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Published on Mar 31, 2026 Updated 2 Days ago

भारत में मेडिकल सीटें कम हैं, फीस ज्यादा. लिहाजा हर साल हजारों छात्र विदेश जाकर डॉक्टर बनने का सपना पूरा करते हैं. लेकिन असल संघर्ष तब ही शुरू होता है जब लौटकर उन्हें FMGE परीक्षा, इंटर्नशिप और कई नियमों की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जिससे करियर शुरू होने में सालों लग जाते हैं. पढ़ें विश्लेषण.

जानें, विदेश से पढ़े डॉक्टरों के सामने असल चुनौतियाँ?

हर साल भारत की मेडिकल शिक्षा प्रणाली अधिकांश अभ्यर्थियों को बाहर कर देती है. 2025 में रिकॉर्ड 2,209,318 उम्मीदवारों ने NEET-UG प्रवेश परीक्षा दी, जबकि देश के सभी मेडिकल कॉलेजों में कुल मिलाकर लगभग 129,025 (1.29 लाख) MBBS सीटें ही उपलब्ध हैं. इनमें से लगभग आधी सीटें (करीब 48 प्रतिशत) निजी संस्थानों में हैं, जहाँ फीस 60 लाख रुपये से लेकर 1 करोड़ रुपये से भी अधिक तक हो सकती है. दिलचस्प बात यह है कि 1,236,531 (12.36 लाख) उम्मीदवार परीक्षा में योग्य भी घोषित हुए, लेकिन परीक्षा पास करने के बाद भी अधिकांश छात्र भारत के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से वंचित रह गए. यह आकांक्षाओं और उपलब्ध क्षमता के बीच गहरे अंतर को दर्शाता है.

आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 ने स्पष्ट रूप से कहा कि देश में ऊँची फीस और सीमित सीटों के कारण हर साल ‘हजारों छात्र’ मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं. मार्च 2026 में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) विदेशी मेडिकल स्नातकों (FMGs) के लिए नए नियम जारी कर रहा था, जिनमें महामारी के दौरान ऑनलाइन पूरी की गई MBBS पढ़ाई के किसी भी हिस्से के लिए अतिरिक्त प्रायोगिक प्रशिक्षण (हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग) अनिवार्य करने की बात शामिल थी. हालांकि 6 मार्च की अधिसूचना पर FMGs के व्यापक विरोध और प्रतिनिधित्व के बाद इस परिपत्र को वापस लेकर संशोधित कर दिया गया. विदेश में चिकित्सा शिक्षा लेने वाले भारतीय छात्रों के लिए डिग्री पूरी करना अक्सर एक लंबी संघर्षपूर्ण प्रक्रिया की शुरुआत मात्र होती है. जैसे-जैसे भारत में मेडिकल सीट पाने का रास्ता संकरा और महंगा होता जा रहा है, विदेश में पढ़ाई करना कई छात्रों के लिए मजबूरी जैसा बनता जा रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि जो छात्र भारत के मेडिकल कॉलेजों में जगह नहीं बना पाते, वे क्या करें.

भारतीय छात्र अभी भी मेडिकल पढ़ने विदेश क्यों जाते हैं?

देश में ज़्यादा प्रतिस्पर्धा और अत्यधिक फीस के कारण कई भारतीय मेडिकल अभ्यर्थियों के लिए विदेशी विश्वविद्यालय ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प दिखाई देते हैं. विदेश मंत्रालय के अनुमान के अनुसार जनवरी 2025 तक लगभग 12.5 लाख भारतीय छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे. यदि 2025 के नीति आयोग के एक कार्यपत्र के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कोर्स कुल विदेशी छात्र प्रवाह का 2.8 प्रतिशत हैं, तो इसका मतलब है कि लगभग 30,000–35,000 भारतीय छात्र स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा, जिनमें मेडिकल भी शामिल है, के लिए विदेश जाते हैं. पाँच या छह वर्ष की डिग्री अवधि के दौरान यह संख्या लगातार बढ़ती रहती है, और किसी भी समय एक लाख से अधिक भारतीय छात्र दुनिया के कई देशों में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे होते हैं. रूस भारतीय छात्रों के लिए प्रमुख गंतव्य बना हुआ है, जबकि चीन में भी एक महत्वपूर्ण, हालांकि अपेक्षाकृत कम, छात्र समुदाय मौजूद है.

विदेश में चिकित्सा शिक्षा लेने वाले भारतीय छात्रों के लिए डिग्री पूरी करना अक्सर एक लंबी संघर्षपूर्ण प्रक्रिया की शुरुआत मात्र होती है. जैसे-जैसे भारत में मेडिकल सीट पाने का रास्ता संकरा और महंगा होता जा रहा है, विदेश में पढ़ाई करना कई छात्रों के लिए मजबूरी जैसा बनता जा रहा है.

हालांकि, विदेशी मेडिकल स्नातकों को एक समान समूह मानना गलत होगा. विदेशों के संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता और क्लिनिकल अनुभव काफी अलग होता है. कुछ भारतीय छात्र ऐसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते हैं जिन्हें मेजबान देश की संबंधित संस्थाओं द्वारा मान्यता प्राप्त होती है, जबकि कुछ ऐसे संस्थानों में जाते हैं जहाँ शैक्षणिक स्तर असमान होता है, क्लिनिकल प्रशिक्षण सीमित होता है या भारत लौटने पर परिणाम अपेक्षाकृत कमजोर रहते हैं. भाषा और पाठ्यक्रम का अंतर भी चुनौतियां पैदा कर सकता है-जैसे रूसी या चीनी माध्यम में पढ़ाई करना या अलग प्रकार की बीमारियों के पैटर्न से सामना होना-लेकिन कई छात्र इन परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा लेते हैं और अच्छा प्रदर्शन भी करते हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि कई FMGs अपनी डिग्री पूरी करके अच्छे डॉक्टर बनने के लिए पर्याप्त ज्ञान और कौशल लेकर लौटते हैं. उनकी असली चुनौतियां भारत लौटने के बाद शुरू होती हैं.

भारत में प्रैक्टिस की राह इतनी कठिन क्यों है?

सबसे बड़ा अवरोध विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा (FMGE) से शुरू होता है, जो एक राष्ट्रीय बहुविकल्पीय लाइसेंसिंग परीक्षा है और भारत में प्रैक्टिस करने के लिए FMGs को इसे पास करना आवश्यक होता है (भविष्य में इसे सभी स्नातकों के लिए NExT परीक्षा से बदलने की योजना है). ऐतिहासिक रूप से FMGE का पास प्रतिशत काफी कम रहा है. दिसंबर 2025 के सत्र में केवल 23.95 प्रतिशत विदेशी स्नातक ही पास हो पाए, जिसमें 300 में से 150 अंक प्राप्त करना आवश्यक था. आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 ने भी पहले के एक वर्ष के कम पास प्रतिशत का उल्लेख करते हुए इसे कई विदेशी मेडिकल कार्यक्रमों की ‘कमजोर गुणवत्ता‘, विशेषकर अपर्याप्त क्लिनिकल प्रशिक्षण, का संकेत बताया.

कुछ भारतीय छात्र ऐसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते हैं जिन्हें मेजबान देश की संबंधित संस्थाओं द्वारा मान्यता प्राप्त होती है, जबकि कुछ ऐसे संस्थानों में जाते हैं जहाँ शैक्षणिक स्तर असमान होता है, क्लिनिकल प्रशिक्षण सीमित होता है या भारत लौटने पर परिणाम अपेक्षाकृत कमजोर रहते हैं.

लेकिन स्क्रीनिंग परीक्षा पास करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है. FMGE पास करने के बाद विदेश से MBBS करने वाले भारतीय नागरिक को भारत में एक वर्ष की अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप (CRMI) पूरी करनी होती है, भले ही उसने विदेश में पहले ही इंटर्नशिप या क्लिनिकल प्रशिक्षण किया हो. यह नियम दशकों से लागू है और 2021 के NMC के विदेशी चिकित्सा स्नातक लाइसेंस (FMGL) विनियम के तहत इसे और स्पष्ट किया गया, जिसमें कहा गया कि नवंबर 2021 के बाद डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों को पूरी 12 महीने की इंटर्नशिप भारत में ही करनी होगी (साथ ही अन्य शर्तें भी लागू हैं). इसका परिणाम यह होता है कि विदेश में छह साल की मेडिकल पढ़ाई अक्सर आठ से दस साल की लंबी यात्रा में बदल जाती है, तब जाकर कोई व्यक्ति भारत में डॉक्टर के रूप में पंजीकरण करा पाता है.

चित्र 1: भारत में महिला माताओं के लिए दीर्घकालिक प्रतिफल मार्ग

Why Foreign Medical Graduates Face A Harder Road Home To India

Source: Author’s Own

इंटर्नशिप चरण विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए बड़ा अवरोध बन गया है. शिक्षण अस्पतालों में सीमित सीटों के कारण उन्हें जगह पाने में कठिनाई हुई. कई बार महीनों इंतज़ार करना पड़ा या शुल्क देना पड़ा. यूक्रेन युद्ध और कोविड के बाद लौटे छात्रों की संख्या बढ़ने से यह संकट और गहरा गया. इस स्थिति में अदालतों और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को अस्थायी समाधान के साथ हस्तक्षेप करना पड़ा, जैसे कुछ छात्रों को गैर-शिक्षण अस्पतालों में निगरानी में प्रशिक्षण की अनुमति देना या राज्यों को अधिक इंटर्नशिप सीटें खोलने का निर्देश देना.

नए नियम के अनुसार, जो छात्र यह दिखा दें कि उनकी ऑनलाइन पढ़ाई की कमी विदेश में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग से पूरी हो गई थी, उन्हें भारत में अतिरिक्त क्लर्कशिप नहीं करनी पड़ेगी, लेकिन जो यह साबित नहीं कर पाएंगे उन्हें इसकी बराबरी साबित करनी होगी.

FMGs के लिए एक केंद्रीकृत इंटर्नशिप आवंटन प्रणाली होनी चाहिए, जो पोस्टग्रेजुएट काउंसलिंग की तरह काम करे और स्नातकों को उपलब्ध अस्पतालों से कुशलतापूर्वक जोड़े. एक बार जब कोई FMG आवश्यक परीक्षा पास कर लेता है और अन्य एमबीबीएस स्नातकों की तरह ही इंटर्नशिप कर रहा होता है, तो उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए.

NMC की 6 मार्च 2026 की सार्वजनिक अधिसूचना को प्रभावित छात्रों और अन्य हितधारकों की चिंताओं के बाद वापस लेकर 18 मार्च 2026 को एक नोटिस जारी किया गया. नए नियम के अनुसार, जिन छात्रों की ऑनलाइन पढ़ाई की कमी विदेश में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग से पूरी हो चुकी है उन्हें भारत में अतिरिक्त क्लर्कशिप नहीं करनी पड़ेगी, जबकि बाकी को इसकी समानता साबित करनी होगी.

भारत में मेडिकल इंटर्न (अनिवार्य प्रशिक्षण वर्ष में रहने वाले स्नातक) को अस्पताल या कॉलेज द्वारा स्टाइपेंड दिया जाता है, जो आमतौर पर राज्य या संस्थान द्वारा तय किया जाता है (सरकारी अस्पतालों में अक्सर 10,000 से 50,000 रुपये प्रतिमाह तक). लेकिन कुछ संस्थानों में FMG इंटर्न को भारतीय मेडिकल कॉलेजों से पढ़े इंटर्न के मुकाबले कम या बिल्कुल भी स्टाइपेंड नहीं दिया गया. इस भेदभाव के कारण विरोध प्रदर्शन और अदालतों में मामले दर्ज हुए. फरवरी 2026 में एक महत्वपूर्ण फैसले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि FMG इंटर्न को भी भारतीय एमबीबीएस इंटर्न के समान स्टाइपेंड मिलना चाहिए.

इन चुनौतियों से यह धारणा बनती है कि व्यवस्था विदेशी मेडिकल स्नातकों के खिलाफ है. वैश्विक मेडिकल शिक्षा के स्तर अलग-अलग होने से कुछ संदेह स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें अलग स्क्रीनिंग परीक्षा देनी पड़ती है. NExT लागू होने तक उनके लिए लाइसेंस प्रक्रिया असमान बनी रहती है.

लौटते डॉक्टरों के लिए सरल सिस्टम क्यों जरूरी है?

भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर डॉक्टर तय मानकों पर खरा उतरे, क्योंकि मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है. लेकिन कड़ी जांच और अनावश्यक नौकरशाही में फर्क है. अभी FMGs लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जूझते हैं, इसलिए व्यवस्था में सुधार जरूरी है.

विदेशी डिग्री वालों के लिए अच्छे मानक रखना जरूरी है, पर जो देश डॉक्टरों का बड़ा स्रोत है, उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि लौटने वाले छात्रों का मूल्यांकन एक निष्पक्ष और सरल व्यवस्था से हो. अगर वे अपनी योग्यता साबित कर दें, तो उन्हें व्यावहारिक सोच के साथ भारत के स्वास्थ्य तंत्र में शामिल किया जाना चाहिए.

FMGs के लिए वापसी की प्रक्रिया को अधिक सरल और तेज बनाया जाना चाहिए. इसके लिए FMGs के लिए एक केंद्रीकृत इंटर्नशिप आवंटन प्रणाली होनी चाहिए, जो पोस्टग्रेजुएट काउंसलिंग की तरह काम करे और स्नातकों को उपलब्ध अस्पतालों से कुशलतापूर्वक जोड़े. एक बार जब कोई FMG आवश्यक परीक्षा पास कर लेता है और अन्य एमबीबीएस स्नातकों की तरह ही इंटर्नशिप कर रहा होता है, तो उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए. अंततः और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को अपने देश में मेडिकल शिक्षा का विस्तार और सुधार जारी रखना होगा. भारतीय छात्रों का विदेश जाना तभी कम होगा जब इसके मूल कारणों-जैसे अधिक सरकारी मेडिकल कॉलेज, निजी क्षेत्र में नियंत्रित और सस्ती फीस, और सीटों के भौगोलिक असंतुलन को सुधारने वाली नीतियाँ-को संबोधित किया जाएगा.

जब भारत डॉक्टर बनाने में आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ रहा है, तब वह उन छात्रों को नजरअंदाज नहीं कर सकता जो दुनिया भर में-ग्वांगझोउ से मनीला तक-मेडिकल पढ़ रहे हैं. ये छात्र दिखाते हैं कि देश में सीटें कम हैं, लेकिन उनकी मेहनत और सपने भी मजबूत हैं. विदेशी डिग्री वालों के लिए अच्छे मानक रखना जरूरी है, पर जो देश डॉक्टरों का बड़ा स्रोत है, उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि लौटने वाले छात्रों का मूल्यांकन एक निष्पक्ष और सरल व्यवस्था से हो. अगर वे अपनी योग्यता साबित कर दें, तो उन्हें व्यावहारिक सोच के साथ भारत के स्वास्थ्य तंत्र में शामिल किया जाना चाहिए.


के. एस. उपलाभ गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं. 


*NEET-UG = National Eligibility cum Entrance Test (Undergraduate)

*MBBS = Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery

*NExT = National Exit Test

*NEET-PG = National Eligibility cum Entrance Test (Postgraduate)

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