Author : Chaitanya Giri

Published on Jan 20, 2026 Commentaries 0 Hours ago

2026 भारत के अंतरिक्ष भविष्य के लिए निर्णायक क्यों है? जानें कैसे विज्ञान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता एक साथ जुड़कर गगनयान और नए प्रक्षेपण यानों के ज़रिये भारत को एक जिम्मेदार और प्रभावशाली अंतरिक्ष शक्ति बना रहे हैं,

भारत और अंतरिक्ष: 2026 में क्या कुछ बदलने वाला है

भारत के लिए यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है. वर्ष 2025 को देश उस साल के रूप में याद रखेगा, जब उसने पहली बार उच्च-प्रौद्योगिकी पर आधारित सटीक सैन्य कार्रवाई-ऑपरेशन सिंदूर-को अंजाम दिया. पाकिस्तान स्थित आतंकी और सैन्य ठिकानों पर किए गए इन हमलों की विशेषता यह रही कि इनमें भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं की अहम भूमिका रही. इसरो द्वारा पहली बार इस तथ्य को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना इस बात का संकेत था कि भारत अब एक सिविल–मिलिट्री फ्यूजन आधारित अंतरिक्ष कार्यक्रम की ओर स्पष्ट रूप से बढ़ चुका है.

यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब वैश्विक व्यवस्था गहरे तनाव से गुजर रही है. दुनिया आज चार बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है-लंबे समय तक चलने वाले सैन्य संघर्ष, जनसांख्यिकीय बदलाव, पश्चिमी देशों में आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार और 20वीं सदी में बनी वैश्विक संस्थाओं की प्रासंगिकता का क्षरण. ये स्थितियां 1930 के दशक की याद दिलाती हैं, जब वैश्विक अस्थिरता ने नई राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को जन्म दिया था.

अमेरिका में रक्षा और सुरक्षा को लेकर बदली हुई सोच, यूरोप का युद्ध-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर झुकाव और वैश्वीकरण से पीछे हटने के संकेत इस बात को स्पष्ट करते हैं कि आने वाले वर्षों में वैश्विक सहयोग पहले जैसा सहज नहीं रहेगा. इसका सीधा असर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने वाला है, जो अब तक खुले सहयोग और साझेदारी पर आधारित रही है.

इन परिस्थितियों का परिणाम यह हुआ है कि संरक्षणवाद और आत्मनिर्भरता की प्रवृत्ति तेज हुई है. अमेरिका में रक्षा और सुरक्षा को लेकर बदली हुई सोच, यूरोप का युद्ध-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर झुकाव और वैश्वीकरण से पीछे हटने के संकेत इस बात को स्पष्ट करते हैं कि आने वाले वर्षों में वैश्विक सहयोग पहले जैसा सहज नहीं रहेगा. इसका सीधा असर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने वाला है, जो अब तक खुले सहयोग और साझेदारी पर आधारित रही है.

भारत का अंतरिक्ष मिशन 

ऐसे माहौल में भारत का वाणिज्यिक अंतरिक्ष क्षेत्र और अंतरिक्ष विभाग अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीतियों पर पुनर्विचार करने को मजबूर होंगे. पिछले पांच वर्षों में भारत के निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप्स ने पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी की महत्वाकांक्षा दिखाई थी लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाओं ने यह साफ कर दिया है कि अंतरिक्ष सहयोग अब केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक कसौटियों पर भी परखा जाएगा. ऐसे में भारत उन देशों के साथ साझेदारी को प्राथमिकता देगा, जिनकी भारत की प्रगति में वास्तविक और दीर्घकालिक रुचि है.

भारत आज बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है. 2026 में उसे अंतरिक्ष तकनीक, दूरसंचार और अंतरिक्ष आपूर्ति श्रृंखला में अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को लेकर ठोस फैसले लेने होंगे. खासकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी अंतरिक्ष क्षमताएँ न केवल आर्थिक विकास, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया जरूरतों को भी पूरा कर सकें. बाह्य अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज का क्षेत्र नहीं रहा; यह भारत के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार बन चुका है.

2026 में उसे अंतरिक्ष तकनीक, दूरसंचार और अंतरिक्ष आपूर्ति श्रृंखला में अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को लेकर ठोस फैसले लेने होंगे. खासकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी अंतरिक्ष क्षमताएँ न केवल आर्थिक विकास, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया जरूरतों को भी पूरा कर सकें.

वर्ष 2026 गगनयान मिशन के लिहाज़ से भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा. भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम केवल राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसके साथ कई व्यावहारिक और रणनीतिक जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी हैं. भारतीय ‘व्योमनॉट्स’ की सुरक्षा, विशेषकर निम्न पृथ्वी कक्षा में, भारत को इस सीमित कक्षीय क्षेत्र में बढ़ती उपग्रह भीड़ और अंतरिक्ष मलबे की समस्या पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करेगी.

चीनी अंतरिक्ष स्टेशन और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहले ही घनी कक्षाओं और मलबे से उत्पन्न खतरों का सामना कर रहे हैं. लेकिन चूँकि ये दोनों प्रतिद्वंद्वी शक्तियों से जुड़े हैं और सबसे बड़े उपग्रह समूह भी इन्हीं देशों के हैं, इसलिए वैश्विक हित में संयम दिखाने की संभावना कम है. ऐसे में भारत के सामने अवसर भी है और जिम्मेदारी भी-कि वह सुरक्षित, टिकाऊ और न्यायसंगत अंतरिक्ष उपयोग की वकालत करे.

2026 नए प्रक्षेपण क्षमताओं के लिहाज़ से भी भारत के लिए उल्लेखनीय होगा. इसरो के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) की पहली वाणिज्यिक उड़ान, स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट की पहली कक्षीय उड़ान और रक्षा बलों द्वारा विकसित ठोस ईंधन आधारित त्वरित प्रतिक्रिया लॉन्चर ‘वेदा’ में संभावित प्रगति-ये सभी घटनाएँ भारत को छोटे उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करेंगी.

आगे की राह 

इसके साथ ही, इसरो कई उन्नत स्वदेशी तकनीकों का प्रदर्शन करेगा-जैसे उन्नत संचार के लिए ट्रैवलिंग-वेव ट्यूब एम्पलीफायर, सुरक्षित संचार के लिए क्वांटम की डिस्ट्रीब्यूशन और उच्च-थ्रस्ट विद्युत प्रणोदन प्रणालियाँ. ये तकनीकें भविष्य में भारतीय उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों की रीढ़ बन सकती हैं.

स्पष्ट है कि नागरिक, वाणिज्यिक और सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रमों के बीच खींची गई पुरानी रेखाएँ अब तेजी से मिट रही हैं. 2026 वह वर्ष होगा, जब भारत का सिविल–मिलिट्री एकीकृत अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी स्पष्टता के साथ सामने आएगा-एक ऐसा कार्यक्रम, जो विज्ञान, सुरक्षा और वैश्विक जिम्मेदारी को एक साथ साधने की कोशिश करेगा.


यह लेख मूल रूप से द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था.

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Chaitanya Giri

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Dr. Chaitanya Giri is a Fellow at ORF’s Centre for Security, Strategy and Technology. His work focuses on India’s space ecosystem and its interlinkages with ...

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