में विश्व को देखने की अपनी दृष्टि के अनुरूप ही वैश्विक व्यवस्था में चालकी के साथ जोड़-तोड़ करें. ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य भी शोषण और दोहन करने वाला ही है. ऐसी नई और दबंग शक्तियों की वजह से पेश आने वाला ख़तरा वास्तविक और प्रत्यक्ष है. इस ख़तरे के पीछे हो रही कार्रवाई और अपनाए गए तरीके भी अपारदर्शी और स्पष्ट दिखाई न देने वाले हैं.


Endnotes

[a] The Biharis, originally from the Indian state of Bihar, number around 250,000-300,000 in a Bangladeshi population of around 170 million. They have been at odds with the majority Bengali population of the country ever since it was formed in 1971, as they supported the Pakistani army’s brutal repression of the majority community’s aspiration for independence. Most of them wanted to relocate in Pakistan after Bangladesh separated from it, but in 1978 Pakistan stopped allowing them in.

[1] Tammy Bruce, “Implementing the President’s Executive Order on Reevaluating and Realigning United States Foreign Aid,” U.S. Department of State, https://www.state.gov/implementing-the-presidents-executive-order-on-reevaluating-and-realigning-united-states-foreign-aid/.

[2] Abigail Williams, Vaughn Hillyard, and Zoë Richards, “USAID to Be Reduced to About 290 Foreign Service Officers and Civil Servants,” NBC Newshttps://www.nbcnews.com/politics/politics-news/usaid-reduce-foreign-service-officers-trump-cuts-federal-government-rcna191122.

[3] Editorial Board, “USAID Exposed as a Shadow Government Piggy Bank for Far-Left Causes,” Washington Times, February 5, 2025, https://www.washingtontimes.com/news/2025/feb/5/editorial-usaid-exposed-shadow-government-piggy-ba/.

[4] Frank Langfitt, “Trump Funding Freeze Halts Decades of U.S. Democracy Work Around the World,” NPR, February 16, 2025, https://www.npr.org/2025/02/16/nx-s1-5297844/trump-musk-democracy-usaid-authoritarian-human-rights-funding-freeze.

[5] Kelley Beaucar Vlahos, “DOGE’s Best First Target: The National Endowment for Democracy,” The American Conservative, November 29, 2024, https://www.theamericanconservative.com/doges-best-first-target-the-national-endowment-for-democracy/.

[6] “At USAID, Waste and Abuse Runs Deep,” White House, February 3, 2025, https://www.whitehouse.gov/articles/2025/02/at-usaid-waste-and-abuse-runs-deep/.

[7] Mike Gonzalez, “The Unmasking of USAID,” The Heritage Foundation, February 10, 2025, https://www.heritage.org/progressivism/commentary/the-unmasking-usaid.

[8] “Challenges to Accountability and Transparency Within USAID-Funded Programs,” USAID Office of Inspector General, January 23, 2025, https://oig.usaid.gov/sites/default/files/2025-02/USAID%20Inspector%20General%20Memorandum%20Challenges%20to%20Accountability%20and%20Transparency%20Within%20USAID-Funded%20Programs.pdf.

[9] Yasin Gungor, “US Granted $270M to Soros-Backed Institute Over 15 Years: Data,” Anadolu Agency, February 7, 2025, https://www.aa.com.tr/en/americas/us-granted-270m-to-soros-backed-institute-over-15-years-data/3474978.

[10] “George Soros Used USAID Grants to Destabilise India, Bangladesh, and Other Nations, Report Claims,” Financial Express, February 10, 2025, https://www.financialexpress.com/world-news/trump-claims-george-soros-used-usaid-grants-to-destabilise-india-bangladesh-and-other-nations/3744424/.

[11] Yasin Gungor, “US Granted $270M to Soros-Backed Institute Over 15 Years: Data,” Anadolu Agency, February 7, 2025, https://www.aa.com.tr/en/americas/us-granted-270m-to-soros-backed-institute-over-15-years-data/3474978.

[12] Tim Kilcullen, Joseph Vazquez, Tom Olohan, and Dan Schneider, “Law & Dis*Order: How the Soros Machine Directs and Controls Prosecutors Across America to Implement His Leftist Agenda,” MRC Special Reporthttps://cdn.mrc.org/static/pdfuploads/Soros+Report_FINAL_PAGES.pdf-1723215421233.pdf

[13] “Disinformation Primer,” Centre of Excellence on Democracy, Human Rights and Governance, February 2021, https://www.ictworks.org/wp-content/uploads/2021/10/usaid-disinformation-primer.pdf.

[14] Alan MacLeod, “USAID’s Disinformation Primer: Global Censorship in the Name of Democracy,” MintPress News, March 21, 2024, https://www.mintpressnews.com/usaid-disinformation-primer-global-censorship-name-of-democracy/287075/.

[15] Elon Musk (@elonmusk), "USAID is a Criminal Organisation," X post, February 2, 2025, https://x.com/elonmusk/status/1886102414194835755.

[16] Joe Buban, “Philip Agee on the National Endowment for Democracy,” YouTube video, 9:54 min, January 10, 2022, https://www.youtube.com/watch?v=pXFuB6QkeJY.

[17] “1967 February 15: ‘Ramparts’ Magazine Exposes Secret CIA Funding of U.S. Student Group,” Today in Civil Liberties Historyhttp://todayinclh.com/?event=ramparts-magazine-article-exposes-cia.

[18] Buban, “Philip Agee on the National Endowment for Democracy”

[19] Vlahos, “DOGE’s Best First Target: The National Endowment for Democracy”

[20] William Michael Schmidli, “Reframing Human Rights: Reagan’s ‘Project Democracy’ and the US Intervention in Nicaragua,” in The Reagan Moment: America and the World in the 1980s, ed. Jonathan R. Hunt et al. (Ithaca, NY: Cornell University Press, December 2021), 237–259, https://doi.org/10.7591/cornell/9781501760686.003.0012.

[21] Vlahos, “DOGE’s Best First Target: The National Endowment for Democracy”

[22] National Endowment for Democracy, https://www.ned.org.

[23] Vlahos, “DOGE’s Best First Target: The National Endowment for Democracy”

[24] Vlahos, “DOGE’s Best First Target: The National Endowment for Democracy”

[25] “National Endowment for Democracy,” Militarist Monitorhttps://militarist-monitor.org/profile/national_endowment_for_democracy/#_edn2.

[26] “Did US Plot Sheikh Hasina’s Ouster? What Bangladesh Ex-PM Said in Her Undelivered Speech,” The Week, August 11, 2024, https://www.theweek.in/news/world/2024/08/11/did-us-plot-sheikh-hasinas-ouster-what-bangladesh-ex-pm-said-in-her-undelivered-speech.html.

[27] “How USAID Was Used for Regime Change in Bangladesh: Former US State Dept Official Mike Benz Reveals,” The Times of India, February 10, 2025, https://timesofindia.indiatimes.com/world/us/how-usaid-was-used-for-regime-change-in-bangladesh-former-us-state-dept-official-mike-benz-reveals/articleshow/118118878.cms.

[28] “‘Laughable’: US Denies Involvement in Bangladesh PM Sheikh Hasina’s Resignation,” Hindustan Times, August 14, 2024, https://www.hindustantimes.com/world-news/bangladesh-unrest-us-denies-involvement-in-prime-minister-sheikh-hasina-resignation-101723596150941.html.

[29] Geeta Mohan, “Sheikh Hasina's Son Denies Her Resignation Statement Report: ‘False, Fabricated’,” India Today, August 11, 2024, https://www.indiatoday.in/world/story/sheikh-hasina-big-charge-against-us-in-undelivered-speech-message-to-students-2580591-2024-08-11.

[30] “Hillary Clinton’s Aides Threatened Me with Tax Audit: Sajeeb Wazed Joy,” BDNews24, April 27, 2017, https://bdnews24.com/bangladesh/hillary-clintons-aides-threatened-me-with-tax-audit-sajeeb-wazed-joy.

[31] Michael Sainato, “Hillary Clinton Lobbied Bangladesh PM on Behalf of Clinton Foundation Donor,” Observer, May 11, 2017, https://observer.com/2017/05/hillary-clinton-lobbied-bangladesh-prime-minister-clinton-foundation-donor/.

[32] “Report Says U.S. Backed Regime Change Initiative in Bangladesh,” The Commune, September 17, 2024, https://thecommunemag.com/revealed-u-s-backed-regime-change-in-bangladesh/.

[33] Vanda Felbab-Brown, “Why Pakistan Supports Terrorist Groups, and Why the US Finds it So Hard to Induce Change,” Brookings Institution, January 5, 2018, https://www.brookings.edu/articles/why-pakistan-supports-terrorist-groups-and-why-the-us-finds-it-so-hard-to-induce-change/.

[34] The Grayzone, “Inside America’s Meddling Machine: NED, the US-Funded Org Interfering in Elections Across the Globe,” YouTube video, 22:42 min, August 21, 2018, https://www.youtube.com/watch?v=NzIJ25ob1aA.

[35] Elon Musk (@elonmusk), X post, February 5, 2025, https://x.com/elonmusk/status/1887036439289897208.

[36] The Grayzone, IRI Bangladesh Final Report, September 2024, https://thegrayzone.com/wp-content/uploads/2024/09/IRI-Bangladesh-Final-Report-1.pdf.

[37] Towfique Ahmed, “Tui Parish,” YouTube video, 3:02 min, April 14, 2020, https://www.youtube.com/watch?v=pLTB2feqNJo.

[38] Towfique Ahmed, “E Daay Kaar,” YouTube video, 4:12 min, December 31, 2020, https://www.youtube.com/watch?v=nE531d96tJE.

[39] Arts & Entertainment Desk, "Rapper-barrister Towfique Ahmed Offers Legal Support to Quota Reform Protesters," The Daily Star, July 18, 2024, https://www.thedailystar.net/entertainment/music/news/rapper-barrister-towfique-ahmed-offers-legal-support-quota-reform-protesters-3659861.

[40] Abhinandan Mishra, “Documents Show U.S. Set in Motion Plan to Oust Hasina,” The Sunday Guardian, September 15, 2024, https://sundayguardianlive.com/top-five/documents-show-u-s-set-in-motion-plan-to-oust-hasina.

[41] International Republican Institute, Survey Research for Bangladesh 2023: Dissatisfaction with Country’s Direction, https://www.iri.org/news/survey-research-for-bangladesh-2023-dissatisfaction-with-countrys-direction/. As of March 7, 2025, the IRI website appears to be disabled.

[42] Nurul Islam Hasib, “USAID: Bangladesh Cannot Afford to Leave Anyone Behind,” Dhaka Tribune, October 30, 2024, https://www.dhakatribune.com/bangladesh/foreign-affairs/363599/usaid-bangladesh-cannot-afford-to-leave-anyone.

[43] USAID, “Democracy, Human Rights, and Governance – Bangladesh,” https://2017-2020.usaid.gov/bangladesh/democracy-human-rights-and-governance. As of March 7, 2025, the USAID website appears to be disabled.

[44] "Survey Research for Bangladesh 2023: Dissatisfaction with Country’s Direction"

[45] International Republican Institute, “NDI-IRI Joint Technical Assessment Mission (TAM) Bangladesh,” https://www.iri.org/resources/ndi-iri-joint-technical-assessment-mission-tam-bangladesh/. As of March 7, 2025, the IRI website appears to be disabled.

[46] Writ Petition No. 6063 of 2021, Supreme Court of Bangladesh, High Court Division, https://www.supremecourt.gov.bd/resources/documents/2110398_W.P.No.6063of2021.pdf.

[47] Arnav Laroia, “Bangladesh Supreme Court Overturns Restoration of Quota System for Government Employment,” JURIST, July 21, 2024, https://www.jurist.org/news/2024/07/bangladesh-supreme-court-overturns-restoration-of-quota-system-for-government-employment/.

[48] Parama Sigurdsen and Ravi Iyer, “A Double-Edged Sword: The Role of Social Media in the 2024 Political Uprising in Bangladesh,” Tech Policy Press, October 1, 2024, https://www.techpolicy.press/a-double-edged-sword-the-role-of-social-media-in-the-2024-political-uprising-in-bangladesh/.

[49] David Ignatius, “Innocence Abroad: The New World of Spyless Coups,” Washington Post, September 21, 1991, https://www.washingtonpost.com/archive/opinions/1991/09/22/innocence-abroad-the-new-world-of-spyless-coups/92bb989a-de6e-4bb8-99b9-462c76b59a16/.

[50] Nurul Islam Hasib, "USAID: Bangladesh Cannot Afford to Leave Anyone Behind," Dhaka Tribune, October 30, 2024, https://www.dhakatribune.com/bangladesh/foreign-affairs/363599/usaid-bangladesh-cannot-afford-to-leave-anyone.

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