ऑपरेशन सिंदूर ने साफ कर दिया—अब भारत सिर्फ जवाब नहीं देता, रणनीतिक दबाव भी बनाता है. तकनीकी बढ़त और नियंत्रित कार्रवाई के दम पर बिना युद्ध बढ़ाए अपने विकल्प मजबूत करना ही नए भारत की पहचान बन रहा है.
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भारत की पाकिस्तान नीति में ऑपरेशन सिंदूर एक निर्णायक पड़ाव के रूप में सामने आया था. एक सीमित अवधि में चले इस सैन्य अभियान के परिणाम बहुत व्यापक निहितार्थों वाले रहे. पहलगाम में हुए नृशंस आतंकी हमले के जवाब में इस अभियान के दौरान पाकिस्तान के सुदूरवर्ती स्थलों पर संचालित आतंकी ठिकानों को सफलतापूर्वक ध्वस्त करने का काम किया गया. आतंकी ढांचे पर नई दिल्ली की यह प्रतिक्रिया न तो नितांत भावनात्मक रही और न ही विशुद्ध प्रतीकात्मक.
यह एक नपी-तुली सुनियोजित सामरिक कार्रवाई थी, जिसने प्रतिरोध के नए पैमाने को परिभाषित करने का काम किया. भारत की ओर से ऐसा करारा जवाब दिया गया और ऐसे-ऐसे पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया, जिनके बारे में पाकिस्तान ने शायद सोचा भी नहीं होगा. पाकिस्तान की मनुहार के बाद भारत ने चार दिन बाद भले ही संघर्ष विराम पर सहमति जताई हो, लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि अभियान केवल थमा है, समाप्त नहीं हुआ. ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने न केवल अपनी मारक क्षमताओं का प्रदर्शन किया, बल्कि वह दृढ़ता भी दिखाई कि उस पर हुए हमलों का किसी भी कीमत पर ऐसा जवाब दिया जाएगा, जिसे दुश्मन लंबे अर्से तक याद रखे. राजनीतिक नेतृत्व की स्पष्टता के साथ सैन्य बलों ने अपने शौर्य का अप्रतिम परिचय दिया.
पाकिस्तान की मनुहार के बाद भारत ने चार दिन बाद भले ही संघर्ष विराम पर सहमति जताई हो, लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि अभियान केवल थमा है, समाप्त नहीं हुआ. ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने न केवल अपनी मारक क्षमताओं का प्रदर्शन किया, बल्कि वह दृढ़ता भी दिखाई कि उस पर हुए हमलों का किसी भी कीमत पर ऐसा जवाब दिया जाएगा, जिसे दुश्मन लंबे अर्से तक याद रखे.
हर सफलता अपने साथ कुछ सबक लेकर आती है और इस पैमाने पर ऑपरेशन सिंदूर भी अपवाद नहीं रहा. इसमें पाकिस्तान की परमाणु हेकड़ी की हवा पूरी तरह निकल गई. हालांकि तनाव भड़कने से जुड़े पहलू अभी भी कायम हैं, लेकिन भारत के स्पष्टता भरे रुख ने एक रेखा अवश्य खींच दी है. ऑपरेशन सिंदूर तीनों सेनाओं के बीच अद्भुत समन्वय का साक्षी भी बना. विशेष रूप से अरब सागर में नौसेना की तत्परता से तैनाती से जुड़ा पहलू बहुत सराहनीय रहा. इसके बावजूद यह भी स्वीकार करना होगा कि तीनों सेनाओं के बीच सामंजस्य को बेहतर बनाने की दिशा में अभी और प्रयास करने होंगे. खासतौर से रीयल टाइम में एकीकृत परिचालन को लेकर.
ऑपरेशन सिंदूर ने लक्ष्य को चिह्नित कर सटीक प्रहार की क्षमताओं के साथ दूर से ही दुश्मन को सबक सिखाने में सुरक्षा बलों की भूमिका को और पुख्ता किया. मिसाइल, ड्रोन और बियोंड-विजुअल रेंज वाले संघर्ष ने भारत के जोखिम घटाते हुए हमलों के अधिकतम प्रभाव को सुनिश्चित किया. हालांकि इस दौरान हवाई रक्षा प्रतिरोध, ड्रोन रोधी क्षमताओं, खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही क्षमताओं के अलावा संचार संबंधी लचीलेपन के स्तर पर मौजूद कुछ कमजोरियां भी उजागर हुईं.
नीति-नियंताओं के लिए इसका स्पष्ट संदेश है कि प्रणालीगत पूर्ण एकीकरण के अभाव में केवल अपनी सुविधा के साथ विशिष्ट तकनीकों को अपनाने की अपनी सीमाएं भी होती हैं. वैसे तो इस सैन्य संघर्ष में भारत ने निर्णायक प्रभुत्व के साथ सफलता हासिल की, लेकिन शुरुआती स्तर पर लगे कुछ झटकों ने सैन्य क्षमताओं में विद्यमान कुछ असंतुलन की ओर भी संकेत किया. आवश्यक स्क्वाड्रन क्षमताओं का अभाव, लंबी दूरी तक प्रहार करने वाली प्रणालियों की सीमाएं और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के मोर्चे पर जो कमजोरियां दिखीं, उन्हें तत्काल प्रभाव से दूर कर स्वयं को सशक्त करना होगा.
ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को मिले चीनी खुफिया एवं सैन्य सामग्री सहयोग-समर्थन को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता. इस जटिलता ने दो मोर्चों पर संभावित संघर्ष को लेकर भारत की तैयारी को और पुख्ता बनाने की आवश्यकता को कहीं अधिक गहराई से रेखांकित किया है.
ऑपरेशन सिंदूर के साथ ही भारत ने आतंकवाद से निपटने को लेकर अपना दृष्टिकोण और स्पष्ट किया. भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि आतंकवादी तत्वों और उन्हें संरक्षण देने वाले देशों के बीच कोई अंतर नहीं किया जाएगा और उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी होगी. इस अभियान से संबंधित तकनीकी आयाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. इस क्रम में ड्रोन, लायटरिंग म्यूनिशन यानी घातक ड्रोन और अत्याधुनिक हवाई रक्षा कवच का व्यापक उपयोग न केवल भारत के अपने अनुभवों पर आधारित रहा, बल्कि उसने समकालीन वैश्विक संघर्षों के रुझानों से लिए गए सबक का लाभ भी उठाया. इसका ही परिणाम है कि भारत ने रक्षा उपकरणों में आत्मनिर्भरता के प्रयासों को तेज कर दिया है. ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को मिले चीनी खुफिया एवं सैन्य सामग्री सहयोग-समर्थन को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता. इस जटिलता ने दो मोर्चों पर संभावित संघर्ष को लेकर भारत की तैयारी को और पुख्ता बनाने की आवश्यकता को कहीं अधिक गहराई से रेखांकित किया है.
हमें अपनी मंशा और क्षमताओं दोनों को और धार देनी होगी और यह बात केवल घोषणाओं तक सिमटकर न रह जाए, बल्कि आवश्यकता पर तत्परता से उपयोग योग्य भी बने. चीफ आफ डिफेंस स्टाफ यानी सीडीएस जैसी पहल बहुत अच्छी रही है, लेकिन इस ढांचे के अंतर्गत सशस्त्र बलों के बीच तालमेल को और बेहतर बनाना होगा. यह सही है कि समन्वय में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन नियोजन, कमान ढांचे और संसाधनों के आवंटन में एकीकरण के अभाव और असंतुलन की कुछ स्थिति बनी हुई है. इसमें सबसे बड़ी चुनौती मंशा को मूर्त रूप देने की होगी. जैसे सैन्य बलों की संस्थागत संस्कृतियों में सामंजस्य बैठाना, सेना के विभिन्न अंगों में लचीलापन बढ़ाना और सामरिक तैयारियों की दिशा में एकीकृत ढांचा तैयार करना. यदि रणनीतिक बदलाव को स्थायी बनाना है, तो इस क्रम में तकनीक के आधुनिकीकरण के साथ-साथ इन संगठनात्मक सुधारों पर भी ध्यान देना ही होगा.
भारत के सामरिक परिदृश्य में ऑपरेशन सिंदूर एक ऐसा पड़ाव बनकर उभरा, जहां मंशा, क्षमता और रणनीतिक पहलू पूरी स्पष्टता के साथ एक दूसरे के साथ ताल मिलाते दिखे. इसने दर्शाया कि यह दबाव में आने वाला पुराना भारत नहीं, बल्कि दुश्मन पर दबाव बनाने वाला भारत है, जहां तकनीकी श्रेष्ठता का लाभ उठाकर संघर्ष का दायरा बढ़ाए बिना ही अपने विकल्पों में वृद्धि करने में बड़ी सफलता मिली. उस संघर्ष में मिली सफलता को कायम रखने के लिए आवश्यक होगा कि ऐसा राजनीतिक संकल्प लिया जाए जो दिखावटी सुधारों के बजाय संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता दे. यदि ऐसा न हुआ तो ऑपरेशन सिंदूर से उपजी संभावनाएं एक गंवाए हुए अवसर का प्रतीक बनकर ही रह जाएंगी.
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Professor Harsh V. Pant is Vice President at Observer Research Foundation, New Delhi. He is a Professor of International Relations with King's India Institute at ...
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