भारत को चाहिए कि वो अपनी प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना का विस्तार करके इसे राष्ट्र निर्माण की रणनीति के तौर पर देखे, जिससे निर्यात, उच्च कौशल वाले रोज़गार और मैन्युफैक्चरिंग के सेक्टर में दुनिया से होड़ लगाने को बढ़ावा मिले
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे तेज़ी से प्रगति कर रही बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत के निर्यात की दास्तान एक कमज़ोर तस्वीर पेश करती है. 2024 में भारत ने 442 अरब डॉलर के सामान का निर्यात किया था, जो दुनिया में 17वें नंबर पर था और चीन के वस्तुओं के निर्यात से तुलना करने पर उसका महज़ 12 प्रतिशत रहा था. पिछले साल की तुलना में 2024 में भारत के निर्यात में केवल 0.08 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी. जबकि इसी दौरान दुनिया का व्यापार 3.7 प्रतिशत बढ़ा और भारत के आयात में 6.85 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ था. साफ़ है कि भारत का वस्तुओं का निर्यात वादों, उम्मीदों या फिर संभावनाओं के पैमाने पर खरा नहीं उतरा है. इसी संदर्भ में सरकार ने उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (PLI) की योजना को शुरू किया था.
PLI योजना को देश के निर्माण क्षेत्र में ज़बरदस्त बदलाव लाने की नीयत से शुरू किया गया था. वैसे तो इस योजना को लेकर परिचर्चा मोटे तौर पर निवेश में बढ़ोत्तरी, निर्यात में वृद्धि और प्रोत्साहन के वितरण जैसे आर्थिक मानकों पर ही केंद्रित रही है. लेकिन, इस योजना के गहरे प्रभाव कहीं और देखने को मिलते हैं.
PLI का मूल्यांकन सिर्फ़ संकुचित वित्तीय नज़रिए से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे एक ऐसे सामरिक दांव के तौर पर देखा जाना चाहिए, जो राष्ट्रीय क्षमता को मज़बूती प्रदान करती है, उच्च कौशल वाले रोज़गार का सृजन करती है, तकनीकी क्षमता में इज़ाफ़ा करती है और तेज़ी से बदल रही भू-राजनीतिक व्यवस्था में भारत को दुनिया की नज़र में मैन्युफैक्चरिंग के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करती है.
2024 में भारत ने 442 अरब डॉलर के सामान का निर्यात किया था, जो दुनिया में 17वें नंबर पर था और चीन के वस्तुओं के निर्यात से तुलना करने पर उसका महज़ 12 प्रतिशत रहा था.
इस योजना का सबसे ज़्यादा लाभ, स्पष्ट रूप से मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को मिलता दिख रहा है. चीन के वस्तुओं के निर्यात में 927 अरब डॉलर मूल्य के साथ इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है. ऐसे में भारत में मोबाइल फोन के निर्माण के लिए PLI योजना को शुरू करना उचित ही था. सैमसंग ने PLI योजना का अपना पांच साल का चक्र पूरा कर लिया है और वित्त वर्ष 2025 में ही इस योजना के तहत 1000-1200 करोड़ के प्रोत्साहन की दावेदारी की है. इस आधार पर उसके उत्पादन में किस्तों में 25 से 30 हज़ार करोड़ की वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है. एप्पल के लिए ठेके पर काम करने वाले निर्माता- फॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन और विस्ट्रॉन- ने भारत से निर्यात की मज़बूत व्यवस्थाएं निर्मित कर ली हैं. शुरुआती आशंकाओं के बावजूद अब ये कंपनियां भारत के स्मार्टफ़ोन निर्यात में काफ़ी योगदान करती हैं, जो 2024 में बढ़कर 18 अरब डॉलर पहुंच गया था.
इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि एप्पल की उत्पादन श्रृंखला में घरेलू मूल्य संवर्धन काफ़ी हद तक बढ़ गया है, जिससे ये तथ्य रेखांकित होता है कि PLI योजना घरेलू क्षमता की बढ़ोत्तरी में योगदान दे रही है, जो सिर्फ़ कम मूल्य वाले असेंबल करने के काम तक ही सीमित नहीं है.
वैसे तो निर्यात में बढ़ोत्तरी और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अहम हैं. लेकिन, PLI की असली सफलता इसकी बड़े पैमाने पर उच्च कौशल वाले रोज़गार पैदा करने की क्षमता में निहित है. आज हज़ारों युवा भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स और उनके कल-पुर्ज़े बनाने के काम से जुड़ रहे हैं. इनमें से बहुतों के पास मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल या फिर मैटेरियल्स इंजीनियरिंग का अनुभव होता है.
ये कम वेतन और कम कौशल वाले रोज़गार नहीं हैं. ये आकांक्षाएं बढ़ाने वाले और भविष्य पर केंद्रित रोज़गार हैं. इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग की हर नई इकाई का दूसरे क्षेत्रों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इन इकाइयों के इर्द गिर्द औज़ार बनाने वाले कारखाने, लॉजिस्टिक्स के केंद्र, परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाएं और कल-पुर्ज़ों के आपूर्तिकर्ताओं जैसी इकाइयां भी उभरती हैं, जिससे एक ऐसा घना औद्योगिक इकोसिस्टम बनता है, जो तमाम सेक्टर्स में उत्पादकता को बढ़ाता है.
PLI केवल एक आर्थिक प्रोत्साहन वाली योजना नहीं है, बल्कि ये राष्ट्र निर्माण की एक नीति है. इसकी सफलता को केवल फ़ौरी अवधि के रिटर्न या फिर निवेश की कसौटी पर नहीं मापा जाना चाहिए, बल्कि इसकी कामयाबी का आकलन, भारत के औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने और अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने में दूरगामी योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए.
PLI केवल एक आर्थिक प्रोत्साहन वाली योजना नहीं है, बल्कि ये राष्ट्र निर्माण की एक नीति है. इसकी सफलता को केवल फ़ौरी अवधि के रिटर्न या फिर निवेश की कसौटी पर नहीं मापा जाना चाहिए, बल्कि इसकी कामयाबी का आकलन, भारत के औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने और अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने में दूरगामी योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए.
पहले की अफ़सरशाही की अकुशलता की शिकार सरकारी औद्योगिक नीतियों के उलट, PLI नतीजों पर केंद्रित है. ये उत्पादन, बड़े स्तर और निवेश के लिए इनाम देती है. कंपनियों को पहले उत्पान करके बिक्री करना होता है, और सरकारी प्रोत्साहन हासिल करने से पहले अपनी उत्पादकता में हुई वृद्धि की रिपोर्ट देनी होती है. इससे सरकारी आवंटन और निजी सेक्टर के प्रदर्शन के बीच तालमेल बनता है और करदाता के पैसे को ठोस राष्ट्रीय क्षमता के विकास में इस्तेमाल किया जाता है.
हाल के दिनों में वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में सैमसंग के निर्यात में लगभग 20 फ़ीसद की गिरावट आई है. इस गिरावट को PLI योजना की असफलता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसके बजाय सैमसंग के निर्यात में ये गिरावट योजना को जारी रखने की ज़रूरत को रेखांकित करती है. इससे एप्पल जैसी उन कंपनियों को भी सकारात्मक संदेश जाएगा, जिनके PLI चक्र समाप्ति की ओर हैं. जिन कंपनियों ने शुरू में ही अपनी क्षमता का विस्तार करके और नेक इरादों से अपने आपको साबित किया है, उनके लिए सरकार को PLI कार्यक्रम के दूसरे चक्र पर विचार करना चाहिए, जिसमें ज़ोर रिसर्च और विकास, कल-पुर्ज़ों के निर्माण और मूल्य संवर्धन पर हो.
इस वक़्त PLI को बंद करना वैसा ही होगा जैसे उड़ान भरते ही विमान के इंजन को बंद करना. PLI का लक्ष्य सिर्फ़ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) हासिल करना ही नहीं है, बल्कि इसका मक़सद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के पांव मज़बूती से जमाना और इस दौरान घरेलू क्षमताओं का विकास करना है.
भारत हर साल तरह तरह की सब्सिडी- जैसे कि मुफ़्त बिजली, सस्ते उर्वरक, खाद्यान्न वितरण और किसानों की क़र्ज़ माफी- पर 5 लाख करोड़ रुपए (60 अरब डॉलर) ख़र्च करता है. वैसे तो इनमें से कुछ ख़र्च सामाजिक संरक्षण के लिए आवश्यक है. लेकिन, इस सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा यानी लगभग 2-3 लाख करोड़ रुपए राजनीतिक मक़सद से ख़र्च किया जाता है, जो आर्थिक रूप से अकुशल और विकास के लिहाज से नुक़सानदेह है.
इसकी तुलना में सभी 14 सेक्टर्स में पूरे पांच साल की PLI योजना के लिए आवंटन महज़ 1.97 लाख करोड़ रूपए (24 अरब डॉलर) है. और फिर भी, इस योजना से: a) 1.2 लाख करोड़ रुपए का निजी निवेश आया है; b); उन्नत निर्माण सेक्टर में लाखों संगठित रोज़गार पैदा हुए हैं, और c)भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स का निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. PLI योजना के ऐसे प्रभाव बहुत अहम हैं. UNIDO के एक नीतिगत ब्रीफ में कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हर सीधी नौकरी से 2.2 अप्रत्यक्ष रोज़गार पैदा होते हैं. PLI के संदर्भ में लियोनटिएफ के इनपुट- आउटपुट आर्थिक मॉडल पर आधारित अध्ययन ये दिखाते हैं कि इससे मैन्युफैक्चरिंग के कच्चे माल की मांग बढ़ती है और तमाम सहयोगी उद्योगों के उत्पादन को भी बढ़ावा मिलता है.
PLI एक तय समय-सीमा के भीतर प्रदर्शन और निवेश पर रिटर्न पर आधारित योजना है. ये राष्ट्रीय हितों और औद्योगिक प्राथमिकताओं से मेल खाती है. अगर वित्तीय तार्किककरण की ज़रूरत है, तो भारत को पूंजी निर्माण करने वाले PLA जैसे मंचों के बजाय, खपत पर आधारित, राजनीतिक रूप से लाभप्रद सब्सिडियों पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है.
PLI योजना केवल एक आर्थिक औज़ार नहीं है. ये एक भू-राजनीतिक हथियार भी है. कोविड-19 महामारी, यूक्रेन युद्ध और चीन से रणनीतिक विलगाव की वजह से आज जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव आ रहे हैं, तो बहुत से देश मैन्युफैक्चरिंग के भरोसेमंद विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. भारत इस लम्हे के दोराहे पर खड़ा है और PLI योजना उस कमी को पूरा करने के लिए भारत को एक नीतिगत ढांचा प्रदान करती है.
ये मामला वित्तीय संयम का नहीं, बल्कि समझदारी से पूंजी के फिर से आवंटन का है. जिसके लिए सीमित सार्वजनिक फंड को राजनीतिक दृष्टि से प्रेरित सब्सिडियाँ के बजाय दूरगामी उत्पादत क्षमता के विकास में लगाना होगा.
चीन अचानक ही दुनिया के कारखाने के तौर पर नहीं उभरा था. कई दशकों तक चीन ने अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को आर्थिक मदद देने के लिए सरकारी बैंकों, स्थानीय सरकारों और विकास क्षेत्रों के माध्यम से बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत कम लागत वाली कामकाजी पूंजी ही नहीं, बल्कि पूंजीगत व्यय का भी विस्तार किया था. चीन के निर्माताओं को भारी छूट पर ज़मीन, बिजली, लॉजिस्टिक्स और क़र्ज़ का भी फ़ायदा मिला था. चीन ने इन आर्थिक प्रोत्साहनों को रेवड़ी की तरह नहीं, बल्कि भू-सामरिक निवेश के रूप में इस्तेमाल किया था.
आज दुनिया को चीन के जिस विकल्प की तलाश है, वो भारत के लिए वैश्विक स्तर का एक अनूठा अवसर है. भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए; भारत को चाहिए कि वो PLI को ख़र्च के तौर पर नहीं, बल्कि सामरिक निवेश के रूप में देखे.
वैसे तो क़र्ज़ के बोझ, ज़रूरत से अधिक क्षमता और छद्म बैंकिंग के तौर पर चीन को इसकी भारी आर्थिक लागत भी चुकानी पड़ी. लेकिन, भू-राजनीतिक संदर्भों में देखें, तो चीन को इसका ख़ूब लाभ भी हुआ. आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन एक अपरिहार्य धुरी बन चुका है. उसके पास व्यापार में मोल-भाव करने की क्षमता है और यही नहीं, चीन ने औद्योगिक रोज़गार के ज़रिए करोड़ों लोगों को ग़रीबी के दलदल से भी बाहर निकाला है.
भारत न तो चीन के मॉडल की नक़ल कर सकता है और न ही उसको करना चाहिए. लेकिन, भारत को चीन के प्रयोग के मुख्य सबक़ को सीखना होगा: निर्माण क्षेत्र को उत्पादक सरकारी सहयोग देना. जब इसको जवाबदेही और प्रतिस्पर्धा से जोड़ा जाता है, तो इससे लंबी अवधि के लिए राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण होता है. PLI उसी सिद्धांत का भारतीय स्वरूप है. इसको वित्तीय व्यय के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमता की निर्माता के तौर पर देखा जाना चाहिए. अब PLI योजना को मूल 14 सेक्टरों के दायरे से आगे बढ़ाया जाना चाहिए. कई कमज़ोर उद्योगों, ख़ास तौर से भारी उपकरण निर्माण सेक्टर को PLI की मदद से फ़ायदा हो सकता है.
सटीक नीतिगत प्रोत्साहन देकर भारत, क्रेन, एक्सकेवेटर और औद्योगिक वाहनों के निर्माण का एक प्रमुख वैश्विक केंद्र बन सकता है, जिससे न केवल घरेलू मूलभूत ढांचे के विकास की ज़रूरतें पूरी होंगी, बल्कि इनका निर्यात दक्षिणी पूर्वी एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व को भी किया जा सकेगा. PLI की दूसरी पीढ़ी की नए सिरे से बनाई गई रूप-रेखा में ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग के उपकरण, इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरियों, हवाई जहाज़ के कल-पुर्ज़े और सटीक काम करने वाले औज़ारों जैसे सेक्टर्स को शामिल किया जा सकता है.
PLI के सकारात्मक लाभ से वैसे तो भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) के विकास को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन, इस सेक्टर के लिए एक अलग विशेष PLI योजना की आवश्यकता है. भारत के MSME सेक्टर की निर्यात क्षमता में वृद्धि के लिए एक अलग PLI योजना शुरू करनी चाहिए. वैसे तो भारत का MSME देश की GDP में लगभग 30 प्रतिशत का भागीदार है. लेकिन, ये सेक्टर सामने भारी पूंजी लागत और कम श्रमिक उत्पादकता जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. MSME सेक्टर के लिए PLI योजना के तहत उन्हें ब्याज चुकाने में मदद और निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर कर में रियायतें (RoDTEP) और कॉरपोरेट टैक्स की दर में छूट जैसी अतिरिक्त लाभ भी दिए जाने चाहिए. ऐसे नीतिगत प्रावधानों का मक़सद भारत के MSME सेक्टर को निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करना होगा.
PLI योजना केवल एक आर्थिक औज़ार नहीं है. ये एक भू-राजनीतिक हथियार भी है. कोविड-19 महामारी, यूक्रेन युद्ध और चीन से रणनीतिक विलगाव की वजह से आज जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव आ रहे हैं, तो बहुत से देश मैन्युफैक्चरिंग के भरोसेमंद विकल्पों की तलाश कर रहे हैं. भारत इस लम्हे के दोराहे पर खड़ा है और PLI योजना उस कमी को पूरा करने के लिए भारत को एक नीतिगत ढांचा प्रदान करती है. इससे व्यापार वार्ताओं में भारत की स्थिति को मज़बूती मिलती है, अहम सेक्टर्स में आत्मनिर्भरता मज़बूत होती है और वैश्विक कंपनियों को विश्वसनीय, क्षमता बढ़ाने वाले और नियमों पर आधारित उत्पादन का ठिकाना मिलता है.
ये योजना भारत सरकार द्वारा लागू की गई अब तक की सबसे पारदर्शी और परिणामों पर आधारित नीति है. अगर ‘मेक इन इंडिया’ को PLI का ईंधन नहीं दिया जाता, तो ये एक रणनीति के बजाय सिर्फ़ एक नारा बनकर रह जाएगा. राजनीतिक रूप से ध्यान बंटने या फिर बजट आवंटन की संकुचित व्याख्या की वजह से अगर इसको अभी बंद कर दिया गया, तो रणनीतिक रूप से ये बड़ा ग़लत क़दम होगा.
इसके बजाय भारत को चाहिए कि वो, a) उन कंपनियों को PLI का लाभ देना जारी रखे, जो अपेक्षाओं पर खरी उतरी हैं; b) इसका विस्तार दूसरे सेक्टर्स के लिए भी करे; c) इस योजना का रिसर्च और विकास (R&D) और ऊपर की मूल्य संवर्धन श्रृंखलाओं के साथ अधिक तालमेल बनाए; d) MSME का निर्यात बढ़ाने के लिए एक समर्पित PLI योजना की शुरुआत करे, और e) खर्चीली और बेकार की सब्सिडी की पूंजी को उत्पादत और प्रदर्शन से जुड़े प्रोत्साहनों की ओर आवंटित करे.
जिस तरह 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत के सेवा क्षेत्र में क्रांति ला दी थी, उसी तरह PLI योजना भी हमारे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंक़लाब ला सकती है. लेकिन, ऐसा तभी होगा जब हम इसके ज़रिए क्षमता के विस्तार, फ़ौरी प्रगति और दूरगामी प्रतिबद्धता जताएं, जिसकी ये हक़दार है. ये हर तिमाही में निवेश पर रिटर्न (ROI) का मामला नहीं है. इस योजना का संबंध, रोज़गार, सम्मान, तकनीकी शक्ति और राष्ट्रीय सहनशीलता से है. आज दुनिया को चीन के जिस विकल्प की तलाश है, वो भारत के लिए वैश्विक स्तर का एक अनूठा अवसर है. भारत को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए; भारत को चाहिए कि वो PLI को ख़र्च के तौर पर नहीं, बल्कि सामरिक निवेश के रूप में देखे.
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Prasanna Karthik is a strategy consultant and public policy professional based out of New Delhi. He is a Fulbright as well as Clinton Global Initiative ...
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