Author : Vinitha Revi

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jun 24, 2024 Updated 0 Hours ago

चागोस के सवाल पर मौजूदा UK-मॉरिशस बातचीत के बावजूद जल्द किसी समझौते तक पहुंचने की संभावना कम लगती है. 

चागोस द्वीपसमूह पर यूके-मॉरीशस वार्ता में क्या रुकावट आ रही है?

Source Image: Le Matinal

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और वर्तमान विदेश मंत्री डेविड कैमरन ने उस समय चागोस के मूल निवासियों और मॉरिशस सरकार- दोनों को निराश कर दिया जब वो चागोस द्वीपसमूह की भविष्य की संप्रभुता को लेकर जारी बातचीत के मामले में UK की नीति पर यू-टर्न लेते दिखे. पिछले करीब एक साल से ज़्यादा समय से UK और मॉरिशस चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता की कवायद पर रचनात्मक बातचीत में लगे हुए हैं. जिस समय बातचीत की आधिकारिक घोषणा हुई (नवंबर 2022 में), तब कैमरन के पूर्ववर्ती विदेश मंत्री जेम्स क्लेवरली ने कहा था कि UK का इरादा 2023 की शुरुआत तक सभी बकाया मुद्दों का समाधान करना और एक समझौते पर पहुंचना है. 

पिछले करीब एक साल से ज़्यादा समय से UK और मॉरिशस चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता की कवायद पर रचनात्मक बातचीत में लगे हुए हैं. 

ख़बरों के मुताबिक बातचीत के सात चरण पूरे हो चुके हैं लेकिन बाहरी चागोस द्वीपों के पुनर्वास के सवाल के साथ-साथ संप्रभुता का विवाद अभी भी अनुसलझा है. कोई भी सरकार चुनाव से पहले विवाद की आशंका वाले फैसले लेने से पहले परहेज़ करती है. जुलाई 2024 में UK में आम चुनाव होना निर्धारित है, ऐसे में इस बात की संभावना नहीं लगती कि UK चागोस द्वीपसमूह मॉरिशस को सौंपेंगा या चागोस के मूल निवासियों को निकट भविष्य में द्वीप पर लौटने की अनुमति देगा. 

UK-मॉरिशस संप्रभुता विवाद 

हिंद महासागर के मध्य में स्थित चागोस द्वीपसमूह में लगभग 58 छोटे, निचले इलाकों में स्थित द्वीप हैं. ऐतिहासिक रूप से चागोस द्वीपसमूह को मॉरिशस के द्वारा नियंत्रित इलाके के रूप में माना जाता था जो कि मूल रूप से एक फ्रांसीसी उपनिवेश था जिसे बाद में 1814 की पेरिस संधि के तहत UK को सौंप दिया गया था. 1968 में स्वतंत्रता हासिल करने से पहले तक मॉरिशस एक ब्रिटिश उपनिवेश रहा. इसके तीन साल पहले जब स्वतंत्रता को लेकर मॉरिशस के प्रतिनिधियों से बातचीत चल रही थी तो UK की सरकार ने द्वीपसमूह के सबसे बड़े द्वीप डिएगो गार्सिया में एक साझा सैन्य अड्डा स्थापित करने के लिए लीज़ पर देने के अमेरिका के अनुरोध को स्वीकार करने का निर्णय लिया. सैन्य अड्डा स्थापित करने के लिए UK की सरकार ने दबाव की रणनीति का इस्तेमाल करके मॉरिशस के प्रतिनिधियों के साथ लैंकेस्टर हाउस समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते ने UK को स्वतंत्रता से पहले चागोस द्वीपसमूह को मॉरिशस से अलग करने की अनुमति दे दी. इसके बाद UK ने चागोस द्वीपसमूह के निवासियों को ज़बरन मॉरिशस और सेशेल्स निर्वासित कर दिया. 

मॉरिशस 1980 के बाद से ही द्वीपसमूह पर UK की संप्रभुता का विरोध कर रहा है. मॉरिशस इसके पीछे ये दलील देता है कि लैंकेस्टर हाउस समझौते पर उसने दबाव में हस्ताक्षर किए थे. उधर चागोस के निवासियों, जो अब सेशेल्स, मॉरिशस और UK में रहते हैं, के कई संगठन अपनी वापसी के अधिकार के लिए जूझ रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में इन दोनों मामलों को कई कानूनी मंचों पर उठाया गया है. इनमें ब्रिटेन की अलग-अलग अदालतों के साथ-साथ यूरोपियन मानवाधिकार अदालत शामिल हैं. 2019 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) ने एक सलाह दी जिसमें कहा गया कि “जब मॉरिशस ने स्वतंत्रता हासिल की थी तो वहां उपनिवेशवाद ख़त्म करने की प्रक्रिया कानूनी तरीके से पूरी नहीं हुई थी और यूनाइटेड किंगडम जितनी जल्दी हो सके चागोस द्वीपसमूह पर अपना नियंत्रण ख़त्म करने के लिए बाध्य है.” ICJ की इस राय की उस समय पुष्टि हुई जब संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने द्वीप पर UK के कब्ज़े की निंदा करते हुए 6 की तुलना में 116 वोट से प्रस्ताव पास किया. 

2019 में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) ने एक सलाह दी जिसमें कहा गया कि “जब मॉरिशस ने स्वतंत्रता हासिल की थी तो वहां उपनिवेशवाद ख़त्म करने की प्रक्रिया कानूनी तरीके से पूरी नहीं हुई थी और यूनाइटेड किंगडम जितनी जल्दी हो सके चागोस द्वीपसमूह पर अपना नियंत्रण ख़त्म करने के लिए बाध्य है.”

UK ने इस आधार पर ICJ के फैसले को खारिज किया कि उसने सिर्फ एक राय दी थी, न कि कोई अंतिम फैसला दिया था. हालांकि इस मुद्दे पर ख़ुद को अलग-थलग पाते हुए UK सरकार से जुड़े कई लोगों ने एक ब्रिटिश सांसद की भावना को दोहराया कि चागोस पर UK का रवैया “ख़ुद UK सरकार और विश्व में ब्रिटेन की प्रतिष्ठा के लिए नुकसानदेह होता जा रहा है.” नवंबर 2022 में UK ने एलान किया कि उसने सभी बकाया मुद्दों के समाधान के लिए मॉरिशस के साथ बातचीत शुरू की है. हालांकि अब ऐसा लगता है कि विदेश मंत्री डेविड कैमरन और रक्षा मंत्री ग्रांट शैप्स जैसे वरिष्ठ मंत्री इस रवैये पर फिर से विचार कर रहे हैं. कैमरन ने कहा “हमें बहुत सावधानी से बातचीत समाप्त करने के असर पर सोचने की ज़रूरत है जिसने हमारी व्यवस्था के स्वरूप को बदल दिया है.” इसलिए नीति को लेकर साफ तौर पर इस यू-टर्न के कारणों के साथ-साथ व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र के लिए सुरक्षा से जुड़े असर पर विचार करना उपयोगी है.

डिएगो गार्सिया का महत्व 

अमेरिका के सैन्य नेटवर्क के लिए एक सामरिक संपत्ति के रूप में डिएगो गार्सिया के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है. आज कई विद्वान और सुरक्षा विश्लेषक इस दृष्टिकोण की पुष्टि करते हैं. डिएगो गार्सिया की वजह से अमेरिका तेज़ी से सेना की तैनाती कर सकता है, उसका हवाई क्षेत्र लंबी दूरी के हवाई अभियानों में मदद करता है और इसकी लोकेशन को देखते हुए ये एक महत्वपूर्ण संचार और सैटेलाइट निगरानी स्टेशन है. डिएगो गार्सिया हिंद महासागर और फारस की खाड़ी में तैनात सेना को साजो-सामान का समर्थन मुहैया कराता है.

डिएगो गार्सिया हिंद महासागर और फारस की खाड़ी में तैनात सेना को साजो-सामान का समर्थन मुहैया कराता है.    

अमेरिकी वायुसेना की लेफ्टिनेंट कर्नल वनेसा विलकॉक्स (96वीं बम स्क्वॉड्रन और बॉम्बर टास्क फोर्स कमांडर) बताती हैं कि डिएगो गार्सिया और एंडरसन एयरफोर्स बेस इंडो-पैसिफिक में काम करने के हिसाब से उनके सबसे महत्वपूर्ण एवं मज़बूत केंद्र हैं और इस महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र में अभियानों का समर्थन करने में अमेरिका की क्षमता के प्रमाण हैं. राजनीतिक वैज्ञानिक और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक एम बी साल्टर और सी ई मुटलू इतिहास में अमेरिकी अभियान के लिए डिएगो गार्सिया की महत्वपूर्ण भूमिका को 1973 के अरब-इज़रायल युद्ध, ऑपरेशन ईगल क्लॉ (तेहरान में अमेरिकी दूतावास के बंधकों को बचाने की कोशिश), इराक पर दोनों आक्रमण और अफ़ग़ानिस्तान में अभियान से जोड़ते हैं. अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में युद्ध के दौरान ऐसी ख़बरें आईं कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और जापान की सेना समेत सहयोगी देशों की सेनाओं ने डिएगो गार्सिया में अपना अड्डा बनाया था. इसके अलावा राजनीतिक वैज्ञानिक डॉ. वॉल्टर लैडविग III के अनुसार, “बिना किसी सेंट्रल लोकेशन के चुनौती ये होगी कि आपको अलग-अलग दूसरे स्थानों में संपत्तियों और संसाधनों को बांटना है. जिबूती, ओमान और संभवत: दक्षिण-पूर्व एशिया में डिएगो गार्सिया की तरह कोई सेंट्रल लोकेशन नहीं है.” मॉरिशस अच्छी तरह से ये समझता है कि चागोस द्वीपसमूह को लेकर किसी भी बातचीत के नतीजे की बुनियाद डिएगो गार्सिया का लगातार सुचारू संचालन सुनिश्चित करने में है. इस दिशा में मॉरिशस ने सार्वजनिक रूप से और आधिकारिक तौर पर कई अवसरों पर अलग-अलग मंचों और संवादों में कहा है कि उसका इरादा 99 साल की लीज़ पर डिएगो गार्सिया अमेरिका को देने का है. 

चीन का ख़तरा 

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी से संभावित ख़तरे को लेकर UK सरकार के भीतर कुछ चिंताएं हैं. भविष्य में द्वीपसमूह की संप्रभुता के इर्द-गिर्द के मुद्दों पर बहस करते हुए ब्रिटेन के सांसद हेनरी स्मिथ ने पूछा “मॉरिशस में चीन कितना भागीदार है?” और “मॉरिशस किस तरह की पहुंच चीन को दे सकता है?” यहां सामरिक सोच भविष्य को सुरक्षित बनाने को लेकर है. मॉरिशस पर चीन के प्रभाव की चुनौती तात्कालिक नहीं है बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति को लेकर गहरी जागरूकता है. हालांकि क्षेत्र के विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि मॉरिशस में चीन की किसी सैन्य योजना से जुड़े दावे का समर्थन करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है. 2008 से चागोस द्वीप के सर्वदलीय संसदीय समूह के समन्वयक और मॉरिशस में पूर्व ब्रिटिश उच्चायुक्त (2000-04) डेविड स्नॉक्सेल को इस बात पर यकीन नहीं है कि मॉरिशस चागोस द्वीप तक चीन को पहुंच प्रदान करेगा. उन्होंने समझाते हुए कहा कि “मॉरिशस का विशेष रूप से फ्रांस, कुछ हद तक UK या भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ जिस तरह का नज़दीकी संबंध है, उस तरह का संबंध चीन के साथ नहीं है. उन देशों के साथ मॉरिशस का बहुत घनिष्ठ संबंध हैं और इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती कि वो इस रिश्ते से अलग हो जाएगा.” डॉ. लैडविग ने भी पुष्टि की कि मॉरिशस ने आधिकारिक रूप से कहा है कि वो कभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा जो इस क्षेत्र में भारत के हितों को कमज़ोर करता हो.

 मॉरिशस पर चीन के प्रभाव की चुनौती तात्कालिक नहीं है बल्कि हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति को लेकर गहरी जागरूकता है.

अमेरिका की चुप्पी 

UK और मॉरिशस के बीच मौजूदा बातचीत को लेकर अमेरिका ने चुप्पी साध रखी है. अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने एक संवाददाता सम्मेलन में चागोस द्वीपसमूह के ऊपर UK की संप्रभुता को स्पष्ट रूप से स्वीकारते हुए कहा कि “ये UK और मॉरिशस के बीच एक द्विपक्षीय मुद्दा था”. राजनयिकों के द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ये एक सामान्य कूटनीतिक बयान है लेकिन संप्रभुता से जुड़े विवाद शायद ही द्विपक्षीय मामले होते हैं. विवाद से जुड़े पक्षों से आगे अक्सर कई अप्रत्यक्ष हितधारक होते हैं जो किसी विवाद का समाधान करने में निर्णायक नहीं तो प्रभावी भूमिका ज़रूर अदा करते हैं. ये देखते हुए कि बातचीत डिएगो गार्सिया के इर्द-गिर्द लॉजिस्टिक को प्रभावित करती है, इस बात की संभावना कम है कि अमेरिका ने अपने पसंदीदा नतीजे और व्यवस्था पर विचार नहीं किया है. 

 ये देखते हुए कि बातचीत डिएगो गार्सिया के इर्द-गिर्द लॉजिस्टिक को प्रभावित करती है, इस बात की संभावना कम है कि अमेरिका ने अपने पसंदीदा नतीजे और व्यवस्था पर विचार नहीं किया है. 

लेकिन इस मुद्दे पर अमेरिका की चुप्पी कई बातों को अस्पष्ट बनाती है. मिसाल के तौर पर, बाहरी द्वीपों में चागोस के मूल निवासियों के पुनर्वास के मुद्दे पर UK के सांसद एंड्रयू रोसिंडेल ने दावा किया कि उन्होंने अमेरिका सरकार के सर्वोच्च स्तर पर इसे उठाया है. उन्होंने कहा कि “किसी ने भी अभी तक मुझे ये नहीं कहा कि उन्होंने चागोस के मूल निवासियों की वापसी पर आपत्ति जताई है”. हालांकि आगे उन्होंने ये भी जोड़ा कि “जब मैं यहां आया और विदेश मंत्री, मंत्रियों, सिविल सर्वेंट और अधिकारियों के सामने इस मुद्दे को उठाया तो उन्होंने कहा कि अमेरिका ने आपत्ति जताई है”. 

आगे का रास्ता 

कैमरन की नीति में बदलाव की ख़बरों के बाद प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ से बात की. ज़ाहिर तौर पर सुनक ने एलीनोर तूफान के असर को लेकर अपनी चिंता जताने के लिए बात की लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने मॉरिशस के प्रधानमंत्री को भरोसा दिया कि UK आपसी रूप से फायदेमंद नतीजों को लेकर प्रतिबद्ध बना हुआ है. हालांकि निकट भविष्य में किसी समझौते पर पहुंचने की संभावना नहीं लगती है. जब तक UK इंडो-पैसिफिक में एक महत्वपूर्ण किरदार और अमेरिकी हितों के लिए एक अहम सहयोगी के रूप में ख़ुद को देखता है, तब तक चागोस द्वीपसमूह पर नियंत्रण छोड़ना और डिएगो गार्सिया को लेकर सामरिक समीकरणों से अलग होना मुश्किल होगा. एक अनुभवी राजनेता होने के नाते कैमरन लंबी बातचीत को सही ठहराने के लिए अच्छी स्थिति में हैं. उन्होंने कहा “बातचीत के बाद किसी भी नतीजे के साथ ये संदेह से परे होना चाहिए कि अमेरिका-UK के लिए इस अहम राष्ट्रीय संपत्ति के सही ढंग से काम-काज और संचालन को कोई ख़तरा न हो. चाहे वो चीन का असर हो या भविष्य में मॉरिशस के साथ क्या हो सकता है या दूसरे देशों और बाहरी द्वीपों के साथ क्या हो सकता है, ये सभी सवाल इस मुद्दे को देखते हुए मेरे दिमाग के पूरी तरह से सामने और केंद्र में हैं.” हालांकि, ये मतलब लगाना कि हिंद महासागर में सभी छोटे द्वीपीय देश चीन के साथ जुड़ने के तत्काल ख़तरे का सामना कर रहे हैं, न सिर्फ उन्हें अधिकार से वंचित करता है बल्कि अमेरिका के अलावा क्षेत्र में एक हितधारक के रूप में भारत के साथ मॉरिशस के मज़बूत संबंधों को भी कमज़ोर करता है.


विनिता रेवि ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़ी इंडिपेंडेंट स्कॉलर हैं. 

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