द हेग में ऑन्ग सान सू ची की मौजूदगी का मतलब सियासी ज़्यादा है और मुक़दमे में इंसाफ़ के तराज़ू का संतुलन बनाए रखना कम है.
इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में म्यांमार के ख़िलाफ़ सामूहिक नरसंहार, बलात्कार और अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय को तबाह करने का मुक़दमा चल रहा है. इस में अपने देश की वक़ालत करने के लिए ख़ुद म्यांमार की नेता ऑन्ग सान सू ची वक़ीलों और क़ानून के जानकारों के एक बड़े दल को लेकर नीदरलैंड के द हेग शहर पहुंची हैं. म्यांमार के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र की सब से बड़ी अदालत में इन आरोपों को लेकर शिकायत की गई थी. ये आरोप पश्चिमी अफ्रीका के एक छोटे से देश जाम्बिया ने लगाए थे. जाम्बिया को ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानी ओआईसी के सदस्य देशों का समर्थन हासिल है. द हेग में इस मुक़दमे की सुनवाई 10 दिसंबर को शुरू हुई. ये इत्तेफ़ाक़ ही है कि 10 दिसंबर को दुनिया अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाती है.
म्यांमार इस समय दो क़ानूनी चुनौतियों का सामना कर रहा है. दोनों ही शिकायतें नवंबर में दर्ज कराई गई थीं. दोनों अर्ज़ियों में ही म्यांमार पर अपने यहां के अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय पर ज़ुल्म ढाने के आरोप हैं. इन में से एक शिकायत में लैटिन अमेरिकी देश अर्जेंटीना में वहां के मानवाधिकार संगठनों ने म्यांमार और इस की नेता ऑन्ग सान सू ची पर यूनिवर्सिल जुरिस्डिक्शन फॉर क्राइम के ऊपर आरोप लगाए हैं. वहीं, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में जाम्बिया की तरफ़ से दर्ज कराई गई शिकायत, अर्जेंटीना में चल रहे मुक़दमे के बाद दर्ज कराई गई है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि मुक़दमों के दौरान म्यांमार की स्टेट काउंसेलर ऑन्ग सान सू ची की मौजूदगी से क्या इस मुक़दमे के नतीजे पर कोई फ़र्क़ पड़ेगा?
ऑन्ग सान सू ची के कार्यालय ने तर्क दिया है कि म्यांमार की राज्य सलाहकार अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ की रक्षा के लिए द हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय गई हैं. कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ऑन्ग सान सू ची का अपने बचाव में तर्क देना अहम है. क्योंकि ऐसा पहली बार है जब अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय पर ज़ुल्म ढाने के आरोप में द हेग में म्यांमार पर मुक़दमा चलाया जा रहा है. ऐसे में ऑन्ग सान सू ची अपने समर्थकों के बीच ये संकेत देना चाहती हैं कि द हेग में चल रहे मुक़दमे में वो ही सब से बेहतर ढंग से अपने देश और राष्ट्रीय हितों का बचाव कर सकती हैं.
ऑन्ग सान सू ची को उम्मीद है कि वो देश की सत्ता पर अपनी पार्टी की पकड़ मज़बूत करेंगी. ताकि, अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी पार्टी फिर से जीत हासिल कर सके.
ऐसा लगता है कि द हेग में चल रहे मुक़दमे में म्यांमार के बचाव के लिए ख़ुद मौजूद रह कर ऑन्ग सान सू ची दो मक़सद पूरे करना चाहती हैं. पहला तो ये कि, वो अपने देश के ख़िलाफ़ मुक़दमे में पहुंच कर इसे राष्ट्रीय गौरव का मुद्दा बना कर पेश करेंगी, ताकि अपने देश में राष्ट्रवादी जज़्बातों को उभार सकें. द हेग में म्यांमार पर चल रहा मुक़दमा बेहद शर्मिंदगी का मौक़ा है. लेकिन, ऑन्ग सान सू ची इस अवसर को इस तरह भुनाना चाहती हैं कि इस से विश्व स्तर पर म्यांमार का सम्मान बढ़े और देश की जनता इस पर गर्व करे. ऐसा कर के ऑन्ग सान सू ची को उम्मीद है कि वो देश की सत्ता पर अपनी पार्टी की पकड़ मज़बूत करेंगी. ताकि, अगले साल होने वाले आम चुनाव में उनकी पार्टी फिर से जीत हासिल कर सके.
दूसरी बात ये है कि इस मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कठघरे में खड़े हो कर सू ची दुनिया को ये संदेश देना चाहती हैं कि भले ही अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के मसले को लेकर दुनिया उनके ख़िलाफ़ हो, मगर वो अपने रुख़ पर अटल हैं. इससे पहले 2017 में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान के बाद, सू ची ने अपनी सेना का बचाव किया था. तब उन्होंने कहा था कि उनका देश इस मामले में अंतरराष्ट्रीय समीक्षा से बिल्कुल भी नहीं घबराता. सू ची ने ये भी कहा था कि ये म्यांमार को तय करना है कि उस पर जो आरोप लग रहे हैं वो सबूतों पर आधारित हैं, या फिर हवा में लगाए जा रहे हैं. लेकिन, उस साल म्यांमार की राष्ट्रीय सलाहकार सू ची ने रोहिंग्या मसले पर दुनिया भर में मचे शोर शराबे की वजह से न्यूयॉर्क में हुए संयुक्त राष्ट्र महाधिवेशन में हिस्सा नहीं लिया था.
अब ऑन्ग सान सू ची का द हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चल रहे मुक़दमे में शामिल होने का फ़ैसला, उन के अंतरराष्ट्रीय मंचों से दूर रहने के फ़ैसले के ठीक उलट है. क्योंकि तब सू ची ने ख़ास तौर से संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मंचों से दूरी बनाने का निर्णय किया था. अगस्त 2017 में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान के बाद से ऑन्ग सान सू ची के विदेश दौरे आसियान प्लस 6 देशों तक ही सीमित रहे हैं.
ऐसी संभावना जतायी जा रही है कि द हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ऑन्ग सान सू ची और विशेषज्ञों की उनकी टीम ये तर्क देगी कि ये मसला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. वो अदालत को ये समझाने की कोशिश भी करेंगे कि अगस्त 2017 का सैन्य अभियान अराकान रोहिंग्या सॉलिडैरिटी एसोसिएशन नाम के आतंकवादी संगठन के ख़िलाफ़ था, न कि अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़. उनकी तरफ़ से ये तर्क भी दिए जाने की उम्मीद है कि अगर अगस्त 2017 के अभियान के दौरान अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ म्यांमार की सेना ने कोई ज़्यादती की थी, तो उस की जांच सू ची की सरकार कर रही है.
जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में म्यांमार के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाया गया था, तो चीन और रूस के अलावा आठ अन्य देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.
इसी बीच, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने 7 दिसंबर को म्यांमार का दौरा किया और ऑन्ग सान सू ची के अलावा म्यांमार के राष्ट्रपति विन मिन्ट से मुलाक़ात की. इस बात की पूरी संभावना है कि अपने दौरे में चीन के विदेश मंत्री ने द हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार के ख़िलाफ़ मुक़दमे को लेकर भी चर्चा की होगी. यहां ये याद रखना होगा कि जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में म्यांमार के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाया गया था, तो चीन और रूस के अलावा आठ अन्य देशों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. संयुक्त राष्ट्र इस प्रस्ताव में म्यांमार से अपील की गई थी कि वो अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान रोके और हालात की पड़ताल के लिए संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष दूत को अपने यहां का दौरा करने की इजाज़त दे.
द हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में म्यांमार के ख़िलाफ़ मुक़दमे की अगुवाई जाम्बिया के उत्साही मंत्री अबू बकर तंबादुई करेंगे. तंबादुई को रवांडा में हुए नरसंहार की एक दशक तक जांच करने का तजुर्बा है. तंबादुई, इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी के उस प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे, जिस ने 2017 में बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैम्प का दौरा किया था. इस शरणार्थी सिविर में म्यांमार से भागे रोहिंग्या समुदाय के सब से ज़्यादा लोग पनाह लिए हुए हैं. ये लोग बांग्लादेश से लगे पश्चिमी म्यांमार के रखाइन सूबे से भाग कर यहां आए हैं.
सू ची की राजनीतिक बयानबाज़ी और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उनकी मौजूदगी से म्यांमार को अपने ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे में नैतिक समर्थन हासिल हुआ है. द हेग में ऑन्ग सान सू ची की मौजूदगी का मतलब सियासी ज़्यादा है और मुक़दमे में इंसाफ़ के तराज़ू का संतुलन बनाए रखना कम है.
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Mihir Bhonsale was a Junior Fellow in the Strategic Studies Programme and Indian Neighbourhood Initiative of ORF. ...
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