विक्टर ओर्बन हंगरी के ऐसे ताकतवर नेता रहे जिन्होंने 2010–2026 तक राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखी और ‘illiberal democracy’ का मॉडल आगे बढ़ाया. जानिए कैसे हंगरी में यही शैली उनकी ताकत भी बनी और चुनौती भी. राष्ट्रवादी एजेंडा, EU से टकराव और रूस से नज़दीकी के बावजूद, आखिरकार किन कारणों से उनके हाथ से सत्ता चली गई.
12 अप्रैल 2026 को हंगरी के मतदाताओं ने नई सरकार चुनते हुए दूर-दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन और उनकी पार्टी फिदेस्ज़ को 16 साल के शासन के बाद सत्ता से बाहर कर दिया.
पीटर मग्यार और उनकी तिस्ज़ा पार्टी ने 199 सदस्यीय संसद में 138 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत आसानी से हासिल कर लिया, जबकि 2010 से लगातार चार चुनाव जीतने वाली फिदेस्ज़ केवल 55 सीटों तक सिमट गई. मतदान प्रतिशत 77 प्रतिशत से अधिक रहा-जो 1989 में साम्यवाद के पतन के बाद सबसे अधिक था-यह दर्शाता है कि ओरबान के शासन में आम लोगों के जीवन की वास्तविकताओं के बीच बदलाव की गहरी मांग थी.
2025 में आर्थिक वृद्धि केवल 0.4 प्रतिशत रही, जो पोलैंड, बुल्गारिया और रोमानिया जैसे पड़ोसी देशों से काफी पीछे थी, जबकि बेरोज़गारी एक दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने हंगरी को यूरोपीय संघ का सबसे भ्रष्ट देश बताया. वहीं, क़ानून के शासन से जुड़े मुद्दों के कारण 2022 से ब्रुसेल्स द्वारा रोके गए अरबों यूरो के EU फंड ने वित्तीय दबाव और बढ़ा दिया, जिससे सरकारी खजाने में बड़ी कमी आई.
विक्टर ओर्बन के चुनाव अभियान ने भू-राजनीतिक मुद्दों पर ज़ोर दिया, जिसमें यूक्रेन और यूरोपीय संघ को हंगरी की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि देश की आंतरिक आर्थिक समस्याओं पर बहुत कम ध्यान दिया गया.
दूसरी ओर, पूर्व फिदेस्ज़ समर्थक रहे मैग्यार, जिन्होंने 2024 में एक घोटाले के बाद पार्टी छोड़ दी-जिसके कारण राष्ट्रपति कातालिन नोवाक और उनकी पूर्व पत्नी व पूर्व न्याय मंत्री जुडिट वर्गा को इस्तीफा देना पड़ा-ने अपने अभियान में आरोप लगाया कि ओरबान ने हंगरी को एक ‘क्लेप्टोक्रेसी’ (भ्रष्ट तंत्र) बना दिया है, जहां कुछ करीबी लोगों को फायदा हुआ जबकि आम नागरिक संघर्ष करते रहे. इसके विपरीत, विक्टर ओर्बन के चुनाव अभियान ने भू-राजनीतिक मुद्दों पर ज़ोर दिया, जिसमें यूक्रेन और यूरोपीय संघ को हंगरी की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि देश की आंतरिक आर्थिक समस्याओं पर बहुत कम ध्यान दिया गया.
पूरे यूरोपीय संघ में राहत की भावना देखी गई. ओरबान के शासन में हंगरी EU के लिए बाधा बन गया था-रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को रोकना, यूक्रेन के लिए €90 अरब के ऋण को वीटो करना, और यहां तक कि क्रेमलिन के साथ संवेदनशील जानकारी साझा करना.
मैग्यार ने EU और नाटो के साथ संबंध सुधारने का वादा किया है, जो देश की रणनीतिक दिशा में बड़ा बदलाव दर्शाता है. उनसे उम्मीद है कि वे रूस के खिलाफ EU के 20वें प्रतिबंध पैकेज को नहीं रोकेंगे और यूक्रेन को दिए जाने वाले ऋण पर लगे वीटो को हटाएंगे. बदले में, ब्रुसेल्स भी रुके हुए फंड जारी करने पर विचार कर रहा है.
हालांकि स्थिति पूरी तरह सरल नहीं है. मैग्यार ने कहा है कि वे यूक्रेन को सीधे सैन्य या वित्तीय सहायता नहीं देंगे और उसकी EU सदस्यता को तेज़ी से आगे बढ़ाने का भी विरोध करते हैं. हंगरी की रूसी तेल पर निर्भरता 2021 के 61 प्रतिशत से बढ़कर 93 प्रतिशत हो गई है, जिससे इस नीति को बदलना मुश्किल होगा. यूक्रेन के ज़कारपातिया क्षेत्र में लगभग 1.5 लाख हंगेरियन मूल के लोग भी एक संवेदनशील मुद्दा बने रहेंगे. फिर भी, यदि हंगरी यूरोपीय सुरक्षा में सहयोगी भूमिका निभाता है, तो यह EU की एकजुटता के लिए बड़ा बदलाव होगा. दुनिया भर के दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेताओं के लिए ओरबान की हार एक बड़ा झटका है.
MAGA के प्रमुख नेताओं-डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा फिदेस्ज़ की रैली में फोन कर समर्थन जताना और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का चुनाव से कुछ दिन पहले बुडापेस्ट जाकर उनके लिए प्रचार करना तथा ‘ब्रुसेल्स के नौकरशाहों’ के हस्तक्षेप की आलोचना करना-दिखाता है कि वे ओरबान की जीत में गहरी रुचि रखते थे. अब ओरबान की हार के बाद सबसे ज़्यादा चिंता अमेरिका में दिख सकती है, खासकर तब जब मिडटर्म चुनाव नज़दीक हैं और ट्रंप की लोकप्रियता पहले से दबाव में है.
उनके शासन में बुडापेस्ट MAGA समर्थकों के लिए एक तरह का केंद्र बन गया था. ‘अलोकतांत्रिक राज्य‘ (illiberal state) बनाने के लिए विक्टर ओर्बन की रणनीति को वॉशिंगटन से लेकर वारसॉ तक अध्ययन और सराहा गया. स्टीव बैनन ने उन्हें ‘Trump before Trump’ तक कहा था. MAGA के प्रमुख नेताओं-डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा फिदेस्ज़ की रैली में फोन कर समर्थन जताना और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का चुनाव से कुछ दिन पहले बुडापेस्ट जाकर उनके लिए प्रचार करना तथा ‘ब्रुसेल्स के नौकरशाहों’ के हस्तक्षेप की आलोचना करना-दिखाता है कि वे ओरबान की जीत में गहरी रुचि रखते थे. अब ओरबान की हार के बाद सबसे ज़्यादा चिंता अमेरिका में दिख सकती है, खासकर तब जब मिडटर्म चुनाव नज़दीक हैं और ट्रंप की लोकप्रियता पहले से दबाव में है. यह चुनाव दिखाता है कि राष्ट्रवादी नारों से ज्यादा सुशासन और आम लोगों की आर्थिक समस्याएं निर्णायक होती हैं.
कुछ लोग मानते हैं कि पीटर मग्यार खुद भी एक रूढ़िवादी नेता हैं-जिनके विचार आव्रजन, संप्रभुता और सामाजिक मुद्दों पर पारंपरिक हैं-इसलिए उनकी जीत को पूरी तरह दक्षिणपंथी विचारधारा की हार नहीं कहा जा सकता. हालांकि, फिदेस्ज़ की तुलना में तिस्ज़ा पार्टी अधिक केंद्र-दक्षिणपंथ के करीब मानी जाती है. यह नतीजा फिर से दिखाता है कि केवल विचारधारा नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता निर्णायक होती है. मैग्यार की जीत मुख्यतः उन मतदाताओं की वजह से हुई, जो ओरबान को हटाना चाहते थे. अब उनके सामने असली चुनौती शुरू होती है-सार्वजनिक सेवाओं में सुधार, जीवन स्तर बेहतर करना और अपने मजबूत जनादेश को स्थायी संस्थागत सुधारों में बदलना. यह आसान नहीं होगा, क्योंकि फिदेस्ज़ अब भी संस्थानों, स्थानीय नेटवर्क और मीडिया पर गहरी पकड़ रखती है.
हंगरी का यह चुनाव एक साफ और उम्मीद देने वाला संदेश देता है. इससे पता चलता है कि अगर सरकार लंबे समय तक संस्थाओं को कमजोर करे, मीडिया को नियंत्रित करे और अपने फायदे के लिए ताकत का इस्तेमाल करे, तब भी जनता बदलाव ला सकती है. बाहरी समर्थन होने के बावजूद, लोकतंत्र में लोग अपने वोट से सरकार बदल सकते हैं. यह दिखाता है कि मुश्किल हालात में भी आम जनता की ताकत सबसे बड़ी होती है और वे गलत नीतियों को हरा सकते हैं.
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Shairee Malhotra is Deputy Director - Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation. Her areas of work include Indian foreign policy with a focus on ...
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