Author : Arpan Tulsyan

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Published on Dec 22, 2025 Updated 9 Days ago

भारत की स्कूल परीक्षा प्रणाली आज भी अंकों और रटने के दायरे में क़ैद है जबकि भविष्य कौशल की माँग करता है. ऑटोमेशन और AI के दौर में यह अंतर युवाओं को बेरोज़गारी की ओर धकेल रहा है. NEP 2020 ने रास्ता दिखाया है, अब ज़रूरत है उसे ज़मीन पर उतारने की.

रटना छोड़ो, AI के जमाने में कौशल जरूरी

अंकों में उलझी पढ़ाई


कई सालों से भारत की स्कूल परीक्षा प्रणाली साल के अंत में होने वाली, अंक-केंद्रित और एक जैसी परीक्षाओं पर आधारित रही है. इन परीक्षाओं में रटने पर ज़ोर दिया जाता है जिससे बच्चों की वास्तविक समझ और सोचने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती. अध्ययनों से पता चलता है कि पढ़ाने का बड़ा हिस्सा लेक्चर और याद करने में चला जाता है, जहाँ बच्चे जवाब तो दोहरा लेते हैं लेकिन ज्ञान को नई परिस्थितियों में इस्तेमाल नहीं कर पाते. आज जब ऑटोमेशन और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) काम की दुनिया को बदल रहे हैं, तब वास्तविक कौशल की कमी युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बन गई है. इसी वजह से कई शिक्षित युवा बेरोज़गार रहते हैं जबकि कई नौकरियाँ खाली पड़ी रहती हैं. इसका कारण शिक्षा और उद्योग के बीच तालमेल की कमी है, जहाँ पढ़ाई में अभी भी भविष्य के लिए ज़रूरी व्यावहारिक और सामाजिक कौशल की बजाय अंकों और सिद्धांत पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है.

“इन परीक्षाओं में रटने पर ज़ोर दिया जाता है जिससे बच्चों की वास्तविक समझ और सोचने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती.”

दूसरे देशों के अनुभव बताते हैं कि दक्षता-आधारित शिक्षा अपनाने से बच्चों की सीख बेहतर होती है. रवांडा में इस पद्धति से बच्चे कक्षा में ज़्यादा सक्रिय हुए और उनकी समस्या सुलझाने व गणित समझने की क्षमता बढ़ी. अमेरिका और दक्षिण कोरिया में भी पाया गया कि ऐसे कार्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों की सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता पारंपरिक पढ़ाई से बेहतर रही. इसके अलावा, दक्षता-आधारित शिक्षा बच्चों में आत्मविश्वास और सीखने के प्रति रुचि बढ़ाती है जिससे वे जीवन भर सीखने के लिए तैयार होते हैं. इसके विपरीत, रटने पर आधारित शिक्षा कमजोर छात्रों को पीछे छोड़ देती है और असमानता बढ़ाती है, खासकर गरीब और ग्रामीण युवाओं के लिए, जैसा कि विश्व बैंक भी बताता है.

रटने और परीक्षा-केंद्रित पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर कमजोर छात्रों को पीछे छोड़ देती है जिससे वे अपने बेहतर साथियों से और पीछे रह जाते हैं और असमानता बढ़ती है.



इन चुनौतियों को समझते हुए भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 पाठ्यक्रम, पढ़ाने के तरीकों और मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव की बात करती है. नीति दक्षता-आधारित शिक्षा पर ज़ोर देती है, जहाँ मूल्यांकन सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहता बल्कि छात्रों के कौशल, सोच, दृष्टिकोण और मूल्यों को भी परखता है ताकि वे अपने ज्ञान का सही उपयोग कर सकें और अपनी वास्तविक क्षमता दिखा सकें.


नीति से कक्षा तक की चुनौती


भारत में परीक्षा सुधार की बात सबसे पहले 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आई, जहाँ रटने की पढ़ाई कम करने के लिए CCE(Continuous Comprehensive Evaluation) पर ज़ोर दिया गया. हालांकि ज़मीनी बदलाव 2000 के बाद हुआ, जब CBSE ने अंकों की जगह ग्रेड, आंतरिक मूल्यांकन और केस-आधारित प्रश्न शुरू किए. NEP 2020 ने इन सुधारों को और मज़बूती दी जिसमें दक्षता-आधारित मूल्यांकन, समग्र प्रगति पत्रक और बोर्ड परीक्षाओं को कम दबाव वाला बनाने जैसे कदम शामिल हैं. फिर भी, इन सुधारों को लागू करने में कई दिक्कतें हैं. स्कूलों में संसाधनों की कमी है और शिक्षक व अभिभावक अभी भी अंकों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं. कई शिक्षक दक्षता-आधारित सवाल और गतिविधियाँ बनाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं. साथ ही, यह साफ़ समझ नहीं है कि दक्षता-आधारित शिक्षा का मतलब क्या है इसलिए बदलाव अक्सर सिर्फ़ प्रश्नपत्र के रूप तक सीमित रह जाते हैं, कक्षा की पढ़ाई में नहीं.

“दक्षता-आधारित शिक्षा बच्चों में आत्मविश्वास और सीखने के प्रति रुचि बढ़ाती है.”



भारत में स्कूलों की संख्या और विविधता बहुत ज़्यादा है जो सुधारों के रास्ते में बड़ी चुनौती बनती है. अलग-अलग पृष्ठभूमि के स्कूलों और छात्रों के कारण संसाधनों, भाषा सहायता और सीखने के अवसरों में असमानता रहती है. ऐसे में एक जैसे सुधार हर जगह समान रूप से लागू करना, उनकी गुणवत्ता देखना और लगातार सहयोग देना मुश्किल हो जाता है. नतीजतन, कुछ अच्छे संसाधन वाले स्कूलों तक ही सुधार सीमित रह जाते हैं और पूरे सिस्टम में बदलाव नहीं हो पाता. इसके साथ ही, बच्चों के सीखने का स्तर अब भी चिंता का विषय है. PARAKH 2024 के अनुसार, कक्षा 3 के 36 प्रतिशत बच्चे साधारण पाठ नहीं पढ़ पाते और 40 प्रतिशत बुनियादी गणित नहीं कर पाते. NAS के आँकड़े भी दिखाते हैं कि पिछले कई वर्षों में सुधार बहुत धीमा रहा है. वहीं, निजी ट्यूशन पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. ये सभी बातें बताती हैं कि पढ़ाने और मूल्यांकन को बुनियादी कौशल पर फिर से केंद्रित करना ज़रूरी है. अगर समय रहते दक्षता-आधारित और समानता पर आधारित मूल्यांकन सुधार नहीं किए गए तो कई बच्चे कम-कौशल और सीमित अवसरों वाले भविष्य में फँस सकते हैं.


आगे का रास्ता


NEP 2020 और NCF-SE 2023 के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ज़रूरी है कि सुधार केवल नियमों के पालन तक सीमित न रहें बल्कि सभी हितधारक-शिक्षक, स्कूल प्रमुख, अभिभावक, छात्र, प्रशासक और शोधकर्ता- इन्हें अपनी ज़िम्मेदारी समझें. मूल्यांकन सुधार तभी सफल होंगे जब शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधन और स्पष्ट भूमिका मिले. सभी इन-सर्विस शिक्षक प्रशिक्षणों का मुख्य फोकस दक्षता-आधारित मूल्यांकन होना चाहिए. इसके लिए भारतीय भाषाओं में उदाहरण वीडियो और मॉडल प्रश्न तैयार किए जाएँ जो दिखाएँ कि सीमित संसाधनों और बहुभाषी कक्षाओं में भी शिक्षक बच्चों की क्षमताएँ कैसे जाँच सकते हैं. शिक्षक प्रशिक्षण लगातार चलने वाला, कक्षा से जुड़ा और आपसी सीख पर आधारित होना चाहिए ताकि शिक्षक रूब्रिक बनाना, फीडबैक देना और कमजोर छात्रों की मदद के लिए डेटा का सही उपयोग सीख सकें.

“PARAKH 2024 के अनुसार, कक्षा 3 के 36 प्रतिशत बच्चे साधारण पाठ नहीं पढ़ पाते.”


इसके साथ ही, पाठ्यक्रम, किताबों और अन्य शिक्षण सामग्री में स्पष्ट दक्षताओं को शामिल करना ज़रूरी है. NCERT और SCERT को कक्षा और विषय के अनुसार, यह साफ़ बताना चाहिए कि हर स्तर पर बच्चा क्या कर पाने में सक्षम हो.  नई पाठ्यपुस्तकों और शिक्षक गाइड को अध्यायों की बजाय इन दक्षताओं से जोड़ा जाना चाहिए.  हर सीखने के लक्ष्य के साथ ऐसे उदाहरण या गतिविधियाँ होनी चाहिए जो यह दिखाएँ कि किसी विशेष दक्षता को हासिल करने का मतलब क्या है.  इससे पूरे सिस्टम में समान समझ बनेगी और सुधार ज़मीन पर असर दिखा सकेंगे.
शिक्षकों के लिए कक्षा में इस्तेमाल होने वाले मूल्यांकन तरीकों को नए सिरे से तैयार करने की ज़रूरत है. हर कक्षा के अनुसार, सरल दक्षता चेकलिस्ट और प्रश्न-संग्रह उपलब्ध कराए जाएँ. साथ ही, कम दबाव वाले और लगातार होने वाले आकलन तरीकों-जैसे छोटे कॉन्सेप्ट चेक, सोचने वाले प्रश्न, पोर्टफोलियो, और गतिविधि-आधारित काम-को बढ़ावा दिया जाए. शिक्षक प्रशिक्षण लगातार, कक्षा से जुड़ा और आपसी सीख पर आधारित होना चाहिए ताकि शिक्षक मिलकर मूल्यांकन कार्य तैयार करें और कक्षा के अनुभवों से सीख सकें.
कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षाओं में हुए सुधारों को आगे बढ़ाया जाए. प्रश्नपत्रों में ज्ञान को लागू करने वाले, केस-आधारित और विश्लेषणात्मक सवालों की संख्या बढ़ाई जाए जैसे छोटे उत्तर, डेटा की व्याख्या और परिस्थिति आधारित प्रश्न. इसके साथ ही, स्कूलों में आंतरिक मूल्यांकन को मज़बूत किया जाए जहाँ परियोजनाओं, पोर्टफोलियो और प्रयोगशाला कार्य का सही आकलन हो. प्रवेश परीक्षाओं और CUET जैसे टेस्ट भी ऐसे बनाए जाएँ जो रटने की बजाय बच्चों की मुख्य क्षमताओं को परखें. इससे पूरी परीक्षा प्रणाली ज़्यादा न्यायपूर्ण, उपयोगी और जीवन व काम के लिए ज़रूरी कौशलों से जुड़ी होगी.

“अगर समय रहते दक्षता-आधारित और समानता पर आधारित मूल्यांकन सुधार नहीं किए गए तो कई बच्चे कम-कौशल वाले भविष्य में फँस सकते हैं.”


सुधारों में अभिभावकों और समुदाय को भी शामिल करना ज़रूरी है. सार्वजनिक चर्चा, स्कूल स्तर पर जानकारी सत्र और सरल भाषा में तैयार रिपोर्टें लोगों को समग्र और दक्षता-आधारित मूल्यांकन को समझने में मदद कर सकती हैं. इससे ओपन-बुक परीक्षा जैसे नए तरीकों को लेकर डर कम होगा और बच्चों की पढ़ाई में घर से सहयोग बढ़ेगा, न कि केवल कोचिंग पर निर्भरता. अंत में, मूल्यांकन सुधार को खुद एक सीखने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए. अलग-अलग राज्यों में चरणबद्ध और स्वतंत्र शोध से यह समझा जाए कि क्या काम करता है, किसके लिए और किन परिस्थितियों में. इन अध्ययनों से मिले सबूत नीति, शिक्षक प्रशिक्षण और संसाधनों को बेहतर बनाने में इस्तेमाल किए जाएँ  अगर भारत दृढ़ता से दक्षता-आधारित मूल्यांकन अपनाता है तो आने वाले वर्षों में परीक्षाएँ सिर्फ याददाश्त नहीं बल्कि बच्चों की वास्तविक समझ और कौशल को परखने का माध्यम बन सकती हैं.


अर्पण तुल्स्यान ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के सेंटर फ़ॉर न्यू इकॉनमिक डिप्लोमेसी में सीनियर फ़ेलो हैं.

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