Published on Jul 05, 2024 Updated 0 Hours ago

वैसे पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का कुछ असर तो रूस पर पड़ा है. लेकिन, ये वैसा नहीं है, जिसकी उम्मीद लगाई गई थी.

क्या रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंध कारगर साबित हो रहे हैं?

अब जबकि पूर्वी यूरोप में चल रहा युद्ध तीसरे साल में दाख़िल हो गया है, तो रूस की सेनाओं ने कुछ अहम बढ़त हासिल कर ली है. यूक्रेन की सेनाओं को अमेरिका से 6 करोड़ डॉलर का आर्थिक सहायता पैकेज मिला है. इसके अलावा हथियारों और गोला-बारूद के लिए भी अमेरिका ने 22.5 करोड़ डॉलर की मदद यूक्रेन को दी है. इसके साथ साथ यूरोपीय संघ और अमेरिका की तरफ़ से यूक्रेन को 1.5 अरब डॉलर के नए सहायता पैकेज भी मिले हैं. जेनेवा की शांति वार्ता से भी उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं हासिल हुए. इस वार्ता में रूस को आमंत्रित नहीं किया गया था. फंड के साथ साथ यूक्रेन को बेल्जियम से 30 F-16 लड़ाकू विमान भी मिलने जा रहे हैं. इस वजह से रूस के साथ टकराव और बढ़ गया है और अब तो इसके परमाणु संघर्ष में तब्दील होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा है. चूंकि पश्चिमी देश यूक्रेन की रक्षा के लिए अपनी सेनाएं भेजकर सीधे इस युद्ध में शामिल नहीं हो सकते हैं. ऐसे में पश्चिम ने रूस का ख़ज़ाना ख़ाली करने के लिए प्रतिबंधों के ज़रिए आर्थिक युद्ध छेड़ रखा है.

पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की धार यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के अनुपात में रही है. यूरोपीय संघ ने प्रतिबंधों की 14वीं किस्त लागू कर दी है. इन पाबंदियों के अंतर्गत रूस की तरल प्राकृतिक गैस के निर्यात को सीमित करने की कोशिशें की गई हैं, जो रूस द्वारा किए जाने वाले सबसे बड़े निर्यात में से एक है. ऐसे में रूस के ऊपर लगातार लगाए जा रहे प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठ रहा है कि, क्या ये प्रतिबंध रूस के ख़िलाफ़ कारगर साबित हो रहे हैं?

रूस के ख़िलाफ़ पाबंदियां: लगातार होता सुधार

रूस दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रतिबंधों का शिकार देश है और उसके ऊपर 16 हज़ार से ज़्यादा पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं. वहीं, समय के साथ साथ प्रतिबंधों की धार में उतार चढ़ाव आता रहता है. पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंधों की पहली किस्त 2014 में तब लगाई गई थी, जब उसने क्रीमिया पर क़ब्ज़ा किया था. इन प्रतिबंधों में कुछ ख़ास रूसी नागरिकों के वीज़ा पर पाबंदियां, उनकी यात्रा पर रोक, रूसी सरकार के क़रीबों लोगों की संपत्तियों को ज़ब्त करना और रूस की अर्थव्यवस्था के ऊर्जा, रक्षा और वित्तीय क्षेत्रों पर सीमित प्रतिबंध शामिल थे. यूक्रेन में युद्ध छिड़ने से पहले इन प्रतिबंधों का पालन एकरूपता भरा नहीं था और इन्हें लागू करना भी इतना आसान नहीं था, और ज़ाहिर है कि ये भेदभावपूर्ण भी थे; मिसाल के तौर पर अगर कोई ग़ैर अमेरिकी कंपनी प्रतिबंधों का पालन नहीं करती थी, तो अमेरिका में उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता था. वहीं, प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर तुलनात्मक रूप से बहुत कम जुर्माना लगाया जाता था और अक्सर इन प्रतिबंधों को अमेरिकी अदालतों में चुनौती भी दी जाती थी.

प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर तुलनात्मक रूप से बहुत कम जुर्माना लगाया जाता था और अक्सर इन प्रतिबंधों को अमेरिकी अदालतों में चुनौती भी दी जाती थी.

फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से रूस पर कहीं ज़्यादा सख़्त प्रतिबंध लगाए गए, और इनका मक़सद रूस को वित्तीय रूप से कमज़ोर करना था, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता को कम किया जा सके. रूस के चार प्रमुख बैंकों वीटीबी, सोवकॉमबैंक, नोविकॉमबैंक और ओटक्राइट फाइनेंशियल ग्रुप पर प्रतिबंध लगाए गए थे. बाद में कई बड़े रूसी बैंकों और उनके सहयोगियों पर भी प्रतिबंधों की मार पड़ी थी और उन्हें स्विफ्ट (SWIFT) भुगतान व्यवस्था से हटा दिया गया था. अहम औद्योगिक तकनीकी, सॉफ्टवेयर और उपकरणों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई थी. इसके साथ साथ क्रेमलिन के सत्ताधारी वर्ग और रूस के अमीरों की संपत्तियां ज़ब्त कर दी गई थीं. दिसंबर 2022 तक G7 देशों ने रूस के तेल की क़ीमत 60 डॉलर प्रति बैरल तक सीमित कर दी थी. प्रतिबंधों की वजह से निर्यात से आमदनी कम होने और बढ़ते आयातों की वजह से रूस को 2023 के मध्य में रूबल का अवमूल्यन करना पड़ा था. इससे लोगों के रहन सहन पर कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया क्योंकि वेतन और पेंशन में बढ़ोत्तरी कर दी गई थी.

यूरोपीय संघ ने (EU) पर 11वें दौर के जो प्रतिबंध लगाए इनमें देशों और कंपनियों को प्रतिबंधों से बचने के तरीक़े अपनाने से रोकने के क़दम भी शामिल थे. बाद के दौर में इस व्यवस्था को और मज़बूत बनाया गया. क्योंकि, प्रतिबंधों के 13वें दौर में रूस के साथ इलेक्ट्रॉनिक कल पुर्ज़े आयात करने में भाग ले रही कंपनियों की पहचान कर ली गई थी और फरवरी 2024 में उन पर भी पाबंदी लगा दी गई. इसके बाद और सख़्ती करते हुए यूरोपीय संघ ने प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर आपराधिक मुक़दमा चलाने के न्यूनतम मानक भी तय कर दिए थे. इस साल फरवरी में एलेक्सी नवालनी की रूस की जेल में मौत के बाद अमेरिका ने रूस पर 500 प्रतिबंध और लगा दिए थे.

रूस से तरल प्राकृतिक गैस (LNG) के निर्यात पर प्रतिबंध

यूरोपीय संघ ने प्रतिबंधों की जिस 14वीं किस्त का एलान किया है, वो रूस के लिए एक और झटका होंगे. क्योंकि इन पाबंदियों के तहत न सिर्फ़ रूस से LNG के निर्यात पर पाबंदी लगाई गई है, बल्कि EU के देशों द्वारा रूस की इस गैस को अपने यहां से फिर से निर्यात करने को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है. पिछले साल नवंबर में अमेरिका ने LNG की तीन परियोजनाओं: आर्कटिक LNG-2, उस्त-लुगा और मरमंस्क पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इसकी वजह से इन परियोजनाओं में काम कर रहे विदेशी भागीदारों ने अपने हाथ खींच लिए थे. इसके बाद ज़्वेज़्दा शिपयार्ड पर पाबंदी लगा दी गई थी, जिससे रूस के बर्फ़ तोड़ने वाले LNG जहाज़ बनाने की क्षमता पर चोट पहुंचे और वो अपने यहां से तरल प्राकृतिक गैस का निर्यात न कर सके. हाल ही में अमेरिका के वित्त विभाग ने होबस्की LNG, आर्कटिक LNG-1 और आर्कटिक LNG-3 पर भी पाबंदी लगाने का प्रस्ताव रखा है और साथ ही साथ मरमंस्क LNG और वोस्तोक ऑयल के लिए पाइप लाइन बिछा रही कंपनियों पर भी पाबंदी लगाने का प्रस्ताव दिया गया है. चूंकि पाइप लाइन बिछाने के मामले में रूस तकनीकी रूप से कमज़ोर है और वो पश्चिमी कंपनियों पर निर्भर है. ऐसे में इन प्रतिबंधों का असर रूस के भविष्य के LNG प्रोजेक्ट पर पड़ेगा.

हंगरी जैसे यूरोप के कई देश अभी भी रूस से प्राकृतिक गैस ख़रीद रहे हैं, क्योंकि उनकी ऊर्जा की मूल्य संवर्धन श्रृंखलाएं अभी भी रूस से जुड़ी हुई हैं.

2022 के बाद से यूरोप ने रूस की प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल कम कर दिया है और अब वो LNG पर निर्भर है, जो रूस, क़तर, अमेरिका और दूसरे स्रोतों से यूरोप पहुंचती है. इसकी वजह से यूरोप में LNG के कई टर्मिनल बंदरगाह, जैसे कि नीदरलैंड का ज़ीब्रुग, रूस की LNG को प्राप्त करने के अड्डे बन गए हैं. हंगरी जैसे यूरोप के कई देश अभी भी रूस से प्राकृतिक गैस ख़रीद रहे हैं, क्योंकि उनकी ऊर्जा की मूल्य संवर्धन श्रृंखलाएं अभी भी रूस से जुड़ी हुई हैं. इसकी वजह ये है कि सोवियत संघ के ज़माने से ही हंगरी जैसे देशों के ऊर्जा उद्योग रूस पर बहुत अधिक निर्भर रहे हैं.

Figure 1.1: दिसंबर 2023 से फरवरी 2024 के दौरान आर्कटिक LNG-2 का मासिक गैस उत्पादन

Western Sanctions Against Russia 1

Source: OSW, Centre for Eastern Studies 


 

इन प्रतिबंधों का कितना असर हुआ है?

इन पाबंदियों ने रूस पर असर डाला तो है, लेकिन वो ऐसा नहीं है जिसकी उम्मीद लगाई गई थी. रूस की अर्थव्यवस्था पहले से ही ख़ुद को इन प्रतिबंधों के मुताबिक़ ढालने की तैयारी कर रही थी. सरकार ने अर्थव्यवस्था को सेक्टरों में बांट दिया था: फ़ायदा कमाने वाले सेक्टर- हाइड्रोकार्बन, धातुएं, खनिज, कृषि वग़ैरह, और दूसरों पर निर्भर सेक्टर यानी ऑटोमोबाइल्स, उड्डयन, जहाज़ निर्माण, पेंशन और उपकरणों के ज़्यादा इस्तेमाल वाले सेक्टर. ये सेक्टर आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं. 2015 में रूसी अर्थव्यवस्था के तमाम सेक्टरों में आयात घटाने वाली नीतियां लागू की गई थीं, जिनका लक्ष्य 2030 के लिए निर्धारित किया गया था. दुनिया में ऊर्जा की मांग और कमोडिटी बाज़ार में क़ीमतों में उछाल के ख़तरों की वजह से पश्चिम ने अन्य देशों द्वारा रूस से तेल ख़रीदने और उसके तेल को शोधित (refine) करने की अनदेखी कर दी. रूस को अपने उत्पादों के लिए बाज़ार हासिल करने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं हुई. हालांकि, उसके मुनाफ़े में लगातार कमी आती जा रही थी. कुछ सेक्टरों पर प्रतिबंधों का असर कहीं ज़्यादा हुआ है. मिसाल के तौर पर उड्डयन उद्योग में सुखोई सुपरजेट 100 सीरीज़ जैसे स्वदेश में बनने वाले विमानों के लगभग 70 प्रतिशत कल पुर्ज़े उन देशों से आयात किए जाते थे, जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए थे. इन चुनौतियों के बावजूद रूस प्रतिबंधों की मार सह पाने में सफल रहा है. क्योंकि रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने में दुनिया के सभी देश शामिल नहीं हैं. शुरुआत से ही पश्चिमी देशों के वित्तीय नेटवर्क के साथ जुड़े सभी देश किसी न किसी रूप में प्रतिबंधों का पालन कर रहे हैं. जैसे कि वित्तीय पाबंदी या फिर दोहरे इस्तेमाल वाली वस्तुओं के आयात पर रोक. इस साल की शुरुआत से रूस के सबसे क़रीबी साझीदारी चीन ने द्वितीयक स्तर के प्रतिबंधों की धमकी मिलने के बाद रूबल में लेन-देन करना बंद कर दिया है. प्रतिबंधों के बावजूद पिछले साल रूस और चीन के बीच व्यापार 240 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. इसी तरह, भारत के साथ रूस का व्यापार जो युद्ध से पहले 10 से 13 अरब डॉलर के बीच चल रहा था, वो वित्त वर्ष 2023 में बढ़कर 65 अरब डॉलर तक पहुंच गया.

केंद्रीय बैंक की भूमिका

दूसरा, रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का असर कम करने में केंद्रीय बैंक की भूमिका बेहद अहम रही है. युद्ध के शुरुआती दिनों में ब्याज दरों को अस्थायी रूप से 20 फ़ीसद तक बढ़ा दिया गया था, और कंपनियों को अपने फंड विदेश भेजने पर रोक लगा दी गई थी. इससे रूस से पूंजी बाहर निकलने को रोका जा सका. इसके अलावा कंपनियों को अपने 80 प्रतिशत राजस्व को रूबल में तब्दील करने को कहा गया. पूंजी पर इस तरह के नियंत्रण वाले क़ानूनों की वजह से रूबल को, प्रतिबंधों के झटके सह पाने में आसानी हो गई. कार्नेगी रशिया यूरेशिया सेंटर की फेलो अलेक्सांद्रा प्रोपेंको के मुताबिक़ पुतिन के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं: युद्ध के लिए लगातार पूंजी मुहैया कराने के साथ साथ ये भी सुनिश्चित करना कि रूसी नागरिकों के रहन-सहन के स्तर में ज़्यादा गिरावट न आए. इसके साथ साथ उन्हें ये भी सुनिश्चित करना है कि रूस की अर्थव्यवस्था का व्यापक संतुलन न बिगड़ जाए. ये तीनों लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल है, क्योंकि ये एक दूसरे के विरोधाभासी हैं.

वैसे तो प्रतिबंध लगे हुए हैं. लेकिन, रूस में रोज़गार का स्तर इस वक़्त अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है; इसकी वजह रूस की अर्थव्यवस्था का ख़ुद को युद्ध की अर्थव्यवस्था में तब्दील करना और यूक्रेन युद्ध की वजह से औद्योगिक मांग का बढ़ना रही है. हालांकि, सैन्य उद्योग की क्षमता बढ़ाने पर किए जाने वाले ख़र्च के लगातार बढ़ने और यूक्रेन में नए क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की वजह से न केवल महंगाई बढ़ने का डर है, बल्कि ऐसे आर्थिक विकास की भी आशंका है, जिससे आख़िर में रूस की अर्थव्यवस्था ठहर सकती है. रूस के LNG उद्योग पर लगातार बढ़ती पाबंदियां निश्चित रूप से उसके लिए चिंता का विषय हैं. क्योंकि इन प्रतिबंधों से एक तरफ़ तो निर्यात से आमदनी घटेगी, वहीं आयात का ख़र्च बढ़ता जाएगा.

निष्कर्ष

13 जून को जर्मनी ने प्रतिबंधों के नए पैकेज को लागू करने को लेकर आशंकाएं ज़ाहिर कीं. क्योंकि जर्मनी की कुछ कंपनियों को प्रतिबंधों के उल्लंघन का ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. दुनिया के ऊर्जा बाज़ार आपूर्ति और मांग के आधार पर काम करते हैं. अगर रूस की तरल प्राकृतिक गैस पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं, तो मांग पूरी करने के लिए अन्य देशों की क्षमताओं में बढ़ोतरी करने की ज़रूरत पड़ेगी. क़तर दुनिया में LNG का एक बड़ा निर्यातक है. लेकिन, उसके पास 2027 तक नए ख़रीदारों को LNG निर्यात करने की क्षमता ही नहीं है, और चूंकि ऊर्जा सुरक्षा एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है, ऐसे में अक्सर प्रतिबंधों से बच निकलने या फिर रियायतें हासिल करने के रास्ते निकाल ही लिए जाते हैं. रूस के ऊपर लगाई गई पाबंदियों का असर तो हो रहा है. लेकिन, ईरान या फिर उत्तर कोरिया के उलट राष्ट्रीय शक्ति के तत्व; आबादी का आकार, संसाधनों की खेप और संपत्ति जैसे कारक रूस के पक्ष में हैं. इन्हीं वजहों से वो दुनिया में ऊर्जा के निर्यात का बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है. इसका मतलब ये है कि जिन 45 देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं, उन्हें इनको कारगर बनाने के लिए पहले रूस को बाक़ी दुनिया से अलग-थलग करना पड़ेगा. चूंकि हाल फिलहाल में ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं दिख रहा है. ऐसे में आम रूसी नागरिकों की ज़िंदगी में फौरी तौर पर कोई बड़ा बदलाव आने की आशंका नहीं है.

 

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Rajoli Siddharth Jayaprakash

Rajoli Siddharth Jayaprakash

Rajoli Siddharth Jayaprakash is a Junior Fellow with the ORF Strategic Studies programme, focusing on Russia’s foreign policy and economy, and India-Russia relations. Siddharth is a ...

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