हर समुदाय की सेहत की कहानी अलग होती है इसलिए एक ही बीमारी और दवा हर जगह एक जैसा असर नहीं करती. जीनोमइंडिया बताता है कि इलाज भी हर इंसान के हिसाब से अलग होना चाहिए. लेख में पढ़ें कि यह अध्ययन स्वास्थ्य और इलाज को भारत के संदर्भ में नए तरीके से समझने की जरूरत क्यों बताता है.
भारत लंबे समय से अपनी बड़ी जनसंख्या के कारण वैश्विक स्वास्थ्य चर्चाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, लेकिन जीनोमिक्स और विस्तृत फेनोटाइपिक शोध में यह आश्चर्यजनक रूप से कम प्रतिनिधित्व वाला रहा है. इसी असंतुलन को दूर करने के लिए जीनोमइंडिया (GI) परियोजना शुरू की गई. जनवरी 2020 में शुरू हुई इस पहल को एक राष्ट्रीय कंसोर्टियम के रूप में बनाया गया और इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) का समर्थन प्राप्त है. यह परियोजना कई संस्थानों के नेटवर्क को साथ लाती है, जिसमें बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च को समन्वय केंद्र बनाया गया है. प्रमुख जीन अनुक्रमण और विश्लेषण का काम ब्रिक-एनआईबीएमजी, सीएसआईआर-सीसीएमबी और सीएसआईआर-आईजीआईबी जैसे संस्थानों सहित देशभर के कई सैंपल-कलेक्शन साझेदारों के साथ मिलकर किया जा रहा है.
मुख्य जीनोमिक शोध-पत्र के साथ-साथ, इस परियोजना ने एक फेनोटाइपिक शोध-पत्र, सार्वजनिक उपयोग के लिए डैशबोर्ड, ओपन कोड, सार-सांख्यिकी और विस्तृत सहायक सामग्री भी जारी की है, जिसमें अध्ययन के विश्लेषणात्मक विवरण शामिल हैं. हालांकि, दोनों मुख्य शोध-पत्र अभी medRxiv पर प्रीप्रिंट के रूप में उपलब्ध हैं और उनका अभी तक पीयर रिव्यू नहीं हुआ है, इसलिए इनके निष्कर्ष महत्वपूर्ण होने के बावजूद सावधानी से पढ़े जाने चाहिए.
जनवरी 2020 में शुरू हुई इस पहल को एक राष्ट्रीय कंसोर्टियम के रूप में बनाया गया और इसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग का समर्थन प्राप्त है. यह परियोजना कई संस्थानों के नेटवर्क को साथ लाती है, जिसमें बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च को समन्वय केंद्र बनाया गया है.
इस तरह के प्रयास की आवश्यकता स्पष्ट है. भारत दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन वैश्विक जीनोमिक डेटाबेस और सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध अभी भी व्यापक औसतों पर आधारित हैं, जो भारत की आंतरिक विविधता को छिपा देते हैं. भारत में कई अलग-अलग भाषा और समुदाय के लोग रहते हैं, जहां अक्सर अपने ही समुदाय में शादी करने की परंपरा है और हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह की विविधता देखने को मिलती है. इसलिए केवल देश या राज्य के औसत आंकड़ों से सबको समझना मुश्किल है. इस परियोजना का मकसद वंश पर नहीं, बल्कि बेहतर डेटा से बीमारी के जोखिम, सही दवा और छूटे हुए समूहों की पहचान करना है.
जीनोमिक स्तर पर, इस अध्ययन से पता चलता है कि भारत की कई आबादियों में ‘फाउंडर इफेक्ट’ मजबूत है, यानी कुछ समुदाय सीमित पूर्वजों से उत्पन्न हुए हैं, जिससे समय के साथ कुछ आनुवंशिक बदलाव (वेरिएंट) उस समूह में ज्यादा आम हो जाते हैं. साथ ही, उच्च ‘होमोसायगोसिटी’ भी पाई गई है, जिसका मतलब है कि व्यक्ति को माता-पिता दोनों से एक ही प्रकार का जीन मिलता है-यह अक्सर पीढ़ियों से एक ही समुदाय में विवाह होने के कारण होता है.
ऐसी स्थिति में कुछ हानिकारक जीन बदलाव कुछ समुदायों में ज्यादा पाए जा सकते हैं, जो दुनिया के अन्य डेटा में नहीं दिखते. इससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा बदलाव खतरनाक है. साथ ही, यूरोप के आधार पर बने जोखिम मॉडल भारतीय लोगों पर सही काम नहीं करते.
इस अध्ययन में यह पाया गया कि हमारे जीन यह तय करते हैं कि दवाएं हमारे शरीर पर कैसे असर करती हैं. यानी एक ही दवा हर व्यक्ति पर एक जैसा काम नहीं करती. जैसे कुछ जीन कैंसर या अन्य बीमारियों की दवाओं को सहन करने की क्षमता बदल देते हैं, तो कुछ जीन दवाओं को शरीर में कैसे टूटते हैं, यह प्रभावित करते हैं. इसलिए हर किसी को एक जैसी दवा या खुराक देना सही नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के हिसाब से इलाज तय करना चाहिए.
सबसे खास बात यह है कि आदिवासी समुदायों में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में सामान्यतः अधिक पाए जाने वाले HDL का अंतर लगभग खत्म हो जाता है. इससे संकेत मिलता है कि इन समुदायों में हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित करने वाले जैविक और सामाजिक कारक शहरी या यूरोपीय समूहों से अलग हो सकते हैं.
इसके अलावा, यह भी सामने आया कि किसी व्यक्ति का समुदाय या भाषा समूह उसके स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है. अलग-अलग समूहों में बीमारियों का स्तर अलग है, यानी स्वास्थ्य समस्याएं हर जगह समान नहीं हैं. कम HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) और उच्च ट्राइग्लिसराइड्स व्यापक रूप से पाए गए, साथ ही जागरूकता की कमी भी दिखी. जिन लोगों का रक्तचाप उच्च था, उनमें से केवल 17.6 प्रतिशत को इसकी जानकारी थी, और जिन लोगों को डिस्लिपिडेमिया (खून में वसा का असामान्य स्तर) था, उनमें से केवल 2.2 प्रतिशत ही अपने रोग के बारे में जानते थे.
यह अध्ययन जीवन-चक्र से जुड़े कुछ असामान्य पैटर्न भी सामने लाता है. सबसे खास बात यह है कि आदिवासी समुदायों में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में सामान्यतः अधिक पाए जाने वाले HDL (अच्छे कोलेस्ट्रॉल) का अंतर लगभग खत्म हो जाता है. इससे संकेत मिलता है कि इन समुदायों में हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित करने वाले जैविक और सामाजिक कारक शहरी या यूरोपीय समूहों से अलग हो सकते हैं. इसके साथ ही, परियोजना ने एक ‘दक्षिण एशियाई इम्प्यूटेशन पैनल’ भी तैयार किया है, जो भविष्य के शोध के लिए महत्वपूर्ण है. इम्प्यूटेशन वह सांख्यिकीय प्रक्रिया है, जिसमें अधूरे डेटा से गायब आनुवंशिक जानकारी का अनुमान लगाया जाता है, और भारतीय जीनोम पर आधारित यह पैनल दक्षिण एशियाई आबादी के लिए अधिक सटीक परिणाम देने में मदद करेगा.
समुदायों की पहचान छिपाने से लोगों की निजी जानकारी सुरक्षित रहती है, लेकिन इससे शोध के नतीजों को सीधे किसी खास समूह पर लागू करना थोड़ा कठिन हो जाता है. सोशल मीडिया पर हुई आलोचना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन पूरी तरह सही भी नहीं. क्योंकि इस अध्ययन में सिर्फ स्वस्थ वयस्क शामिल थे, इसलिए बच्चों की बीमारियों या गंभीर शुरुआती रोगों पर सीधे निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है. साथ ही, गोपनीयता बनाए रखने से जानकारी की तुरंत उपयोगिता भी थोड़ी कम हो जाती है. हालांकि, यह कहना सही नहीं है कि यह अध्ययन असफल है क्योंकि यह वंशावली या प्राचीन डीएनए पर आधारित नहीं है. यह इसका उद्देश्य ही नहीं था. इसी तरह, Y-क्रोमोसोम या जाति-आधारित विस्तृत विश्लेषण का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होना भी इसकी चिकित्सा उपयोगिता को कम नहीं करता. असली सवाल यह है कि क्या यह अध्ययन भविष्य के महामारी विज्ञान और फार्माकोजीनोमिक्स के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है-और इस दृष्टि से यह सफल है.
फेनोटाइपिक अध्ययन में यह बताया गया कि 95 प्रतिशत प्रतिभागियों में कम से कम एक असामान्य बायोमार्कर या शरीर से जुड़ा माप पाया गया. लेकिन इसे सीधे बीमारी के रूप में नहीं देखना चाहिए. शोधकर्ताओं के अनुसार, यह एक ऊपरी अनुमान हो सकता है, जो एक तरफ वास्तविक मेटाबोलिक समस्या को दर्शाता है, और दूसरी तरफ पश्चिमी मानकों को भारतीय आबादी पर लागू करने की सीमाओं को भी दिखाता है.
यह एक महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि आज भी रोजमर्रा की चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाले कई मानक-जैसे कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग के जोखिम-ऐसी आबादी पर आधारित हैं, जो भारतीय जनसंख्या का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती. जीनोमइंडिया खुद से कोई तैयार ‘भारतीय जोखिम मॉडल’ नहीं देता, लेकिन यह पहली बार बड़े स्तर पर अलग-अलग भारतीय समूहों के डेटा उपलब्ध कराता है और यह भी दिखाता है कि विदेशी (खासकर यूरोपीय) मॉडल यहां ठीक से काम नहीं करते. इससे एक नई दिशा मिलती है-भारतीय संदर्भ में नए मानक तय करने की, जिन्हें वास्तविक आंकड़ों के आधार पर परखा जा सके.
हाल ही में DPD कमी को लेकर FDA द्वारा किए गए लेबलिंग बदलाव यह और स्पष्ट करते हैं कि भारत में भी कुछ दवा वर्गों में इन निष्कर्षों को लागू करने की जरूरत है, इससे पहले कि बड़े दावे किए जाएँ.
इसका व्यावहारिक सबक यह है कि हमें ऐसे बेहतर उपकरण विकसित करने होंगे, जो वास्तविक बीमारी और गलत वर्गीकरण के बीच अंतर कर सकें. इसके लिए भारतीय संदर्भ वाले मानक और जनसंख्या-आधारित निगरानी जरूरी है, न कि केवल पश्चिमी मानकों पर निर्भर रहना. अध्ययन में पाया गया कि कम HDL और उच्च ट्राइग्लिसराइड्स आम हैं, कमर का आकार अधिक है, और 22 समूहों में एक साथ कुपोषण और मोटापे दोनों की समस्या मौजूद है. साथ ही, मधुमेह के मामले NFHS-5 के अनुमान से कहीं अधिक पाए गए, हालांकि उम्र के अनुसार मिलान करने पर यह अंतर कुछ कम हुआ.
व्यावहारिक सीख यह है कि ऐसे बेहतर उपकरण विकसित किए जाएँ, जो वास्तविक स्वास्थ्य समस्या (वास्तविक बोझ) और गलत पहचान (गलत वर्गीकरण) के बीच स्पष्ट अंतर कर सकें. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उच्च रक्तचाप और डिस्लिपिडेमिया जैसी बीमारियों की पहचान और जांच को और गंभीरता से लेना होगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां जागरूकता कम है. ICMR द्वारा ‘भारत-विशिष्ट‘ मानकों की मांग यह दिखाती है कि अब पश्चिमी मानकों पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है. इस अध्ययन से पता चलता है कि अपने ही समुदाय में शादी (एंडोगैमी) और सीमित पूर्वजों के कारण कुछ बीमारियों से जुड़े जीन खास समूहों में ज्यादा मिल सकते हैं. इसलिए दुर्लभ बीमारियों की पहचान और सही सलाह के लिए भारत को अपने डेटा का उपयोग करना होगा, सिर्फ विदेशी जानकारी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी के लिए शादी से पहले जीन जांच अनिवार्य कर दी जाए. ऐसे टेस्ट केवल लोगों की इच्छा से, समझदारी और विशेषज्ञ सलाह के साथ ही होने चाहिए.
सबसे तुरंत जरूरी काम यह है कि निष्कर्षों को व्यवहार में लाने के लिए वैलिडेशन कोहोर्ट (सत्यापन समूह) और लंबे समय तक फॉलो-अप किए जाएँ, साथ ही उन दवाओं के लिए फार्माकोजीनोमिक दिशा-निर्देश तैयार किए जाएँ, जहाँ पहले से ही पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं. एनयूडीटी15, CYP2C19, CYP3A5 और डीपीवाईडी जैसे जीनों के वेरिएंट पहले से ही थायोप्यूरिन्स, क्लोपिडोग्रेल, टैक्रोलिमस और फ्लूरोपाइरीमिडीन जैसी दवाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों से जुड़े हुए हैं. हाल ही में DPD कमी को लेकर FDA द्वारा किए गए लेबलिंग बदलाव यह और स्पष्ट करते हैं कि भारत में भी कुछ दवा वर्गों में इन निष्कर्षों को लागू करने की जरूरत है, इससे पहले कि बड़े दावे किए जाएँ.
जीनोमइंडिया को गंभीरता से लेने का मतलब केवल जीनोमिक्स को लेकर सैद्धांतिक उत्साह दिखाना नहीं है, बल्कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू करना है. इसमें फाउंडर और अलग-थलग आबादी वाले समूहों पर सावधानीपूर्वक शोध, राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत मजबूत तंत्र विकसित करना, दवा-जीन आधारित पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू करना ताकि दवाओं की खुराक को सुरक्षित बनाया जा सके, और उन क्षेत्रों में अधिक लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य कदम उठाना शामिल है जहाँ मेटाबोलिक बीमारियां ज्यादा हैं लेकिन उनकी पहचान अभी भी कम हो रही है.*BRIC-NIBMG = Biotechnology Research and Innovation Council – National Institute of Biomedical Genomics
*CSIR-CCMB = Council of Scientific & Industrial Research - Centre for Cellular & Molecular Biology
*CSIR-IGIB = Council of Scientific and Industrial Research – Institute of Genomics and Integrative Biology
*HDL = High-density lipoprotein, often called “good” cholesterol
*NFHS-5 = National Family Health Survey, round 5
*ICMR = Indian Council of Medical Research
*FDA = United States Food and Drug Administration
के.एस. उपलाभ गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...
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