हाल ही में चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस से 19 सदस्यों को हटा दिया गया. शी जिनपिंग के इस अभियान से चीन की राजनीतिक और सैन्य व्यवस्था में अस्थिरता के संकेत उभर रहे हैं. जानिए किस तरह यह कदम भारत के लिए एक संभावित रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है.
26 फरवरी, 2026 को चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (NPC) ने अपने 19 डेप्युटी मेंबरों को निकाल बाहर किया. इनमें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के 9 अफसर भी थे. इससे पहले 24 जनवरी, 2026 को चीन के दो सबसे सीनियर जनरलों, झांग योउशिया और लियू झेनली को हटाया गया. पिछले तीन सालों में कुल 99 लोग ऐसे ही बाहर किए जा चुके हैं. अब NPC की कुल तादाद 2,977 से घटकर 2,848 रह गई है. इन घटनाओं से राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीर दरकी है.
इससे दो बातें तो साफ हैं. पहली, इतने बड़े पैमाने पर चल रही सफाई से लगता है कि चीन की हुकूमत ऊपर से नीचे तक अपने ढांचे को साफ करने की कोशिश में है ताकि केंद्र की पकड़ फिर से मजबूत हो और गैर भरोसेमंद नेटवर्क खत्म किए जा सकें. यह कुछ हद तक माओ के दौर के 'रेक्टिफिकेशन कैंपेन' की याद दिलाता है. दूसरी बात, अगर नेतृत्व की ऊपरी हिस्सा ही धीरे-धीरे खाली होती जाए तो इसका असर घरेलू स्थिरता और सुरक्षा पर भी पड़ सकता है.
PLA में चल रही यह कार्रवाई कोई आम बात नहीं है. 2022-23 से अब तक शी जिनपिंग फौज के 100 से ज्यादा सबसे सीनियर अफसरों को हटा चुके हैं. यह कार्रवाई हर थिएटर कमांड, हर सैन्य शाखा, अलग-अलग विभागों और यहां तक कि सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) तक फैल चुकी है. माना जाता है कि PLA में टॉप की तकरीबन 176 पोस्ट हैं. इनमें से 101 से ज्यादा को हटाया जा चुका है, यानी 50 फीसदी से भी ज्यादा.
चीन की हुकूमत ऊपर से नीचे तक अपने ढांचे को साफ करने की कोशिश में है ताकि केंद्र की पकड़ फिर से मजबूत हो और गैर भरोसेमंद नेटवर्क खत्म किए जा सकें. यह कुछ हद तक माओ के दौर के 'रेक्टिफिकेशन कैंपेन' की याद दिलाता है.
इन सबको हटाने का सीधा असर कम से कम 10,000 मातहत अफसरों पर पड़ा होगा, वैसे प्रभावित ज्यादा ही हुए होंगे. मेजर जनरल और उससे निचली रैंक का तो आंकड़ा ही नहीं है. इसके चलते हो सकता है कि PLA की पूरी कमांड सिस्टम ही सुस्त पड़ जाए. सेंट्रल मिलिट्री कमीशन और थिएटर कमांडों में खाली होती बड़ी जगहें दिखाती हैं कि PLA की रीढ़ कमजोर हो रही है. इतिहास बताता है कि जब किसी फौज पर सियासी निगरानी बहुत ज्यादा हो जाती है, तो वह ज्यादा नौकरशाही वाली हो जाती है. आज PLA में भी यही पैटर्न देखने को मिल सकता है.
यही हाल पार्टी-स्टेट नौकरशाही का भी है. वहां भी बड़े अफसरों और उनके मातहतों की फटाफट विदाई जारी है. इससे सरकारी सिस्टम का तजुर्बा कम और प्रशासनिक ढांचा कमजोर पड़ रहा है. यह सब तब हो रहा है जब हुकूमत का कंट्रोल बढ़ रहा है, लोगों पर सर्विलांस मजबूत हो रहा है, वैचारिक दबाव भी बढ़ रहा है. ऐसा लगता है कि बीजिंग अब पेशेवर क्षमता से ज्यादा सियासी वफादारी को अहमियत दे रहा है.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सिस्टम डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म के सिद्धांत पर चलती है. यानी नेतृत्व का फैसला सबको मानना पड़ता है. PLA भी ऐसे ही काम करती है, तो सैन्य फैसले लेने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है. इसके अलावा सेंट्रल मिलिट्री कमीशन अकेले बचे वाइस चेयरमैन झांग शेंगमिन राजनीतिक अफसर रहे हैं. सैन्य ऑपरेशन में उनका उतना तजुर्बा नहीं है.
हो सकता है कि PLA की पूरी कमांड सिस्टम ही सुस्त पड़ जाए. सेंट्रल मिलिट्री कमीशन और थिएटर कमांडों में खाली होती बड़ी जगहें दिखाती हैं कि PLA की रीढ़ कमजोर हो रही है. इतिहास बताता है कि जब किसी फौज पर सियासी निगरानी बहुत ज्यादा हो जाती है, तो वह ज्यादा नौकरशाही वाली हो जाती है.
जॉइंट स्टाफ डिपार्टमेंट की हालत और भी खराब है. वहां मुखिया समेट चार डेप्युटी तक हटाए जा चुके हैं. नतीजतन ताकत अब सीधे शी जिनपिंग के अंडर आने वाले जनरल ऑफिस में तो है, लेकिन डांवाडोल है. इस सिस्टम में सैन्य विशेषज्ञता कम और सियासी कंट्रोल ज्यादा दिखता है. कुल मिलाकर चीन फिलहाल किसी बड़े सैन्य हमले के लिए अच्छी हालत में नहीं है. हालांकि 'ग्रे जोन' ऑपरेशन जारी रह सकते हैं और इस तरह के ऑपरेशन शी जिनपिंग को पसंद भी हैं. यानी, धीरे-धीरे दबाव बनाना और जरूरत पड़ने पर रुक जाना.
शी जिनपिंग का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान उन्हें 2012 में मिली दिक्कतों से भी जुड़ा है. तब रक्षा बजट लगातार बढ़ रहा था, और PLA के कई तरह के कारोबार ने भ्रष्टाचार को आम कर दिया था. फौज में तरक्की के लिए घूस चलती थी, नहीं तो कोई गॉडफादर. इसी के चलते कुछ मामलों में विदेशी खुफिया एजेंसियों ने भी PLA में गहरी पैठ बना ली.
इसके अलावा देंग शियाओपिंग के दौर जिस तरह से अफसरों को बार बार अलग अलग जगहों पर भेजते थे, वह लगभग एक दशक पहले बंद हो गया था. इससे कुछ अफसरों ने मोटा माल बनाया. मसलन, जब जनरल गु जुनशान के पुश्तैनी घर पर छापा पड़ा तो माओ की सोने की मूर्ति, सोने का वॉश बेसिन और महंगी शराब के बक्से सहित सोने का अंबार लगा था. इससे समझ सकते हैं कि उस दौर में भ्रष्टाचार का क्या आलम था. इसी वजह से शी जिनपिंग के लिए यह अभियान सिर्फ भ्रष्टाचार साफ करने का मामला नहीं है.
हो सकता है कि इनके पीछे गलवान की घटना में PLA को हुआ नुकसान हो. भारतीय नेतृत्व को इस पूरे अभियान को एक मौके के रूप में देखना चाहिए, खासकर PLA की सफाई. इस दौरान सीमा पर बुनियादी ढांचा मजबूत करने, सैन्य क्षमता बढ़ाने सहित कई तैयारियों का मौका मिल सकता है.
शी जिनपिंग ने इस बदलाव को खुलेआम दिखाया भी है. उन्होंने कुछ रिटायर हो चुके अफसरों पर भी कार्रवाई की, जैसे शेन जिनलोंग. वह चाहें तो झांग योउशिया जैसे लोगों को चुपचाप रिटायर होने दे सकते थे. लेकिन उन्होंने पहले झांग का इस्तेमाल किया, फिर उन्हें हटा दिया. यह 2022 की पार्टी कांग्रेस में हू जिंताओ के साथ हुए सुलूक की याद दिलाता है.
इस समय शी जिनपिंग की सत्ता पर कोई बड़ा खतरा नहीं दिखता. पार्टी के ज्यादातर पुराने नेता किनारे हो चुके हैं. जियांग जेमिन और ली केकियांग नहीं रहे, हू जिंताओ निकाले जा चुके, और वेन जियाबाओ चुप हैं. रिटायर हो चुके सैन्य अफसरों पर हुई कार्रवाई से ऊपरी तबकों में बेचैनी बढ़ी है. लेकिन एक दूसरी समस्या भी है. जिन अफसरों को शी जिनपिंग ने खुद ऊपर उठाया था, उनमें से कई को हटाना पड़ा. इससे लगता है कि शायद वे लोगों को पहचानने में उतने अच्छे नहीं हैं.
भारत के लिए यह बात दिलचस्प है कि वेस्टर्न थिएटर कमांड और शिनजियांग व तिब्बत सैन्य जिलों से जुड़े छह सीनियर PLA अफसरों को भी हटाया गया है. हे वेइदोंग, शू चीलिंग और झांग योउशिया जैसे पहले वेस्टर्न थिएटर कमांड काम करने वाले भी हटाए हैं. हो सकता है कि इनके पीछे गलवान की घटना में PLA को हुआ नुकसान हो. भारतीय नेतृत्व को इस पूरे अभियान को एक मौके के रूप में देखना चाहिए, खासकर PLA की सफाई. इस दौरान सीमा पर बुनियादी ढांचा मजबूत करने, सैन्य क्षमता बढ़ाने सहित कई तैयारियों का मौका मिल सकता है.
भारत और चीन एक-दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं इसलिए PLA के अंदर मौजूदा उथल-पुथल कुछ समय के लिए क्षेत्रीय स्थिरता ला सकती है लेकिन लंबे समय तक शांति बनाए रखने के लिए भारत को इस समय का इस्तेमाल अपनी सैन्य तैयारी बढ़ाने में करना होगा.
अतुल कुमार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में नैशनल सिक्यॉरिटी और चाइना स्टडी के फेलो हैं.
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Atul Kumar is a Fellow in Strategic Studies Programme at ORF. His research focuses on national security issues in Asia, China's expeditionary military capabilities, military ...
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