Author : Basu Chandola

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 02, 2026 Updated 7 Days ago

क्या किसी कंपनी के नाम का इस्तेमाल छिपे हुए सर्च कीवर्ड के रूप में किया जा सकता है? हिंडवेयर मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए ट्रेडमार्क अधिकारों और डिजिटल विज्ञापनों की नई सीमाएं तय करने की कोशिश की है. लेख से समझिए कि यह फैसला ब्रांड, प्रतिस्पर्धा और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म के लिए क्यों महत्वपूर्ण है. 

गूगल पर ब्रांड नाम की नीलामी, कहाँ है कानूनी सीमा?

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दिल्ली उच्च न्यायालय का हिंडवेयर लिमिटेड बनाम ग्रोहे इंडिया (हिंडवेयर) में दिया गया निर्णय, ट्रेडमार्क और कीवर्ड विज्ञापन पर भारत के विकसित होते न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ है. यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब गूगल ने अपने एडवर्ड्स प्रोग्राम में मशहूर ब्रांड ‘Hindware’ को एक कीवर्ड की तरह इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी. इसका फायदा उठाकर प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने बोली लगाई, जिससे गूगल पर हिंडवेयर सर्च करने वाले ग्राहकों को दूसरी कंपनियों के विज्ञापन दिखने लगे. दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे ट्रेडमार्क का उल्लंघन माना और गूगल पर रोक लगाते हुए जुर्माना लगा दिया. इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि ऑनलाइन विज्ञापनों में कीवर्ड्स पर बोली लगाना ट्रेडमार्क के लिए मुसीबत क्यों बनता है. साथ ही, यह भारतीय अदालतों के बदलते रुख और बिजनेस वर्ल्ड पर इसके असर को भी दिखाता है. 

कीवर्ड बिडिंग और ट्रेडमार्क विवाद की जड़

गूगल एड्स (Google Ads), जिसे पहले एडवर्ड्स के नाम से जाना जाता था, व्यवसायों को गूगल के पूरे इकोसिस्टम में विज्ञापन, सेवाएँ और उत्पादों की सूची प्रदर्शित करने की अनुमति देता है. इस मॉडल के केंद्र में कीवर्ड विज्ञापन है, जिसके तहत विज्ञापनदाता विशिष्ट शब्दों या वाक्यांशों पर बोली लगाते हैं. जब कोई उपयोगकर्ता ऐसा खोज शब्द दर्ज करता है जो उन कीवर्ड से मेल खाता है, तो ऑर्गेनिक खोज परिणामों के साथ प्रायोजित परिणाम भी दिखाई दे सकते हैं. जब कोई उपयोगकर्ता इन प्रायोजित लिंकों में से किसी एक पर क्लिक करता है, तो गूगल को राजस्व (कमाई) प्राप्त होता है.

जब विरोधी कंपनियां किसी मशहूर ब्रांड के नाम को कीवर्ड बनाकर ऑनलाइन विज्ञापनों पर बोली लगाती हैं, तो वे उस ब्रांड की साख का फायदा उठाती हैं. इससे ग्राहक के सर्च करने पर असली ब्रांड के बजाय प्रतिद्वंद्वी का विज्ञापन पहले दिखने लगता है. इसे 'ब्रांड इंटरसेप्शन' कहते हैं. इसी वजह से कंपनियां अपनी पहचान बचाने के लिए खुद के ही नाम पर दोबारा बोली लगाने को मजबूर होती हैं. यहीं ट्रेडमार्क कानून जरूरी हो जाता है.

इस लेख का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि ऑनलाइन विज्ञापनों में कीवर्ड्स पर बोली लगाना ट्रेडमार्क के लिए मुसीबत क्यों बनता है. साथ ही, यह भारतीय अदालतों के बदलते रुख और बिजनेस वर्ल्ड पर इसके असर को भी दिखाता है. 

एक ट्रेडमार्क न केवल किसी शब्द या लोगो की रक्षा करता है, बल्कि उससे जुड़े स्रोत, प्रतिष्ठा और भरोसे की भी रक्षा करता है. चिंता यह है कि कीवर्ड बिडिंग प्रतिस्पर्धियों को दूसरे ब्रांड की खोज करने वाले उपभोक्ताओं को रोककर इस साख का अनुचित लाभ उठाने की अनुमति दे सकती है. कानूनी सवाल यह है कि क्या ऐसा विज्ञापन उपभोक्ताओं में भ्रम पैदा करता है.

कैसे बदला भारतीय अदालतों का रुख?

भारतीय अदालतें एक दशक से अधिक समय से गूगल एड (Google Ads) में कीवर्ड के रूप में ट्रेडमार्क के उपयोग के मामले से जूझ रही हैं. कॉन्सिम इन्फो प्राइवेट लिमिटेड बनाम गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का शुरुआती विवाद 'भारतमैट्रिमोनी' और 'तमिलमैट्रिमोनी' जैसे मार्क्स से संबंधित था, मद्रास हाई कोर्ट ने माना कि ऑनलाइन विज्ञापनों में सामान्य या जाति-सूचक शब्दों वाले ट्रेडमार्क का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप में हो सकता है, लेकिन कोर्ट इस पर पूरी तरह रोक लगाने से बचता रहा. अदालत को डर था कि अगर ‘तमिल’ या ‘मैट्रिमोनी’ जैसे आम शब्दों के इस्तेमाल को रोका गया, तो बाजार में सही मुकाबला यानी प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी, क्योंकि ये शब्द खुद उस काम या बिजनेस की जानकारी देते हैं. पुराना कॉन्सिम विवाद गूगल की पुरानी नीति से जुड़ा था, जिसमें वह विज्ञापनों में ट्रेडमार्क वाले शब्दों के इस्तेमाल को रोकता था. लेकिन बाद में गूगल का रुख बदला और उसने कीवर्ड के तौर पर ट्रेडमार्क का इस्तेमाल खोल दिया. इसलिए, अब यह विवाद केवल कंपनियों के बीच का नहीं रहा, बल्कि गूगल की उस नई नीति पर भी है जिससे वह ट्रेडमार्क की बोलियों से मोटी कमाई कर रहा है. 

मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष बाद की मैट्रिमोनी.कॉम  अपीलों में अदालत ने माना कि गूगल का विज्ञापन प्रोग्राम सभी कंपनियों को आगे बढ़ने का एक बराबर मौका देता है. चूंकि यहाँ विवादित ब्रांड नाम ‘मैरिज’ या ‘भाषा’ जैसे बिल्कुल आम शब्दों से बने थे, इसलिए कोर्ट किसी एक कंपनी को पूरे सर्च रिजल्ट पर कब्जा देने के खिलाफ था. अदालत का साफ कहना था कि इंटरनेट चलाने वाले लोग इतने समझदार हैं कि वे परिणाम देखने के बाद खुद तय करते हैं कि उन्हें किस वेबसाइट पर जाना है, इसलिए यहाँ किसी धोखे या भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं थी. 

पुराना कॉन्सिम विवाद गूगल की पुरानी नीति से जुड़ा था, जिसमें वह विज्ञापनों में ट्रेडमार्क वाले शब्दों के इस्तेमाल को रोकता था. लेकिन बाद में गूगल का रुख बदला और उसने कीवर्ड के तौर पर ट्रेडमार्क का इस्तेमाल खोल दिया. इसलिए, अब यह विवाद केवल कंपनियों के बीच का नहीं रहा, बल्कि गूगल की उस नई नीति पर भी है जिससे वह ट्रेडमार्क की बोलियों से मोटी कमाई कर रहा है. 

इसके बाद, गूगल एलएलसी बनाम डीआरएस लॉजिस्टिक्स (पी) लिमिटेड (DRS) मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना कि कीवर्ड के रूप में ट्रेडमार्क का उपयोग ट्रेडमार्क अधिनियम के तहत ‘उपयोग’ के दायरे में आ सकता है, और गूगल की भूमिका हमेशा निष्क्रिय नहीं हो सकती है क्योंकि वह कीवर्ड सुझाता है, बेचता है और उनसे कमाई करता है. हालांकि, न्यायालय ने उल्लंघन के 'प्रति स्वतः नियम' को खारिज कर दिया. अदालत ने उल्लेख किया कि ट्रेडमार्क खोजने वाला उपयोगकर्ता समीक्षाएँ, विकल्प, प्रतिस्पर्धी या संबंधित सेवाएं भी तलाश रहा हो सकता है. इसलिए, उल्लंघन इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या इससे भ्रम, अनुचित लाभ, डाइल्यूशन, या मार्क के कार्य को नुकसान पहुंचता है. यही दृष्टिकोण गूगल एलएलसी बनाम मेकमाईट्रिप (इंडिया) प्रा. लि.  में भी अपनाया गया, जहाँ न्यायालय ने फिर से माना कि भ्रम या अनुचित लाभ की अनुपस्थिति में, कीवर्ड के रूप में ट्रेडमार्क का उपयोग स्वतः ही उल्लंघन के समान नहीं हो जाता है.

अदालत का पुराना नजरिया बाजार में सही मुकाबले के पक्ष में था, ताकि ट्रेडमार्क कानून धोखेबाज़ी तो रोके, लेकिन प्रतिस्पर्धियों को विज्ञापन देने से न रोके. मगर ‘हिंडवेयर’ का फैसला इस दिशा में एक कड़ा और नया मोड़ है. यह पुराने नियमों को पूरी तरह बदलता तो नहीं, पर यह साफ करता है कि भले ही ट्रेडमार्क विज्ञापन के टेक्स्ट में न दिखे, उसे बैकएंड कीवर्ड बनाना भी गलत हो सकता है. कोर्ट ने माना कि गूगल इस खेल में पूरी तरह शामिल है; वह कीवर्ड बेचकर और उन्हें रैंक करके सीधे कमाई करता है. 

हिंडवेयर का मामला ‘मैट्रीमोनी’ जैसे किसी आम शब्द का नहीं, बल्कि एक अनोखे और प्रसिद्ध ब्रांड का था. इसलिए कोर्ट ने माना कि गूगल तकनीकी रूप से तटस्थ नहीं है, बल्कि वह मुनाफे के लिए जानबूझकर ट्रेडमार्क बेच रहा है. 

गूगल ने तर्क दिया था कि कीवर्ड विज्ञापनदाताओं द्वारा चुने गए अदृश्य बैकएंड ट्रिगर थे, और गूगल केवल आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत मध्यस्थ संरक्षण साथ विज्ञापन स्थान प्रदान कर रहा था. अदालत ने इस रुख को खारिज कर दिया और माना कि गूगल की भूमिका निष्क्रिय नहीं थी, क्योंकि वह नीलामियाँ संचालित करता था, खोज शब्द सुझाता था, विज्ञापनों को रैंक करता था और प्रायोजित क्लिकों से राजस्व कमाता था.

अब कंपनियों के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?  

इस फैसले का बिजनेस पर तुरंत असर होगा. इस नए फैसले का बिजनेस की दुनिया पर बहुत जल्द और गहरा असर देखने को मिलेगा. अब जिन कंपनियों के पास अपने खुद के बनाए, अनोखे और मशहूर ब्रांड नाम (ट्रेडमार्क) हैं, उनके पास एक बड़ी ताकत आ गई है. वे इंटरनेट पर अपने नाम को चोरी-छिपे कीवर्ड की तरह इस्तेमाल होने से रोकने के लिए मजबूत कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं. ऐसा खास तौर पर ऑनलाइन ट्रेवल, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल सामान बेचने वाले बाजारों में ज्यादा होगा, जहां ग्राहक केवल इंटरनेट सर्च के भरोसे ही मिलते हैं. दूसरी तरफ, विरोधी कंपनियों को भी अब फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा और अपने ऑनलाइन विज्ञापन बहुत संभलकर तैयार करने होंगे. अब मार्केटिंग, कानूनी टीम और विज्ञापन एजेंसियों को मिलकर अपनी रणनीतियाँ तय करनी होंगी.

आगे चलकर इस फैसले का महत्व इस बात से तय होगा कि बड़ी अदालतें ब्रांड मालिकों की पहचान, विरोधियों के विज्ञापन देने की आजादी और गूगल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं. भारत को किसी एक पक्ष की अति से बचना होगा, न तो प्लेटफॉर्म्स बिना जवाबदेही के दूसरों के नाम से कमाई करें और न ही कानून का इस्तेमाल सही मुकाबले को दबाने के लिए हो.

इस फैसले के बाद गूगल जैसे प्लेटफॉर्म को भारत में शिकायत सुलझाने और गलत विज्ञापन हटाने का मजबूत सिस्टम बनाना होगा. वे यह कहकर नहीं बच सकते कि कीवर्ड्स पर्दे के पीछे काम करते हैं, क्योंकि वे खुद कीवर्ड्स को नीलाम करके पैसा कमाते हैं. डिजिटल बाजार में उनकी भूमिका सिर्फ एक माध्यम की नहीं है. दूसरी तरफ, विज्ञापनों पर बहुत ज्यादा रोक लगाने से बिजनेस को नुकसान भी हो सकता है. कीवर्ड विज्ञापन छोटे और नए व्यापारियों को ग्राहकों तक पहुँचने में मदद करते हैं. यदि सब कुछ रोक दिया गया, तो बड़े ब्रांड्स का एकाधिकार हो जाएगा, विज्ञापन महंगे होंगे और ग्राहकों के विकल्प कम हो जाएंगे. चुनौती सही विज्ञापन और धोखेबाज़ी के बीच संतुलन बनाने की है. 

सर्च विज्ञापनों में कीवर्ड के रूप में ट्रेडमार्क के उपयोग पर भारत में कानूनी स्थिति अभी भी साफ नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है. फिलहाल हाई कोर्ट ही अलग-अलग मामलों के हिसाब से नियम तय कर रहे हैं. आगे चलकर हिंडवेयर फैसले का असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालतें ब्रांड मालिकों की साख, विरोधियों के विज्ञापन देने के अधिकार और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी के बीच कैसा संतुलन बनाती हैं. 

फिलहाल, हिंडवेयर का फैसला सीधे तौर पर केस जीतने वाले ब्रांड के पक्ष में एक मजबूत कदम है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यहाँ एक अनोखा और मशहूर ब्रांड नाम था और गूगल ने भी इस कीवर्ड को बेचकर सीधा मुनाफा कमाया था. आगे चलकर इस फैसले का महत्व इस बात से तय होगा कि बड़ी अदालतें ब्रांड मालिकों की पहचान, विरोधियों के विज्ञापन देने की आजादी और गूगल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं. भारत को किसी एक पक्ष की अति से बचना होगा, न तो प्लेटफॉर्म्स बिना जवाबदेही के दूसरों के नाम से कमाई करें और न ही कानून का इस्तेमाल सही मुकाबले को दबाने के लिए हो. असली परीक्षा इस संतुलन को स्पष्टता से बनाने की होगी.


बासु चंदोला ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.

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