भारत ने नई दिल्ली में एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन आयोजित किया, जो वैश्विक एआई विमर्श को समावेशी और लोकतांत्रिक बनाने का प्रतीक है. इसका उद्देश्य एआई को सुरक्षा से हटाकर मानवता के लाभ और विकास पर केंद्रित करना है. भारत 'मानवता के लिए एआई' मंत्र के साथ ग्लोबल साउथ की जरूरतों को पूरा करते हुए तकनीकी राष्ट्रवाद के दौर में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है. यह सम्मेलन भारत की एआई नेतृत्व की आकांक्षा दर्शाता है.
नई दिल्ली में आरंभ एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन कूटनीतिक मोर्चे पर ही एक मील का पत्थर नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीतिक पुनर्संरचना का प्रतीक भी है. यह शिखर सम्मेलन भारत की इस भावना को दर्शाता है कि वह इस उभरती हुई तकनीक से जुड़े विमर्श को प्रभावित कर उसे समावेशी एवं लोकतांत्रिक बनाना चाहता है. इस आयोजन के माध्यम से भारत एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़ी चर्चा को सुरक्षा एवं प्रतिस्पर्धात्मक लाभ की अमूर्त चिंताओं से इतर उसके प्रभाव की ओर मोड़ना चाहता है. जैसे कि कौन इससे लाभान्वित हो रहा है और कौन नहीं और कौन इस खेल के नियम निर्धारित कर रहा है?
भारत का एजेंडा तीन मानक स्तंभों पर आधारित है. ये तीन स्तंभ हैं पीपल यानी लोग, प्लैनेट यानी पृथ्वी और प्रोग्रेस यानी प्रगति. इन तीन स्तंभों को व्यावहारिक दृष्टि से सात विषयगत ‘चक्रों’ में विभक्त किया गया है. ये सात चक्र हैं-कंप्यूटिंग और डाटा तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण, सामाजिक प्रभाव के लिए एआई, सुरक्षित और विश्वसनीय एआई, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं में एआई, कृषि और खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा एवं ग्लोबल साउथ के लिए एआई.
इससे पहले एआई संबंधी आयोजन विकसित देशों में हुए और पहली बार वैश्विक दक्षिण में ऐसा शिखर सम्मेलन हो रहा है. प्रतीकात्मक रूप से भी यह बड़ा परिवर्तन है. पूर्व के आयोजनों में चर्चा का केंद्र मुख्य रूप से एआई माडल के विकास और जोखिमों पर केंद्रित रहा. इस दृष्टि से भारत की मेजबानी में यह आयोजन अलग कहानी कहने जा रहा है. भारत एआई परिचालन को एक तकनीकी मुद्दे से परे विकास संबंधी पहलू के रूप में पुनर्परिभाषित करने के प्रयास में लगा है. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मानवता के लिए एआई’ वाले उस मंत्र को ही दर्शाता है कि किसी तकनीक का उद्देश्य निजी पूंजी को बढ़ाने के बजाय व्यापक सार्वजनिक हितों की पूर्ति का होना चाहिए.
भारत का एजेंडा तीन मानक स्तंभों पर आधारित है. ये तीन स्तंभ हैं पीपल यानी लोग, प्लैनेट यानी पृथ्वी और प्रोग्रेस यानी प्रगति. इन तीन स्तंभों को व्यावहारिक दृष्टि से सात विषयगत ‘चक्रों’ में विभक्त किया गया है. ये सात चक्र हैं-कंप्यूटिंग और डाटा तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण, सामाजिक प्रभाव के लिए एआई, सुरक्षित और विश्वसनीय एआई, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं में एआई, कृषि और खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा एवं ग्लोबल साउथ के लिए एआई. यह दृष्टिकोण एआई को समावेशन और स्थायित्व के दायरे में एक रणनीतिक विकल्प के तौर पर रेखांकित करता है. इस क्रम में मिनी एआई पर भी जोर दिया जा रहा है. मिनी एआई से तात्पर्य ऐसे माडल से है, जो उपयोग में सुगम होने के साथ ही किफायती एवं बहुभाषी भी हों. खासतौर से कमजोर कनेक्टिविटी वाले परिदृश्य में भी प्रभावी रूप से कार्य कर सकें. ऐसी दृष्टि के साथ भारत यह जताना चाहता है कि नवाचार अनिवार्य रूप से बड़े पैमाने और अत्याधुनिक प्रणालियों तक ही सीमित नहीं रह सकता. इसके बजाय उसकी दृष्टि उपयोगिता को केंद्र में रखती है.
इसमें पूर्वानुमानित सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल, जलवायु के प्रति अनुकूल कृषि और डिजिटलीकृत सेवाओं का वितरण महत्वपूर्ण हैं. इससे एआई केवल कारपोरेट कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि राज्य की क्षमताओं को सुदृढ़ करने का एक उपकरण बन जाती है. इस तरह यह एक ओर विकास संबंधी व्यावहारिकता बन जाती है तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक स्थिति का पर्याय.
भारत की आकांक्षा केवल वैश्विक एआई मानकों के अनुपालक बनने तक सीमित नहीं है, वह उनमें सक्रिय सहभागी भी बनना चाहता है. करीब 30 लाख से अधिक एआई पेशेवरों और दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम के दम पर नई दिल्ली का मानना है कि उसके पास इस विमर्श को दिशा देने के लिए आवश्यक जनसांख्यिकी एवं उद्यमशील शक्ति मौजूद है. इस संदर्भ में जब सैम ऑल्टमैन जैसे एआई क्रांति के अग्रदूत यह कहें कि भारत में फुल स्टैक एआई लीडर बनने की भरपूर संभावनाएं हैं तो यह उसी धारणा को मजबूत करता है कि यह देश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक व्यापक गठबंधन को नेतृत्व दे सकता है. विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों का इस सम्मेलन से जुड़ाव इसकी बहुपक्षीय दिशा को भी दर्शाता है.
एआई संबंधी आयोजन विकसित देशों में हुए और पहली बार वैश्विक दक्षिण में ऐसा शिखर सम्मेलन हो रहा है. प्रतीकात्मक रूप से भी यह बड़ा परिवर्तन है. पूर्व के आयोजनों में चर्चा का केंद्र मुख्य रूप से एआई माडल के विकास और जोखिमों पर केंद्रित रहा. इस दृष्टि से भारत की मेजबानी में यह आयोजन अलग कहानी कहने जा रहा है.
समग्रता में देखा जाए तो भारत एआई परिदृश्य पर स्वयं को पश्चिम के नवाचार केंद्रों और वैश्विक दक्षिण की परिचालन संबंधी आवश्यकताओं, अमेरिकी नेतृत्व वाले उद्यमशील इकोसिस्टम और सरकारी नियंत्रण वाले चीन के व्यापकता से परिपूर्ण तंत्र के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करने में लगा है. एआई संचालन से जुड़ी एक राह भारत की व्यापक विदेश नीति के रुझान को भी दर्शाती है. अलग-थलग पड़े बिना रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखना इस नीति के मूल में है.
तकनीकी राष्ट्रवाद के इस दौर में ऐसा रुख-रवैया न केवल विश्व के शक्ति केंद्रों से जुड़े रहने, बल्कि अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी एशिया और दक्षिण अमेरिकी देशों की आवाज को बुलंद करने की गुंजाइश भी देता है. वैश्विक स्तर पर भारत के स्वर भी उसकी घरेलू नीतियों से भी मेल खा रहे हैं. इस दिशा में कल्याणकारी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि परामर्श और डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में एआई से जुड़ी पहल भारत के दावों को ठोस आधार प्रदान करती है. इसका स्पष्ट अर्थ है कि भारत केवल तकनीकी समावेशन का उपदेश ही नहीं दे रहा, बल्कि उसे अमल में भी ला रहा है.
भारत यदि इसमें सफल होता है तो वह एआई से जुड़ी भू-राजनीति को भी नए सिरे से संतुलित करने में सक्षम हो सकता है. इतना तो तय है कि भारत इस एआई-एक्सप्रेस में केवल एक डिब्बे में जगह पाने से संतुष्ट नहीं होने वाला. वह इंजन का हिस्सा भी बनना चाहता है.
महत्वाकांक्षाओं को सदैव वास्तविकता की कसौटियों का भी सामना करना पड़ता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की तकनीकी क्षमताएं अभी सीमित हैं. सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला के लिए विदेश पर निर्भरता तकनीकी संप्रभुता को सवालों के घेरे में खड़ा करती है. इसके अलावा एल्गोरिदम संबंधी पूर्वाग्रह से लेकर निजी डाटा संरक्षण जैसे प्रश्न भी हैं. ऐसे में यदि भारत वैश्विक स्तर पर एआई की विश्वसनीयता की मांग को लेकर मुखर होता है तो उसे घरेलू मोर्चे पर भी नियामकीय अनकूलता प्रदर्शित करनी होगी.
इसलिए यह एआई शिखर सम्मेलन भारत के समक्ष चुनौतियां और अवसर दोनों प्रदान करता है. भारत यदि इसमें सफल होता है तो वह एआई से जुड़ी भू-राजनीति को भी नए सिरे से संतुलित करने में सक्षम हो सकता है. इतना तो तय है कि भारत इस एआई-एक्सप्रेस में केवल एक डिब्बे में जगह पाने से संतुष्ट नहीं होने वाला. वह इंजन का हिस्सा भी बनना चाहता है.
यह लेख जागरण में प्रकाशित हो चुका है.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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