Author : Andreas Kuehn

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 06, 2026 Updated 1 Days ago

एआई की दौड़ अब सिर्फ नई तकनीक बनाने की नहीं रही. असली मुकाबला इस बात का है कि दुनिया किसका टेक सिस्टम और किस तरह के नियम अपनाती है. चीन की तेज प्रगति ने अमेरिका को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर किया है. इस रणनीति में भारत की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है. लेकिन क्या अमेरिका और भारत अपने मतभेद पीछे छोड़कर एआई सहयोग को आगे बढ़ाएंगे? 

एआई में साथ क्यों आ रहे हैं अमेरिका और भारत

एआई की रेस जीतने में अमेरिका के लिए भरोसेमंद साझेदारों और दोस्तों के साथ रिश्ते अब बहुत अहम हो गए हैं. एआई में आगे कौन है, यह अब सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि सबसे ताकतवर मॉडल किसने बनाया. असली बात यह है कि दुनिया में किसका तकनीकी ढांचा और कैसे नियम अपनाए जाते हैं. ट्रंप सरकार के एआई एक्शन प्लान में यह बात साफ है. इसमें बताया है कि अमेरिकी तकनीक को दुनिया में फैलाने के लिए दूसरे देशों के साथ मिलकर काम करना जरूरी है. साथ ही एआई तकनीक को बाहर भेजना भी जरूरी है. इस सोच के पीछे सबसे बड़ी वजह चीन है. चीन ने बहुत तेजी से अपनी तकनीकी ताकत बढ़ाई है. चीनी कंपनियों ने भी मजबूत एआई मॉडल बनाए हैं. कई मामलों में उनका काम लगभग बराबरी का है और कीमत भी कम है.

अमेरिकी अगुवाई में बनने वाले तकनीकी समझौते सरकारों के बीच तकनीक से जुड़े मसलों पर बनते हैं. ये दो देशों के बीच भी हो सकते हैं और कुछ गिने-चुने देशों के छोटे ग्रुपों में भी. इनका मकसद जरूरी तकनीक से जुड़े फैसलों में तालमेल बैठाना है. साथ ही सप्लाई चेन, निर्यात नियम और तकनीक के मानकों पर मिलकर काम करना भी इसका हिस्सा होता है. एआई पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर टिका है. इसमें जरूरी खनिज, एडवांस चिप, डेटा सेंटर और बिजली सब शामिल हैं. इसलिए अमेरिका को इन तकनीकी समझौतों का इस्तेमाल करना चाहिए.

भारत के पास बड़ी संख्या में हुनरमंद लोग हैं. एआई को सिखाने के लिए बहुत बड़ा और अलग-अलग तरह का डेटा है. दूसरी तरफ अमेरिका के पास रिसर्च और डिवेलपमेंट की ताकत है. एडवांस एआई और सेमीकंडक्टर बनाने की क्षमता है. बड़े स्तर पर निवेश करने के लिए पैसा है.

इस पूरी रणनीति में भारत की अलग और खास जगह हो सकती है. भारत का बड़ा बाजार है, बड़ी वर्कफोर्स है. भारत की पहुंच ग्लोबल साउथ के कई देशों तक है. फिर भारत ने बड़े पैमाने पर तकनीक इस्तेमाल करने का अनुभव भी दिखाया है. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर इसका उदाहरण है. भारत के पास बड़ी संख्या में हुनरमंद लोग हैं. एआई को सिखाने के लिए बहुत बड़ा और अलग-अलग तरह का डेटा है. दूसरी तरफ अमेरिका के पास रिसर्च और डिवेलपमेंट की ताकत है. एडवांस एआई और सेमीकंडक्टर बनाने की क्षमता है. बड़े स्तर पर निवेश करने के लिए पैसा है. इन दोनों देशों की साझेदारी से एआई को तेजी से बढ़ाया जा सकता है. अमेरिका को उम्मीद है कि भारत के साथ साझेदारी से उसकी एआई तकनीक दूसरे देशों तक भी पहुंचेगी.

परमाणु तकनीक से एआई ढांचे तक अमेरिका-भारत सहयोग

तकनीक लंबे समय से अमेरिका और भारत के रिश्तों का अहम हिस्सा रही है. 2008 में दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर सहयोग पर '123 एग्रीमेंट' हुआ था. इस समझौते से अमेरिका को भारत को परमाणु तकनीक देने का कानूनी रास्ता मिला. फिर यह रिश्ता धीरे-धीरे रक्षा, अंतरिक्ष और हाई-टेक कारोबार तक फैल गया. 2020 में ट्रंप सरकार ने अमेरिका-भारत रिश्ते को 'कॉम्प्रिहेंसिव ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दिया. इसकी बुनियाद लोकतंत्र पर और चीन के बढ़ते असर की चिंता पर टिकी थी.

बाइडेन सरकार के वक्त 2022 में अमेरिका-भारत इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी यानी iCET शुरू हुआ. इसमें एआई, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और एडवांस कम्युनिकेशन को केंद्र में थे. बाद में ट्रंप-2.0 शासन ने इसे जारी रखा, लेकिन नाम बदलकर 'यूएस-इंडिया ट्रस्ट इनिशिएटिव' कर दिया. इसमें एआई पर ज्यादा ध्यान दिया गया. साथ ही प्राइवेट कंपनियों के साथ मिलकर 'यूएस-इंडिया रोडमैप ऑन एक्सेलेरेटिंग एआई इंफ्रास्ट्रक्चर' बनाने की बात कही गई. साफ था कि अमेरिका की एआई रणनीति में भारत की जगह अहम है.

2020 में ट्रंप सरकार ने अमेरिका-भारत रिश्ते को 'कॉम्प्रिहेंसिव ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दिया. इसकी बुनियाद लोकतंत्र पर और चीन के बढ़ते असर की चिंता पर टिकी थी.

हालांकि दूसरे ट्रंप-2.0 शासन की शुरुआत में दोनों देशों के रिश्ते ठीक रहे, लेकिन जल्दी ही तनाव बढ़ गया. अमेरिका के टैरिफ, भारत का रूसी तेल खरीदना और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोकने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान जैसे मुद्दों पर मतभेद बढ़े. इन राजनीतिक तनावों की वजह से तकनीक सहयोग का एजेंडा अचानक रुक गया.

फिर से आगे बढ़ने की कोशिश

तनाव कम करने की दिशा में एक अहम कदम 6 फरवरी, 2026 को दिखा. उस दिन एक अस्थायी व्यापार समझौते का ढांचा घोषित किया गया. इसमें कहा गया कि आगे चलकर दोनों देश बड़े व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखेंगे. व्हाइट हाउस ने कहा कि वह भारत पर लगा टैरिफ कम करेगा और रूसी तेल खरीद से जुड़े एक्सट्रा पेनाल्टी वाले टैरिफ भी हटाएगा. संयुक्त बयान में टेक प्रॉडक्ट का व्यापार बढ़ाने और संयुक्त प्रौद्योगिकी सहयोग का भी जिक्र था. मसलन, डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले जीपीयू का नाम लिया गया.

इसके अलावा 2025 के आखिर और 2026 की शुरुआत में कुछ और घटनाओं ने अमेरिका-भारत तकनीक सहयोग को फिर से गति दी. 12 दिसंबर, 2025 को 'पैक्स सिलिका' पहल शुरू हुई. इसका मकसद अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच भरोसेमंद एआई माहौल बनाना और निवेश बढ़ाना था. 20 फरवरी, 2026 को भारत इस पहल का दसवां मेंबर बना. इससे संकेत मिला कि भारत की सरकारी संस्थाएं और टेक कंपनियां भरोसेमंद एआई माहौल बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

2025 के आखिर और 2026 की शुरुआत में कुछ और घटनाओं ने अमेरिका-भारत तकनीक सहयोग को फिर से गति दी. 12 दिसंबर, 2025 को 'पैक्स सिलिका' पहल शुरू हुई. इसका मकसद अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच भरोसेमंद एआई माहौल बनाना और निवेश बढ़ाना था.

हाल ही में भारत ने 2026 एआई इम्पैक्ट समिट की मेजबानी भी की. इससे भारत की एआई महत्वाकांक्षा और अंतरराष्ट्रीय असर साफ दिखा. इस समिट में दुनिया भर की सरकारें, कंपनियां और एआई विशेषज्ञ शामिल हुए. भारत ने इसमें खास तौर पर ग्लोबल साउथ के देशों को एआई चर्चा में शामिल करने पर जोर दिया. साथ ही एआई के असली इस्तेमाल पर ध्यान दिया गया.

बदले हालात में कैसे हो एआई सहयोग

हालात बदलने के साथ अमेरिका-भारत एआई सहयोग को फिर से मजबूत करने का मौका बना है. इसके लिए एक साफ रास्ता भी सामने है. ORF अमेरिका और स्पेशल कॉम्पिटिटिव स्टडीज प्रॉजेक्ट ने मिलकर 'यूएस-इंडिया एआई एंड इमर्जिंग तकनीक कॉम्पैक्ट' नाम का दस्तावेज जारी किया है. इसमें चार मुख्य आधार बताए गए हैं. सोच सीधी है. अगर साझेदारी से असली नतीजे मिलते हैं तो एआई तेजी से बढ़ सकता है. इसके लिए असली इस्तेमाल, मजबूत ढांचा, कुशल लोग और साफ नियम जरूरी हैं.

पहला कदम यह होना चाहिए कि एआई का इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में दिखे जहां उसका असर साफ नजर आए. इसमें सरकारी सेवाएं, स्वास्थ्य, खेती और साइबर सुरक्षा शामिल हैं. इसके लिए सरकार और प्राइवेट कंपनियों की साझेदारी में पायलट प्रोजेक्ट चल सकता है. जहां नतीजे अच्छे हों, वहां उसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है.

दूसरा, अमेरिका और भारत को मिलकर तकनीक का पूरा ढांचा बनाना चाहिए. इसमें कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा, बिजली और कूलिंग सब शामिल हो. अगर ढांचा मजबूत नहीं होगा तो सहयोग आगे नहीं बढ़ पाएगा.

तीसरा, दोनों देशों को हुनरमंद लोगों की तैयारी पर ध्यान देना चाहिए. इसमें ट्रेनिंग, अप्रेंटिसशिप और साझा रिसर्च प्रोग्राम हो सकते हैं. इससे भविष्य की इंडस्ट्री की मांग पूरी करने वाले लोग तैयार होंगे.

चौथा, दोनों देशों की नीतियों और नियमों में तालमेल जरूरी है. इसमें भरोसेमंद डेटा साझा करने का ढांचा, साफ मालिकाना हक और तकनीक के मानकों पर सहमति शामिल होनी चाहिए. इससे कारोबार और तकनीक का सहयोग आसान होगा. क्योंकि आज भी कंपनियों के लिए लालफीताशाही बड़ी चिंता बनी हुई है.

साझा लक्ष्य है एआई का फैलाव  

अमेरिका-भारत एआई सहयोग को एक साझा परियोजना की तरह देखा जा सकता है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि एआई का अगला दौर भरोसेमंद तकनीक और मजबूत ढांचे पर चले. साथ ही नियमों में तालमेल, एक जैसे मानक और मजबूत सप्लाई चेन भी हों.

एआई में नेतृत्व अब सिर्फ बड़े मॉडल से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से तय होगा. अमेरिका-भारत टेक साझेदारी दुनिया की एआई व्यवस्था को आकार देने में अहम भूमिका निभा सकती है. यह तय कर सकती है कि दुनिया का तकनीक सिस्टम बिखरा रहेगा, या फिर मजबूत, भरोसेमंद और डेमोक्रेटिक एआई ढांचे पर चलेगा.

भारत में हुए एआई इम्पैक्ट समिट ने दिखा दिया कि देश अब एआई की दुनिया में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है. वैश्विक कंपनियों और सरकारों की मौजूदगी ने इस दिशा को और स्पष्ट किया. माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों के भारी निवेश ने संकेत दिया है कि भारत एआई ढांचे के लिए तेजी से उभरता हुआ केंद्र बन रहा है.

माइक्रोसॉफ्ट ने एआई और डेटा सेंटर ढांचे में 17.5 अरब डॉलर निवेश की घोषणा की है. अमेजन ने 2030 तक बड़े निवेश की योजना बनाई है. गूगल ने भी एआई ढांचा बनाने के लिए बड़े निवेश का एलान किया है. भारत की अडानी ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों ने भी साझेदारी बढ़ाई है. ओपनएआई और एंथ्रोपिक ने भारत में दफ्तर खोले हैं. ओपनएआई ने यह भी कहा है कि भारत जल्द ही उसका सबसे बड़ा बाजार बन सकता है.

साझा लक्ष्य है एआई का फैलाव  

अगर अमेरिका और भारत हाल के राजनीतिक मतभेद पीछे छोड़ दें और एआई के इस्तेमाल, ढांचे, प्रतिभा और नियमों में जल्दी नतीजे दिखा दें, तो अमेरिका-भारत तकनीक गठजोड़ एआई बढ़ाने का मजबूत आधार बन सकता है. एआई में नेतृत्व अब सिर्फ बड़े मॉडल से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से तय होगा. अमेरिका-भारत टेक साझेदारी दुनिया की एआई व्यवस्था को आकार देने में अहम भूमिका निभा सकती है. यह तय कर सकती है कि दुनिया का तकनीक सिस्टम बिखरा रहेगा, या फिर मजबूत, भरोसेमंद और डेमोक्रेटिक एआई ढांचे पर चलेगा.


डॉ. एंड्रियास कुएन ओआरएफ अमेरिका में सीनियर फेलो हैं.

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Andreas Kuehn is Senior Fellow, Observer Research Foundation America. He oversees ORF America’s Technology Policy Program, and leads ORF’s US-India AI Fellowship Program. ...

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