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थियेटराइजेशन क्या है और इसे अपनाने में सीमाएँ क्या हैं, यह लेख इन्हीं पहलुओं को सामने लाता है. साथ ही यह बताया गया है कि सफल सुधार के लिए पहले मज़बूत एकीकरण पर ध्यान क्यों देना ज़रूरी है.
भारत की सशस्त्र सेनाओं में बेहतर तालमेल और तेज़ सुधार के लिए केवल थियेटराइजेशन ही समाधान नहीं है. करीब एक दशक से इस दिशा में कोशिशें हो रही हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर ठोस नतीजे नहीं दिखे हैं. ऐसे में ज़रूरत है कि सभी राजनीतिक दल और सैन्य नेतृत्व मिलकर इस पर गंभीर आत्ममंथन करें. थियेटराइजेशन की मौजूदा प्रक्रिया 2014 और 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई संयुक्त कमांडर सम्मेलनों के बाद शुरू हुई थी. उस समय यह महसूस किया गया कि सेनाओं में आपसी समन्वय की कमी है और प्रशासनिक बोझ अधिक है. लक्ष्य था-सेनाओं का बेहतर एकीकरण कर संसाधनों का सही उपयोग करना ताकि देश के विकास के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें.
पिछले बीस वर्षों में एकीकरण की दिशा में कुछ अहम कदम उठे हैं. इनमें मुख्यालय इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) की स्थापना, स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड (SFC) का संचालन, डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) का विस्तार और सैन्य मामलों के विभाग (DMA) का गठन शामिल है. हालांकि, IDS को संचालन से जुड़े अधिकार नहीं मिले. SFC और DSA का दायरा सीमित रहा जिससे सेवाओं के नियंत्रण पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. रक्षा मंत्रालय का पूर्ण एकीकरण भी अब तक नहीं हो सका है.
भारतीय नौसेना द्वारा अपनाया गया रोटेशनल कमांड मॉडल निस्संदेह एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल रही है. यह मॉडल इस बात को दर्शाता है कि नौसेना ने समय रहते संयुक्तता और एकीकरण की आवश्यकता को समझा और नेतृत्व साझा करने के लिए संस्थागत लचीलापन दिखाया. रोटेशनल कमांड की अवधारणा आपसी विश्वास को बढ़ावा देती है और यह संकेत देती है कि नेतृत्व केवल एक ही सेवा तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार साझा किया जा सकता है. इससे संयुक्त सोच को प्रोत्साहन मिलता है और विभिन्न सेवाओं के बीच संवाद भी बेहतर होता है.
रोटेशनल कमांड की अवधारणा आपसी विश्वास को बढ़ावा देती है और यह संकेत देती है कि नेतृत्व केवल एक ही सेवा तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि आवश्यकता और परिस्थिति के अनुसार साझा किया जा सकता है.
हालांकि, इस मॉडल की सीमाएं भी स्पष्ट है. इसे बड़े ज़मीनी या व्यापक समुद्री थियेटरों में उसी रूप में लागू करना व्यावहारिक नहीं है. बड़े थियेटरों में संचालन का दायरा कहीं अधिक व्यापक और जटिल होता है. यहां सेना, नौसेना और वायुसेना की भूमिकाएँ गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं और संसाधनों का पैमाना भी काफी बड़ा होता है. ऐसे में केवल नेतृत्व के रोटेशन से प्रभावी संतुलन बन पाना कठिन हो जाता है.
यही कारण है कि तीनों सेनाएँ लंबे समय तक पारंपरिक ‘कमांड एंड कंट्रोल’ ढांचे में काम करती रहीं. यह ढांचा स्पष्ट जिम्मेदारियों, स्थापित अधिकार संरचनाओं और परिचित कार्यप्रणालियों पर आधारित था, जिससे संचालन में स्थिरता बनी रहती थी. बड़े और संवेदनशील क्षेत्रों में यह मॉडल निर्णय लेने में स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित करता था.
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि रोटेशनल कमांड एक उपयोगी प्रयोग तो है लेकिन इसे हर परिस्थिति के लिए आदर्श समाधान नहीं माना जा सकता. भारत जैसे जटिल सुरक्षा वातावरण वाले देश के लिए ज़रूरी है कि वह पहले मज़बूत एकीकरण, साझा योजना और संयुक्त प्रशिक्षण पर ध्यान दे. जब यह आधार सुदृढ़ होगा, तभी किसी भी बड़े थियेटर में साझा नेतृत्व की अवधारणा सफलतापूर्वक लागू की जा सकेगी.
एकीकरण का आशय केवल अलग-अलग सैन्य सेवाओं को एक साथ रखने से नहीं है बल्कि उनकी क्षमताओं, संसाधनों और संचालन प्रक्रियाओं को इस तरह समन्वित करना है कि संयुक्त शक्ति, किसी एक सेवा के स्वतंत्र प्रयासों से कहीं अधिक प्रभावी बन सके. इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि थलसेना, नौसेना और वायुसेना अपने-अपने दायरे में काम करने के बजाय साझा लक्ष्य के लिए एक साथ, पूरक भूमिका में कार्य करें. जब खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स, संचार, प्रशिक्षण और संचालन एकीकृत होते हैं तभी सैन्य क्षमता का वास्तविक उपयोग संभव होता है.
समय के साथ एकीकृत कमांड संरचनाओं का निर्माण किया गया, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और संगठित हो सकी. यह अनुभव दर्शाता है कि सफल सैन्य एकीकरण जल्दबाज़ी नहीं बल्कि निरंतर और संतुलित प्रयासों से ही संभव होता है.
इतिहास से स्पष्ट होता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिकांश आधुनिक देशों ने सैन्य एकीकरण की दिशा में अत्यंत धैर्य और दीर्घकालिक सोच के साथ काम किया. अमेरिका और चीन इसके प्रमुख उदाहरण हैं. इन देशों ने किसी त्वरित संरचनात्मक बदलाव के बजाय पहले दशकों तक संयुक्तता और आपसी तालमेल को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया. यह प्रक्रिया केवल थल, जल और वायु सेनाओं तक सीमित नहीं रही बल्कि राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तक फैली रही.
संयुक्त प्रशिक्षण को इन प्रयासों का आधार बनाया गया जिससे विभिन्न सेवाओं के बीच आपसी समझ और भरोसा विकसित हो सके. इसके साथ ही साझा सैन्य सिद्धांतों का विकास किया गया ताकि सभी घटक एक ही रणनीतिक सोच के तहत कार्य करें. समय के साथ एकीकृत कमांड संरचनाओं का निर्माण किया गया, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और संगठित हो सकी. यह अनुभव दर्शाता है कि सफल सैन्य एकीकरण जल्दबाज़ी नहीं बल्कि निरंतर और संतुलित प्रयासों से ही संभव होता है.
जब यह आधार मज़बूत हो गया, तभी आवश्यकता के अनुसार थियेटर कमांड की ओर कदम बढ़ाया गया. अमेरिका में यह प्रक्रिया भौगोलिक चुनौतियों और वैश्विक सैन्य उपस्थिति के कारण अपनाई गई जबकि चीन ने क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और अपने सामरिक हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया.इन उदाहरणों से साफ है कि थियेटर कमांड कोई शुरुआती कदम नहीं बल्कि लंबे और सुव्यवस्थित एकीकरण की स्वाभाविक परिणति होती है.
अंडमान-निकोबार कमांड (ANC) को अक्सर संयुक्त कमांड का सफल मॉडल बताया जाता है लेकिन यह मुख्य रूप से एक समुद्री प्रयोग था जहां सीमित संयुक्त बल और नौसेना की प्रमुख भूमिका के कारण मतभेद कम रहे. बड़े और जटिल थियेटरों में, जहां सेना, नौसेना और वायुसेना की भूमिकाएँ गहराई से जुड़ी होती हैं, इस मॉडल को सीधे लागू करना व्यावहारिक नहीं है.
रक्षा मंत्रालय के पूरे ढांचे को शामिल करते हुए खतरा-आधारित योजनाएं बनाई जाए. साथ ही, युवा अधिकारियों के बीच सेवाओं का आपसी अनुभव बढ़ाया जाए और संयुक्त प्रशिक्षण को मज़बूत किया जाए.
पिछले कई दशकों से भारत में संयुक्तता की नींव NDA और वॉर कॉलेज जैसी संस्थाओं में रखी गई है. फिर भी, संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा, अधिकारों की चिंता और संस्थागत असुरक्षाओं के कारण यह तालमेल अक्सर वास्तविक एकीकरण में नहीं बदल पाया. एकीकरण केवल सेनाओं तक सीमित नहीं है; इसमें राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शीर्ष संस्थानों की भूमिका भी अहम है.
संयुक्त प्रशिक्षण और तकनीकी नेटवर्क अभी भी पूरी तरह साझा नहीं हो पाए हैं. सेना द्वारा बनाए गए इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स इसका उदाहरण हैं, जहां वायु शक्ति के समुचित समावेश की कमी साफ दिखाई देती है.समुद्री वायु शक्ति को लेकर वायुसेना और नौसेना के बीच बहस भी इसी असंतुलन को दर्शाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकरण के लिए ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर—दोनों स्तरों पर काम करना ज़रूरी है. रक्षा मंत्रालय के पूरे ढांचे को शामिल करते हुए खतरा-आधारित योजनाएं बनाई जाए. साथ ही, युवा अधिकारियों के बीच सेवाओं का आपसी अनुभव बढ़ाया जाए और संयुक्त प्रशिक्षण को मज़बूत किया जाए.
तेज़ी से बदलते सुरक्षा खतरों के दौर में भारी संसाधनों वाली और जल्दबाज़ी में की गई थियेटराइजेशन की नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है. इसके बजाय, विशेष बल, अंतरिक्ष और साइबर कमांड जैसे अधिक एकीकृत ढांचे बनाना ज्यादा व्यावहारिक होगा.साफ है कि भारतीय सेनाओं में बेहतर तालमेल और तेज़ बदलाव के लिए पहले मज़बूत एकीकरण ज़रूरी है- थियेटराइजेशन अपने आप में समाधान नहीं है.
अर्जुन सुब्रमण्यम भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल और एक रणनीतिक टिप्पणीकार हैं.
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Air Vice Marshal (Dr) Arjun Subramaniam (Retd) is a fighter pilot from the Indian Air Force, a military historian, air power analyst, and strategic commentator. ...
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