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ज़ोरावर टैंक पर नाग-II मिसाइल का जुड़ना ताकत बढ़ाता है लेकिन युद्ध सिर्फ एक अपग्रेड से नहीं बदलता. जंग का सच ये है कि टैंक और मिसाइल तभी असरदार होते हैं जब पूरी फोर्स एक साथ चले इसलिए नाग-II महत्वपूर्ण है पर निर्णायक नहीं.
एंटी-टैंक हथियार नाग को ज़ोरावर लाइट बैटल टैंक (LBT) के साथ इस्तेमाल करने के लिए तैयार किया गया है. नाग-II एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) के जुड़ने से ज़ोरावर की मारक क्षमता ज़रूर बढ़ती है लेकिन यह बढ़ोतरी सीमित है. यह एक अच्छा कदम है पर इससे कंबाइंड आर्म वॉरफेयर यानी सेना की अलग-अलग शाखाओं का मिलकर काम करना- कभी भी बदला नहीं जा सकता. दरअसल, अलग-अलग हथियारों को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ना कोई नई बात नहीं है जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के आसपास से ही स्वचालित तोपों (सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी) और बख्तरबंद वाहनों को मिलाने के प्रयोग होते रहे हैं. ऑस्ट्रिया के जनरल लुडविग वॉन आईमैन्सबर्गर और ब्रिटेन के जनरल जे.एफ.सी. फुलर ने भी पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच ऐसे विचार आगे बढ़ाए थे. वास्तव में जर्मनी ने अपने उत्तर अफ्रीकी अभियान में आईमैन्सबर्गर द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के आधार पर ही अपनी क्षमताओं को तैनात किया था. हालांकि पोलैंड और फ्रांस के ख़िलाफ अभियान के दौरान कंबाइंड आर्म का उपयोग प्रभावी साबित हुआ और पता चला कि हथियारों को एक ही प्लेटफॉर्म में मिलाने के बावजूद इसका कोई वास्तविक विकल्प नहीं है.
“तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैंक मिसाइल… ‘फायर एंड फोरगेट’ गाइडेंस विशेषता के साथ।”
नाग-II का एकीकरण ज़ोरावर की मारक क्षमता में एक सार्थक बढ़ोतरी के बारे में बताता है और इसकी विशेषताओं की नज़दीक से पड़ताल करने पर पता चलता है कि इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (पैदल सेना के लड़ाकू वाहन) की तरह ज़ोरावर साइड माउंटेन कंटेनर से नाग-II मिसाइल क्यों छोड़ता है जिससे बचे रहने और लचीलापन- दोनों के तत्व मिलते हैं. ये तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैंक मिसाइल है. डिज़ाइन में आधुनिकता (जैसे कि बूस्टर और सस्टेंड मोटर दोनों के लिए यूनिफाइड सिंगल बूस्टर) इसे अलग-अलग सिस्टम के साथ एकीकरण के लिए अनुकूल बनाता है. थ्रस्ट वेक्टर कंट्रोल की जगह नाग-II में जेट वेन कंट्रोल (JVC) है. इसमें ‘फायर एंड फॉरगेट’ गाइडेंस विशेषता है जिसमें ATGM सिस्टम अपने आप निशाने का पता लगाकर उसे ध्वस्त कर सकता है. ये विशेषता ऊपर से नीचे की ओर हमला करने की क्षमता के साथ एकीकृत है जिसका इस्तेमाल टैंक जैसे भारी बख्तरबंद लक्ष्यों की कमज़ोर छत को निशाना बनाने के लिए किया जाता है. इस तरह उसकी ज़्यादातर सुरक्षा को दरकिनार किया जा सकता है. नाग-II के दो महत्वपूर्ण लाभ हैं: गतिरोध की दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता और ज़ोरदार प्रहार. इसकी अधिकतम रेंज 4 किमी है और ये अत्यंत सटीक है. साथ ही इससे कई बख्तरबंद लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकता है. लॉन्चर कंटेनर के भीतर दो मिसाइल होती हैं. कुल मिलाकर नाग-II सिस्टम ज़ोरावर टैंक की मारक क्षमता, गतिशीलता और बख्तरबंद तत्वों जैसी दूसरी विशेषताओं के साथ मिलकर ज़बरदस्त ताकत मुहैया कराता है. अंत में, ज़ोरावर टैंक के साथ स्वदेशी नाग-II ATGM को जोड़ने से अधिक सुरक्षित कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन और कंप्यूटर इंटेलिजेंस सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (C4ISR) नेटवर्क टारगेटिंग क्षमता की सुविधा मिलेगी. नाग का एकीकरण गलवान के बाद भारतीय सेना की आक्रामक रक्षा की रणनीति के साथ भी मेल खाता है जिसके तहत भारत की हिमालयी सीमाओं (विशेष रूप से लद्दाख) में चीन की घुसपैठ को रोकने के लिए अधिक आक्रामक बदलाव किए गए हैं.
“नाग-II + ज़ोरावर = संयुक्त ज़बरदस्त मारक क्षमता।”
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की उपलब्धि के बावजूद नाग-II का एकीकरण (जो ज़ोरावर को अधिक घातक बनाता है) पर्याप्त नहीं है. युद्ध के दौरान इन्फैंट्री-आर्मर के साथ मेल-जोल से इसके असर में सुधार होगा. भौगोलिक क्षेत्र चाहे जो भी हो लेकिन बख्तरबंद ऑपरेशन में इन्फैंट्री की भूमिका ज़रूरी है. वास्तव में इन्फैंट्री के साथ मेल-जोल के बिना नाग-II का एकीकरण और मारक क्षमता असरदार नहीं होगी. पहाड़ी भू-भाग के साथ-साथ दूसरे वातावरण में भी ज़ोरावर के सही प्रदर्शन के लिए माउंटेड (गाड़ियों में सवार) और डिसमाउंटेड इन्फैंट्री (पूरी तरह पैदल) महत्वपूर्ण होंगी. इन्फैंट्री के उपयोग के आगे आर्मर को तोपखाने के समर्थन की आवश्यकता होगी. ये मोबाइल आर्टिलरी के लिए विशेष रूप से सही है. टैंक के साथ मोबाइल आर्टिलरी को जोड़ना उस कंबाइंड आर्म वॉरफेयर के मुख्य आविष्कारों में से एक था जिसे जर्मनी ने दोनों विश्व युद्ध के बीच के वर्षों में विकसित किया था. इसका श्रेय विशेष रूप से जर्मनी के जनरल हेंज़ गुडेरियन को जाता है. यहां तक कि पारंपरिक फील्ड आर्टिलरी भी गुडेरियन की कंबाइंड वॉरफेयर की सोच में अप्रत्यक्ष मारक क्षमता प्रदान करने में महत्वपूर्ण थी. हालांकि मोटर चलित आर्टिलरी सबसे प्रमुख आविष्कार था. जर्मनी के द्वारा विकसित युद्ध लड़ने के ये इनोवेटिव तरीके आज भी महत्वपूर्ण हैं. दुश्मन के टैंक और “सैनिकों की एकाग्रता” के बीच संपर्क तोड़ने के लिए मोबाइल और फील्ड आर्टिलरी महत्वपूर्ण हैं. ये मारक क्षमता दुश्मनों को कुचलने के साथ-साथ उन्हें गुमराह भी कर सकती है. ज़ोरावर के साथ नाग-II का एकीकरण कोई रामबाण या गेम-चेंजर नहीं है.
“ज़ोरावर के साथ नाग-II का एकीकरण कोई रामबाण या गेम-चेंजर नहीं है।”
आसान भाषा में कहें तो सिंगल प्लैटफॉर्म (टैंक) पर सीधे हमला करने के लिए तैयार टैंक पर सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी गन के एकीकरण की तरह ज़ोरावर पर नाग-II मिसाइल को केवल जोड़ना कंबाइंड आर्म वॉरफेयर की ज़रूरतों को पूरा नहीं करता है, भले ही ज़ोरावर की दूसरी ख़ूबियां कितनी भी मारक क्यों न हो. दुश्मन की क्षमताओं की जटिलताएं, उनके द्वारा कंबाइंड आर्म की रणनीति का इस्तेमाल, भौगोलिक स्थिति, युद्ध के मैदान और अभियान से जुड़ी मांगों के कारण कंधे से दागी जाने वाली मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइल (जैसे कि जेवलिन) ज़रूरी हो जाएगी. भारतीय सेना (IA) की कुछ इन्फैंट्री यूनिट को इससे लैस भी करने की उम्मीद है. पहाड़ी भू-भाग (जहां अन्य ATGM के साथ ज़ोरावर लाइट बैटल टैंक को तैनात किया जाएगा) में अभियान के लिए तैयार अच्छी तरह से प्रशिक्षित डिसमाउंटेड इन्फैंट्री यूनिट के सबसे असरदार होने की संभावना है. ज़ोरावर के साथ नाग-II के एकीकरण के बावजूद के9 वज्र जैसी सेल्फ-प्रोपेल्ड मोबाइल आर्टिलरी (जो अब लद्दाख में तैनात है) भी ATGM से लैस इन्फैंट्री की तरह ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. इस तरह नाग-II का एकीकरण इन्फैंट्री, मोबाइल आर्टिलरी और अब इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW), इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (ISR) के साथ-साथ दुश्मनों की ज़मीनी सेना के ख़िलाफ़ काइनेटिक अटैक के लिए सर्वव्यापी ड्रोन से तालमेल के बिना नहीं किया जा सकता है. असरदार कंबाइंड आर्म वॉरफेयर के लिए इन्फैंट्री, आर्मर, आर्टिलरी और ड्रोन के बीच नज़दीकी सहयोग और समन्वय महत्वपूर्ण है. वास्तव में मानवयुक्त हवाई मारक क्षमता से नज़दीकी हवाई समर्थन भी कंबाइंड आर्म वॉरफेयर के प्रभावी प्रयोग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
इस तरह नाग ATGM, ज़ोरावर की क्षमताओं में केवल कदम-दर-कदम बढ़ोतरी के बारे में बताती है जो इसे और अधिक घातक तो बनाती है लेकिन ये कंबाइंड आर्म को ख़त्म करने में मदद नहीं करेगी.
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Kartik is a Senior Fellow with the Strategic Studies Programme. He is currently working on issues related to land warfare and armies, especially the India ...
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Rahul Rawat is a Research Assistant with ORF’s Strategic Studies Programme (SSP). He also coordinates the SSP activities. His work focuses on strategic issues in the ...
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