Author : Arya Roy Bardhan

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 03, 2026 Updated 6 Days ago

अब चारों नई श्रम संहिताएं लागू हो गई हैं जिनका उद्देश्य कामगारों को बेहतर अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कामकाजी माहौल देना है लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या इनका लाभ असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों तक पहुंच पाता है या ये सुधार सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह जाते हैं.

नए लेबर कोड लागू, क्या बदलेगी मजदूरों की दुनिया?

मज़दूर दिवस के कुछ दिनों के बाद, 8 और 9 मई को केंद्र सरकार ने 30 से अधिक गैज़ेट अधिसूचनाएं जारी कीं, जो चार श्रम संहिताओं को लागू किए जाने से जुड़ी थीं. इनमें वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कामकाजी माहौल से जुड़े प्रावधान शामिल थे. इन नियमों के साथ ही 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को एक ही ढांचे में शामिल करने की प्रक्रिया भी पूरी हो गई. हालांकि, यह सुधार है या सिर्फ़ पुराने कानूनों को नए तरीके से लागू कर दिया गया है, इसका जवाब इस सवाल में छिपा है कि ये श्रम संहिताएं उस बाज़ार के लिए कितनी फ़ायदेमंद हैं, जिनके लिए इनको बनाया गया है?

आंकड़ों की ज़ुबानी

हालिया सालाना आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) से यह पता नहीं चलता कि भारतीय अर्थव्यवस्था श्रम बल का उपयोग करने में कितना सक्षम है. श्रम बल में भागीदारी निश्चय ही सुधरी है. पिछले दशक में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है और बेरोज़गारी दर कम हुई है. लेकिन यही बाज़ार बहुत हद तक कृषि, पारिवारिक उद्यमों, स्वरोज़गार, बिना मज़दूरी के काम और छोटे-छोटे उद्यमों पर ही निर्भर है. भारतीय रोज़गार को लेकर सवाल अब यह है कि क्या यहां काम सुरक्षित व लाभदायक है, और क्या वे कामगारों को अधिक उत्पादक गतिविधियों की ओर ले जा पा रहे हैं.

यह सुधार है या सिर्फ़ पुराने कानूनों को नए तरीके से लागू कर दिया गया है, इसका जवाब इस सवाल में छिपा है कि ये श्रम संहिताएं उस बाज़ार के लिए कितनी फ़ायदेमंद हैं, जिनके लिए इनको बनाया गया है?

नई श्रम संहिताओं के बाद यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. नियोक्ता, प्रतिष्ठान और रजिस्टर के आधारित कानून तभी अच्छा काम करते हैं, जब श्रमिक उन उद्यमों से जुड़े हों, जहां उनको पहचान मिले. PLFS से पता चलता है कि श्रमिकों का बड़ा हिस्सा इसके बजाय स्वरोज़गार, कृषि, बिना वेतन वाले पारिवारिक काम और अति सूक्ष्म उद्यमों में लगा हुआ है.

चित्र 1- LFPR और WPR

Will The Labour Codes Reach The Market They Govern

Source: PLFS

एक देश, कई श्रम बाज़ार

चित्र 1 में ग्रामीण बेरोज़गारी कम दिख रही है, तो इसका एक कारण यह है कि कृषि और घरेलू उद्यम आर्थिक अस्थिरता को कम करने का काम करते हैं. शहरी बेरोज़गारी अधिक है, क्योंकि कामगारों की शिक्षा, प्रवासन और वेतनभोगी रोज़गार की उपलब्धता के आधार पर ही शहरों में काम मिलता है. एक युवा, शिक्षित शहरी महिला और गांव में बिना वेतन के पारिवारिक काम करने वाली कामगार एक जैसी लग सकती हैं, भले ही उनकी आर्थिक परिस्थितियां बहुत अलग हों.

इसलिए गुणवत्तापूर्ण काम ही मुख्य आधार बन जाता है. ज़्यादातर घरों के लिए ‘अच्छी नौकरी’ का मतलब है, नियमित वेतन वाली नौकरी, फिर भी अलग-अलग वर्गों तक इसकी पहुंच अलग-अलग है. संपन्न परिवारों में वेतनभोगी रोज़गार में लगे सदस्यों की संख्या कहीं अधिक होती है, जबकि गरीब परिवार दिहाड़ी मज़दूरी, स्वरोज़गार और जीवन बसर करने लायक कामकाज पर निर्भर होता है.

महिला कामगार बिना वेतन वाले पारिवारिक कामों में ज़्यादा हैं, जबकि पुरुष नियमित-वेतन वाले क्षेत्र में. स्वरोज़गार में भी पुरुषों की हिस्सेदारी अधिक है. ग्रामीण भारत में श्रमिकों को काम अधिक मिलता है, लेकिन वहां काम आमतौर पर कम-उत्पादकता वाले हैं.

श्रम बाज़ार में असमानता वेतन के स्तर से नहीं, बल्कि नौकरी के प्रकार से ही शुरू हो जाती है. यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नियमित वेतन वाली नौकरी का मतलब हमेशा औपचारिक श्रम बल नहीं होता.

चित्र 2- आय-वर्गों के बीच कामकाज का बंटवारा

Will The Labour Codes Reach The Market They Govern

Source: PLFS

सभी आर्य-वर्गों को काम तो मिलता है, लेकिन अच्छे वेतन वाला काम संपन्न परिवारों में अधिक दिखता है. श्रम बाज़ार की मुश्किलें महिलाओं के रोज़गार से और बढ़ जाती हैं. महिला कामगार बिना वेतन वाले पारिवारिक कामों में ज़्यादा हैं, जबकि पुरुष नियमित-वेतन वाले क्षेत्र में. स्वरोज़गार में भी पुरुषों की हिस्सेदारी अधिक है. ग्रामीण भारत में श्रमिकों को काम अधिक मिलता है, लेकिन वहां काम आमतौर पर कम-उत्पादकता वाले हैं. शहरी भारत में नियमित रोज़गार अधिक है, लेकिन महिलाएं और नौजवानों के लिए इसे पाना मुश्किल है.

चित्र 3- लिंग के आधार पर काम

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Source: PLFS

कानून कहां लागू होते हैं, कहां नहीं

इस लेख में जिन PLFS इकाई-स्तरीय अनुमानों की मैंने चर्चा की है, उनमें 57.8 प्रतिशत नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों के पास कामकाज से जुड़ा कोई लिखित अनुबंध नहीं था, 47.5 प्रतिशत वेतन के साथ छुट्टी नहीं पा सकते थे और 51.4 प्रतिशत के पास सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं था. यहीं पर नए कानून महत्वपूर्ण हो सकते हैं- नियुक्ति पत्र, सामान्य वेतन रिकॉर्ड और बेहतरी के लिए पुरानी नौकरी छोड़ने का अधिकार इन ‘नियमित’ रोज़गार को गुणवत्तापूर्ण नौकरियों में बदल सकते हैं. 

नए कानून में इन सब पर ध्यान दिया भी गया है. जैसे- सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर को पेंशन, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा का लाभ दिया गया है. वेतन की मानक परिभाषा, न्यूनतम वेतन, अनिवार्य नियुक्ति पत्र और पांच वर्ष के बजाय एक वर्ष के बाद ही ग्रेच्युटी का लाभ औपचारिक व आंशिक-औपचारिक नौकरियों के बीच का अंतर कम करेगा. इसी तरह, आधार लिंक्ड यूनिवर्सल अकाउंट नंबर और ई-श्रम पंजीकरण भारतीय श्रम नीति की पुरानी ख़ामियों को दूर करते हैं. फिर भी, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा इस दायरे से बाहर है. 

इसी तरह, औद्योगिक संबंध संहिता में 300 कर्मचारियों की सीमा बनाई गई है, जिसके नीचे कंपनियां बिना सरकारी मंजूरी के छंटनी कर सकती हैं. इसी कारण कंपनियां छोटे आकार की ही बनी रहना चाहेंगी. व्यावसायिक सुरक्षा संहिता में 10 कर्मचारियों की सीमा होने के कारण, घरेलू और सूक्ष्म उद्योगों के कामगारों का बड़ा हिस्सा इस सुरक्षा दायरे से बाहर है. अंशदानों में एकरूपता लाने के लिए वेतन का मानक ज़रूर तय किया गया है, लेकिन EPF और ESI  आधारों पर इसका प्रभाव हर कंपनी के हिसाब से अलग-अलग है. वहीं, नियम-पालन सुनिश्चित करने के लिए वेब-आधारित निरीक्षण और खुद से प्रमाणित करने की व्यवस्था की गई है, पर इससे उन ज़गहों की निगरानी कठिन हो सकती है, जहां श्रमिक अपने कानूनी अधिकारों का दावा करने में सबसे कम सक्षम होते हैं.

वेतन संहिता में भी समानता के नियम लागू किए गए हैं. सामाजिक सुरक्षा संहिता में न सिर्फ़ 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश बना हुआ है, बल्कि मातृत्व के बाद ‘वर्क फ्रॉम होम’ का भी प्रावधान है. फिर भी, दिक्क़त यह है कि ये संहिताएं औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के बहुत छोटे हिस्से पर ही लागू हो सकेंगी.

एंटरप्राइज का आकार भी समस्याएं पैदा करता है. इकाई-स्तरीय PLFS अनुमान बताते हैं कि इनमें 74.5 प्रतिशत स्थायी कामगार वहां काम करते हैं, जिस एंटरप्राइज में छह से कम कर्मचारी हैं, और 9.1 प्रतिशत कामगार वहां, जहां छह से नौ कर्मी काम करते हैं. इसका अर्थ है कि श्रम बाज़ार का ज़्यादातर हिस्सा उन सीमाओं से नीचे या उनके आस-पास ही है, जहां से प्रतिष्ठान-आधारित नियम लागू होते हैं.

इन संहिताओं के लागू होने से अब सशर्त समानता की बातें भी होने लगी हैं. जैसे- जहां पहले महिलाओं को रात में काम करने से रोका जाता था, वहीं अब सुरक्षित कामकाजी माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी नियोक्ता पर डाली गई है. वेतन संहिता में भी समानता के नियम लागू किए गए हैं. सामाजिक सुरक्षा संहिता में न सिर्फ़ 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश (वेतन के साथ) बना हुआ है, बल्कि मातृत्व के बाद ‘वर्क फ्रॉम होम’ का भी प्रावधान है. फिर भी, दिक्क़त यह है कि ये संहिताएं औपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के बहुत छोटे हिस्से पर ही लागू हो सकेंगी.

कामगारों को मिले लाभ

ऐसे में, सवाल यही है कि उन कानूनों को उस बाज़ार के लिए कारगर कैसे बनाया जाए, जिनके लिए उनको बनाने का दावा किया गया है. 

पहला उपाय- रोज़गार की गुणवत्ता, यानी- अनुबंध, वेतन के साथ अवकाश, सामाजिक सुरक्षा, कामकाज के घंटे, उद्यम का आकार, साथ ही भागीदारी व बेरोज़गारी आदि पर नज़र रखने के लिए नई डिजिटल संरचना का उपयोग किया जाए।

दूसरा- औपचारिक सीमा के आसपास ही नहीं, बल्कि उससे नीचे तक भी नियम लागू होने चाहिए. निचले दर्जे के उद्यमों के लिए पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा बाध्यकारी शर्त होनी चाहिए. 

तीसरा- महिलाओं से जुड़ी ख़ास समस्याएं, जैसे बच्चे की देखभाल, सुरक्षित परिवहन, आवास, देखभाल सेवाएं और गैर-कृषि कार्य को श्रम बाज़ार की नीतियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, न कि कल्याणकारी योजनाओं का.

चौथा- अप्रेंटिसशिप और औद्योगिक संबंध संहिता के ‘री-स्किलिंग फंड’ को एक भरोसेमंद आधार बनाना चाहिए. 

और आखिरी उपाय, ‘श्रम’ चूंकि समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्य-स्तर पर इसका लागू होना ही यह तय करेगा कि ये कोड एक व्यवस्थित सुधार हैं या सिर्फ़ अलग-अलग टुकड़ों के जोड़.

साफ है, ये संहिताएं कामगारों के जीवन में बदलाव ला सकती हैं, लेकिन तभी, जब इनको उस अनौपचारिक क्षेत्र तक पहुंचाया जाएगा, जिसकी सेवा करने का ये दावा करती हैं.


आर्य रॉय बर्धन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में जूनियर फेलो हैं.

[1] Unless otherwise stated, PLFS figures used here draw on the 2025 Annual Report and the unit-level first-visit files analysed for this article; the 2025 redesign makes the survey more useful for current labour-market monitoring, but also requires caution when comparing with earlier PLFS rounds.

[2] Unpaid family workers are individuals who work without explicit monetary compensation in a market-oriented business, farm, or enterprise operated by a relative living in the same household. While they contribute directly to economic activity, they frequently lack employment contracts, social protection, and recognized worker representation.

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