Expert Speak Raisina Debates
Published on Sep 11, 2025 Updated 0 Hours ago

ट्रंप द्वारा TRIPP कॉरिडोर को अमल में लाने के प्रयास ने आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच शांति का एक नया रास्ता तैयार किया है और साथ ही दक्षिण काकेशस की भू राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है. यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस कदम का रूस और ईरान विरोध कर सकते हैं.

TRIPP कॉरिडोर और काकेशस: अमेरिका, रूस और ईरान की टकराती महत्वाकांक्षाएँ

हाल के वर्षों में दुनिया भर में और विशेषकर यूरोप और मध्य पूर्व क्षेत्र में चल रहे संघर्षों ने लम्बे समय से चले आ रहे कुछ अन्य क्षेत्रीय संघर्षों को एक तरह से दरकिनार कर दिया है. एक तरफ जहां डोनाल्ड ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार हासिल करने के प्रयास में सक्रिय रूप से संघर्ष समाधान के अवसरों की तलाश में दिख रहे हैं वही 1990 के दशक से दक्षिण काकेशस को विभाजित करने वाले आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच के संघर्ष ने उन्हें इसके लिए एक नया अवसर दिया है.  

अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता में की गई संयुक्त घोषणा ने दक्षिण काकेशस क्षेत्र के लिए एक नई दिशा तय की है. इस संयुक्त घोषणा ने नागोर्नो-काराबाख के विवादित अर्मेनियाई क्षेत्र की संप्रभुता को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच सदियों से चली आ रही शत्रुता को समाप्त करने का काम किया है. इस संयुक्त घोषणा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें अर्मेनिया के रास्ते अज़रबैजान को उसके नखचिवन एन्क्लेव से जोड़ने वाले स्यूनिक क्षेत्र, जिसे ज़ंगेज़ूर कॉरिडोर भी कहा जाता है, में ट्रंप रूट फॉर इंटरनेशनल पीस एंड प्रोस्पेरिटी (TRIPP) की स्थापना की बात कही गई है. जैसा कि उम्मीद की जा रही थी, दक्षिण काकेशस क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति ने रूस और ईरान को अलग-अलग कारणों से नाराज़ करने का काम किया है. हालांकि, अभी यह देखना बाकी है कि क्या ट्रंप का ये नया दांव दीर्घकालिक रूप से आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच शांति सुनिश्चित कर पाएगा, लेकिन फिलहाल इस क्षेत्र में, जो ईरान के बहुत करीब है और जिसे रूस का पारंपरिक प्रभाव-क्षेत्र माना जाता है, अमेरिका को इस क्षेत्र में लेकर आने वाला हालिया समझौता दक्षिण काकेशस में नई वास्तविकताओं को जन्म ज़रूर देगा. 

 इस संयुक्त घोषणा ने नागोर्नो-काराबाख के विवादित अर्मेनियाई क्षेत्र की संप्रभुता को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच सदियों से चली आ रही शत्रुता को समाप्त करने का काम किया है. 

इस सात-सूत्रीय घोषणा में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और 1991 की अल्मा-अता घोषणा के तहत अतीत के संघर्षों से हटकर द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की बात कही गई है. समझौते में संघर्ष के समाधान के लिए बनाए गए यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन (OSCE) के मिन्स्क ग्रुप को तत्काल प्रभाव से भंग करने का आह्वान किया गया है. दक्षिण काकेशस में USA की बढ़ती रुचि संयुक्त घोषणा के तीसरी और चौथी पॉइंट में साफ़ झलकती है. यह घोषणा दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने का आह्वान करती हैं और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देश इस बात पर जोर देते हैं कि आर्मेनिया, TRIPP की स्थापना के लिए एक ढांचा विकसित करने के लिए USA के साथ काम करेगा. ट्रंप कॉरिडोर का विचार इससे पहले तुर्की में अमेरिकी राजदूत थॉमस बैरक द्वारा जुलाई में पेश किया गया था, जिन्होंने 99 साल की अवधि के लिए स्यूनिक प्रांत के एक हिस्से को अमेरिका को पट्टे पर देने की संभावना का उल्लेख किया था. इसके तहतअमेरिका को कॉरिडोर पर विशेष विकास के अधिकार की बात कही गई है जिससे दक्षिण काकेशस में उसकी स्थिति मजबूत होगी.

ईरान और रूस दोनों, हालांकि आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच शत्रुता के शांतिपूर्ण समाधान का स्वागत करते हुए, लेकिन, कॉरिडोर पर अमेरिका के नियंत्रण का विरोध कर रहे हैं. अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित तेहरान, ईरानी सीमा के पास ऐसे कॉरिडोर के निर्माण को अपनी संप्रभुता के लिए एक संभावित ख़तरे के रूप में देखता है. मास्को का आर्मेनिया में काफ़ी प्रभाव अब भी बना हुआ है जिसमें आर्मेनिया-तुर्की सीमा के पास ग्युमरी में एक सैन्य अड्डा शामिल है और आर्मेनिया के एकमात्र परमाणु संयंत्र मेट्सामोर के संचालन में उसकी केंद्रीय भूमिका भी उल्लेखनीय है. 

दक्षिण काकेशस में पनप रही नई भू-राजनीति

मास्को समर्थित यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU) का सदस्य होने के कारण येरेवन को समझौते की कम्पेटिबिलिटी के बारे में सवालों का सामना करना पड़ सकता है, विशेष रूप से गुड्स और सर्विसेज के मुक़्त आवागमन के संबंध में इसके आधारभूत कानून पर सवाल हो सकते हैं. कॉरिडोर पर अमेरिकी उपस्थिति और नियंत्रण सीमा पार से गुड्स और सर्विसेज की आवाजाही को प्रभावित कर सकता है. इसके अलावा, यह देखते हुए कि ईरान का EAEU के साथ एक मौजूदा मुक़्त व्यापार समझौता है और तेहरान की इस पहुँच में कोई भी नई बाधा उसके सामान्य सीमा शुल्क समझौते का उल्लंघन होगी. दक्षिणी काकेशस में रूस का अपना महत्व भी तेजी से बदल रहा है. उदाहरण के लिए, आर्मेनिया ने हाल के वर्षों में ईरान और तुर्की के साथ अपनी सीमाओं पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी खुद संभाल ली है, यह एक ऐसा काम है जो पहले रूसी सेना द्वारा किया जाता था. शायद, दक्षिण काकेशस में पनप रही नई भू-राजनीति पर बड़े सवाल इस बात से संबंधित हैं कि रूस एक ऐसे आर्मेनिया के साथ कैसे निपटेगा जो उसके प्रभाव-क्षेत्र से दूर जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. और यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त होने के बाद क्या नया होगा.

संघर्ष के समाधान और कनेक्टिविटी पर रूस की स्थिति परस्पर जुड़ी हुई है और इसे 2020 के रूस, अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच हुए संयुक्त समझौते में सबसे सही रूप से दर्शाया गया है. इस संयुक्त समझौते में नखचिवन को बाकू से जोड़ने वाले एक कॉरिडोर के निर्माण का आह्वान किया गया था. गौरतलब बात यह है कि आर्मेनिया और ईरान पारंपरिक रूप से ज़ंगेज़ूर कॉरिडोर के निर्माण का विरोध करता है क्योंकि उन्होंने अर्मेनियाई क्षेत्र के माध्यम से अज़रबैजान को एक्सेस प्रदान करने पर सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया था. हालांकि, TRIPP समझौते के बाद, स्थिति में काफ़ी बदलाव आया है और आर्मेनिया सैद्धांतिक रूप से अज़रबैजान को अपने क्षेत्र से ट्रांसिट प्रदान करने पर सहमत हो गया है. 

 इस संयुक्त घोषणा ने नागोर्नो-काराबाख के विवादित अर्मेनियाई क्षेत्र की संप्रभुता को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच सदियों से चली आ रही शत्रुता को समाप्त करने का काम किया है. 

यह बदलाव आंतरिक और बाहरी दोनों कारणों से प्रेरित लगता है. अगले साल आर्मेनिया में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों के साथ-साथ एक तेजी से बढ़ते राजनीतिक झगड़े ने आर्मेनिया सरकार के तख़्तापलट के डर को जन्म दिया है और इस बात ने पाशिनयान को समझौता करने के लिए मजबूर किया. दूसरी ओर, 2020 और 2023 में आर्मेनिया के ख़िलाफ़ अज़रबैजान के सफ़ल सैन्य अभियानों ने बाकू को येरेवन से अधिकतम मांगों पर जोर देने की हिम्मत दी है जो उसके घरेलू रुख़ का हिस्सा है. 2023 के संघर्ष में बाकू ने नागोर्नो-काराबाख पर पूर्ण सैन्य नियंत्रण हासिल कर लिया था. इन सबके बीच, मास्को, जो पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में एक संतुलन बनाने वाली शक्ति और आर्मेनिया का प्रमुख सहयोगी रहा है, यूक्रेन संघर्ष में उलझा हुआ था और इस तरह वह इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित करने या आर्मेनिया के हितों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने में असमर्थ रहा. इसके अतिरिक्त, दक्षिण काकेशस में अब तुर्की का प्रभाव भी बढ़ गया है और अब अंकारा बाकू का एक करीबी सहयोगी है और अज़रबैजान की हाल की सैन्य सफ़लताओं में देश के सैन्य आधुनिकीकरण में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण थी. इन बदलावों और एक क्षेत्रीय शक्ति की अनुपस्थिति के परिणामस्वरूप अर्मेनियाई विदेश नीति में एक नरम बदलाव आया है, जो मास्को से दूर जाने की राह पकड़ रहा है. पाशिनयान का लक्ष्य अज़रबैजान के साथ आर्मेनिया के संबंधों को सामान्य बनाना और यहां तक कि तुर्की के साथ संबंधों को बेहतर बनाना है, जो उसकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह की मजबूरियों को दर्शाता है. जून में, एक ऐतिहासिक यात्रा में, पाशिनयान ने इस्तांबुल में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से मुलाकात की और आपसी टकराव को हल करने के लिए राजनयिक समाधान का आह्वान किया. हालांकि घरेलू स्तर पर, इन बदलावों को अनुकूल दृष्टि से नहीं देखा जा रहा है और इसके पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए हैं और इस कारण पाशिनयान की राजनीतिक स्थिति भी कमज़ोर हुई है. 

दक्षिण काकेशस में एक नया पावर एक्सिस

ईरान और रूस द्वारा व्यक्त की गई स्पष्ट आशंकाओं के बावजूद, बाकू और येरेवन दक्षिण काकेशस में अमेरिकी उपस्थिति के माध्यम से बाहरी मध्यस्थता के साथ शर्तों पर आगे बढ़ने को तैयार लग रहे है. अगस्त 2025 में, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने पाशिनयान से मिलने के लिए आर्मेनिया का दौरा किया और दोनों नेताओं ने 10 समझौतों पर हस्ताक्षर किए और संबंधों को रणनीतिक साझेदारी की हद तक बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की. पाशिनयान ने ईरान को आश्वस्त किया कि प्रस्तावित कॉरिडोर अर्मेनियाई अधिकारियों के नियंत्रण में रहेगा, और ये आपसी व्यापार को मजबूत करने के लिए सीमा पर एक दूसरा पुल बनाने के लिए भी सहमत हुए. कुछ दिनों बाद, रूसी उप प्रधानमंत्री एलेक्सी ओवरचुक ने आर्मेनिया का दौरा किया और दक्षिण काकेशस में शांति प्रक्रिया का समर्थन किया और यह भी कहा कि रूस आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच कॉरिडोर के विवरण का अध्ययन करेगा. हालांकि येरेवन का यह नाजुक संतुलन फिलहाल तेहरान और मास्को को शांत कर सकता है लेकिन बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अमेरिकी भूमिका इस क्षेत्र में कैसे विकसित होती है. साथ ही बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान और बाद में अमेरिका से मिली गारंटी कैसे आकार बदलती है. यदि अगले राष्ट्रपति के आने के बाद अमेरिका का दृष्टिकोण बदलता है और रूस दक्षिण काकेशस पर फिर से ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होता है तो फिर इस क्षेत्र में एक नए जियोपोलिटिकल हकीकत के पनपने का अंदाजा है. अंत में एक बात और दिलचस्प है कि तुर्की-अज़रबैजान साझेदारी के मजबूत होने से दक्षिण काकेशस में एक नया पावर एक्सिस उभर कर सामने आया है. यह नया रिश्ता एक ऐसी राजनीति को जन्म दे रहा है जो अमेरिका या ईरान-रूस खेमे दोनों के साथ पूरी तरह से मेल नहीं खाता. ये सारी जटिलताएं ट्रंप की नई रणनीति के लिए जबरदस्त चुनौतियां पेश कर सकती हैं. 


विवेक मिश्रा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर हैं. 

राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में जूनियर फेलो हैं. 

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Authors

Vivek Mishra

Vivek Mishra

Vivek Mishra is Deputy Director – Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. His work focuses on US foreign policy, domestic politics in the US, ...

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Rajoli Siddharth Jayaprakash

Rajoli Siddharth Jayaprakash

Rajoli Siddharth Jayaprakash is a Junior Fellow with the ORF Strategic Studies programme, focusing on Russia’s foreign policy and economy, and India-Russia relations. Siddharth is a ...

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